Friday, June 21, 2024
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सतीश उपाध्याय का नवगीत – मुझ में ही सपने पलते हैं

मैं नयन हूं
मुझ में ही सपने पलते हैं
कई पतझड़, मधुमास समेटे
पलकों में रहते हैं
**
सपनीले रंगों का मुझमें
हरियल एक संसार बसा है
चटकीले, पीत स्वर्ण सा
अमलतास का प्यार बसा है
मुझ में गूंज समुंदर की
और मीठे झरने बहते हैं
मैं नयन हूं
मुझ में ही सपने पलते हैं
*
उम्मीदों के नव पल्लव
मेरे भीतर मुस्काते हैं ,
हरियाली की धड़कन मुझमें
गुलमोहर भी गाते हैं
पतझड़ के आंसू भी इसमें
मोती बनकर ढलते हैं
मैं नयन हूं
मुझ में ही सपने पलते हैं
*
मुझमें झंझावात समाए
सागर की गहराई भी
पलती है खामोशी से
जीवन की सच्चाई  भी
रातों को महकाने मुझमें
पारिजात भी खिलते हैं
मैं नयन हूं
मुझ में ही सपने पलते हैं
*
पलकों में मधुमास थिरकते
मौसम जब गाने लगते हैं
तब ख्वाबों में नीड़ बनाने
सपने भी आने लगते हैं
यादों की पुरवाई से
सुर्ख पलाश दहकते हैं
मैं नयन हूं
मुझ में ही सपने पलते हैं
कई पतझर, मधुमास समेटे
पलकों में रहते हैं।
सतीश उपाध्याय
सतीश उपाध्याय
ऋचा प्रकाशन दिल्ली एवं नेशनल बुक ट्रस्ट दिल्ली से नवसाक्षर साहित्य माला के अंतर्गत दो पुस्तकों का प्रकाशन। देश के प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में नवगीत व्यंग एवं बाल कविताओं का प्रकाशन, कुछ कविताओं, क्षणिकाओ का पंजाबी में अनुवाद लेखन अवधि - 50 वर्ष सेवानिवृत्त व्याख्याता (संस्कृत)
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