Saturday, May 18, 2024
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शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’ के पाँच नवगीत

1. कई कबूतर
घर की छत पर
पर्व मनाने
आ जाते हैं कई कबूतर |
यद्यपि इन्हें नहीं पाला है
लेकिन पाले जैसे लगते,
नई-नई लय की ध्वनियों से
अभिधाओं को ज्यों हों जपते,
पीड़ाओं के
पैर दबाने
आ जाते हैं कई कबूतर |
छिटके हैं जो दाने चुगते
अभिनव मंत्र सुनाते रहते,
जिनकी मधुर अपरिचित भाषा
उड़-उड़ जाते-आते रहते,
थके हुए
मन को बहलाने
आ जाते हैं कई कबूतर |
इनसे हँस परिचय करती है
नवगीतों की भाषा-शैली,
इनसे ही अनुभूति निरंतर
भरती है बिंबों की थैली,
सुधियों को
रह-रह सहलाने
आ जाते हैं कई कबूतर |
2. हम अनिकेत रहे
जीवन बीता बनजारा-सा,
सड़कों पर ही,
हम अनिकेत रहे |
जीवन-यात्रा की गलियों के
हर आँगन का लेखा,
चले अगर आगे तो पीछे
मुड़कर कभी न देखा,
आसमान का घेरा ही छत,
महल समझ ही,
हम अनिकेत रहे |
एक ओर थे ऊँचे पर्वत
एक ओर थी खाई,
चलने के पदचापों में भी
बजती थी शहनाई,
थिरक उठे साहस के घुँघरू,
झनन-झनन ही,
हम अनिकेत रहे |
नदियों की जलधाराओं से
गाने का गुण पाया,
झरनों की कल-कल ध्वनियों की
मधुर गीत था गाया,
भू-तल समझा सहज बिछौना,
बिना कहे ही,
हम अनिकेत रहे |
3. अच्छे दिन आए
लघु रेडियो
तरंगों के हैं
अच्छे दिन आए |
बिंबों के प्रतिबिबों का हर
गट्ठर ढोती हैं,
श्रव्य-दृश्य कणिकाओं के तल-
घर में सोती हैं,
उलझे हुए
असंगों के हैं
अच्छे दिन आए |
वैज्ञानिक क्षमताओं का ध्रुव
सूर्य उगाते हैं,
सद्भावों की गरिमाओं का
दीप जलाते हैं,
उड़ती हुई
पतंगो के हैं
अच्छे दिन आए |
धैर्य, शान्ति, समझौतों के नव
गीत सुहाने हैं,
खेलकूद हैं, समाचार हैं,
नए-पुराने हैं,
छाए हुए
मतंगों के हैं
अच्छे दिन आए |
4. सोचिएगा
इस नए बदले समय में,
आततायी हो गया है,
आज खंजर,
सोचिएगा |
कहीं बादल बरसता है,
शहर डूबा,
कहीं सूखा, मुँहफटा तट,
तंग सूबा,
बिना बोले फटा बादल,
कब हँसेगी गाँव  वाली,
भूमि बंजर,
सोचिएगा |
चंद्रमा पर खोजता जल,
आदमी जब,
भूख को भोजन मिलेगा,
तब कहें कब,
इस सहज परिवेश में भी,
जीवनक यायावरी का,
बना कंजर,
सोचिएगा |
खेत को अट्टालिका का,
कल बुलावा,
योजना करती रही है,
छल भुलावा,
इस विकट पर्यावरण में,
क्या हँसेगा फुनगियों पर,
मौन मंजर,
सोचिएगा |
5. एक पीपल का फिर कल निधन हो गया
अब कहाँ घंट टाँगेंगी,
अगली सदी,
एक पीपल का फिर कल निधन हो गया |
ये बदलेगा मौसम,
पता है किसे,
वह न आया, बुलाया
गया है जिसे,
किन्तु की दुश्मनी ने
गजब दलबदल,
साँप का नेवलों से मिलन हो गया |
क्या घटे, कब घटे, दुख
रहा यह सता,
रोज अपना बदलती,
वसन जब लता,
सूक्ष्म कपड़ों का ऐसा
हुआ है चलन,
अब दुकानों से गायब चिकन हो गया |
अग्निबाणों से कब यह,
डरा है गगन,
बम गिरा, पर कहाँ यह,
मरा है यतन,
लौट आया उपग्रह
गया चाँद तक,
इस तरह से सफल है मिशन हो गया |
शिवानन्द सिंह सहयोगी
शिवानन्द सिंह सहयोगी
संपर्क - shivanandsahayogi@gmail.com
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