जिस दौर में जब सारा देश कोविड जैसी महामारी से जूझ रहा हो, तब संगीत सम्राट तानसेन की जन्मस्थली बेहट (ग्वालियर, मध्यप्रदेश )में सैकड़ों किसान मजदूरों का तन्मय होकर शास्त्रीय संगीत सुनते हुए देखना बीते साल (2020) का सबसे सुंदर दृश्य हो सकता है।
यह दृश्य पूरे भारत में और कहीं नहीं दिखाई देता। आमतौर पर शास्त्रीय संगीत की सभाओं में पढ़ा लिखा शहरी भद्रलोक ही दिखाई देता है। यह मुगल बादशाह अकबर के नवरत्नों में से एक तानसेन ( 1493-1586) के संगीत का जादू है जो उनके जाने के 435 साल बाद भी बरकरार है। पिछले 96 साल से इस महान संगीतकार की याद में होने वाले तानसेन संगीत समारोह (26-30 दिसंबर, 2020) में ऐसे दृश्य आम है।
तानसेन का असली नाम रामतनु पांडे था जिनका जन्म ग्वालियर के पास बेहट गांव में 1493 से 1500 ईसवी के बीच हुआ था। वे रीवा नरेश राजा रामचंद्र सिंह के दरबारी थे। उनके गायन की शोहरत से प्रभावित होकर मुगल बादशाह अकबर ने 1562 में उन्हें अपने दरबार के नौ रत्नों में शामिल किया था।
अकबर की बेटी मेहरून्निसा से प्रेम विवाह करने के कारण उन्हें इस्लाम कबूल करना पड़ा और अकबर ने उनका नाम मियां तानसेन रखा। वे वृंदावन मथुरा के स्वामी हरिदास के शिष्य थे और बाद में सूफी संत मोहम्मद गौस की सोहबत में आए। उनके संगीत में वैष्णव और सूफी परंपरा का मिश्रण है।
पापुलर कल्चर में भी तानसेन की जबरदस्त लोकप्रियता रही है। उनपर 1943, 1958 और 1962 में तीन तीन बार फिल्में बन चुकी है। अस्सी के दशक में उनपर पाकिस्तान में एक टीवी सीरियल बहुत सफल रहा था। विजय भट्ट की फिल्म ” बैजू बावरा “(1952) सुपर हिट रही थी जिसमें भारत भूषण और मीना कुमारी ने मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं।



अजित राय जी तानसेन समारोह पर सकारात्मक और सार्थक टप्पणी के लिए साधुवाद यह समारोह गौरव है मध्यप्रदेश का और अब अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी शास्त्रीयता का विस्तार हो रहा है ।
साधुवाद
डॉ प्रभा मिश्रा