चाँद से लेकर मंगल तक पहुंचने वाले देश के लोगों की सोच अभी तक कपड़ों के इर्दगिर्द घूमती है . घरों और चौपाल से लेकर नेताजी के भाषण तक चहुँ ओर पहनावे की बात होती है |  इन्सान की पहचान ,इंसान की इज्जत मान सब सिर्फ उसके पहनावे से ही तय होता है |
इस देश के लोग तो इतने त्रिकालदर्शी हैं कि पहनावा देखकर बता देते हैं कि कौन संस्कारी कौन कु-संस्कारी |  कमाल की बात है ना, यहाँ इन्सान से ज्यादा कपड़ों की कद्र है और कहते हैं इंसानियत नहीं बची .जींस पहनने से संस्कृति को खतरा हो जाता है और कपड़े देखकर संस्कार भी भाग जाते हैं… इनका वश चले तो संस्कारों का ड्रेसकोड बना दें |

अर्चना चतुर्वेदी की चुटकी - संस्कारों का ड्रेस कोड 3

कल्पना करके देखिये  जिस तरह कई नौकरियों में ड्रेसकोड होता है कई पार्टियों में ड्रेसकोड होता है उसी तरह संस्कारों का भी ड्रेस कोड होता तो क्या होता ?  इसके लिए सबसे पहले संसद में बहसें होती कि कौन सा ड्रेसकोड उचित होगा जिसे पहन संस्कार आयेंगे और भारतीय संस्कृति की रक्षा होगी फिर एक ड्रेसकोड कमेटी का गठन होता जो इस बात की खोज करती कि महिलाएं या पुरुष कौन सी ड्रेस पहनेंगे जिनसे संस्कार ज्यादा अच्छे आयेंगे |
दूसरी तरफ नेताजी अपने भाषणों में ड्रेस से संस्कार तक की बातें करते ..उनकी बातों से संस्कार भी कन्फ्यूज हो जाता कि क्या उसकी जरुरत सिर्फ नारी को है नर को नहीं ..संस्कार बेचारा हैरान परेशान सा घूमता क्योंकि  उसे हर तरफ ..हर कोई सिर्फ नारी के कपड़ों की बात करता नजर आ रहा है |

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