इस डिजिटल क्रांति युग में जिस तरह वर्क फ्रॉम होम की शानदार सुविधा शुरू हुई ही है। आजकल इंसान लड़ाइयां भी क्लेश फ्रॉम होम की तर्ज पर ही निपटाने में विश्वास करते हैं। वे जमाने गए जब लोग गलियों और सड़कों पर लठ लेकर लड़ते थे,औरतें आंगन और नल पर एक दूसरे के बाल खींचती थी । बीच बचाव कराने वाले की भी स्पेशल भूमिका होती थी । आजकल बड़ा सिम्पल है लड़ना …घर बैठकर फेसबुक और वाट्सेप से ही बड़ी बड़ी लड़ाइयां लड़ी जा रही है| डिजिटल लट्ठ से लेकर बंदूकें तक चल जाती हैं ।
स्वार्थ और निजी आराम को तवज्जो देते लोगो के खून का टेंपरेचर माइनस से नीचे पर चल रहा है..कितनी भी बड़ी मुसीबत आए खून में उबाल आना नामुमकिन हो चुका है | बहुत असहनीय मुद्दा हो तो भी इन वीरों का खून हल्का गुनगुना ही हो पाता है॥ एडवांस टेक्नोलोजी का पदार्पण के साथ गलियों में और मुहल्लों में होने वाला मनोरंजन बैडरूम तक जा पहुंचा सो आज का इंसान बिस्तर पर पड़े पड़े ही ए के 47 चला कर दुश्मन को ढेर कर देता है।

