आज आपको एक शहर की कहानी सुनाती हूँ ..एक ऐसे शहर की जो आपको अपने शहर की याद दिला देगा…चमक दमक से भरा पूरा, बड़े बड़े शॉपिंग मॉल आसमान छूती इमारतें ..इन इमारतों से बातें करते फ़्लाइओवर ..चौड़ी-चौड़ी सड़कें और उनपर बने बल्बनुमा यू टर्न इस शहर को मानो अलग से परिभाषित करते हैं.
इस चमकते-दमकते शहर में जगह जगह कूड़े के ढेर मानो स्वच्छता अभियान को सीधी चुनौती देते प्रतीत होते हैं ..ऐसा कतई नहीं है कि यहाँ का प्रशासन साफ़ सफाई जैसा पावन कार्य करना नहीं चाहता. ये पूरे दिलो जान से सफाई करते हैं.. यहाँ तक कि उसके सबूत भी छोड़ते हैं. नालों की सफाई हर साल की जाती है उसके लिए बरसात शुरू होने का इन्तजार ऐसे किया जाता है मानो नई ब्याहता बरसात में पीया संग भीगने का सपना लिए हुए सावन के आने का करती है.  
बरसात शुरू होते ही हाल ही में हिरोइन बनी जेसीबी लहराती हुई आती है और पूरी शिद्दत के साथ नालियों का कूड़ा और गंदगी बाहर निकाल कर ढेर लगा देती है. भले ही इस कार्य में नए बने फुटपाथ की बलि ही क्यों ना चढ़ जाए पर जेसीबी अपना कार्य पूरी लगन और ईमानदारी से सम्पन्न करती है. टूटा फुटपाथ और बिखरा कूड़ा मानो ताल से ताल मिलाते सबको मुहं चिडाते नजर आते हैं...

अर्चना चतुर्वेदी की चुटकी - कथा एक शहर की 3

दूसरे देशों में भले ही ये फुटपाथ लोगों के चलने के लिए हों पर  हमारे देश में लोगों के  चलने के अलावा सब कुछ चलता है …गोलगप्पे वाले की दूकान …चाय की टपरी ….रजाई गद्दे का बिजनस …पंचर वाले का अड्डा …तो परांठे वाले से लेकर चाइनीज फूड तक की दुकानदारी सब कुछ फुटपाथ की शोभा बढ़ाते हैं ..कहीं बस स्टॉप तो कहीं गरीब का बसेरा .. फुटपाथ की एक अलग ही दुनिया है ..और अलग है इसका जीवन …जो रोज उखड़ता है और रोज बसता है. ये फुटपाथ ना होते तो बेचारे पुलिसवालों के सपने कहाँ से पूरे होते..कुल मिलाकर ये फुटपाथ कई घरों की जिम्मेदारियां अपने कंधो पर उठाये हैं. ऐसे में दुखी भी वही लोग ज्यादा होते हैं…
आम जनता गंदगी और टूटा फुटपाथ देख कर मुँह फेर निकल जाती है ..जागरूक और जुगाड़ू जनता फोटो खींच कर किसी अखबार को मेल कर देती है और अपना फोटो देख खुश हो जाती है.
उसके बाद कूड़े के ढेर अपने अंतिम संस्कार यानी उठने का इंतजार करते-करते वापस नाले में अपना मुँह छुपा लेते है. गंदगी से लबालब भरे नाले पूरे माहौल को खुशबूदार और मच्छरों की आरामगाह में तब्दील कर प्रसन्न नजर आते हैं…
कुछ शक्की लोगों को लगता है कि यहाँ का प्रशासन और फुटपाथ बनाने वालों की जय-वीरू की जोड़ी  है. असल में तो जेसीबी नालों की सफाई नहीं करने आती बल्कि फुटपाथ तोड़ने ही आती है. फुटपाथ बनने का और टूटने का सिलसिला यूँ ही सतत चलता रहता है.. यहाँ का ईमानदार प्रशासन निरंतर सफाई कार्य में जुटा रहता है और यहाँ की जिम्मेदार जनता नालों और सड़कों की गंदगी बढ़ाने में अपना पूरा सहयोग प्रदान करने में कोई कसर नहीं छोडना चाहती सो अपने कूड़े-करकट.. थूकने और बाकी ऐसे वाले काम जिन्हें मुँह फेर कर किया जाता है उन्हें भी इन्ही नालों में निपटा अपना नागरिक कर्तव्य पूरा करती है…
इति शहर कथा समाप्त..

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