कुछ पुरानी चीजें भले ही वे जीर्ण-शीर्ण हो जाएँ, इतनी आत्मीय हो जाती हैं कि उन्हें छोड़ने का मन ही नहीं करता। आप गलत नहीं समझें, मैं अपनी प्राणप्रिया की बात नहीं कर रहा, अपने प्रियतम जूतों की बात कर रहा हूँ। कोई बीस साल पहले मैंने ‘हश पपीज़’ के इन जूतों को अमेरिका में पेन्सिलवेनिया की एक मॉल से भारी सेल में खरीदा था। ऐड़ी से ऊपर वाले तांबई-लाल रंग के जूते। तब मैं पचास वर्षीय युवा था और उन चमचमाते जूतों में पाँव डालते ही शरीर कॉलेज के छात्र जैसा युवतर हो जाता था। पैंसठ का हुआ तो मैं सेवानिवृत्त कर दिया गया पर अपने जूतों को मैं ‘रिटायर’ नहीं कर पाया। उनकी ऊपरी त्वचा पर ‘चेरी ब्लॉसम पॉलिश’ के मेकअप के बाद झुर्रियों के निशान ओझल हो जाते थे। अजीब बात यह थी कि मेरे चेहरे पर ऐसी चेरी ब्लॉसम लगाने से मेरी झुर्रियाँ मुखर हो उठती थीं।
उन पंद्रह वर्षों में जूतों की देह ने मेरे चरण कमलों का आकार ले लिया था। पैर और जूते एक-दूसरे में ऐसे ‘फिट‘ होते कि परस्पर कहने लगते ‘तुझे बनाया गया है मेरे लिए‘। उन्हें पहनकर मैं धरा पर पग धरता तो लगता तो जैसे शंहशाह शेरशाह सूरी चल रहा हो। उन्हें पहन कर जब मैं सरकारी दफ्तर में मार्चपास्ट करते हुए घुसता तो लगता जैसे पेंशन प्रकरण की फाइल पर बैठे क्लर्क का पिंडदान करने वाला होऊँ। घनिष्ठ साथ था हमारा। बस, बार-बार ऐड़ी की रगड़ खा कर जूतों के प्रवेश द्वार की गद्दी फट गई थी। गद्दी के नर्म चाम्र की तुरपाई कर उस पर नई पट्टी लगवाने से वे पुनः पदासीन होने योग्य हो गए थे। उनकी ठसक वैसी ही थी जैसे कोई सेवानिवृत्त जज किसी आयोग का अध्यक्ष बना दिया गया हो।
मैंने नए जूते खरीदने के बहुतेरे प्रयत्न किए। उस चक्कर में, कालांतर में एक-एक करके चार जोड़ी नैमब्रांड जूते खरीद लाया, पर कोई भी नया जूता हश पपीज़ के जूतों जैसा ‘फिट‘ नहीं बैठा। किसी ने ऐड़ी में काटा तो किसी ने पंजों को भींच कर रख दिया। नए जूतों की आत्मा (सोल) इतनी चिकनी होती कि अच्छे फर्श देख कर फिसल जाती। उनकी काया इतनी कोमल और तन्वंगी होती कि उबड़-खाबड़ सड़क पर पाँव पड़ते ही जूता चीखने-चिल्लाने लगता। तब मैं भी दर्द से चीख पड़ता और घर आकर पुन: अपने पुराने जीवन साथी हश पपीज़ को निकालता, पॉलिश करता। जैसे ही वे चमकते, मेरे चेहरे की आभा लौट आती।
ऐसा नहीं था कि मैं हश पपीज़ के स्टोर पर नए जूतों की तलाश में नहीं गया। नौ नंबर के नए जूते मिल जाते, पर वे आगे से ‘वाइड‘ नहीं होते। कभी वे पंजों जितने चौड़े होते पर पीछे से ऐड़ी जैसे सँकरे नहीं होते। मुझे मनुष्यों के चरित्र की तरह आगे से ‘खुलेमन‘ के और पीठ पीछे संकीर्ण लोगों का साथ निबाहने की आदत हो गई थी, इसलिए मैं अपने सहचर जूते भी वैसे ही चाहता था। सैल्समैन ने बताया कि जूता कंपनियों ने आदमी के चरित्र के अनुरूप जूते बनाने बंद कर दिए थे। पुराने हश पपीज़ को यथासमय ‘रिटायर‘ कर पाने की मेरी इच्छा इसलिए पूरी नहीं हो पा रही थी। पत्नी को कौतुहल होता कि मैं उन जूतों को इतना प्यार क्यों करता हूँ! इतना प्यार यदि मैं भगवान को करता वे ही साक्षात् आ जाते। उनके तंज को मैंने प्रेरणादायी समझ कर ग्रहण कर लिया। बच्चे मुझे इन जूतों में देखते तो खानदानी कंजूस समझते। अपरिचित लोग ‘बनाना रिपब्लिक‘ के सूट के नीचे पुरातन हश पपीज देखते तो मुझे सठियाया समझते। एक प्रभु श्रीराम की चरण-पादुकाएँ थीं, जिन्हें सम्राट-सा गौरव मिला था। अयोध्यावासी चरण पादुकाएँ देखते ही कह उठते थे, ये तो प्रभुश्री राम की चरण पादुकाएँ हैं। मेरे इन जूतों का भाग्य भी ऐसा ही कुछ था। दोस्तों और परिचितों के घर किसी उत्सव में जूते बाहर खोलकर जब लोग भीतर तशरीफ ले जाते तो मेरे चमकते हश पपीज़ देख कर वे समझ जाते कि मैं वहाँ हूँ। मेरे जूते मेरी पहचान बन गए थे। जूतों की भीड़ में पड़ी सैकड़ों जूतियाँ हश पपीज़ को देख कर कहतीं, अरे तुम वही व्यंग्यकार धर्मपाल के सुपरिचित और सुप्रसिद्ध जूते हो।
बीस सालों में आज चौथी बार इन जूतों के फट रहे मुँह की बारीक तुरपाई करवाने आया हूँ। हमारा शू-मेकर, जिसे घटिया सोच वाले लोग मोची कहते हैं, ने उलट-पुलट कर जूते देखे और प्रसन्न हो गया। कहने लगा अरे आप वही जैन साहब हैं जिनके इन जूतों को मैं दस साल से ठीक कर रहा हूँ। आपकी शकल बदल गई, पर इन जूतों की नहीं बदली। भगवान करे जब तक ये जूते चलें, आप भी चलें। मैं जानता हूँ ये चरण पादुकाएँ अमर हैं और मैं मरणशील। मेरे जाने के बाद इन्हें किसी संग्रहालय में रखा जाना चाहिए, इस टीप के साथ कि स्वर्गीय व्यंग्यकार अपने उसूलों का पक्का था। लोग जिंदगी भर जूते खाते और बदल जाते, पर इस व्यंग्यकार ने न अपनी विचारधारा बदली न जूते बदले।
शू-मेकर तुरपाई करने के बाद क्रीम लगाकर जूतों पर पॉलिश कर रहा है। जूते फिर चमकने लगे हैं। मैं हकीकत जानता हूँ कि जो चमक रही है वह पॉलिश है, पर चमकने का श्रेय जूतों को मिल रहा है। बूढ़े-थके पाँव अपने अंतरंगी जूतों के बंधन में बंध जाना चाहते हैं। इस बंधन में सुख है, इनमें गति है और जीवन भी।


Well written Dharmpalji….
आदरणीय धर्मपाल जी!
हश पपीज़ के जूते बहुत-बहुत मुबारक सर!
भले ही बीस साल पहले आपने ‘हश पपीज़’ के इन जूतों को अमेरिका में पेन्सिलवेनिया की एक मॉल से भारी सेल में खरीदा था तो क्या? आखिर यह मोह का बंधन जो है। छोड़ना तो कठिन ही होगा।
यह भी अच्छा है कि आपका शू मेकर आपको पहचानने लगा। अब 10 बार सुधरवाने जाओ तो कैसे नहीं पहचानेगा!
और बताओ;घटिया किस्म के लोग उसे मोची कहते हैं यह तो वाकई उसकी तौहीन है। उनसे आपका पाला नहीं पड़ा यह अच्छा हुआ।
बेहतरीन बैंक के लिए बहुत-बहुत बधाई सर!
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