Tuesday, August 25, 2026
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सीमा सिंह की लघुकथाएँ

 ख्वाहिशों के छोर
“बस, मिष्ठी! यही आदत तुम्हारी नहीं पसंद है मुझे,” नाश्ते की ट्रे लेकर कमरे में प्रवेश करती माँ ने बिफरते हुए कहा।
पत्नी के क्रोधित स्वर से सहाय बाबू भी उठ कर चले आए। पूरा कमरा जंग का मैदान बना पड़ा था। बिटिया ने अपने कमरे में सारे कपड़े बिखरा रखे थे।
पिता को मुस्कुराता देख बिटिया को भी शह मिल गई।
“क्या, माँ? सब बेकार हैं, पुराने हैं! एक जोड़ा ऐसा नहीं है ,जिसको पहन पापा के साथ जा सकूँ!”
“भाई, बिटिया दो-एक साल में डॉक्टर बन जाएगी तो कपड़े तो ठीक-ठाक ही होने चाहिए उसके।
पिता का सहारा पा मिष्ठी और मुखर हो उठी। “आप ही देखिए पापा कितने बेकार कपड़े जमा कर दिए हैं माँ ने।”
“अभी दो सप्ताह पहले ही चार जोड़े इसको उठाकर दिए हैं मैंने,” आँगन में सफाई करती कामवाली की ओर इशारा कर श्रीमती सहाय अपने क्रोध को दबाते हुए बोली। “मैं कहती हूँ, जब पहनने नहीं होते हैं तो खरीदती ही क्यों हो?”
“वही तो! उसकी पसंद के खरीदा करो!” सहाय बाबू ने पत्नी से कहा।
एकलौती संतान की हर ख्वाहिश मुँह पर आने से पहले ही पूरी करने की इच्छा रखने वाले सहाय बाबू का बचपन बहुत तंगहाली में बीता था। इसी लिए वो अपनी बेटी की हर इच्छा पूरी कर देने की चाह रखते थे। किन्तु पत्नी दुनियादार महिला थी ,वो नहीं चाहती थी कि इकलौते होंने के कारण बेटी पैसे के महत्त्व को नकार बेपरवाह हो जाए।
“अबकी बार अच्छे कपड़े दिलवा देंगे, तुम मेरे साथ चलना।” पिता ने फुसफुसा कर पुत्री से कहा। और पत्नी से आँखों ही आँखों में खुशामद करते हुआ बोले, “ये बेकार पड़े कपड़े अगर मिष्ठी नहीं पहनना चाहती ,तो महरी को ही दे दो।”
उदास, आँगन बुहारती लड़की की आँखों में अचानक दीवाली के दिए जल उठे थे।

ज़रूरत

शूटिंग की तैयारी थी। सेट लग चुका था। बस निर्देशक महोदय के आने की प्रतीक्षा थी। उनके आते ही सब सचेत हो उठे।
“सब रेडी है?” आते ही अपने असिस्टेंट से पूछा।
“जी सर!” उसने मुस्तैदी से उत्तर दिया।
“एक बार सीन ब्रीफ करो।”
“जी, सीन है, माँ-बाप का लाड़ला बेटा रूठ गया है, तो माता पिता तरह-तरह की खाने पीने की चीज़े लाकर उसको मना रहे हैं और बच्चा गुस्से में फेंक रहा है।”
“और वो बाल कलाकार? उसका क्या हुआ? अस्पताल से छुट्टी मिल गई?”
“नहीं सर, पर दूसरे बच्चे का इंतजाम कर लिया है! यहीं पास की बस्ती से अरेंज किया है। सिर्फ दो सीन हैं बच्चे के, दो सौ रुपए रोज़ पर बुलाया है।”
“काम कर सकेगा?”
“जी सर, मैंने सब समझ दिया है।’
“ओके, चलो फिर, लाइट, कैमरा… एक्शन!”
“कट, कट, कट!”
“हाथ से रखना नहीं है, उठाकर फेंकना हैं,” असिस्टेंट ने झुँझलाहट काबू करते हुए कहा, “पहले केक और पेस्ट्री हाथ मारकर दूर गिराओ, फिर दूध का गिलास गिरा दो। ठीक?”
“चलो, फिर से,” डायरेक्टर ने खीजकर कहा- “एक्शन!”
“ओहो! कट! कट! कट! अबे, तुझको समझाया था ना? फेंक दे, नीचे गिरा दे! ये इतना सँभालकर क्यों रख रहा है?”
बच्चे ने सुबकते हुए कहा, “उन अंकल ने कहा था शूटिंग के बाद खाने का सारा सामान मैं घर ले जा सकता हूँ।”

जूठन

निशा इस घर की नौकरानी नहीं थी, मगर उससे ज्यादा भी कुछ ना थी। कहने को तो उसके चाचा-चाची का ही घर था, परन्तु माँ-पापा के जाने के बाद निशा कभी परिवार के सदस्य का सा सम्मान ना पा सकी।
“निशाSSS!” चाची ने पुकारा, “कहाँ थी? चल तैयार हो जा… कुछ माँग ले मुदिता से अच्छा सा पहनने को, लड़के वाले आते ही होंगे।” फिर मुदिता से उन्मुख होकर कहा, “बेटा तू तैयार है? जल्दी कर ले… और हाँ इसको भी कुछ देदे ठीक-ठाक सा पहनने को।”
“इसको क्या देना, ये तो हमेशा से उतरन में ही जँचती है… पहन ले ना मेरी कोई भी साड़ी। देख सामने पड़ी हैं।” फोन में घुसी अपने मंगेतर से चैट करती मुदिता ने निशा को व्यंग्यात्मक दृष्टि से देखा।
निशा भीतर तक बिंध गई।
कमरे से निकलते हुए मुदिता अपनी जूठी प्लेट उसके हाथ में थमा गई, “ले खा ले। मैं चली जाऊँगी तो मेरी जूठन नहीं मिलेगी…”
पत्थर बनी निशा जाती हुई मुदिता और जूठी थाली को देखती रही। अचानक उसके चेहरे पर कुटिल मुस्कान बिखर गई। विद्रूप हँसी के साथ निशा बुदबुदाई, “तू क्या जाने मुदिता, तुझको तो मेरी उतरन के साथ जीवन बिताना है…”
निशा के मन की सारी कड़वाहट शांत हो चुकी थी।
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तरक्की की सीढ़ी
घर में हो रही चहल-पहल और भाग-दौड़ से माँजी को समझ आ रहा था कि आज फिर बिटिया के घर जाना होगा।
बेटा बड़ा अफसर था, घर में महीने-दो-महीने मे ऐसी पार्टी, दावत होती ही रहती थीं। आधा शहर बाहर लॉन में इकठ्ठा हो जाता, मीट-मुर्गा और भी जाने क्या क्या पकता, और साथ में शराब की तो जैसे नदियाँ बह जाती थीं।
माँजी का जी उकता जाता इन सब से, तो उन्होंने बीच का रास्ता निकाल लिया था। पार्टी वाले दिन पास ही शहर में बसी अपनी बेटी के घर चली जाती थीं। वो बेटे जैसे अमीर तो नहीं, फिर भी खाने पहनने की कोई तंगी नहीं थी उसके वहाँ भी।
माँजी प्रतीक्षा कर रही थीं कि कब बहू आकर शाम की दावत की सूचना दे, जो इस बात का संकेत होता कि माँजी अपना सामान लगा लें।
दस बजने आया और कोई औपचारिक सूचना ना पाकर माँजी खुद ही पता करने बाहर निकली।
सामने पड़ी सीढ़ी को देख भुनभुना उठी। “दुछत्ती से सामान निकालने के बाद हटवा भी दिया करो इसको।।। दो महीने से यहीं की यहीं है। जब इसकी ज़रूरत पड़ेगी ,तो ये ही काम आएगी!”
सामने से आती बहू को देखकर पूछा- “दावत है क्या आज, बहू?”
“हाँ, माँ।” उत्तर पुत्र की ओर से मिला।
“मुझे किसी ने बताया भी नहीं! मैं बिटिया के घर चली जाऊँगी-” माँजी वापस अपने कमरे की ओर चली।
पुत्र ने रोकते हुए कहा। “नहीं, माँ, आपको कहीं जाने की जरुरत नहीं है। वो आज नेता जी घर पर आ रहे हैं, खास तौर पर तुमसे मिलने।”
“मुझसे मिलने?” जहान भर का अचरज माँजी के चेहरे से होकर स्वर में उतर आया।
“हाँ, माँ। वो आपके गाँव के हैं, नानी के गाँव के। मेरी फाइल उनके ऑफिस में अटकी पड़ी थी… मैंने आज खास आपसे मिलवाने के लिए उन्हें बुलवाया है।”
तभी माँजी ने देखा बहू आँगन में पड़ी सीढ़ी को झाड़कर किनारे सँभाल कर खड़ी करवा रही थी।

 बरसात

“अबकी गर्मी बहुत पड़ी है, पानी भी ज्यादा ही बरसेगा,” साहब अपनी पत्नी को मौसम सम्बन्धी ज्ञान दे रहे थे।
“क्या सच में ऐसा होता है?” मेम साब ने अचम्भित होकर पूछा।
“और नहीं तो क्या! हमेशा ही मौसम का ऐसा हाल होता है।” साहब ने और जोश से बताया।
“हनी, कब तक आ रहा है मानसून?” मेम साब ने इठलाते हुए पूछा।
“अभी लग जाएगा एक सप्ताह तक…” साहब ने बताया।
मेम साब की बेताबी उनके चेहरे पर दिख रही थी रामदेई को। और घर का काम निपटाती हुए रामदेई के चेहरे पर घिरे बादलों की कालिमा और आँखों में बरसात का पानी किसी को नज़र नहीं आया।

भुलक्कड़
“बहू! मेरी पूजा की थाली में फूल नहीं हैं।”
“लाई माँजी,” कहती हुई, उषा तेजी से पूजाघर की ओर भागी।
“सात बजने आया, चाय मिलेगी आज?” बाबूजी ने गंभीर स्वर में कहा तो चाय ले जाती उषा की चाल और तेज हो गई।
“माँ, मेरा टिफिन?” दीपू चिल्लाया, तो उषा बाबूजी के कमरे से उठाया अखबार पति को देने के बजाय किचन में ही साथ ले आई।
दीपू का दूध और लंच-बॉक्स देते हुए प्यार से उसके सिर पर हाथ फिराते हुए मुस्कुराई, “वाह, मेरा राजा बेटा तैयार हो गया! टिफिन पूरा खत्म करना।”
“क्या रखा है?”
“आलू का पराँठा।”
“पर आपने तो प्रोमिस किया था डोसा रखोगी! मुझे नहीं ले जाना आलू का पराँठा!” दीपू ने रूठते हुए कहा।
“आज ले जा, मेरा बच्चा, कल पक्का रख दूँगी!”
उषा और भी खुशामद करती दीपू की, तब तक पतिदेव के चिल्लाने की आवाज़ आई, “अखबार क्या छाप रही हो?”
“नहीं, सर जी! आपके लाडले को मनाने में भूल गई।” मुस्कुराते हुए उषा ने अखबार और चाय के दो प्यालों के साथ कमरे में प्रवेश किया।
दो घूँट भी ना पी होगी चाय, तब तक कामवाली की गुहार सुनाई दी, “बहू जी! निरमा खत्म हो गया है।”
चाय का प्याला हाथ में ले, कमरे से निकलते हुए पतिदेव से पूछा, “आप चने खाएँगे नाश्ते में?”
“नहीं!”
“फिर क्या बनाऊँ??”
“और कुछ भी। ये घोड़ा-दाना बाबूजी को मुबारक! मैं लंच पर घर नहीं आऊँगा, काम है मुझको।”
“आलू का पराँठा बना दूँ?”
“अरे! जो ठीक लगे बना दो।”
“आपको प्याज वाले आलू के पराँठें पसंद हैं, वही बनाती हूँ।” मुस्कुराती हुई उषा फ़टाफ़ट प्याज काटने लगी।
सासू माँ किसी काम से किचन में आईं और उषा के हाथ में प्याज देख कर उनका पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया।
“कल ही बताया था ना ,आज से सावन शुरू हो गएँ हैं? पूरे माह प्याज-लहसुन का प्रयोग नहीं होगा! मगर कुछ याद रहे तब ना। मैं तो धन्य हो गई, हे प्रभु! कैसी भुलक्कड़ बहू मिली है मुझे…”

  • सीमा सिंह, नोएडा 
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