Sunday, September 6, 2026
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सुनील गज्जाणी की तीन लघुकथाएं 

खिलौने
जन्माष्टमी उत्सव के मेले में मंदिर के बाहर फुटपाथ पर अपनी टोकरी में मिट्टी के खिलौने लिए वो बुढ़िया भी खिलौने बेचने वालों की कतार में जाकर  बैठ गयी । उसे आज उम्मीद थी कि  आज मेले के कारण कुछ अच्छी बिक्री हो जाएगी और  उसके मिट्टी के खिलौने जो कुछ दिनों  से जैसे के  तैसे पड़े थे बिक ही जाएंगे ! दो-तीन बच्चों को अपनी ओर आता देख वो अपने इन ख्यालों से बाहर निकल उत्सुकता से उन बच्चों की  मनुहार करने लगी !
“आओ बच्चों आओ, क्या दूँ  तुम्हें? ये देखो शेषनाग पर बैठे भगवान कृष्ण, ये बाल कन्हैया माखन खाते, ये साधु बाबा, ये मीरा बाई और ये है कबूतर, खरगोश, शेर, मोर इस प्रकार वो बुढ़िया अपनी टोकरी में रखें और खिलौने बड़े उत्साह से बता ही रही होती है कि बच्चें नाक-भौ सिकोड़ते हुए बोले !
” छी : ! हमें ये नहीं अगर आप के पास पजल गेम , हाथ वाला वीडियो गेम, रिमोट कार या मेंटली एक्सरसाइज वाला कोई गेम हैं तो हमें  दिखाईयें!  मगर बच्चों की ये टेक्निकल गेम वाली  बातें  पारम्परिक खिलौने बेचने वाली बुढ़िया की समझ से कोसो  परे थी।
खाना 
उसकी खाने की बहुत इच्छा थी मगर साहस  नहीं हो पा रहा था उसे हर वक़्त लगता  कि शायद कोई उसे देख रहा है उसके मन में  ये एक आशंका थी ! परन्तु वो यह भी  देख रहा था कि उसके सहकर्मी  जिनकी तोंदें  छिटकी , जो कोई ना कोई बीमारी से ग्रसित है मगर फिर भी खाने के शौकीन, वे  पेट में एसिडिटी होने के बावजूद बड़े चाव से और बहुत सलीके से अपने किसी प्रार्थी से मंगा कर खा जाते थे  ! मगर वो  दुबला-छरहरा  हो कर भी खाने से खूब  घबरा रहा था ! मगर उसकी प्रबल  इच्छा ज़रूर थी कि उसके शरीर पर कुछ चर्बी  चढ़े, थोड़ा थुलथुला बने । लेकिन अनभिज्ञ था गरिष्ठ खाने की प्रणाली से, कि कहाँ, किस प्रकार,  कैसे, किन सावधानियों के साथ खाया जाएं  ! उसके दफ़्तर उसकी सीट पर  जब कोई प्रार्थी  टिफिन भी लेकर आता तो किसी आशंका के भय  से इंकार कर देता था, सहकर्मी उसकी इस दशा को देख खिलखिला उठते और फिर उससे अपने खाने की प्रणाली का बड़ी शान से बखान करते। रोज-रोज सहकर्मियों के बखान से प्रेरित हो उसने आज खाने की ठान ही ली और एक प्रार्थी व्यक्ति को  कह बैठा, जिसकी एक लोन की फ़ाइल कुछ दिनों से उसने अपने पास रोक रखी थी ! उस व्यक्ति को अपना लोन पास करवाना था तो  जैसे-तैसे अपना चुल्हा  जला उसके लिए एक टिफिन की व्यवस्था कर लाया और उसे थमा व्यथित मुद्रा में बैठ गया ! टिफिन की महक से उसके मुंह में पानी भर गया  और उतावला हो खाने के लिए जैसे ही टिफिन से  रूपये  निकाले मगर  जो उसे  सदा आशंका रहती थी वो सच साबित  हो गयी| भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के  कर्मचारी आ धमके, खाने के छूने से चिकने हुए उसके हाथ  धुलवाने पर साफ़ होने की बजाय और सड़ गए, पीली चिकनाई से। व्यक्ति  मुस्कुरा उठा उसे सकपाता देख और  बोला-“माफ़ करना, मेरे बच्चों को सुकून से खाना नसीब नहीं हो रहा था तो तुम्हें कैसे खिलाता ! कोरोना के कारण मेरी छोटी-सी दुकान पूरी तरह रोज़ाना की आमदनी से  प्रभावित हो गयी  ! कर्ज़ा , ज़िम्मेदारियाँ, इस बिगड़े हालत में दाने-दाने को तरस-से  गए हम,  सोचा एक  लोन ले लूं तो  कुछ हालात सुधरे,  मानसिक पीड़ा कम हो ! मगर यहाँ हर रोज़ चक्कर कभी कुछ बहाना कभी कुछ कमी बताना फॉर्म में और आख़िरकार तुमने अपनी ये मुख्य मंशा ज़ाहिर कर दी कि काम झट करवाना होतो कुछ खिलाने की व्यवस्था कर दो ! अब तुम्हीं बताओ बाबू, ऐसे हालात में मैं क्या करता !” वो रुआंसा, बौखलाया गिरफ्तार होते समय बुत-सा कभी अपने सहकर्मियों को, तो कभी उस व्यक्ति को देखता, शायद ये सोचता कि इस खाने से परहेज ही करता तो बेहतर था !
संवेदना 
हाँ, तो अब मैं एक युवा कवयित्री को कविता पाठ के लिए आवाज़ दे रहा हूँ, मैं इनके सम्मान में सिर्फ इतना ही कहना चाहूँगा कि ये बेहद गंभीर, संवेदनशील मगर मन स्पर्श करती हुई कविताएं लिखती हैं और प्रासंगिक मुद्दों को लें अपनी कलम से बहुत से  सवाल पाठकों, श्रोताओं के समक्ष छोड़ जाती जाती हैं  ! ये भी हमारी संस्थान का सौभाग्य है कि  आज खुले मंच पर कवयित्री रुप में इनका पर्दापण हो रहा है तो चाहूँगा  की एक बार ज़ोरदार करतल ध्वनि से इनका जोरदार स्वागत किया जाएं  ! कवयित्री माईक पास आ खड़ी हो गयी, सभागार करतल ध्वनियों से गुंजायमान हो रहा था ! कवयित्री मंचस्थ कवियों का,  सभागार में उपस्तिथ श्रोताओं का  वंदन ,अभिंनन्दन शब्दों की बजाय़ आंगिग भावों से अभिव्यक्त कर रही थी ! शब्द मौन थे इस समय , ये देख सभागार में  फुसफुसाहट होने लगी !
‘अरे माईक अच्छों-अच्छों को हिला देता है !”
”अरे, कविता कवि की पीड़ा होती है , सींचता है वो अपनी गहरी अनुभूति से !”
कवयित्री अपनी डायरी हाथ में थामे कभी मंच को तो कभी सभागार को देखती !
‘ अनुभूतियां उम्र नहीं देखती , ये आज की कविता है कृपया आप प्रोत्साहन कीजिये ! सुनिये ,शाबास बेटा ! ” मंचस्थ वरिष्ठ कवि ने सभागार को शांत करते हुए निवेदन किया !
अब एक दम शांति सभागार में कवयित्री वाचन करने लगी !
‘ मेरी पहली कविता का शीर्षक है “भूर्ण हत्या” …..!” इतना कह वो सिसकने लगी ! सभागार ,मंच सब हैरान कुछ क्षण एक दम सन्नाटा फिर मंचस्थ वरिष्ठ कवि ने खड़े हो ताली बजायी और ये देख पूरा सभागार खड़े हो अनुसरण करने लगा मुक्त कंठों से सराहना करते हुए!  मानो इस सिसकियों ने जो  भाव  अपनी  इस संवेदनशील कविता के माध्यम से कहना चाहा वो पूरा कर दिया !
डॉ. सुनील गज्जाणी
(विद्यावाचस्पति)
अध्यक्ष बुनियाद साहित्य एवं कला संस्थान, बीकानेर
जोड़ना। : सुथारों की बारी गुवाड़
बीकानेर (राज.)
मोबाइल नंबर: 09950215557
http://www.aakharkalash.blogspot.com
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