Sunday, May 31, 2026
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रेखा श्रीवास्तव की लघुकथा – आहत

मिश्रा जी बगैर ये चिंता किए कि वह कुछ घंटे पहले पत्नी का अंतिम संस्कार करके आये है । तेजी से घर से निकल गये । घर के लोग चकित रह गये ।
वह सीधे कफन की दुकान पर गये और दुकानदार से बोले – ” एक व्यक्ति के अंतिम संस्कार में कितने का सामान लगता है ।”
“यही कोई तीन हजार का ।” लेकिन दुकानदार कुछ समझा नहीं क्योंकि ऐसा सवाल तो कोई करता ही नहीं है ।
“ये लीजिए चार हजार जमा कर लीजिए और रसीद बना दें मेरे नाम की ।”
दुकानदार विस्मय से उन्हें देखने लगा ।
“अरे भाई जब कोई आपको ये रसीद दे तो आप उसे सामान दे दीजिएगा।”
 “लेकिन बाबूजी इस तरह कोई नहीं करता ।”
“लेकिन मुझे करना पड़ रहा है ।” रसीद लेकर वह श्मशानघाट पहुँचे और वहाँ उपलब्ध सामान के दुकानदार से भी अग्रिम भुगतान कर रसीद ले ली और घर आ गये ।
उनके कानों में बेटे के शब्द गूँज रहे थे – “पापा अपना एटीएम दे दीजिए , मेरा हाथ बिल्कुल खाली है,  सामान मंगाना है ।”
वह बेटे का मुँह देखते रह गये और उन्होंने उठकर एटीएम देकर पासवर्ड बता दिया । उसी क्षण उन्होंने निर्णय लिया कि वह अपने लिए अग्रिम भुगतान करके व्यवस्था कर लेते हैं ताकि वह अपनी सम्पत्ति सन्तानहीनों के लिए दान कर सकें ।
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