इधर-उधर से : किताबें जो साल 2020 में मैंने पढ़ीं 3
तमाम ज़िल्लतें झेलने के बाद आख़िर साल 2020 अब विदा हो गया है। ये साल ज़ाहिर तौर पर पूरी दुनिया के लिए एक ऐसे सदमे की तरह गुजरा जो लम्बा याद रहेगा। मगर मेरे लिए इस साल की अच्छी बात यह रही कि अबकी पढ़ना ठीकठाक मात्रा में हुआ।
साल की शुरुआत चर्चित लेखक रत्नेश्वर सिंह के उपन्यास ‘एक लड़की पानी पानी’ से हुई, जिसने काफी प्रभावित किया। युवा लेखिका दिव्या विजय का कहानी-संग्रह ‘सगबग मन’ दूसरी किताब है, जिसे इस साल पढ़ा गया। इस संग्रह की कहानियाँ ध्यान खींचती हैं।
आईटीबीपी में डिप्टी कमान्डेंट एवं युवा लेखक कमलेश कमल के उपन्यास ‘ऑपरेशन बस्तर – प्रेम और जंग’ तथा अंकुर मिश्रा के कहानी-संग्रह ‘कॉमरेड’ से भी गुजरना हुआ। इनपर यही कहूँगा कि ‘ऑपरेशन बस्तर’ रोचक उपन्यास है, लेकिन कमलेश कमल के फुटकर लेखन में भारतीय संस्कृति एवं भाषा को लेकर उनका जो ज्ञान दिखता है, उसके मद्देनज़र कह सकते हैं कि उनका  श्रेष्ठ आना अभी शेष है। वहीं अंकुर मिश्रा के लेखन में भरपूर संभावनाएं हैं, अतः वे लिखना सतत जारी रखें।
वरिष्ठ लेखक-पत्रकार प्रमोद भार्गव का उपन्यास ‘दशावतार’ भी इस साल पलटा गया।  वरिष्ठ कथाकार तेजेंद्र शर्मा के कविता-संग्रह ‘टेम्स नदी के तट से’ के आगमन ने पहले पहल तो चौंकाया, मगर पढ़ने के बाद यही राय बनी कि ये एक कहानीकार की कविताएँ जरूर हैं, मगर इनमें कच्चापन कतई नहीं है। यह एकमात्र कविता-संग्रह इस साल मैंने पढ़ा और कह सकता हूँ कि इस संग्रह की अनेक कविताएँ याद रहने लायक हैं।
वरिष्ठ लेखक त्रिलोक नाथ पाण्डेय का उपन्यास ‘चाणक्य के जासूस’ भी पढ़ना हुआ। रिसर्च को रोचक बनाकर पेश करना पाण्डेय जी की विशेषता है जो उनके पिछले उपन्यास ‘प्रेम लहरी’ में दिखा था। यह उपन्यास भी इस कसौटी पर सफल ही लगती है।
नयी वाली हिंदी की बिरादरी से इस साल दिव्य प्रकाश दुबे की ‘इब्नेबतूती’ भी ध्यान खींचने में कामयाब रही। एक साहसिक विषय पर दिव्य ने अच्छी कहानी बुनी है। उपन्यास का विषय और प्रस्तुति दोनों ही प्रभावित करते हैं।
मशहूर अभिनेता आशुतोष राना का उपन्यास ‘रामराज्य’ भी पढ़ना हुआ। यह किताब विस्तृत लेखन की मांग करती है, लेकिन अभी के लिए इतना अवश्य कह सकता हूँ कि राम को मानने वालों और न मानने वालों, उनको पूजने वालों और उनपर प्रश्न उठाने वालों, दोनों के लिए ही यह उपन्यास सर्वथा पठनीय है। शेष विस्तार से कभी।।।!
युवा लेखक रणविजय का कहानी-संग्रह ‘दिल है छोटा सा’ भी इस साल पढ़ा गया। इस संग्रह में अच्छी कहानियाँ हैं। सत्य व्यास के उपन्यास ‘उफ्फ कोलकाता’ के ‘हॉरर’ से भी आजकल Kindle पर रूबरू हो रहे हैं। लगभग निपटने को है। खत्म हो जाए फिर ही बता पाएंगे कि ये डेविड धवन और रामसे ब्रदर्स का मिक्सचर है या ‘भुतहा हास्य’ को लेकर सत्य व्यास ने अपना कोई ब्रांड बनाया है।
एक बहुत विशेष किताब जो इस साल पढ़ी गयी वो है चर्चित लेखक राजीव रंजन प्रसाद का उपन्यास ‘साक्षी है समय’। यह महाभारत से लेकर वर्तमान भारत तक की यात्रा पर आधारित उपन्यास-शृंखला का पहला भाग है। अश्वत्थामा की अमरता के आधार पर उन्हें सूत्रधार बनाकर राजीव महाभारत से लेकर मौर्य काल तक के इतिहास पर इस उपन्यास में बात करते हैं। इस क्रम में वे न केवल महाभारत को मिथक मानने की वामपंथी मान्यता को ध्वस्त करते हैं, बल्कि इतिहास के अनेक पात्रों-प्रसंगों जिन्हें वामपंथी इतिहासकारों ने विरुपित किया है, को नए ढंग से सामने भी लाते हैं। सबसे ख़ास बात कि यह सबकुछ शोधपरक तथ्यों पर आधारित है, कल्पना का पुट कम है। इस किताब पर भी विस्तार से लिखने की जरूरत है।
चर्चित लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ का उपन्यास ‘मल्लिका’ भी पढ़ा गया। उपन्यास पठनीय है, लेकिन मुझे भारतेंदु का चरित्र ‘मल्लिका’ पर कहीं कहीं हावी लगा। ऐसा लगा कि भारतेंदु के जीवन पर आधारित पर कोई उपन्यास पढ़ रहा हूँ। लिखेंगे कभी इसपर भी।।।!
इन सब  के अतिरिक्त स्वामी विवेकानंद से जुड़ी कई पुस्तकें (विवेकानंद की आत्मकथा, मैं कौन हूँ?, हिन्दू धर्म आदि), वीर सावरकर की पुस्तक ‘हिंदुत्व’, सरोज बाला की ‘रामायण की कहानी, विज्ञान की जुबानी’, गोदान, चित्रलेखा, वैशाली की नगरवधू, कुरुक्षेत्र आदि पुस्तकें भी पढ़ी गयीं हैं।
(पीयूष द्विवेदी की फेसबुक वाल से साभार)
पीयूष द्विवेदी
लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं. देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में सियासत और साहित्य के विषयों पर निरंतर रूप से लिखते रहते हैं. मूलतः देवरिया जिले से हैं, फिलहाल नोएडा में निवास है. संपर्क - 8750960603

1 टिप्पणी

  1. पीयूष जी2020 में अध्ययन, मनन, चिंतन पर आपका आलेख
    प्रभावित कर गया । शुभ कामनाएं ।
    डॉ प्रभा मिश्रा
    भोपाल (मध्यप्रदेश)
    भारत

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