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कमला नरवरिया की कहानी – अधूरी दास्तां

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वह ऑफिस में बैठा एक मर्डर केस की स्टडी कर रहा था । तभी अचानक से उसकी फोन की घंटी घनघना उठी उसने फोन उठाया दूसरी तरफ से डीएसपी साहब बोल रहे थे पुनीत जंगल में एक लाश मिली है तुम्हें उसके इन्वेस्टिगेशन के लिए जाना है उसने यह सर कहा और फोन रख दिया । वह गाड़ी मे अपने सहकर्मियों के साथ घटनास्थल का निरीक्षण करने के लिए निकल पड़ा
 उसके लिए क्राइम सीन  पर जा कर लाशों का मौका मुआयना करना कोई नई बात नहीं है । उसने अपने अब तक के कैरियर में कई प्रकार की लाश देखी ।सड़ी- गली, टूटी- फटी ,नग्न -अर्धनग्न , जली-अधजली बिना सिर के सिर्फ धड़वाली वाली क्षत-विक्षत अंगों वाली तरह-तरह की लाशे। नौकरी के शुरुआती वर्षों में उसे लाशों को देखकर उबकाई सी आती थी परंतु अब यह उसके लिए एक नॉर्मल सी बात हो गई है। थोड़ी ही देर में  वह घटनास्थल पर पहुंच गया। वहां एक 30 -35 वर्षीय स्त्री की लाश अर्द्ध नग्न क्षत-विक्षत अवस्था में पड़ी थी।
चेहरा किसी नुकीले पत्थर से कुचल दिया गया जिससे लाश की पहचान ना हो सके ।वह पूरी तन्मयता के साथ बॉडी का निरीक्षण करने लगा एकाएक उसकी नजर लाश के बाएं बाजू पर बने टैटू पर गई जिस पर दिल का आकार बना था और दिल के अंदर एसपी लिखा था ।उसे देखकर  जैसे उसके दिल में अचानक से कुछ टूट सा गया हो। उसके आंखों के आगे अंधेरा सा छा गया और वह लगभग गिरते-गिरते बचा यदि समय रहते उसके सहकर्मी ने उसे पकड़ा ना होता तो वह जमीन पर गिर ही गया होता।
वह दिल पर पत्थर रखकर भारी मन से इन्वेस्टिगेशन करके घर आया और सोफे पर   निढ़ाल होकर गिर पड़ा। और घंटों ऐसे ही निढाल पड़ा रहा । उसकी आंखों के सामने स्नेहा का चेहरा रह रह कर आ रहा था। दुबली सी देह , श्याम वर्ण ,गोल चेहरा ,उस पर बड़े-बड़े कजरारे  नैना ।
स्नेहा के इन नैनो में कुछ ऐसा जादू सा भरा था जो उसे अपनी ओर आकर्षित करता था। स्नेहा से  उसकी पहली मुलाकात भी किसी एक्सीडेंट से कम न थी। जब दोनों ने एक ही कॉलेज में एडमिशन लिया था ,नई नई स्कूटी चलाना सीखी स्नेहा से उसकी नई बाइक कॉलेज के पहले दिन ही टकरा गई थी ।उस दिन सिर्फ उसकी बाइक ही नहीं टकराई थी ।
उसकी आंखें  भी स्नेहा के कजरारे से नैनों से टकराकर हमेशा के लिए उनमें उलझ सी गई थी दोनों हेलमेट लगाए थे इस वजह से उन्हें ज्यादा चोट नहीं आई थी । उसने  स्नेहा को डांटकर कहा था जब तुम्हें गाड़ी चलानी नहीं आती  तो क्यो चलाती हो । इतना  सुनकर वह जोर जोर से रोने लगी थी और आज स्नेहा से उसकी अंतिम मुलाकात भी किसी एक्सीडेंट से कम न थी। उसने आंखों से ढुलक आए आंसूओ को अपने रुमाल से पोछा और एक बार फिर वह अतीत की धुंधली सी यादों में खो गया।
स्नेहा हमेशा  कॉलेज की लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ती थी । वह भी उसका साथ पाने के लालच में उसके साथ लाइब्रेरी में  बैठकर पढ़ता था।यह उसी की संगत का असर था कि उसे किताबों और स्नेहा से कुछ ऐसा प्रेम हुआ  कि ताउम्र ना छूटा। वैसे वह भी कम खूबसूरत न था गौर वर्ण, लंबा कद  चेहरा ऐसा आकर्षक  कि कोई भी एक बार उसे देख ले तो पलट कर अवश्य देखता । कॉलेज की सारी लड़कियां उस पर मरती थी पर  वह जिस पर मरता था वह स्नेहा थी ।
“साहब आप चाय पिएंगे” नौकर की आवाज सुनकर उसकी तंद्रा टूटी और वह विचारों की शृंखला से बाहर आया। “मेरा अभी मन नहीं है” उसने नौकर को कहा। बेचैनी उसके चेहरे पर अभी भी साफ झलक रही थी । उसने एक सिगरेट सुलगाई और उसे पीते हुए कमरे में टहलने लगा मगर उसे बेचैनी से कोई राहत नहीं मिली। वह एक बार फिर सोफे पर आकर बैठ गया ।
उसने अपनी आंखें बंद करने की कोशिश की मगर एक बार फिर स्नेहा का चेहरा उसकी आंखों के सामने आ गया। वो हंसती हुई स्नेहा ,उसका  रुठना-मनाना ,वो शरारतें, वो मस्ती कोलेज में उसके साथ बिताए एक एक पल किसी चल चित्र की भांति उसकी आंखों के सामने घूम रहे थे।यह  टैटू  भी उसने  शिवरात्रि पर लगने वाले महादेव के मेले  में बनवाया था।
उसने बड़े उत्साह से उसे टैटू दिखा कर कहा था “पुनीत अब तुम्हें मुझसे कोई अलग नहीं कर सकता तुम हमेशा टैटू के रूप में मेरे साथ रहोगे वैसे तुम्हें इस टैटू का अर्थ मालूम है पुनीत” उसने चहककर पूछा था “हां इस में कौन सी बड़ी बात है एस फोर स्नेहा पी फोर  पुनीत”
उसने कहा , “नहीं एस पी का मतलब है स्नेहा का पुनीत, अरे बुद्धू तुम इतना भी नहीं जानते” स्नेहा ने कहा फिर इस बात पर दोनों खिलखिला कर हंस पड़े।वह भी तो स्नेहा को  कितना  प्रेम करता था।” फिर हम अलग क्यों  हुए “उसने स्वयं से सवाल किया। वह तड़प कर रह गया जैसे किसी ने जलता हुआ अंगारा उसकी तरफ  फेंक दिया हो।
शायद उसके बड़े सपनों ने ही  उसे उसकी स्नेहा से दूर कर दिया। वह अक्सर स्नेहा से कहता था तुम्हें पता है स्नेहा  इस समाज में अपराध क्यों होते हैं वे कौन से कारण है जो इन्हें बढ़ावा देते हैं जैसे अपराधों के तह में जाकर  वह उन्हें जड़ से मिटा देना चाहता था इसीलिए उसका सपना  पुलिस  अधिकारी बनना था जिससे वह समाज को अपराध मुक्त कर सकें ।
शायद इसी सपने का पीछा करते हुए  वह अपनी स्नेहा से इतना दूर हो गया कि फिर ना मिल सका । उसे याद आ रहा था जब वह इसी सपने को पूरा करने  की तैयारी  करने के लिए दूसरे शहर जा रहा था तब स्नेहा ने उसके कंधे पर अपना सिर रखकर उससे कहा था । “मत जाओ पुनीत “। उसने उसकी बात को टालते हुए कहा था  “बस कुछ ही समय की बात है स्नेहा हम फिर साथ होंगे “।
इस पर स्नेहा ने कहा था  “पुनीत मैं तुम्हारा इंतजार सारा जीवन कर सकती हूं, पर मेरे माता-पिता नहीं करेंगे ,जाने से पहले तुम एक बार उनसे हमारी शादी की बात करते जाओ” , लेकिन उस वक्त उस पर अपने सपनो को पूरा करने का ऐसा भूत सवार था कि उसने स्नेहा की बातों को अनसुना कर दिया।आज उसे ऐसा लग रहा था काश मैंने उसकी बातों को गंभीरता से सुन लिया होता तो आज  स्नेहा हमारे साथ होती , पर स्नेहा तो स्नेह व त्याग की मूर्ति थी ।
वह हमेशा उसकी हां में हां मिलाने वाली ,उसकी खुशी में खुश होने वाली लड़की थी। “काश स्नेहा उस दिन तुमने  ज़िद की होती…….. ” उसने एक ठंडी आह भरते हुए अपने आप से कहा । रेलवे स्टेशन पर उसे  छोड़ने आई स्नेहा से उसकी यही अंतिम मुलाकात थी ।जब उसने आंखों में आंसू भरते हुए उससे कहा था “जल्दी आना  पुनीत, मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी” यही उसकी स्नेहा के आखिरी शब्द थे जो उसने उससे विदा होते समय सुने थे।
उस दिन ट्रेन स्टेशन से छूट चुकी थी और उसने लगभग भागते भागते ट्रेन पकड़ी थी पर आज उसे ऐसा लग रहा था अच्छा होता उस दिन ट्रेन छूट गई होती। एक पल के लिए उसे लगा जैसे उसकी आंखों के सामने वो स्टेशन ,वो ट्रेन और  स्नेहा जैसे सजीव हो उठे हो।   उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे  उसकी ट्रेन नहीं छूट रही हो बल्कि स्नेहा से उसका साथ छूट रहा हो वह चिल्ला उठा “नहीं स्नेहा , नहीं स्नेहा मैं तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा”  उसके चिल्लाने की आवाज सुनकर नौकर दौड़ कर उसके पास आया ,”क्या हुआ साहब” नौकर ने पूछा  “कुछ नहीं,  तुम चले जाओ यहां से “उसने कहा । “साहब अभी तक आपने खाना नहीं खाया ,मैं उसे टेबल पर लगा दूं “नौकर ने पूछा ।वह गुस्सा होकर नौकर  से बोला “तुम्हें एक बार में बात समझ में नहीं आती क्या जब मैंने तुम्हें जाने को कहा है तो तुम जाओ यहां से मेरे सिर पर क्यों खड़े हो। “वह अपना सिर् पकड़ कर बैठ गया। रात के अंधकार की तरह उसकी बेचैनी भी लगातार बढ़ती जा रही थी।
इसी बेचैनी में वह दो तीन पैग बनाकर अपने हलक से नीचे उतर चुका था मगर आज यह भी उसका साथ नहीं दे रही थी और यह रात काली अमावस की रात की तरह खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी उसने बिस्तर पर जाकर सोने की कोशिश की लेकिन आज किसी बेवफा की तरह नींद भी उसका साथ नहीं दे रही थी ।वह विचारों के सागर में एक बार फिर से खो गया।
पुलिस विभाग में क्राइम सीन इन्वेस्टिगेटर के पद पर पदस्थ होने के बाद वह कितना खुश था।अपना सपना पूरा होने के बाद वह सीधे स्नेहा के घर पहुंचा था पर उसे पहुंचने में देर हो चुकी थी अपने सपने को पूरा करने के चक्कर में उसका स्नेहा के साथ घर बसाने का सपना टूट चुका था “स्नेहा की शादी  हो गई है” उसके माता-पिता के मुंह से सुनकर वह उल्टे पांव लौट आया था उस दिन उसका दिल ऐसे टूटा कि फिर कभी किसी और से जुड़ न सका ।
उसके दिल, उसके दिमाग उसके वजूद में स्नेहा ऐसे बस गई थी कि वह चाहकर भी उसे भुला नहीं पाया  था उससे दूर होने के बावजूद भी वह उसकी उपस्थिति को अपने आसपास महसूस करता था यही वजह है कि वह आज भी अकेला है।स्नेहा इसी शहर में रहती है पता होने के बाद  भी उसने कभी उससे मिलने की कोशिश नहीं की  ताकि उसकी शादीशुदा जिंदगी पर कोई प्रभाव नहीं पड़े।
पर आज वह अपने को बेहद लाचार व बेबस महसूस कर रहा था उसे ऐसा लग रहा था कहीं ना कहीं वही अपनी स्नेहा की मौत का जिम्मेदार है ,ना वह अपने सपनों को  पूरा करने के लिए उससे दूर जाता ,ना उसका  स्नेहा से साथ छूटता । यही नौकरी थी जिसके लिए वह अपनी स्नेहा से दूर हो गया ।आज वह यह नौकरी  हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ देगा।
ऐसा सोचते सोचते ना जाने कब उसकी आंखें लग गई । जब आंख खुली तो वह हड़बड़ा कर उठ खड़ा हुआ। सबसे पहले उसने अपना इस्तीफा लिखा । फिर सुबह के दैनिक कार्यक्रमों से फारिग होकर ऑफिस खुलने से पहले ही ऑफिस पहुंच गया। एसपी साहब के आने में अभी टाइम था इसीलिए वह उनकी केबिन के सामने बेसब्री से घूमने लगा। घूमते-घूमते उसे लगा जैसे उसकी अंतर्रात्मा उसे  धिक्कार रही  हो । पुनीत तुम कायर हो, तुम भगोड़े हो ।
वर्षो पहले भी तुम अपने सपनों की खातिर स्नेहा का साथ छोड़ चुके हो और आज आज भी वही कर रहे हो । स्नेहा को न्याय दिलाने की जगह अपनी नौकरी छोड़ रहे हो । उसके हत्यारे जो आज भी खुली हवा में घुम रहे हैं। उन्हें जेल की सलाखों में पहुंचाने की जगह‌ खुद चोरों की तरह भाग रहे हो । नहीं ,पुनीत नहीं  तुम इस बार ऐसा नहीं कर सकते हो ।
तुम अपनी स्नेहा से मुंह नहीं  मोड़ सकते हो । तुम्हें उसके हत्यारों को सजा  दिलानी ही होगी।  उसके टहलते हुए कदम रुक से गए ।ऐसी सर्दी के मौसम में  भी उसके माथे पर  पसीने की बूंदे छलक आई   जैसे वह  होश में आया हो  “वह क्या करने जा रहा था ” उसने स्वयं से कहा फिर एक बार इस्तीफे को गौर से देखा और उसके टुकड़े-टुकड़े करके डस्टबिन में फेंक दिए । और चल पड़ा वापस अपनी केबिन की ओर इस बार उसके चेहरे पर एक अजीब सा सुकून था

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