- केलापन
कॉल सेंटर में उसकी सुबह की ड्यूटी साढ़े छ बजे शुरु हो जाती है।नेटवर्क की प्राब्लम के लिए हर ग्राहक को नौ मिनट का समय मिलता है।एक की समस्या का समाधान करने के बाद लाइन पर लगे दूसरे ग्राहक की बारी आ जाती है।उसने दो ग्राहकों को निपटा लिया था तीसरे को लाइन पर लेने के लिए उसने शालीनता से पूछा, “कहिए मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?”आवाज़ से वृद्ध लगने वाले उस ग्राहक ने जो समस्या बताई, वह कोई विशेष, नहीं थी, उसने ट्राँसफर कर दी और उसे आश्वासन दिया कि उनकी समस्या का शीघ्र ही समाधान हो जाएगा।कह कर वह कॉल काटने ही वाला था कि उधर से आवाज़ आई, जिसमें दर्द झलक रहा था,”सुनिए मेरी और भी समस्या है।” यह कह कर उन्होंने अपनी बात को जारी रखा।
वह बिना रुके बोले जा रहे थे।उनका समय कब से समाप्त हो गया था; लेकिन उसने और ग्राहकों की बारी की ओर ध्यान न देकर उनकी बात को सुनना जारी रखा, जबकि यह उसकी ड्यूटी के विरुद्ध था, प्रतीक्षा कर रहे लोग उसकी शिकायत कर सकते थे और अनुशासन का पालन न करने पर उसके विरुद्ध कारवाई भी की जा सकती थी, किन्तु वह इस परिणाम के लिए तैयार था।वह बीस मिनट तक उससे बात करते रहे और फिर धन्यवाद कह कर स्वयं ही फ़ोन काट दिया।लेकिन उसने अभी भी अगली कॉल नहीं ली थी और वह अब भी उस वृद्ध बारे में सोच रहा था, जो उस पर अपना गुस्सा निकाल रहे थे कि उस का बेटा उनका ध्यान नहीं रखता। वह चार दिन से उसकी जानकारी लेने घर नहीं आया और न ही उसने फ़ोन किया है, जबकि वह जानता है कि उसके पिता घर में अकेले रहते हैं।वह किसी से बात करने के लिए भी तरस जाते हैं। घर की दीवारें उन्हें काटती हैं। कह कर वह रोने लगे थे।
वह आश्वस्त था कि उसने वृद्ध की भावनाओं को समझा, उनके मन की बात सुनी और अकेलेपन को थोड़ी देर के लिए दूर किया था।अगली कॉल लेने के लिए उसने फ़ोन उठा लिया।
2. मौन संवेदना
रजनी ने आते ही बताया कि उसका बेटा और बहू रिश्तेदार की शादी में जा रहे हैं। स्कूल में छुट्टियाँ हैं। वह अपनी छोटी बेटी को अकेले घर नहीं छोड़ सकती इसलिए स्कूल खुलने तक उसे साथ लेकर आएगी। उसने देखा लड़की आठ-नौ साल की है। खेलती रहेगी या घर के छोटे-छोटे काम ही कर देगी। उसने हाँ कह दिया।
रजनी काम करती रही और बच्ची अपने बैग से कापी -किताब निकालकर पढ़ने लगी। आध पौन घंटे बाद लॉन में जाकर खेलने लगी। बीच-बीच में वह माँ से आकर पूछ जाती कि वह उसके साथ काम करवाए। दो-चार दिन ऐसे ही निकल गए।
पाँचवें दिन रजनी आई तो उसने बताया कि उसकी तबीयत ख़राब है, वह अस्पताल जा रही है। लड़की को वह उसके पास ही छोड़ गई और अस्पताल से आते हुए ले गई ।
अगले दिन रजनी फिर नहीं आई। लड़की ने आकर बताया कि माँ की तबीयत ज़्यादा ख़राब है। वह नहीं आएगी। उस दिन वह बैग नहीं लाई और उसके साथ काम करवाती रही।फ्रिज साफ़ करते हुए उसने देखा दो दिन पहले के लाए हुए दो बर्गर रखे हुए थे। बच्चे तो खाएँगे नहीं। उसने निकालकर लड़की को डस्ट बिन में डालने के लिए कहा। वह थोड़ी देर तक उन्हें देखती रही और फिर डरते-डरते पूछा, “ आँटी आज मेरी मम्मी ने खाना नहीं बनाया था, क्या मैं ये बर्गर खा लूँ ?”
उसने लड़की की ओर देखते हुए इशारे से ‘हाँ ‘में उत्तर तो दे दिया, लेकिन मन में चुभते हुए अनेक प्रश्नों ने उसे कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया।लड़की ने काग़ज़ में से एक बर्गर निकालकर खाना शुरू ही किया था कि तेज़ आवाज़ में “रुको” कहकर उसने बर्गर लगभग उसके हाथ से छीनते हुए डस्ट बिन में फेंक दिया और अपने बच्चों के लिए बनाए गए ताज़ा भोजन में से खाना प्लेट में रखकर उसे खाने को दे दिया। लड़की थोड़ा झिझकी, फिर जल्दी-जल्दी खाने लगी।वह उसे तृप्ति भाव से एकटक देखती रही।
3. अजनबी
वे केवल सात लोग रह गए थे। कुछ वर्षा के आसार देखकर पहले ही निकल गए और कुछ जिनका घर पास ही था वर्षा के आरम्भ होते ही चले गए। वे क्योंकि पार्क के गेट से दूर थे, जब तक वहाँ पहुँचते बारिश तेज़ हो गई। इसलिए पार्क के शेड में एक- एक करके आ गए थे। वहाँ रखे तीन बैंचों पर सभी बैठ गए; लेकिन तेज़ हवा के कारण बारिश की बौछारों से भीगने लगे तो बेंच से उठकर शेड के बीचों-बीच आकर खड़े हो गए।उनमें से छह लोग प्रतिदिन यहाँ आते है। उनके बीच एक बुजुर्ग महिला शायद नई थी। उसे इससे पहले कभी किसी ने नहीं देखा था। एक लड़का और लड़की अभी भी बेंच पर बैठे थे।वे बौछारों से भीगने की परवाह किए बिना मोबाइल पर कोई गेम खेल रहे थे।शेष लोग भी अपने -अपने मोबाइल पर नज़रें गढ़ाए खड़े थे।बारिश पहले से भी अधिक तेज़ हो गई थी। महिला को शायद खड़े होने में कठिनाई हो रही थी। वह बार-बार अपनी टाँगें इधर-उधर कर रही थी। कोने में खड़ी लड़की किसी को फ़ोन मिला रही थी। उसके चेहरे पर अजीब -सी परेशानी दिखाई दे रही थी। थोड़ी देर बाद उसकी फ़ोन पर बात हो गई तो वह निश्चिंत हो गई। दस मिनट में ही एक कार गेट पर आकर रुकी। वह भागती हुई कार में जाकर बैठ गई। शेष पाँच अभी भी एक दूसरे से नज़रें चुराए ,सिर झुकाए फ़ोन पर उँगलियाँ चला रहे थे। महिला जो अब तक पूरी तरह भीग चुकी थी कभी आसमान की ओर देखती तो कभी टाँगें ऊपर-नीचे करती। वह थक भी गई थी और उसके लिए समय काटना कठिन हो रहा था।
अब धीरे-धीरे बारिश धीमी हो रही थी। पर हवा अभी भी तेज़ थी। बाहर सड़क पूरी तरह पानी में डूब गई थी। वे पाँचों अपना मोबाइल सम्भालते हुए एक-एक करके उठे और अपनी-अपनी दिशा की ओर पानी से निकलते हुए आँखों से ओझल हो गए। अब न लोग थे और न मोबाइल।वह महिला जो अकेली रह गई थी बेंच पर बैठ कर बारिश की बूँदों को निहारते हुए उनसे बतिया रही थी, जिसका आनन्द उनमें से किसी ने नहीं लिया था।वह बारिश के पूरी तरह रुकने की प्रतीक्षा करने लगी।
4. कुत्सित
चलते -चलते उसे देर हो गई थी। जब-तक बस अड्डे पर पहुँची अंतिम बस चलने को तैयार थी। वह अटैची को घसीटते हुए जल्दी से उसमें चढ़ गई। पूरी बस खचाखच भरी हुई थी, उसने देखा अंतिम से दूसरी सीट, खिड़की की ओर एक सीट ख़ाली थी, उसे ख़ुशी हुई कि खड़े होकर नहीं जाना पड़ेगा। ऐसा भी हो सकता था कि कंडक्टर कहे मैडम बस फ़ुल हो चुकी है, अब और सवारी नहीं लेंगे।उसने चैन की साँस लेते हुए अटैची ऊपर रखी और बैठी सवारी को खिड़की की ओर खिसकने के लिए कहा; लेकिन वह आगे नहीं खिसका और अपनी टाँगें सिकोड़कर उसे रास्ता देते हुए खिड़की की ओर बैठने का इशारा किया।वह पर्स अपनी गोद में रखकर इत्मीनान से बैठ गई।
बस अपनी गति से आगे बढ़ रही थी। रात के ग्यारह बजने वाले थे । ।कुछेक सवारियाँ सो गईं थीं और कुछेक पर उनींदापन सवार था और वे हिचकोले खा रही थीं। पर उसकी आँखों में नींद नहीं थी। वह सतर्क होकर बैठी थी। उसकी सीट के साथ बैठा अधेड़ उम्र का व्यक्ति ऊँघने लगा था।ऊँघते – ऊँघते उसका सिर उसके कंधे से आ टकराता। उसने अपना कंधा हटा लिया । दो तीन बार ऐसा होने पर उस व्यक्ति की शायद नींद टूट गई थी, वह सीधा होकर बैठ गया। रात गहरा रही थी, उसकी आँखें भी भारी होने लगीं। वह व्यक्ति, जो पहले सीधा बैठा था, अब अपनी टाँगें फैला कर बैठ गया। वह सिकुड़ कर बैठ गई।नींद उस पर हावी हो रही थी। उसने आँखें फिर से बंद कर लीं। बस को झटका लगा तो उसने आँखें खोल लीं। अब वह व्यक्ति अपनी बाजुओं को बग़ल में दबाये बैठा था। फिर धीरे-धीरे उसकी बाँहें भी फैलने लगीं।
उसकी कोहनियाँ उसके कंधे से आगे छूने का प्रयास कर रही थीं। वह और सिकुड़ गई। पर आगे जगह नहीं थी। उसका स्पर्श बढ़ता जा रहा था । वह अनमनी हो उठी।सभी यात्री सो रहे थे।किसी से कहने का कोई अर्थ नहीं था।वह सतर्क होकर बैठ गई।तभी एक तीखा मोड़ आया। ड्राइवर ने जैसे ही बाईं ओर गाड़ी मोड़ी, वह पूरी तरह से उस पर झुक गया।जब तक वह सीधा होता, उसने एक झटके से अपनी कोहनी उसकी फैली टाँगों के बीच मार दी।वह अपनी चीख को दबाता हुआ तिलमिला कर खड़ा हो गया और फिर पिछली सीट पर कंडक्टर के पास जाकर बैठ गया।
5. मौन पीड़ा
“शब्दों की चोट उतनी पीड़ा नहीं देती, जितना तुम्हारा मौन मुझे पीड़ा देता है।कुछ तो बोलो रोहन। मैं चीखती -चिल्लातीं हूँ, तुम ग़ुस्सा नहीं करते। माँ-पिताजी को बात-बात में टोकती हूँ, तुम नाराज़ नहीं होते।बच्चों की पिटाई करती हूँ, तो मेरा हाथ नहीं पकड़ते। कुछ तो करो, कुछ तो कहो रोहन। इतनी चुप्पी अच्छी नहीं होती।” कहते हुए कौमिका पहली बार फफककर रो पड़ी।
पिछले पाँच वर्ष से रोहन सैनिक अस्पताल में कॉमा की स्थिति में बिस्तर पर पड़ा है। उसने अपनी छाती पर पाँच-पाँच गोलियों को झेलकर भी शत्रु के कई सैनिकों को मार गिराया था; लेकिन ऑपरेशन के दौरान वह स्वयं से ही हार गया और कॉमा में चला गया। डाक्टरों को आशा और उसको विश्वास था कि एक दिन उसकी बेहोशी टूट जाएगी। वह बोल नहीं सकता था, पर उसकी आवाज़ सुन पाता था। वह जब भी उससे मिलने आती, उससे बतियाती, अपने मन की बातें उसे बताती, तो उसके चेहरे पर कई-कई भाव उभरते दिखाई देते थे; लेकिन वही चेहरा आज भावहीन हो गया है। लम्बी चुप्पी के बाद उसके दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया है यानी ब्रेन डेड और उसके बाद —-डाक्टर ने उसे कल सूचित किया था। रात भर वह सो नहीं पायी। एक तूफ़ान-सा उठता रहा मन में, अंतर्द्वंद्व चलता रहा।
अपने आँसुओं पर क़ाबू पाकर उसने रोहन का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा,”मैं तुम्हारे मन की बात समझ रही हूँ रोहन, उसे ज़रूर पूरा करूँगी।”
रोहन के अंगों के दान पेपर पर हस्ताक्षर करने के बाद उसने उसे पीछे मुड़कर नहीं देखा।
- सुदर्शन रत्नाकर,ई-29. नेहरु ग्राउंड,फरीदाबाद 121001
