127 वां

 

कहानी (गीताश्री) - 127वां... 5 गीताश्री

 

सड़क के एक तरफ ऊंचे ऊंचे फ्लैट थे तो दूसरी तरफ बेतरतीब बसी अवैध बस्तियां जिनमें कई पीढ़ियों का शोर भरा था। मामूली सुख सुविधाओं के लिए बिलबिलाती हुई आत्माओं का शोर।

सड़क के एक तरफ तो बड़ी बड़ी गाड़ियां सरपट दौड़ रही थीं और दूसरी तरफ टैम्पू और ऑटो! शेयर्ड ऑटो का शोर, नोयडा आनंद विहार तक ले जाने वाले ऑटो! सड़क के दोनों तरफ अरमानों और सपनों की दोतरफा दुनिया। इस दुनिया में घिसटते लोग, कुछ लोग आधे दिन यहां रहते और आधे दिन वहां। वे लोग अपने घरों में कम रहते हैं। इस दुनिया के लोग सारा समय दूसरी दुनिया को संवारने में खर्च कर अपनी दुनिया में सुस्ताने भर आ जाते हैं ताकि फिर बिखरी-बिगड़ी हुई दुनिया को फिर से संवार सके।

सीमा इन दोनों दुनियाओं के बीच घिसटती हुई चली जा रही है। सड़क पर हर तरफ गाड़ियां गुजर रही हैं, वह इन सबसे बेखबर है, उसके बगल से नोयडा के मॉल में शाम बिताने के लिए कई लड़के लडकियां जा रहे हैं, कोई बाइक पर बैठा है तो कोई कार में! सीमा की आँखों से उनका हाथों में हाथ या बाइक पर एक दूसरे से टकराती देह नहीं देखी जाती। वह गुस्से में दूसरी तरफ देखने लगती है। सीमा खूब शॉपिंग करके आई है। जीआईपी इन दिनों उसका पसंदीदा मॉल बना हुआ है, उसके अलावा उसे सब मॉल छोटे लगते हैं। जैसे ही वह जीआईपी मॉल में घुसती है, खुद को भूल जाती है, मॉल की भीड़ और चमक में वह खुलकर डूब जाती है, कभी मेकअप कराती है, अपना लुक पूरा का पूरा बदल लेती है, कभी कपड़ों की शॉपिंग तो कभी कुछ और! लगभग रोज़ ही वह थैले भर कर घर में घुसती है। जीवन का मतलब यही है इन दिनों।

अपने अजीबोगरीब खयालों में डूबी वह सड़क पर घिसटती हुई चली जा रही है।  तभी पीछे से आती एक गाड़ी के हॉर्न ने उसे चौंका दिया!

“”अरे मैडम, बीच में न चलो! मरोगी तो कौन भुगतेगा!”” कार वाला चिल्लाया!

सीमा को जैसे होश आया। उसने नज़र घुमाई तो वाकई वह, बीच सड़क पर थी! उसके आगे पीछे गाड़ियों की लाइन थी और उनके हॉर्न की चीख पुकार! वह चौंक गयी थी। उसने अपना सामान उठाया और सड़क के किनारे खड़ी हो गयी! खोड़ा कालोनी अब उससे दूर हो गयी थी, वैसे भी वहां नुक्कड़ पर सस्ती जलेबी खाने वाले लोलुप लोग होते हैं, जो उसे देखकर ही लार टपकाने लगते थे। सीमा ने खोड़ा कॉलोनी पर एक हिकारत भरी नज़र डाली और इंदिरापुरम के लिए ऑटो कर लिया!

घर जाएगी, तसल्ली से एक गिलास पानी पियेगी, फिर ही कुछ काम करेगी!

सीमा को कभी कभी लगता है कि उसके पास सोचने, शॉपिंग करने और खाने पीने के अलावा कोई और काम नहीं है! घर पहुँच कर पानी पीने की तलब उसे हो चली थी, अपने अपार्टमेंट की बिल्डिंग को देखकर उसे तसल्ली

कहानी (गीताश्री) - 127वां... 6

हुई, जैसे ही वह इस बिल्डिंग को देखती थी, बचपन से चिपका हुआ खोड़ा कॉलोनी का टैग खुद पर से हटा देती थी। उसे खोड़ा कॉलोनी का टैग बहुत ही नापसंद था, जब से वह बड़ी हुई थी, तब से उसने केवल अपने इस टैग को हटाना चाहा था। उसे रोहित पर ढेरों लाड़ उमड़ आया! जिसकी वजह से वह खोड़ा कॉलोनी को बहुत पीछे छोड़ आई है। टैग हटाने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है उसे। सोचकर ही दहशत। रोहित के वैभव ने टैग से मुक्ति तो दिला दी लेकिन उसका भविष्य छीन लिया था। छल से, झूठ और फरेब से। फरेब कितना दिलकश होता है।

आज उसके पास सपनों का संसार है, आज अगर वह रोशनी में आँखें खोलती है तो उसके पीछे उसका रोहित ही तो है, आज भी अपने लिए ढेरों शॉपिंग करके आई है। घर आते ही वह धम्म से सोफे पर घुस गयी। कीर्ति नगर का गद्देदार सोफा है, रोहित ने उसके लिए ही मंगाया था। रोहित है ही ऐसा, उसके लिए सब कुछ कर देने वाला। सबके बीच वह भी किसी सामान की तरह दिखने लगी है.

पांचवी मंजिल पर बने इस फ्लैट में तीन तरफ से बालकनी है, सुबह उठकर उसे सूरज निहारना बहुत पसंद था, मगर आजकल तो वह दस बजे से पहले उठती ही नहीं है। जब तक वह सोकर उठती थी, तब तक सूरज सिर पर चढ़ आता था। तब उसे अम्मा की याद आती थी। अम्मा की याद उसके लिए एकदम कड़वी थी।

”छि अम्मा छि!” “

ठंडे पानी की पूरी गिलास हलक में उड़ेल ली।

वह उठी और जितना भी आज खरीद कर लाई थी न जाने कितनी महंगी महंगी आर्टिफिशियल ज्वेलरी, मॉल से खरीदे गए झुमके, तो मीना बाजार के चमकीले सूट! सब कुछ तो था उसके पास। घड़ी की सुई अपनी रफ्तार से बढ़ रही है, धीरे धीरे रात आएगी और नशे में खोजेगी कुछ! वह अपने घर में महंगे महंगे सामानों को कभी कभी तोड़ देती है! सीमा भटकती है, अपने उस तीन कमरों वाले घर में वह इधर उधर भटकती है, जैसे रूहें भटका करती हैं, किसी पर छा जाने के लिए, किसी की दैहिक नरमाई खोजती हैं, वैसे ही सीमा भी खोजती है। और जब उसे नहीं मिलता कुछ और रात में नशा उतर कर बिस्तर पर छा जाता है तो वह बाथरूम में चली जाती है, घंटों घंटों शावर के नीचे खड़ी हो जाती है। चाहती है यह आग बुझ जाए, यह ताप कम हो जाए, मगर वह बढ़ता चला जाता है। कभी कभी तो रोहित ही उसे बाथरूम से बेहोशी की हालत में बाहर लाता है, सुबह जब वह ऑफिस जाता है तो उसके सिरहाने बेड -टी, ब्रेकफास्ट और अपना क्रेडिट और डेबिट कार्ड रखकर जाता है।

वह नीम खुमारी में बड़बड़ाती है- “तुमने पहले क्यों नहीं बताया रोहित…छल क्यों किया…हम एक दूसरे के लिए नहीं बने थे…”

रोहित कोई जवाब नहीं देता। बच्चे की तरह उसे सहेज कर बेड पर लिटा देता। वह उसका चेहरा नहीं देख पाती जहां कोई अफसोस रत्ती भर नहीं, विजेता का दर्प छलकता रहता था।

जिस रात से पता चला है, उसने रोहित का चेहरा देखना बंद कर दिया। कोई बात कहती तो चेहरा घुमा लेती। फोन पर जरुर सहज होकर बात कर लेती। भीतर कहीं खामोशी जम रही थी जो न किसी की आवाज सुनना चाहती थी न किसी से अपना दुख बोलना चाहती थी। शाम को पड़ोस से आती आवाजें भी उसे परेशान करतीं।

सीमा को लगता कि उसके मन में बहुत ही गहरी गुफाएं हैं, और उसे इस अंधेरी गुफा से होकर गुजरना है। उसे एक कोने पर खडी हुई अम्मा दिखती है। अम्मा, भरी जवानी में विधवा हो गयी थी, और रहती भी कहाँ थी खोड़ा कॉलोनी में। अनपढ़ और खूबसूरत माँ, और उससे भी खूबसूरत वह। अम्मा कहती थी कि भगवान सब कुछ दे, मगर गरीब की लड़की को ख़ूबसूरती न दे। उसके फ्लैट में उसके सारे सामान की ख़ूबसूरती एकदम से उसकी कालिख में बदल जाती। वह धीरे धीरे उसी बचपने में चली जाती।

अम्मा ने थोडा-मोरा पैसा जोड़कर खोड़ा कॉलोनी में सौ गज का प्लॉट और खरीद लिया था। तब नहीं पता था कि सड़क के उस तरफ अमीरों की बस्ती बस जाएगी और उसके कारण इस तरफ के प्लॉट पर भी मार कुटाई शुरू हो जाएगी। सीमा को अब भी याद है वह दिन जब बिल्डरों ने उसके प्लॉट पर भी कब्ज़ा कर लिया था। उसकी गरीब अम्मा, झाडू पोंछा लगाने वाली औरत जिसके पास अपनी कल की रोटी का ही ठिकाना नहीं था, वह बिल्डर के आगे खूब गिडगिडाई, रोई, मगर बिल्डर ने उसकी एक न सुनी थी।

जैसे जैसे नोयडा और इंदिरापुरम का विस्तार हो रहा था, वैसे वैसे ही खोड़ा गाँव में भी कुकुरमुत्तों की तरह बिल्डर और प्रोपर्टी डीलर उग रहे थे। इस इलाके के प्रोपर्टी डीलर न केवल छोटे छोटे प्लॉट को घेर लेते थे बल्कि जबरन खरीद लेते थे।

माँ को रोहित उसी प्रोपर्टी डीलर के ऑफिस से मिला था जहाँ वह अपने प्लॉट को बचाने की गुहार लेकर जाया करती थी। भोला-सा सफाचट चेहरा, थोड़ी पतली आवाज और स्त्रैण चाल –ढ़ाल वाले रोहित ने न केवल उसकी माँ को सहारा दिया था, बल्कि अपने साथियों के साथ मिलकर बिल्डर के गुंडों को उस प्लॉट से भगाया था। रोहित उसकी मां का बहुत खयाल रखने लगा था।

अपनी बेटी के दिल से अनजान अम्मा ने एक सुदर्शन-मुलायम पुरुष को बेटी का हाथ थमाने का ऐलान कर दिया। उसे अपनी गली का पहला प्रेमी रोशनलाल याद आ गया! जिसके साथ के रोशन सपने असमय अंधेरे में डूब गए थे। अम्मा को बता न सकी थी। वह कायर भी गायब हो गया था। विरोध करती भी तो किसके सहारे।

गम में डूबी सीमा ने ढेर सारी नींद की गोलियां खा ली। अम्मा ने छाती पीट पीट कर रोशनलाल को खूब कोसा और ऐसे वक्त में फिर रोहित काम आया। उसने जी जान से सीमा की सेवा की, इलाज में खूब पैसे खर्च किए और सीमा को सकुशल घर वापस ले आया। रोहित ने रात दिन अस्पताल में गुजारे। अम्मा नियमित काम पर जाती रहीं और रोहित उसके पास बैठा रहा। सीमा उसके प्रति कृतज्ञता से भर गई मगर दिल में रोशनलाल की जगह उसे न दे सकी। सुबक सुबक कर रोती तो रोहित उसे ढांढस बंधाता। उसके मुलायम स्पर्श से वह राहत पाती। मगर उसके साथ शादी के बारे में सोच कर दिल कांप उठता। एक अनजान आदमी से शादी कैसे कर ले। सपने देखे रोशनलाल के साथ और जिंदगी कहीं और खींचे ले जा रही है।

अम्मा का फैसला अटल था।

अनजान रोहित के साथ खोड़ा गांव से उठकर सीधे इंदिरापुरम के फ्लैट में आ गई। कुछ दिन वैभव में डूबी रही…धीरे धीरे सच सामने प्रकट होता रहा, वह पछाड़े खाती रही..

कुछ दिन तक रोहित ने उसे छुआ तक नहीं। सीमा को लगा- शायद वह गम में हैं इसलिए उसे राहत पहुंचा रहा है। वह रोशनलाल को भूल कर नई जिंदगी जीने के लिए खुद को तैयार करने लगी थी। जो वैभव रोहित ने दिया था, रोशनलाल कभी न दे पाता। सिर्फ वैभव कहां बांध पाया है स्त्री मन को। रोहित के पास खुद चल कर गई थी वह। अपने भीतर से जूझते हुए, पहल करने के तमाम खतरों को भांपते हुए। क्या पता कि जिंदगी के इम्तहान कभी खत्म नहीं होते।

रोहित…आधा चंद्रमा उसकी रातें अधूरी…। अपने घरवालों और रिश्तेदारों से दूर, इसीलिए छिप कर फ्लैट में रहता है। सीमा हैरान हुई कि रोहित कहीं हावभाव से उनकी तरह नहीं दिखता। कैसे खुद को छुपा कर रखा है। फिर ऐसे इनसान को शादी की, एक सुंदर स्त्री की क्या जरुरत पड़ी। वह सवाल पूछती और रोहित क्रेडिट कार्ड थमा कर चला जाता।

सवालों से घिरी वह सोफे पर बैठी रही। किससे पूछे रोहित का सच..

मोबाइल की तरफ देखा जिसमें एक ही नंबर से दस मिस्ड कॉल था। फोन पर रोहित के जीजा जी थी। विहंस रहे थे, शादी की बधाई और हंसी मजाक..

“अरे, कभी हमारी जरुरत हो तो बुला लिया करिए…हम किस दिन काम आएंगे आपके…रोहित ने  हमसे रिश्ता तोड़ लिया तो क्या ? आप आ गई हैं, औरतें ही रिश्ते निभाती हैं…हम किस दिन आएं..सुना है, आप खूब रसपान भी करती हैं…करेंगे न किसी शाम हम आप..”

सीमा ने दांत किटकिटा कर खोड़ा गांव टाइप गालियां निकाली।

उधर से बेशर्म हंसी उभरी—

“मुझे गाली देने से अच्छा उस आदमी को दो जो समाज के सामने सिर्फ अपनी मर्दानगी साबित करने के लिए तुम्हें ब्याह लाया है…उसके वश का और कुछ नहीं…काम हमीं आएंगे भाभी जी…”

आवाज दे लेना। घर की बात है, घर में ही रहेगी। आप रोहित को छोड़ नहीं पाओगी, सोचो कितना सुख सुविधा से लाद रखा है आपको…छोड़ पाओगी ये सब. सोच लो…”

फोन कट कर दिया सीमा ने।

“काम…क्या काम…इतनी लाचार है या इतनी जरुरतमंद कि कोई उस पर रहम दिखाए.

सीमा को याद आया, रोहित कैसे अम्मा के सामने बिछा रहता था, सबके लिए मंहगे गिफ्ट लाता था, सीमा पर नजर थी उसकी, अम्मा ने उससे छुटकारा पाया और सीमा ने खोड़ा गांव से. रोहित ने अपने कलंक से, जमाने के ताने से। सबकी मुक्ति अलग अलग थी। अम्मा को छोड़कर सबके साथ मुक्ति सशर्त आई थी। इतनी बड़ी कीमत के बारे में कहां सोचा था। मुक्ति नहीं कैद थी, जिससे रिहाई असंभव दिखाई देती है। रिहाई लेकर क्या करेगी। कहां जाना है। इतनी भीड़ है दुनिया में जहां रोहित के जीजा जैसे लोग हर कदम पर जाल बिछाए बैठे हैं। तो उनसे डर कर मुक्ति के बारे में न सोचे। सोचते सोचते माथा फटने लगा।

छटपटाती हुई सीमा बालकनी में जाकर खड़ी हो गई। सोच विचार सब बंद। बालकनी में टयूब की तेज रोशनी थी, जो उसे चुभ रही थी। एक तरफ अखबार के ढेर पड़े थे। हवा तेज थी, सो अखबार के पन्ने फड़फड़ा रहे थे। उसने झुक कर अखबारो को दबाना चाहा। हिंदी अखबार के दूसरे पन्ने पर बड़ी-सी हेडिंग पर नजर पड़ी।

“पति की नपुंसकता के बारे में पत्नी ही बता सकता है…” स्वास्थ्य मंत्री। उसने पन्ना उठा लिया। पूरी खबर कांपते हाथों पढ़ने लगी- “अमुक इलाके में पुरुषों में बढ़ती नपुंसकता के बारे में या तो डॉक्टर बता सकता है या पत्नी। सरकार कैसे बता सकती है कि कौन सा व्यक्ति नपुंसक है या नहीं है। कोई पुरुष कभी नहीं बताएगा कि वह नपुंसक है….। इससे निपटने या दूर करने के लिए प्रदेश सरकार के पास कोई कार्य योजना तैयार नहीं है…महिला स्वास्थ्य शिविरों के माध्यम से निसंतान दंपति का पता लगाया जाता है। अमुक इलाके में 126 व्यक्ति चिन्हित किए गए हैं…“ बड़ी खबर थी। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री का बयान था जिसके लिए उनकी निंदा भी नीचे छपी थी।

“127 वां व्यक्ति तो इस घर में रहता है।“ वह बड़बड़ाई।

127वां व्यक्ति की पहचान जाहिर होते ही सारा वैभव ढह जाएगा। भीतर से अपनी ही आवाज की गूंज सुनाई दी। वह कांप उठी।

खबर पढ़ने के बाद उस पन्ने को अखबारों के ढेर में दबा दिया।

लाइट बुझा दी। टयूब लाइट और तीखी लगने लगी थी। उसे अंधेरा चाहिए था जहां से रोशनी को देख सके। बेसुध अंधेरे में डूबे आकाश की तरफ देखा। वहां आधा चांद देर से टंगा था। रोज की तरह रात थी, सुबह अपने वक्त पर ही आएगी। सीमा ने एक आंख में खोड़ा गांव भरा, दूसरे में इंदिरापुरम का वैभव…। खोड़ा गांव अतीत भी था, भविष्य भी हो सकता है। उसे चुनना था। बर्फ का दरिया या अगिन-खोह ।

यह तीन अलग अलग समयों में पसरी हुई एक जिंदगी थीं जिसका हल ढूंढने के लिए समय की शरण में ही जाना पड़ता। समय के कहर का मरहम समय ही होता है।

सीमा ने सोच के कपाट बंद किए और भूत और भविष्य की फाइल पर बर्फ की चादर डाल दी। वर्तमान के अगिन-खोह में होलिका की तरह दहकने को पैर बढ़ा दिए।

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