Tuesday, August 25, 2026
होमकवितामंजुला श्रीवास्तवा की कविता - वन पलाश

मंजुला श्रीवास्तवा की कविता – वन पलाश

वन पलाश बन महक रहा था
केसरिया रंग सूर्य सा दहक रहा था
लाल रंग आभा ले उछल रहा था
बिन पत्तों के पलाश चमक रहा था।
अरण्य में फ़ौजी सा तना डटा था
सांवली भुजाएं फैलाए खड़ा था
धरती से अंबर तक शीश तना था
गाड़ी के रफ्तार सा चलता बना था
पटरियों के किनारे वो दौड़ रहा था
छण में आंखों से ओझल हुआ था
आंखों में मेरी सुंदरता समा गया था
होली में तन मन मेरा भींग गया था।
चार पलाश समक्ष वो बौना हो रहा था
बीच डगर में पत्तों से लदा वन घना था
गोधूली में अस्ताचल का सूर्य अड़ा था
कज्जल रेखा क्षितिज में खींच रहा था ।
मंजुला श्रीवास्तवा
16/3/24
RELATED ARTICLES

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest