Tuesday, August 25, 2026
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सूर्यकांत शर्मा की कविता – किराए का मकान

किराए का मकान
है तू,

समझ बैठा जिसे
दुकान है तू।
धुंधली सी दुनिया
से आया है तू

समझ ले
कान खोल कर
सुन ले तू।
महज़ इस मकान में
किराए पर आया है
तू।

न रख कोई ख़्वाब
न ख़्वाहिश कोई,
किराए के मकान
में आ बैठा है तू।
पंच तत्त्व और दस
द्वार के मकाँ में
रहता है तू

पंच विकार और
पूर्व कर्म से घिरा
बैठा है तू।
सबकी चाहत औ
ख़्वाबों का झूला
है तू

कहाँ!कहाँ!
कब !किसे!
क्यों! क्योंकर!
किस गुमां में
फूला है तू ।

तू किराए के  आशियां में आया
जीवन के यौवन काल में आते ही
क्यूं इतना
हैराँ? परेशां सा?
बौराया है तू।
कामना वासना
के पोखर में
नहीं !नहीं! नहीं!
उस कीचड़ में नहाया
शूकर की मानिंद
लोटता  है तू।

किराए के मकान
भी
कभी अपने हुए है!?
अ ग़ाफ़िल
इतना भी  ना समझ
है तू।
किराए के मकान
में तन्हाई में आया
है तू
उसी दुनिया में
तन्हा ही जायेगा
तू।

दे! दे! दे ना
सारे का सारा
किराया
उस दो जहां
के मालिक का
प्यारा शहज़ादा है
तू।

  • सूर्यकांत शर्मा , द्वारका नई दिल्ली
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4 टिप्पणी

  1. यही सच्चाई है। हम सब को इसे समझने और जीवन के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलने की जरूरत है। दूसरी तरफ भगवान् या प्रकृति भी हम सभी जीवों को अपनी तरफ से भी किरायेदार का दर्जा ही देती है न कि किसी मकान मालिक का। यह मेरी कविता बेदखली में दिखेगा:

    बेदख़ली
    –बिमल सहगल

    किसी दुनियावी मकान-मालिक जैसा ही
    निष्ठुर और व्यावहारिक होता है
    इस दुनिया का मालिक भी;
    लीज़ पर उठाता है रच के जीवों के चोले,
    और फिर ज्यों ही
    उसमें वास करने भेजी रूहों का
    मन रमने लगता है उसी के रचे संसार में,
    बढ़ने लगती हैं उनकी नज़दीकियाँ और लगाव
    घर-परिवार में उसी के द्वारा बसाये
    दूसरे किराएदारों और दुनियावी पहचान वालों से
    कि बहुधा, अचानक से,
    लीज़ अवधि पूरी होने से पहले ही,
    भेज देता है वह बेदख़ली का नोटिस
    और अक्सर बिना नोटिस के ही
    आसानी से खाली करवा लेता है अपनी संपत्ति
    कोई भी बहाना गढ़ के।
    और जो करते हैं अवहेलना उसकी वहीं टिके रह,
    करता है बरताव उनके साथ
    बिलकुल किसी दुनियावी मकान-मालिक जैसा ही
    उसी की तरह नित नए-नए हथकंडे अपनाते।
    बिजली-पानी काटने और धमकाने की तर्ज़ पर
    मिटा देता है पहले तो
    यौन आकर्षण और उत्पत्ति में रुचि
    खींच लेता है फिर दाँतो के साथ
    जिह्वा का स्वाद
    आंतों को भींच कर
    उड़ा ले जाता है भूख और प्यास
    आँखों के नूर के साथ ही मिटा देता है
    उनके हिस्से का सारा मायावी संसार
    जहां कोई कोयल नहीं कूकती फिर उनके लिए
    न कोई अपना घोल पाता है कानों में कभी मधुर गान
    और हाथ-पाँवों को शिथिल कर
    नज़दीकियों को खदेड़ आता है कहीं दूर
    और यादों की बगिया को उजाड़ने के बाद
    किसी विषम किराएदार के डटे रहने की
    बची-खुची अड़ियल चाह को
    तरह-तरह की बीमारियों की बौछार से
    आखिर दे ही देता है पछाड़ –
    सिरे से उसारे नए मकान में, उसकी जगह,
    संशोदित शर्तों पर
    फिर से कोई और किराएदार बिठाने।
    *****

    • वाह क्या कहने,,,,मन को सकरात्मक और रचनात्मक महसूस हो रहा आपका कवितामय प्रत्युत्तर पड़ कर। हृदय से आभारी हूँ।

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