इस सावन क्या कह पाओगी?
जो न कही है, तुमने अब तक;
इस सावन क्या कह पाओगी?
होंठ सिले हैं, लाज के मारे;
अँखियों की भाषा, पढ़ पाओगी?
झुट्ठी-मुट्ठी, कुछ भी कह लो;
क्या मेरे बिन, रह पाओगी?
दिल में है जो, जुबां से कह दो;
कब तक खुद को, भरमाओगी।
कजरी, ठुमरी बहुत गा चुकी
गीत प्यार के, कब गाओगी?
तुम मेरी, आँखों में देखो;
अपनी ही, सूरत पाओगी।
वक्त फिसलता, रेत के मानिंद;
फिर एक दिन, तुम पछताओगी।
बांध के रखा है, नयनों को;
खूब बरसेंगें, जब तुम जाओगी।
सांझ-रात को, खूब भटक लो;
सुबह, ‘सूरज’ तक आओगी।
- विनय सिंह बैस ‘सूरज’ग्राम-बरी, पोस्ट- मेरुई, जनपद-रायबरेली
8920040660

बहुत सार्थक और समीचीन संदर्भों को रेखांकित करती है आपकी रचना।