Tuesday, August 25, 2026
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विनय सिंह बैस ‘सूरज’ की कविता- इस सावन क्या कह पाओगी?

इस सावन क्या कह पाओगी?

जो न कही है, तुमने अब तक;
इस सावन क्या कह पाओगी?

होंठ सिले हैं, लाज के मारे;
अँखियों की भाषा, पढ़ पाओगी?

झुट्ठी-मुट्ठी, कुछ भी कह लो;
क्या मेरे बिन, रह पाओगी?

दिल में है जो, जुबां से कह दो;
कब तक खुद को, भरमाओगी।

कजरी, ठुमरी बहुत गा चुकी
गीत प्यार के, कब गाओगी?

तुम मेरी, आँखों में देखो;
अपनी ही, सूरत पाओगी।

वक्त फिसलता, रेत के मानिंद;
फिर एक दिन, तुम पछताओगी।

बांध के रखा है, नयनों को;
खूब बरसेंगें, जब तुम जाओगी।

सांझ-रात को, खूब भटक लो;
सुबह, ‘सूरज’ तक आओगी।

  • विनय सिंह बैस ‘सूरज’ग्राम-बरी, पोस्ट- मेरुई, जनपद-रायबरेली
    8920040660
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