आकाशदीप
जलता रहता सारी रात एक आस में
मेरे आंगन का आकाशदीप।
पीले अक्षत का दिन सो गया
और धुआँ हो गया सिवान
मौलसिरी की नन्ही डाल ने
लहरों पर किया दीपदान
चुग़ता रहता अँगार चांदनी उजास में
मेरे आंगन का आकाशदीप ।
मौन हुई मंदिर की घंटियाँ
ऊँघ रहे पूजा के बोल
मंत्र बँधी यादों के ताल में
शेफाली शहद रही घोल
गढ़ता रहता तमाम रूप आसपास में
मेरे आंगन का आकाशदीप।
तिथियों के साथ मिटी उम्र की
भीत पर टँकी उजली रेख
हँस -हँस कर नम आंखें बाँचतीं
मटमैले पत्र- शिलालेख
वरता रहता सलीब एक-एक साँस में
मेरे आंगन का आकाशदीप।
रोशनी अंधेरे का महाजाल
बुनती है यह श्यामा रैन
पिंजरे का सुआ पंख फड़फड़ा
उड़ने को अब है बेचैन
कसता रहता सारी रात नागफाँस में
मेरे आंगन का आकाशदीप।
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तुम बदले
तुम बदले, संबोधन बदले
लेकिन मन की बात वही है।
जाने क्यों मौसम के पीछे
दिन बदले, पर रात वही है।
यह कैसा अभिशाप, चांद तक
सागर का मनुहार न पहुंचे
नदी तीर एकाकी चकवे का
क्रंदन उस पार न पहुंचे
तन की तृषा झुलस कर सोई
मन में झंझावात वही है ।
तुम्हें नहीं मालूम कि कैसे
भर जाता नस-नस में पारा
उड़ते हुए मेघ की छाया -सा
पल भर का मिलन तुम्हारा
तृप्ति नहीं मरुथल को, यद्यपि
प्यास वही, बरसात वही है ।
जितना पुण्य किया था, पाया
साथ तुम्हारा उतने दिन का
तुम बिछड़े थे जहां,वहीं से
पंथ मुड़ गया चंदन वन का
सब कुछ बदले, पर अपने संग
यादों की बारात वही है।
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रात हुई है
रात हुई है चुपके -चुपके
इन अधरों से उन अधरों की
बात हुई है चुपके-चुपके।
नीले नभ के चांद -सितारे
मुझ पर बरसाते अंगारे
फिर भी एक झलक की खातिर
टेर रहा हूँ द्वारे- द्वारे
मेरे मन की छाप -तिलक पर
घात हुई है चुपके चुपके।
एक चिड़िया ने आकर कैसे
नीड़ बनाया, देख रहा हूँ
भीतर- बाहर कैसे एक
नशा- सा छाया, देख रहा हूँ
देख रहा हूँ ,कैसे शह से
मात हुई है चुपके -चुपके।
मेरा उससे परिचय इतना
जितना ओस -बिंदु का तृण से
कोई पता नहीं कब जलकण
टूट गिरे सीपी में घन से
इक हिरना की आँखों में
बरसात हुई है चुपके- चुपके ।
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पता नहीं
पता नहीं,सच है कि झूठ
पर लोगों का कहना है
मेरे प्रेम पगे गीतों को
उमर कैद रहना है ।
ऐसी हवा बही है दिल्ली
पटना से हरजाई
सरस्वती के मंदिर में भी
खोद रहे सब खाईं
बदले मूल्य सभी जीवन के
कड़वी लगे मिठाई
दस्यु-सुंदरी के समक्ष
नतमस्तक लक्ष्मीबाई
इसी कर्मनाशा में
कहते हैं, सब को बहना है ।
इस महान भारत में अब है
धर्म पाप का नौकर
एक अरब जीवित चोले में
मृत है बस आत्मा भर
बाट-माप के काम आ रहे
हीरे -मानिक पत्थर
मानदेय नायक से भी
ज्यादा पाते हैं जोकर
मुर्दाघर में इस सड़ांध को
जी-जी कर सहना है।
घर के मालिक को ठगकर
जब मौज करें रखवाले
धर्मांतरण करें जब
गंगाजल का गंदे नाले
नामर्दी के विज्ञापन से पटी पड़ी दीवारें
होड़ लगी है कौन रूपसी
कितना बदन उघारे
पिछड़ेपन की बात
कि लज्जा नारी का गहना है।
लेकर हम संकल्प चले थे
तम पर विजय करेंगे
नई रोशनी से घर का
कोना-कोना भर देंगे
लेकिन गांव शहीदों के
अब भी भूखे अधनंगे
उन पर भारी पड़े नगर के
मन के भूखे -नंगे
ऐसे में इस गीतकार को
बोलो क्या कहना है?
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काम करेगा कौन?
काम करेगा कौन?
पूछने लगे खेत-खलिहान
देश के श्रीमानों से।
बहुत बड़ा धोखा है ‘मनरेगा’ भी
श्रमजीवी समाज से
बना रहा आलसी, शराबी
श्रमिकों को पैसे -अनाज से
मुँह को काम दिया
सुनने का
और देखना है कानों से।
नये बौद्ध भिक्षुक हैं
आश्रमबद्ध भिखारी
काम मांगकर काम
न करने की बीमारी
चाबुक दलितों के हाथों में
घास कटाते विद्वानों से।
यज्ञसूत्र अभिमंत्रित
बकरी की गरदामी
सेवक की पट्टिका
लगा बैठे अभिमानी
तिलकित भाल हुए पीछे
पादत्राणों से।
सारी बुद्धि घुसी घुटने में
प्रतिभाओं से नया छलावा
पूजित पद अब फीलपाँव हैं
लोकतंत्र भी मात्र दिखावा
लोकगीत सब हैं तबाह
फिल्मी गानों से।
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डॉ बुद्धिनाथ मिश्र
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