बेदाग, चमकता, दमकता मासूम सा चेहरा, तीखे नयन नक्श, काले घने लंबे बाल, लम्बाई लगभग साढ़े पांच फीट। पतला दुबला किंतु सुडौल जिस्म। उम्र यही कोई तीस बत्तीस वर्ष। कॉटन के सलवार कुर्ते पर सलीके से दुपट्टा धारण किए बड़ी सादगी से वह हमारे सामने आकर खड़ी हो गई। चेहरे पर आत्मविश्वास और अविस्मरणीय मुस्कान। हाथ में पेन और एक ऑर्डर नोटबुक थामे।
“गुड ऑफ्टर नून” बड़े ही शालीन और विनम्र भाव से बोली।
“वेरी गुड आफ्टरनून, यस…?” मैंने बोला।
“ऑर्डर प्लीज सर?”
“ओह, एक मिनट।” मैंने कहा और टेबल पर रखे मेन्यू कार्ड को उठाकर उसपर एक सरसरी नज़र दौड़ाई और कहा, मेरा राजमा चावल लिख लो। बाकी इन लोगों को क्या खाना है, यह खुद बताएंगे।” मैंने अपने साथ बैठे साथियों की तरफ इशारा करके कहा।
फिर एक-एक करके सबने बताया कि किसको क्या खाना है। सबका ऑर्डर लिखकर वह चली गई।
कुछ मिनट्स बाद वह पानी की बोतलें लेकर आई। बोतल हमारी टेबल पर रखीं और मुस्कुराकर बोली, “खाने के लिए आप लोगों को थोड़ा वेट करना पड़ेगा, क्योंकि हम ताज़ा खाना बनाकर परोसते हैं।”
“कोई बात नहीं, हमें कोई जल्दी नहीं है, आप आराम से लाइए।” मैंने कहा
वह हमारे पास से चली गई। मेरे साथी आपस की बातों में मशगूल हो गए। मैं उस महिला के बारे में सोचने लगा । आज इंसान अधिक से अधिक पैसे कमाने और बचाने की चाह में क्या नहीं करता है। अब इन मैडम को ही देख लो, वेटर की सैलरी बचाने के लालच में खुद मालिक से वेटर बन गईं।
हम उस समय हिमाचल के रामपुर बुशहर से चंडीगढ़ आ रहे थे। समय दोपहर का था। शिमला पहुंचते-पहुंचते हमें भूख परेशान करने लगी थी और हम लंच करने के लिए एक ऐसा रेस्टोरेंट या ढाबा देख रहे थे, जहां अच्छे से हमारी गाड़ियां पार्क हो सकें और हम सुकून से बैठकर लंच कर सकें।
पहले हमारा प्लान कुफरी में खाना खाने का बना, लेकिन वहां के हर रेस्टोरेंट में सैलानियों की जबरदस्त भीड़ थी और हम आपाधापी में खाना नहीं खाना चाहते थे इसलिए हमने अपनी गाड़ियां आगे बढ़ा दीं। फिर प्लान बना शिमला में खाना खाएंगे। लेकिन शिमला में भी कुफरी जैसा ही माहौल था।
हम वहां से भी निकल आए। शिमला से काफी दूर निकल आने के बाद यानि चंडीगढ़ से करीब सत्तर किलोमीटर पीछे शोघी में हमें ऑन रोड एक बड़ा प्यारा, रंग बिरंगा-सा रेस्टोरेंट दिखाई दिया। जिसमें नीचे किचन था और ऊपर बहुत बड़ा ओपन डाइनिंग रूम था। खूब खुला-खुला, हवादार और रंग बिरंगे फूलों के गमलों से सुसज्जित। जिसकी साइड सीट पर बैठकर पूरा शिमला और शिमला की हसीन वादियों का नज़ारा देखा जा सकता था।
हम सबको वह रेस्टोरेंट पसंद आया। हमने अपनी गाड़ियां वहीं पार्क की और ऊपर डायनिंग हाल में आकर बैठ गए। हमारे बैठने के साथ ही वह महिला जिसका नाम शालिनी था। जो अपने नाम के अनुरूप शालीन ही नहीं, काफी फुर्तीली और होशियार भी थी। उसकी आंखों में, उसके संघर्ष की दास्तां लिखी हुई साफ दिखाई दे रही थी। वह हमारे पास आई और मुस्कुराकर बोली, “आप लोग लंच करेंगे या चाय कॉफी लेंगे?”
“चाय कॉफी भी लेंगे, लेकिन पहले लंच करेंगे। क्या-क्या है आपके किचन में ?”
मेरे कहते ही उसने टेबल पर रखे मेन्यू कार्ड की तरफ इशारा करके कहा, इसमें जो-जो लिखा है, वह सब है हमारी किचन में।
“ठीक है अभी देखकर बताते हैं।”
“ओके…”इतना कहकर वह वापस नीचे किचन में चली गई।
हम एक दर्जन से भी ज्यादा लोग थे। हम सब बरेली से दो हज़ार से भी अधिक किलोमीटर दूर हिमाचल के दुर्गम, दुर्लभ, खौफनाक, खतरनाक, भयानक, हैरत अंगेज, रौंगटे खड़े कर देने वाले और दिल दहला देने वाले रास्तों, गगनचुंबी चट्टानी रूपी पहाड़ों और बौद्ध मठों को देखने के लिए घर से निकले थे।
हमें मालूम था, हमारा दस बारह दिनों का यह सफर हमारे लिए यादगार तो होने ही वाला है, साथ ही जोख़िम भरा, थका देने वाला, ऊबा देने वाला और मुश्किलें खड़ी कर देने वाला भी होगा। क्योंकि हम इस सफर की परेशानियों और दुश्वारियों के बारे में कई बार गूगल पर पढ़ चुके थे, इंस्टाग्राम, यूट्यूब पर देख, सुन और समझ चुके थे कि कैसी-कैसी मुश्किलों और परेशानियों से जूझकर माइनस डिग्री तापमान में, खून को जमा देने वाली ठंडी, बर्फीली हवाओं के झोंको और थपेड़ों को झेलते हुए, दस-दस, पंद्रह-पंद्रह किलोमीटर में फैली ऊबड़-खाबड़ हजारों फीट गहरी घाटियों, खाइयों में, जहां दूर-दूर तक न कोई घर, न कोई इंसानी वजूद दिखाई देता है। जहां रात का धुंधलका छाते ही डर के मारे सांसें गले में अटक जाती हैं, को पार करके सफर के शौकीन, बाइक सवार, स्कूटी सवार और कार सवार महिला पुरुष यहां पहुंचते हैं।
उन सभी सफर प्रेमियों के हौसलों और हिम्मत को देखकर हमारी हिम्मत भी बढ़ गई। और हम निकल पड़े इन वीरान वादियों के इस जोखिम भरे सफर पर। हम यह भरोसा कर चुके थे कि हमारा यह सफर, हमारे लिए भी बहुत ही चैलेंजिंग, जोखिम भरा लेकिन रोमांचक, मनोरंजक, ज्ञानवर्धक और उत्साहवर्धक होने वाला है।
इससे पहले भी हिमाचल हम कई बार जा चुके थे लेकिन इस बार हमने अपने हिमाचल टुअर में किन्नौर घाटी और स्पीति घाटी की आध्यात्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक यात्रा करने का मन बनाया था। क्योंकि हिमाचल प्रदेश में स्थित किन्नौर वैली और स्पीति वैली का अपना अलग ही महत्व है। यह वैली अपनी प्राचीन बौद्ध संस्कृति, ठंडे रेगिस्तानी परिदृश्यों तथा ट्रैकिंग के लिए विश्वविख्यात है। स्पीति वैली को तो मिनी तिब्बत भी कहते हैं।
यहाँ के अद्भुत और अलौकिक चंद्र-समान परिदृश्य, प्राचीन बौद्ध मठ, दिल दहला देने वाले ट्रेकिंग मार्ग बेहद रोमांचक और रहस्यमयी हैं। समुद्र तल से करीब 12 ,500 फीट की ऊंचाई पर बसा यह ठंडा रेगिस्तान जो तिब्बत और भारत की सीमा को जोड़ता है, का शांत और ठंडा वातावरण यहां आने वालों के मन को खूब लुभाता और गुदगुदाता है। यहाँ के सैकड़ों वर्ष पुराने बौद्ध मठ, विशेष कर ताबो तिब्बती बौद्ध धर्म परम्परा के प्रमुख केंद्र हैं। ताबो को तो दुनिया का सबसे प्राचीन मठ माना गया है।
वहीं दूसरी तरफ भारत तिब्बत सीमा पर स्थित किन्नौर वैली की चर्चा सामरिक, धार्मिक, प्राकृतिक और पर्यटन परम्परा के लिए भी की जाती है। और यह अपनी समृद्ध संस्कृति, सेब की खेती और साहसिक पर्यटन के लिए ही नहीं, बल्कि हिंदू पौराणिक कथाओं में भगवान शिव से जुड़े ‘किन्नर कैलाश’ पर्वत और शिवलिंग के लिए भी दुनियाभर में जानी जाती है। यहाँ के पार्वती कुंड का विशेष धार्मिक महत्व है। किन्नौर घाटी में अपने होने वाले बेहतरीन किस्म के सेब, चिलगोजा और खुबानी का स्वाद पूरे देश में लोकप्रिय है। यहाँ की पारंपरिक किन्नौरी शॉल, टोपी और हस्तशिल्प को भी बहुत पसंद किया जाता है। यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य, हरे-भरे जंगल और शांत वातावरण पर्यटकों को खूब लुभाता हैं। यहाँ ट्रेकर्स और सड़क मार्ग से यात्रा करने का मज़ा ही कुछ और है। यहाँ की नाको झील और वन्यजीव अभयारण्य भी यहाँ आने वालों का मन मोह लेते हैं।
किन्नौर और स्पीति वैली की यात्रा पर ले चलने से पहले आप यह और जान लीजिए कि यह दोनों ही वैली अपने आध्यात्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों का गौरव बढ़ाने वाले आगन्तुकों, अनुयायियों और अनुरागियों का यहां पहुंचने पर अपने दोनों हाथ पसारकर ह्रदय तल से अभिनंदन और स्वागत करती हैं। यहां के स्वच्छ, निर्मल और पवित्र वातावरण में सबका मन रम जाता है। क्योंकि देश के और शहरों की तरह यहां न तो मोटर गाड़ियों का कान फोड़ू कोलाहल है और न ही यहां लोगों की अंधाधुंध भीड़ है। यहां चारों तरफ शांति और सुकून का अनुभव होता है।
भले ही किन्नौर और स्पीति वैली तक पहुंचने के लिए सैकड़ों किलोमीटर का जोखिम भरा सफर टूटे फूटे, ऊबड़ खाबड़, ऊंचे नीचे कंकरीले पथरीले रूह कंपा देने वाले रास्तों से होकर करना पड़े, पर यहां आकर सबको सुखद अनुभूति का अहसास होता है। काजा से करीब 16 किलोमीटर की दूरी पर बसा है लंज गांव। यह गांव अपनी प्राकृतिक छटा और विशालकाय बुद्ध प्रतिमा और प्राचीन बौद्ध मठों के लिए दुनिया भर में लोकप्रिय है।
समुद्र तल से 4,400 मीटर की ऊंचाई पर बसे लंज गांव की विशेषता यह है कि यहां का वातावरण, हमेशा साफ सुथरा और स्वच्छ रहता है क्योंकि यहां भगवान बुद्ध की 35 फीट ऊंची विशालकाय भव्य मूर्ति है। इस मूर्ति के पास खड़े होकर नीचे स्पीति वैली के खूबसूरत नज़ारे साफ दिखते हैं। इस भव्य बुद्ध प्रतिमा से कुछ ही दूरी पर लंज का अपना एक बहुत ही पुराना बौद्ध मठ है। जो तिब्बती शैली में बना है और इसकी भीतरी दीवारों पर बहुत सुंदर चित्रकारी भी की गई है। कहा तो यह भी जाता है कि लंज गांव में लाखों साल पहले टेथिस सागर हुआ करता था। स्पीति वैली का सबसे बड़ा शहर काजा ही है काजा से भगवान बुद्ध की प्रतिमा की दूरी मात्र 14 किलोमीटर दूर है। लेकिन चौदह किलोमीटर का यह छोटा सा सफर रूह को कंपा देने वाला है। लाहौल से स्पीति में प्रवेश करते समय कुंजुम दर्रा और चंद्रताल झील पर्यटकों का मन मोह लेते हैं।
स्पीति घाटी का एक और आकर्षण है, हिक्किम जो काजा से करीब 46 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और यहां दुनिया का सबसे ऊंचाई पर बना डाकघर है, जो यहां आने वालों के लिए आकर्षण का केंद्र है। इस पोस्ट ऑफिस की ऊँचाई समुद्र तल से 14,567 फीट है। इसका लेटर बॉक्स भी दुनिया का सबसे बड़ा लेटर बॉक्स है। इतना बड़ा कि इसी बॉक्स के अंदर पूरा पोस्ट ऑफिस समाया हुआ है। यहां आने वाले सैलानी यहाँ आकर पोस्ट कार्ड खरीदते हैं और अपनों के नाम चिट्ठी लिखते हैं और उस चिट्ठी को पाकर उनके अपने खुश होते हैं। इस पोस्ट ऑफिस की ऊंचाई का रिकॉर्ड लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी दर्ज है।
हिक्किम से सटा एक गांव और है जिसका नाम कॉमिक है। जो कॉमिक मॉनेस्ट्री के नाम प्रसिद्ध है। इस गांव की विशेषता यह है कि यहां दुनिया की सबसे ऊंचाई पर स्थित एक कैफे और होम स्टे है, जिसकी ऊँचाई समुद्र तल से 15,049 फीट है। कैफ़े मंहगी चीजें परोसता है फिर भी यहां लोगों की खासी भीड़ रहती है।
हिक्किम से कॉमिक और कॉमिक से “की” मॉनेस्ट्री के दर्शन करने के बाद चीचम ब्रिज का अद्भुत नजारा देखा जा सकता है। देश भर में इस अनोखे पुल की चर्चा होती है। इस पुल को एशिया का सबसे ऊंचा सड़क पुल माना गया है। चीचम पुल इंजीनियरिंग कला कृति का बेजोड़ नमूना है । यह पुल स्पिति की दुर्गम घाटियों के बीचोबीच बना हुआ है। यह पुल चीचम गाँव को किब्बर और काजा से जोड़ता है। इस पुल की ऊंचाई लगभग 150 मीटर है और यह पुल 14000 फीट की ऊँचाई पर स्थित है।
हम हिमाचल प्रदेश की किन्नौर वैली और स्पीति वैली घूमने जाने के लिए तीन महीनों से तैयारी कर रहे थे। हम यह डिसाइड कर रहे थे कि जहां तक संभव हो, वहां तक ट्रेन से जाया जाए, बस से जाया जाए या फिर कंप्लीट यात्रा अपनी निजी वाहनों से की जाए?
काफी सोच-विचार और गहन चिंतन-मंथन के बाद नतीजा ये निकला कि हमने बरेली से चंडीगढ़ तक ट्रेन से जाने का मन बनाया। चंडीगढ़ से हिमाचल की ही चार टैक्सियां बुक कीं । हम बरेली से लालकुआं गए, क्योंकि बरेली से सीधे चंडीगढ़ जाने वाली सभी ट्रेनों में रिजर्वेशन फुल थे, किसी ट्रेन में कोई सीट खाली नहीं थी। इसीलिए हमने लालकुआं से चंडीगढ़ की टिकट बुक करवा लीं।
अप्रैल 25, 2026 की रात्रि पौने आठ बजे हम बरेली से लालकुआं जाने वाली ट्रेन से लालकुआं के लिए रवाना हुए। रात को ही दस बजे हम लालकुआं पहुंच गए। वहां से चंडीगढ़ जाने वाली हमारी अमृतसर एक्सप्रेस ट्रेन रात्रि ग्यारह बज कर चालीस मिनट पर जाने वाली थी। ट्रेन प्लेटफार्म पर लग चुकी थी। हम सब अपनी-अपनी सीट पर पसर गए। ट्रेन अपने निर्धारित समय से रवाना हुई। रात्रि भोजन हम बरेली जंक्शन पर ही कर चुके थे इसलिए सब मुंह ढक कर सो गए। फिर सुबह को करीब साढ़े नौ बजे चण्डीगढ़ पहुंचकर ही हमारी आंख खुली।
ट्रेन से उतरकर हम सब वेटिंग रूम में आ गए। वहां पर सब फ्रेश हुए, नहाए और कपड़े बदले। चढ़ीगढ़ रेलवे स्टेशन पर हमारी टैक्सियां आ चुकी थीं। हम सब तैयार होकर अपनी-अपनी टैक्सी में बैठ गए।
हमारा प्लान था, चंडीगढ़ से चार-पांच किलोमीटर निकलकर, शहर की आवाजाही से दूर किसी अच्छे से रेस्टोरेंट में नाश्ता करेंगे। हमने सुबह का नाश्ता, दोपहर का लंच और करीब ढाई सौ किलोमीटर रोज का सफर तय करके रात का डिनर और स्टे कहां करना है, इसकी सारी जिम्मेदारी अपने टैक्सी ड्राइवरों को ही सौंप दी थी। इसलिए रास्ते में हमें खाने-पीने की कहीं कोई दिक्कत नहीं हुई।
सुबह के करीब दस बजे हम चंडीगढ़ से चलकर दोपहर को एक बजे लगभग सौ किलोमीटर चलने के बाद एक होटल के सामने रुके। हमारा नाश्ता तो नहीं हो पाया था क्योंकि जिस तरह का खाने का होटल हम देख रहे थे, वैसा रास्ते में कहीं नहीं मिला। कहीं भीड़ बहुत थी तो कहीं हमारे मतलब का नाश्ता नहीं था। इसलिए एक बजे हमने एक अच्छे होटल पर रुककर लंच किया। लंच करने में हम सबको करीब एक घंटा लगा। दो बजे हम फिर चल दिए। हमारा प्लान था कि आज की रात हम रामपुर बुशहर में स्टे करेंगे।
जैसे-जैसे हम रामपुर बुशहर की तरफ बढ़ रहे थे, वैसे-वैसे रास्ते की ऊंचाई और सर्दी भी बढ़ रही थी। शाम का छह बज चुका था और रामपुर बुशहर अभी भी सत्तर किलोमीटर दूर था। पहाड़ों में शाम भी जल्दी हो जाती है। हमने रास्ते में एक होटल के सामने गाड़ियां पार्क कीं और सबने गरम-गरम चाय का आनंद लिया । जिसको वाश रुम जाना था वह वॉशरूम गया।
हम सब बहुत ज़्यादा थक चुके थे। और अब और सफर करने में दिक्कत हो रही थी। रात का अंधेरा भी गहराने लगा था। इसलिए रामपुर बुशहर से करीब दस किलोमीटर पीछे ही सैंज में एक होम स्टे में सबके लिए रातभर को कमरे बुक करवा लिए। वहीं पर रात्रि भोजन भी किया। भोजन बनाने और खाने का सामान हम साथ ले गए थे, बस होम स्टे का किचन किराए पर लिया था। डिनर करके हम सब सो गए। सुबह को करीब आठ बजे तक हम सब नहाकर रेडी हो गए और आगे का सफ़र शुरू कर दिया । हमने तय किया कि नाश्ता वहां नहीं कहीं और करेंगे, क्योंकि वहां सब कुछ बहुत महंगा और काम चलाऊ था।
रामपुर बुशहर क्रॉस करके हमने कपूर रेस्टोरेंट में मनपसंद नाश्ता किया । और वहां से आगे के लिए रवाना हो गए। फिर हमारे साथ वही हुआ, जो बीते कल हुआ था। दोपहर के तीन बज गए, मगर रास्ते में लंच करने के लिए हमें कोई अच्छा ढाबा या होटल नहीं मिला। सभी को भूख भी जोर की लगी थी लेकिन खाना मिलने की दूर-दूर तक कोई उम्मीद नहीं थी।
खाना मिले या ना मिले चलते रहना हमारी मजबूरी थी। फिर एक घंटा चलते रहने के बाद एक वॉटरफॉल के सामने हमारी गाड़ियां रुकीं। कुछ देर हम सब उस वाटर फॉल के नजारे को भौचक्के होकर देखते रहे। फोटो खींची, वीडियो बनाए। वाटर फॉल से कुछ ही दूरी पर बह रही नदी के किनारे चाय की टपरी दिखाई दी। जिसे देखकर हम सबकी भूख और बढ़ गई। हम सब टपरी पर पहुंच गए। चाय की उस टपरी में तीन महिलाएं थीं जो चाय के साथ फास्ट फूड, अंडे, नमकीन और गोलगप्पे भी बेच रही थीं। वहां हम सबने जमकर नाश्ता किया और चाय पी।
धीरे-धीरे शाम का धुंधलका छाने लगा। उस दिन यानि 26 मई का हमारा पहला पड़ाव नाको में था। नाको में बहुत सारी बौद्ध मोनेस्ट्री (बौद्ध मठ) हैं। हमारे टैक्सी ड्राइवर की कोशिश यही थी कि नाको जाते समय जिस पुल को पार करना है, उस तक दिन की रोशनी में ही पहुंच जाएं ताकि नाको के उस खूबसूरत पुल और पुल के नीचे बह रही नदी को अच्छी तरह देख लें। इस पुल की यही खासियत है कि ज़मीन से करीब दो सौ तीन सौ फीट ऊंची पत्थर की खड़ी चट्टानों को काटकर बनाया गया है। जिसका एक रास्ता हिमाचल नाको को जाता है तो दूसरा रास्ता तिब्बत चाइना बॉर्डर को जोड़ता है।
नाको ब्रिज तक पहुंचते-पहुंचते हमें शाम के पांच बज गए। ब्रिज पर दूर-दराज से आए लोगों की भीड़ थी। सभी लोग फोटो खींचने और वीडियो बनाने में मस्त थे। हम सब भी अपनी-अपनी टैक्सियों से उतरकर सामने बह रही नदी के अद्भुत नज़ारे को देखने लगे और फोटो खींचने लगे।
एक घंटे तक हम नाको ब्रिज पर रुके उसके बाद जब अंधेरा हमें अपनी गिरफ्त में लेने लगा तब हम वहां से नाको के लिए चल दिए। नाको की सीमा में घुसते ही हम सबका दम-सा घुटने लगा, क्योंकि वहां ऑक्सीजन की बहुत ज्यादा दिक्कत होने लगी थी, ऊपर से ठंड ऐसी कि शीशे बंद गाड़ियों के अंदर भी हम सब ठंड से काँप रहे थे।
रेगिस्तान की तरह फैली पत्थर के पहाड़ों की सुनसान और डरावनी घाटियां हमारे अंदर और खौफ पैदा कर रही थीं। चारों तरफ निपट अंधेरा बस हमारी गाड़ियों की ही लाइटें जलती नज़र आ रही थीं। हम सबके दिमाग में एक ही बात चल रही थी कि जल्दी से हमारी मंज़िल आए और हम बिस्तर में घुस जाएं।
भगवान, भगवान करते हुए रात को आठ साढ़े आठ बजे निपट अंधेरे में हम नाको हैलीपैड के पास एक होम स्टे में पहुंचे। एक तो कड़ाके की सर्दी, ऊपर से ऑक्सीजन की कमी से सबका बुरा हाल। लेकिन भूख भी अपना ताना मार रही थी।
सबने अपना-अपना सामान अपने-अपने कमरों के हवाले किया और होम स्टे के किचन में जाकर सब खाना बनाने की तैयारी में जुट गए। हिम्मत और मन तो किसी का भी खाना बनाने का नहीं था, पर मजबूरी में आलू और चावल की तहरी बनाई। और बेमन से खाकर अपने-अपने बिस्तर में घुस गए।
सुबह को हमें नाको मॉनेस्ट्री और आसपास की मशहूर जगह देखनी थी। साथ ही हमें अपना पड़ाव भी बदलना था। हमारा दूसरा पड़ाव काजा में था। क़ाज़ा की ऊंचाई समुद्र तल से करीब पंद्रह हज़ार फीट है। रास्ते भी बहुत ही डरावने और ऊबड़ खाबड़ हैं।
सुबह सब समय से उठ तो गए, लेकिन नहाने-धोने और तैयार होने में दिक्कत आ गई। दिक्कत ये आ गई कि वहां का पानी बर्फ से भी ज़्यादा ठंडा था और वॉश रूम के गीजर काम नहीं कर रहे थे तो हमनें होम स्टे के मालिक के सामने अपनी समस्या रखी। उसने हम सबको पानी गर्म करने वाली रोड दे दी। जिससे पानी गर्म करके हम नहा धो कर तैयार हो हुए। कुछ लोगों ने मिलकर आलू और सेम की सब्जी बनाई, उसके साथ खाने के लिए पराठे और चाय बनाई।
गरमा-गरम चाय नाश्ता करके हम सबने अपना-अपना सामान अपनी-अपनी टैक्सी के हवाले किया और नाको मॉनेस्ट्री देखने के लिए चल दिए। नाको मॉनेस्ट्री हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले के नाको गाँव में स्थित एक अत्यंत प्राचीन और ऐतिहासिक बौद्ध स्थल है। इसे 11वीं शताब्दी में महान अनुवादक लोचेन रिंचेन ज़ांगपो (Lochen Rinchen Zangpo) द्वारा बनवाया गया था। इसे ‘लोत्सावा लखांग’ (Lotsava Jhakang) भी कहते हैं ।
इस परिसर में चार मुख्य मंदिर हैं। यहाँ की दीवारों पर प्राचीन भित्ति चित्र (murals), मूर्तियां और तिब्बती बौद्ध धर्म के अवशेष आज भी देखने को मिलते हैं।
यह स्पीति घाटी और किन्नौर घाटी के सबसे पुराने और महत्वपूर्ण बौद्ध केंद्रों में से एक है। नाको मठ के समीप ही ‘नाको झील’ है जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है।
नाको मॉनेस्ट्री को एक्सप्लोर करने के बाद हम नाको झील की तरफ चल दिए। दो से तीन घंटे लगातार पत्थर के पहाड़ों का सफर तय करते हुए हम नाको झील पहुंचे। कई किलोमीटर तक बहने वाली नाको झील प्राकृतिक सौंदर्य का एक बेहतरीन उदाहरण है। चारों तरफ से ऊंची-ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं से घिरी नाको झील के व्यू प्वाइंट पर हमारी टैक्सियां रुक गईं। सबने वहां खूब एन्जॉय किया, फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी की। एक से दो घंटे तक हम उस झील की ठंडी, स्वच्छ और निर्मल धारा के साथ मन बहलाते रहे । उसके बाद हम काजा की तरफ चल दिए।
काजा पहुँचते-पहुंचते हमें फिर रात हो गई। कांजा में हमारा स्टे होटल सेंटर व्यू में था, जो स्पीति झील के किनारे और ऊंची ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं के बीच में है। होटल के अंदर से बाहर का व्यू देखने लायक है। होटल पहुंचते ही हम सब ने जल्दी-जल्दी टैक्सी से अपना-अपना सामान उतारा और अपने-अपने कमरे में जाकर कटे वृक्ष की तरह अपने-अपने बिस्तर पर धराशायी हो गए। सबसे अच्छी बात यह थी कि यहां हमें खाना नहीं बनाना था। हमारे डिनर की व्यवस्था होटल वालों को ही करनी थी इसलिए हम सब चाय पीकर बिस्तर में घुस गए क्योंकि कडाके की सर्दी हमारी हड्डियों को भी कंपा रही थी। डिनर करने के लिए जाना हमारी मजबूरी थी वरना तो एक मिनट के लिए भी बिस्तर से बाहर निकलने की हिम्मत भी नहीं हो रही थी । यह भी अच्छी बात थी कि होटल के डायनिंग रूम में चिमनी वाला चूल्हा आग से धधक रहा था जिसकी वजह से पूरा डायनिंग हाल गरम था। इसलिए खाना खाते समय हम सबको ठंड का ज़रा भी एहसास नहीं हुआ।
काजा में हमें दो से तीन दिन रुकना था क्योंकि काजा में देखने के लिए बहुत कुछ है, जिसे एक दिन में या सरसरी नज़र से नहीं देखा जा सकता। ऊपर बताया गया है कि काजा में क्या खास है। हिमाचल आकर लोग काजा में ही अपना सारा समय क्यों गुजारते हैं, क्योंकि काजा में सब कुछ अनोखा और अद्भुत है। जैसे दुनिया की सबसे ऊंचाई पर बना हिक्किम का पोस्ट ऑफिस, दुनिया की सबसे ऊंचाई पर बना कैफे और चीचम ब्रिज, लंज मोनेस्ट्री, कॉमिक मोनेस्ट्री, “की” मोनेस्ट्री, स्पीति नदी, चंद्र ताल,और ममी वाली मोनेस्ट्री, और चाइना तिब्बत बॉर्डर के अलावा भी यहाँ देखने के लिए बहुत कुछ है ।
हिमाचल प्रदेश की किन्नौर और स्पीति वैली के लगभग सभी दर्शनीय स्थलों के दर्शन करने, देखने और घूमने के बाद हमारी घर वापसी का समय आ गया। कहते हैं कहीं जाने का जितना जोश, जुनून और जल्दी होती है, उससे ज़्यादा जल्दी वापस घर आने की होती है। सब कुछ घूमने और देखने के बाद ऐसा लगता है, जैसे अब यहां कुछ नहीं बचा है, चलो यहां से जल्दी। मन करता है चिड़िया की तरह उड़कर जल्दी से अपने घर पहुंच जाएं। जाते समय जिन रास्तों की दूरी कम लगती है, वापस आते समय वही रास्ते लम्बे लगने लगते हैं।
हमने प्लान बनाया था, वापस आते समय हम अपना पहला नाईट स्टे कुफरी में करेंगे और सुबह को कुफरी घूम कर आगे बढ़ेंगे। लेकिन हमारा पहला नाईट स्टे रामपुर बुशहर में हो ही गया, क्योंकि हमें काजा से निकलते-निकलते देर हो गई थी, जिसका खामयाजा हमें यह भुगतना पड़ा कि हम कुफरी नहीं रुक पाए। इसका मलाल हमें कई दिनों तक सालता रहा।
वापसी के समय हमारा दूसरा पड़ाव रामपुर बुशहर के कपूर होमस्टे में था और तीसरा पड़ाव कसौल की हसीन वादियों में था। इस मौके को हम किसी भी कीमत पर गवाना नहीं चाहते थे। इस बार हमने कोई चूक नहीं की। हम सुबह को समय से उठकर, नहा कर तैयार हो गए। सबने समय से नाश्ता भी कर लिया और अपने निर्धारित समय पर रामपुर बुशहर से चल दिए।
हम लगातार बिना रुके चलते रहे। दोपहर करीब दो बजे जब भूख बर्दाश्त नहीं हुई तब एक अच्छे खाने के होटल की तलाश की. हमारी तलाश शिमला से निकलकर शोघी में पूरी हुई। हमने उसी रेस्टोरेंट के सामने अपनी गाड़ियां पार्क कीं, जहां हमारी मुलाकात शालिनी से हुई थी।
दस से बारह लोहे की खड़ी सीढ़ियां बार-बार चढ़कर, उतरकर, हाथ में हमारे लिए खाने की बड़ी ट्रे लेकर आने-जाने की वजह से शालिनी का चेहरा लाल पड़ गया था। उसके चेहरे के हाव-भाव देखकर साफ़ पता चल रहा था कि वह बहुत थक चुकी है, लेकिन फिर भी उसके काम में किसी तरह की कोई ढिलाई नहीं थी।
मेरे सभी साथी लजीज और स्वादिष्ट भोजन का आनंद ले रहे थे और मैं शालिनी के बारे में सोच रहा था। मेरे साथी जब उसे बार-बार कुछ-कुछ और लाने का आर्डर दे रहे थे, तब मुझे उन पर गुस्सा आ रहा था. पर मैं अपने मनोभावों को उजागर नहीं होने दे रहा था। अंततः जब मुझसे रहा नहीं गया तब मैंने उससे पूछ ही लिया कि वह इतनी मेहनत क्यों और किसके लिए कर रही है ?
उसने रुआँसी होकर कहा, “सर जी बच्चों को पालने के लिए मेहनत तो करनी पड़ती है। “
उसकी बात सुनकर मेरा कलेजा लरज गया, लेकिन मैं खामोश रहा। खाना खाने के बाद मेरे साथी नीचे आ गए पर मैं अपनी जगह बैठा रहा। वह हमारे जूठे बर्तन ट्रे में रखने लगी तब मैंने कहा, “आपके हस्बैंड क्या करते हैं ?” हस्बैंड की बात आते ही उसकी आंखें पनीली हो गईं। वह एकदम बोली,”मेरे हसबैंड नहीं हैं। एक एक्सीडेंट में उनकी डेथ हो गई।”
उसके हस्बैंड के एक्सीडेंट की बात सुनकर मेरा रो देने के लिए मन करा। लेकिन मैंने खुद को काबू में किया। “यह रेस्टॉरेंट आपका अपना है न ?”
“नहीं सर, मैं यहां वेटर का काम करती हूँ।”
“क्यों, तुम्हारे घर में और कोई नहीं है ?”
“होने को तो ससुराल और मायके में सभी लोग हैं। लेकिन जब अपना इंसान ही नहीं होता है, तब कौन किसका होता है। ससुराल वालों ने यह कहकर की अब तुम्हारा यहाँ कुछ नहीं है, तुम जाओ यहाँ से। मायके गई तो मायके वालों ने कह दिया अपना देखो, हम तीन-तीन प्राणियों का बोझ वहन नहीं कर पाएंगे। ”
“तीन प्राणी, मतलब ?” मैंने पूछा।
“तीन प्राणी मतलब मैं और मेरे दो बच्चे।”
उसने अपने आँसुओं को रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन उसके आंसू रुके नहीं और आँखों से निकल कर गालों से उतरकर गर्दन में घुस गए।
“तो अभी तुम कहां रहते हो ?”
“यहीं, इसी रेस्टॉरेंट के पीछे मालिक का घर भी है। उसी में एक कमरा मुझे भी दे दिया है। मेरे दोनों बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी भी मालिक लोग ही उठा रहे हैं। मैं दिनभर इसी रेस्टॉरेंट में काम करती हूँ। मेरे बच्चे नीचे रहकर अपनी पढ़ाई करते हैं।”
उसके मन में दर्द का जो गुबार भरा हुआ था, वह मेरे सामने उगल दिया। कुछ सेकेंड्स के लिए मैं संज्ञा शून्य हो गया। वह जूठे बर्तन उठाकर मेरे पास से जाने लगी।
“सुनो। ..” वह रुक कर मेरी बात सुनने लगी।
“तुम्हारी किस्मत ने जो भी किया, उसकी भरपाई कोई नहीं कर पाएगा, मैं भी नहीं। पर मैं तुम्हें एक सलाह दे रहा हूं। तुम्हारे मालिक बहुत अच्छे हैं। आज के समय में ऐसे लोग मिलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। अपने बच्चों के भविष्य के लिए तुम्हें जो करना है यहीं रहकर करो। और हाँ दूसरी शादी के लिए तुम्हारे पास बहुत ऑफर आएंगे लेकिन दूसरी शादी की कल्पना भी मत करना। आजकल कटी पतंग को लूटना तो हर कोई चाहता है। पर उसे सम्भाल कर रखना कोई नहीं चाहता है। मेरा मतलब हर इंसान मज़बूर इंसान की मज़बूरी का फायदा उठाना चाहता है, बहुत खराब ज़माना है।”
वह एकदम सिसक पड़ी। मुझे लगा जैसे मैंने उसको कुछ गलत बोल दिया हो। “अरे क्या हुआ ? रो क्यों रही हो ?”
“सर, हस्बैंड की डेथ के बाद आज पहली बार ऐसा लगा, जैसे किसी अपने से बात कर रही हूँ। मन कर रहा है, आप मुझे ऐसे ही समझाते रहें, मेरी हिम्मत और हौसला बढ़ाते रहें। बहुत तसल्ली मिली है आपसे बात करके, भारी मन हल्का हो गया।”
“मन तो मेरा भी है तुमसे बात करने का है, पर क्या करूँ मुसाफिर हूँ। पता नहीं अब कब शिमला आना हो और तुमसे मुलाकात हो।”
“सर अपना नंबर देते जाइए, मेरा मन करेगा तो आपसे बात कर लिया करूंगी।”
“नहीं मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से कोई तुमपर ऊँगली उठाए, या तुम्हारी नौकरी पर आंच आए। बस तुम मेरी बातों को ध्यान में रखना। और हां मैं नीचे से तुम्हारे मालिक का नंबर ले लूंगा, तुम्हारे मालिक के सामने तुमसे बात कर लिया करूंगा। ”
“लेकिन बात करिएगा जरूर।” वह बोली।
“हाँ ज़रूर करूंगा।” उसका मन रखने के लिए मैंने उसके मालिक से उनका नंबर तो ले लिया। पर आज तक उससे बात नहीं की। ऐसा नहीं, कि मुझे उसकी याद नहीं आई। मुझे उसकी याद आती है और हर रोज आती है। मेरे दिलो-दिमाग से उसका चेहरा निकलता ही नहीं है। पर मैं बात नहीं करता हूँ क्योंकि बेमतलब किसी से बात करने से गलतफहमियां पैदा होती हैं और मैं किसी को किसी की ग़लतफ़हमी का शिकार नहीं होना चाहता हूँ।
हमारी गाड़ियां कसौल के लिए चलने को तैयार हो चुकी थीं। मैंने गाड़ी की खिड़की से झाँका शालिनी रेस्टोरेंट की वॉलकनी में खड़ी एकटक मुझे ही देख रही थी। उसे देखकर मैं मुस्कुराया, बदले में वह भी मुस्कुरा दी। मेरी गाड़ी आगे बढ़ीं तो मैंने अपना हाथ हिलाकर वहां से जाने का संकेत किया। वह मुझे बस एकटक देखती रही। हम बहुत आगे निकल आए। गाड़ी में बैठे साथी हंसी-मज़ाक कर रहे थे। मगर मेरा मन शालिनी में उलझा हुआ था। मैं ऐसा महसूस कर रहा था, जैसे अपनी कोई अमूल्य धरोहर पीछे छोड़ आया हूँ।
शोघी से कसौल ज़्यादादूर नहीं था। कसौल को कुदरत ने प्राकृतिक सौंदर्य वरदान में दिया होगा तभी तो वहां पर चारों तरफ प्रकृति की हरी भरी छटा बिखरी हुई है। सच में बहुत खूबसूरत है कसौल। कसौल में हमारा स्टे जंगल हॉलिडे होम में था। जो बहुत सुन्दर तरीके से बनाया गया है। इसके चारों तरफ ऊंचे-ऊंचे पहाड़ हैं। घने जंगल की तरह गहरी खाई में ऊंचे ऊंचे पहाड़ी पेड़ों के बीचो बीच बना है जंगल हॉलिडे होम। किसी भी कमरे की कोई सी भी खिड़की खोलो, और सामने देखो सुन्दर पहाड़ी व्यू। जब हम अपने होम स्टे के लिए जा रहे थे तब ऐसा लग रहा था जैसे हम घने जंगलों में जा रहे हैं। कहने के लिए यहाँ वातावरण एकदम शांत था। बस चिड़ियों की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं। पर मेरे मन में अभी भी एक शोर-सा व्याप्त था। अभी भी मैं शालिनी और उसकी किस्मत के बारे में सोच रहा था। मैं सोच रहा था कि कुदरत भी इंसान के साथ कैसे-कैसे खेल खेलती है। कितने अरमान होंगे, कितनी ख्वाहिशें होंगी, कितने ख्वाब देखे होंगे शालिनी ने अपनी ज़िन्दगी जीने के लिए। अपने बच्चों और अपने पति को लेकर भविष्य के लिए क्या-क्या योजनाएं बनायीं होंगी ? उसके सारे सपने, सारे अरमान टूटकर बिखर गए। पता नहीं वह उनको समेट भी पाएगी या नहीं ? यही सब सोचते-सोचते मैंने रात का खाना भी खा लिया और सो भी गया।
सुबह को फिर शुरू कर दी अपनी यात्रा। यह यात्रा हमारी चंडीगढ़ तक की थी। चंडीगढ़ पहुँच कर हमनें सभी टैक्सियों का भुगतान किया। एक हफ्ते तक हमारे परिवार की तरह हमारे साथ रहे हमारे टेक्सी ड्राइवर हम सबसे विदा लेते हुए भावुक हो गए। सबने एक दूसरे से गले लगकर अपने प्रेम का इजहार किया। बड़े ही भावुक मन से और बोझिल क़दमों से हम अपना-अपना सामान लेकर प्लेटफॉर्म नंबर तीन की तरफ रवाना हुए।
फिर वही हुआ, हम सब अपनी-अपनी सीट पर कब्ज़ा जमाकर बैठ गए। सुबह से ग्यारह बजकर चालीस मिनट पर हमारी ट्रैन चंडीगढ़ से मुरादाबाद के लिए रवाना हुई। खाते-पीते, हँसते-हंसाते, गाते-गुनगुनाते हम शाम को मुरादाबाद पहुँच गए। मुरादाबाद से दो से ढाई घंटे का सफर अभी हमें और करना था। तब कहीं जाकर हमें हमारे शहर बरेली पहुंचना था। दिल्ली से चलकर बरेली तक आने वाली इंटरसिटी एक्सप्रेस का हम बेसब्री से इंतज़ार करने लगे।
जैसे ही हमारी ट्रैन आने की घोषणा हुई, हमारी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। क्योंकि घर पहुंचने की जल्दी सबको थी। घोषणा के दस-पंद्रह मिनट बाद हमारी ट्रेन आ गई। हम सब ट्रेन से सवार हुए और आ गए उल्टे बांस बरेली को। जब भी शिमला का जिक्र आता है, स्वतः ही मुझे शालिनी की याद आ जाती है। आज भी उसका चेहरा आंखों से ओझल नहीं हुआ है, आज भी उसकी याद दिलों-दिमाग से नहीं निकली है।

- गुडविन मसीह
