संपादकीय का शीर्षक पढ़कर ‘पुरवाई’ के पाठक थोड़े हैरान तो अवश्य हो रहे होंगे कि आखिर यह कैसा शीर्षक है… और फिर इतने लंबे नाम वाला इंसान कौन हो सकता है!
बात कुछ ऐसी है कि जब दो पढ़े-लिखे लोग आपस में बहस करने लगते हैं, तो उनकी बातचीत सुनने वाले उसमें से कुछ-न-कुछ नया, अपने काम का भी निकाल सकते हैं। दो बौद्धिक इंसान- जावेद अख़्तर और डॉ. आनंद रंगनाथन सोशल मीडिया पर एक मुद्दे को लेकर भिड़ गए और हम कम बुद्धि वाले लोगों को सोचने के लिए ख़ासा मसाला दे गए।
हुआ कुछ यूँ कि डॉ. आनंद रंगनाथन की एक-दो साल पुरानी रील अचानक सोशल मीडिया पर जारी हो गई, जिसमें भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के एक बयान पर टिप्पणी की गई थी। उस रील को देखने के बाद वरिष्ठ फ़िल्मी गीतकार जावेद अख़्तर ने एक टिप्पणी करते हुए कहा, “प्रिय मिस्टर आनंद रंगनाथन, हाल ही में आपकी एक रील में आपने एक पैराग्राफ़ पढ़ा और उसे मौलाना आज़ाद से जोड़ा। सच कहूँ तो, मुझे यह उनके जीवन भर के सामाजिक-राजनीतिक विचारों से बिल्कुल अलग लगा। क्या आप कृपया मुझे अपनी जानकारी का स्रोत बता सकते हैं? क्या यह उनके किसी लेख या भाषण का हिस्सा है? कृपया मुझे बताएँ कि यह कब और कहाँ का है। मैं आपका बहुत आभारी रहूँगा। सादर, जावेद (4:17 · 15 सितंबर 2026)।”
मैं ‘पुरवाई’ के पाठकों से क्षमा चाहूँगा कि वे यह शिकायत न करें कि यदि मैं उन दोनों के बीच की बातचीत आपके सामने रख रहा हूँ, तो भला इस संपादकीय में मेरा योगदान क्या है। मैं इसे अपना और ‘पुरवाई’ का कर्तव्य मानता हूँ कि आपके सामने दो क़ाबिल व्यक्तियों की बातचीत रखते हुए, ‘पुरवाई’ का पक्ष भी रखूँ कि हमें भारत के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े नायकों को किस नज़र से परखना चाहिए। क्या सबको एक ही नज़र से देखना चाहिए या फिर नेता देखकर अपना चश्मा बदल लेना चाहिए?
डॉ. रंगनाथन ने जावेद अख़्तर के ट्वीट का जवाब देते हुए लिखा, “आदरणीय श्री जावेद अख़्तर, अल्हम्दुलिल्लाह। यह कोटेशन मौलाना आज़ाद के कलकत्ता भाषण से लिया गया है। यह भाषण ‘ख़ुत्बात-ए-आज़ाद’ में प्रकाशित हुआ था। इसका लिंक यह है…” (लिंक में मौलाना आज़ाद की पुस्तक का उर्दू में पीडीएफ़ संलग्न है, इसलिए मैं नहीं पढ़ पाया)।
“मौलाना भारतीय मुसलमानों से अपील कर रहे हैं कि वे दुनिया भर के मुसलमानों के साथ एकजुट हों और ख़िलाफ़त को बचाएँ। वे अपनी बात इस तरह शुरू करते हैं कि दुनिया में सभी रिश्ते टूट सकते हैं- पिता बेटे के ख़िलाफ़ हो सकता है, भाई अपने भाई के ख़िलाफ़ हो सकता है, माँ अपने बच्चे से मुँह मोड़ सकती है, लेकिन एक मुसलमान का दूसरे मुसलमान के साथ रिश्ता कभी नहीं टूट सकता।
“इसके बाद मौलाना कहते हैं: अगर इस्लाम की रूह का ज़रा-सा भी अंश इसके मानने वालों में ज़िंदा है, तो अगर जंग के मैदान में किसी तुर्क के पैर में काँटा चुभता है, तो अल्लाह की कसम, हिंदुस्तान का कोई भी मुसलमान तब तक सच्चा मुसलमान नहीं है, जब तक वह उस चुभन को अपने दिल में महसूस न करे। क्योंकि इस्लाम की मिल्लत (समुदाय) एक शरीर की तरह है और मुसलमान, चाहे वे कहीं भी हों, उसके अंग हैं। अगर हाथ की एक उँगली कट जाए, तो बाकी शरीर तब तक चैन से नहीं रह सकता, जब तक उसे उस चोट का एहसास न हो।
“यह कोई बनावटी बात नहीं है। यह उस मशहूर हदीस का सीधा मतलब है, जिसे इमाम अहमद ने बताया था: अल्लाह के रसूल (उन पर शांति और आशीर्वाद हो) ने कहा कि आपस में प्यार, दया और हमदर्दी के मामले में ईमान वालों की मिसाल एक शरीर जैसी है: जब एक अंग में तकलीफ़ होती है, तो पूरा शरीर बेचैनी और बुख़ार से प्रतिक्रिया देता है। और एक और हदीस है, जिसे अबू मूसा अल-अशअरी ने बताया है: एक ईमान वाला दूसरे ईमान वाले के लिए एक इमारत की तरह है; हर हिस्सा दूसरे को सहारा देता है। यह इस्लाम के मानने वालों की पहली और आख़िरी पहचान है, जिसकी ओर ख़ुद क़ुरान ने इशारा किया है।
“इसके बाद, मुसलमानों की एकता को मज़बूत करने के लिए, मौलाना आज़ाद ने क़ुरान की आयत 48:29 का ज़िक्र करते हुए अपनी बात रखी है।”
“अल्लाह के पैगंबर और उनके साथ रहने वाले लोग काफ़िरों के प्रति सख़्त हैं और आपस में दयालु हैं।”
“उनमें जो भी सख़्ती है, वह झूठ और अविश्वास के ख़िलाफ़ है; और उनमें जो भी प्यार और नरमी है, वह सच्चाई, ईमानदारी, इस्लाम और तौहीद (अल्लाह की एकता) के लिए है। इसलिए, अविश्वास करने वालों के प्रति बहुत सख़्त रहें, लेकिन आपस में बहुत सहानुभूतिपूर्ण और दयालु रहें; इस बात पर ध्यान दें और इसे ऐसे न छोड़ दें, जैसे आपने इसे सुना ही न हो।”
“पुनश्च- यह दूसरी बार है जब मैं आपको आपके हीरो और उनके जीवन भर के सामाजिक-राजनीतिक रुख के बारे में बता रहा हूँ। पहली बार तब हुआ था, जब आपने यह मानने से इनकार कर दिया था कि नेहरू के शासन में किताबें बैन की गईं, एडिटर्स को नौकरी से निकाला गया, फ़िल्मों पर रोक लगाई गई और मजरूह को जेल भेजा गया। प्लीज़, अब मुझसे गाँधी के बारे में मत पूछिएगा- महात्मा गाँधी… राहुल गाँधी नहीं, हालाँकि शायद दोनों ही आपके हीरो हैं। शुभकामनाएँ।”
मैंने टीवी डिबेट्स में भी देखा है कि आनंद रंगनाथन अपने हर बयान के पक्ष में सबूत अवश्य पेश करते हैं। यद्यपि वे भी कभी-कभी अपना नियंत्रण खो देते हैं और लगभग चिल्लाने लगते हैं। मगर चिल्लाते हुए भी वे इस बात का ख़याल रखते हैं कि वे आधारहीन बात न बोलें। यही उन्होंने यहाँ भी किया है।
इस पर जावेद अख़्तर ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा- “सर, वे ख़ुतबे (भाषण) ख़िलाफ़त और ब्रिटिश उपनिवेशवाद के बारे में थे। यह कहना कि मौलाना आज़ाद भारत के हिंदुओं के बारे में ऐसा कह रहे थे, सच नहीं होगा। इस संदर्भ में ‘काफ़िर’ का मतलब उपनिवेशवादी था। जब अतातुर्क ने ओटोमन साम्राज्य की जगह ली, तो मौलाना ने उस मामले को ‘बंद अध्याय’ कहा। उनके बयान को ख़ुद कमाल अतातुर्क ने पर्चों के रूप में छपवाया था, जिसमें अतातुर्क की पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष सरकार का समर्थन किया गया था।”
“मैं आपसे गुज़ारिश करूँगा कि आप कलकत्ता हाईकोर्ट में आज़ाद का बयान पढ़ें, जहाँ अंग्रेज़ों ने उन पर देशद्रोह का आरोप लगाया था। यह एक ऐसा सम्मान था, जो महासभा या आरएसएस के किसी सदस्य को कभी नहीं मिला। आज़ाद नौ साल तक ब्रिटिश जेलों में रहे; क्या आप अपने दक्षिणपंथी ख़ेमे से किसी ऐसे व्यक्ति का नाम बता सकते हैं, जो उनकी बराबरी कर सके? 1946 में, लीग के अध्यक्ष के तौर पर जिन्ना और कांग्रेस के अध्यक्ष के तौर पर आज़ाद की लॉर्ड वेवेल के साथ बैठक हुई थी। जिन्ना ने आज़ाद से हाथ मिलाने से इनकार कर दिया था। वे आज़ाद की देशभक्ति से नफ़रत करते थे। आइए, आज़ाद के प्रति निष्पक्ष रहें। वैसे, राहुल गाँधी का ज़िक्र करना पूरी तरह से अनावश्यक था। यह न तो सच था और न ही अच्छी बात थी; मुझे आपसे कुछ शालीनता और स्तर की उम्मीद है। उम्मीद है कि कम-से-कम इस मामले में आप मुझे निराश नहीं करेंगे।”
डॉ. आनंद रंगनाथन ने जावेद अख़्तर की हर बात का जवाब सबूत के साथ पेश किया और उनके दक्षिणपंथी ख़ेमे के किसी व्यक्ति को जेल में रहने के संदर्भ में उन्हें याद दिलाया कि अंग्रेज़ों के ज़माने में केवल एक ही व्यक्ति को दो जन्मों की कैद की सज़ा सुनाई गई थी और काला पानी भेजा गया था- जिसका नाम था विनायक दामोदर सावरकर।
‘पुरवाई’ इस सोच में पड़ गई कि हमें यह बताया गया है कि मौलाना आज़ाद की किसी स्कूल या कॉलेज में विधिवत शिक्षा नहीं हुई थी। उनकी आरंभिक शिक्षा इस्लामी तौर-तरीक़ों से हुई। घर पर या मस्जिद में उन्हें उनके पिता तथा बाद में अन्य विद्वानों ने पढ़ाया। इस्लामी शिक्षा के अलावा उन्हें इतिहास की शिक्षा भी अन्य मौलानाओं से मिली। आज़ाद ने उर्दू, फ़ारसी, हिंदी, अरबी तथा अंग्रेज़ी भाषाएँ सीखीं।
मौलाना आज़ाद अफ़ग़ान उलेमाओं के ख़ानदान से ताल्लुक रखते थे, जो बाबर के समय हेरात से भारत आए थे। उनकी माँ अरबी मूल की थीं और उनके पिता मोहम्मद ख़ैरुद्दीन एक फ़ारसी (ईरानी, नृजातीय रूप से) थे। उनका जन्म मक्का में हुआ था।
हैरानी की बात यह है कि जिस व्यक्ति ने कभी स्कूल, कॉलेज या विश्वविद्यालय से किसी प्रकार की शिक्षा ग्रहण नहीं की, पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें देश का पहला शिक्षा मंत्री क्यों बना दिया। क्या भारत में कोई अन्य विधिवत रूप से पढ़ा-लिखा नेता मौजूद नहीं था? एक नए देश की शिक्षा की बागडोर किसी ऐसे व्यक्ति के हाथ में क्यों दे दी गई, जिसे उस समय के हिसाब से आधुनिक शिक्षा की जानकारी नहीं थी। याद रहे कि वे 1946 से 1958 (उनकी मृत्यु तक) भारत के शिक्षा मंत्री रहे।
शायद इसीलिए भारत की शिक्षा नीति में भारत का इतिहास बहुत कम दिखाई देता है, जबकि हिंदुस्तान का इतिहास अधिक पढ़ने को मिलता है। हमें तो यहाँ तक बताया जाता रहा है कि भारत का समुद्री मार्ग 1498 में वास्कोडिगामा ने खोजा। जबकि सच तो यह है कि उससे हज़ारों साल पहले भारत का खाड़ी देशों और अफ़्रीका से व्यापार हुआ करता था।
डॉ. रंगनाथन और जावेद अख़्तर की बहस ने हमें बहुत कुछ सोचने के लिए सामग्री उपलब्ध करवा दी है। आप भी इस पर विचार करें कि जावेद अख़्तर ने चित्रकार हुसैन के विरुद्ध कभी कोई वक्तव्य नहीं दिया, जब उन्होंने हिंदू देवियों के अर्धनग्न चित्र पेंट किए। मगर उन्होंने सलमान रुश्दी की ‘सेटेनिक वर्सेस’ के लिए आलोचना की। क्या जावेद अख़्तर भी अपने हिसाब से चुनकर स्थितियों पर राय देते हैं?
और हाँ… आप सब सोच रहे होंगे कि आज के संपादकीय के विषय का भला संपादकीय से क्या संबंध है… इतना लंबा विषय लिखकर उसके बारे में तो कोई बात ही नहीं की गई। तो आपको यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना आज़ाद का पूरा नाम था- सैय्यद ग़ुलाम मुहिउद्दीन अहमद बिन ख़ैरुद्दीन अल-हुसैनी…

इस बात से एक बात स्पस्ट हो गई है एक मुसलमान कितना भी उदार हो लेकिन वो आखिर में कट्टर ही होता है हालाँकि इस पर कई सेक्युलर लोग सवाल उठाएंगे लेकिन इस पर कुछ नहीं बोलेंगे कि वे उनके खिलाफ़ क्यों चुप रहते हैं जो कट्टरपंथी होते हैं और उन पर क्यों बोलते हैं जो इस्लाम की बुराईयों को जाहिर करते हैं
यह संपादकीय उन तथाकथित सेकुलर सोच कर लोगों को आईना दिखाता है ,जो बा कलम शिक्षा मंत्री रहे और इतिहास को भी शिक्षा में धता बता दिया ।क्या इस देश को यह सभी लोग मातृभूमि कहते हैं।
यह संपादकीय एक महत्त्वपूर्ण और विचारणीय प्रश्न उठाता है। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के शिक्षा मंत्री के रूप में चयन, उनकी शैक्षिक पृष्ठभूमि तथा स्वतंत्र भारत की इतिहास-दृष्टि—इन तीनों को भावनात्मक आग्रहों से नहीं, बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों और मूल स्रोतों के आधार पर देखे जाने की आवश्यकता है। विशेष रूप से यह प्रश्न विचारणीय है कि स्वतंत्रता के बाद भारतीय इतिहास, भारतीय ज्ञान-परंपरा और सांस्कृतिक निरंतरता को इतिहास-लेखन एवं शिक्षा में अपेक्षित स्थान मिला या नहीं। संपादकीय का मूल्य इसी बात में है कि वह पाठक को स्थापित धारणाओं से आगे जाकर स्रोतों और तथ्यों के आधार पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है।
स्वतंत्रता की प्राप्ति से लेकर 1958 तक मौलाना के शिक्षा मंत्री के कार्यकाल में किस-किस तरह के आदेश दिए गए हैं। किस-किस तरह से पाठ्यक्रमों का निर्माण हुआ है, यह सब शोध का विषय भी है। आपने एक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है।
आज की सम्पादकीय ‘खबरों का खुलासा है।
हालांकि आज के समय में बीते वक्त को दोहराने से कुछ चेहरे हमारे सामने आये
और उनके विषय में हम जो जानते थे उससे अधिक जान पाए ।
साधवाद
Dr Prabha mishra
यह संपादकीय चर्चा के लिए मुख्य रूप से इन मुद्दों को सामने लाता है: कानून बनाने और राष्ट्रीय लक्ष्यों व लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए ज़िम्मेदारी संभालने वाले व्यक्ति के पास उस विषय का पर्याप्त ज्ञान होने की आवश्यकता; ऐसे नियुक्त लोगों का धर्मनिरपेक्ष स्वभाव का होना और सौंपे गए विषय के प्रति तर्कसंगत दृष्टिकोण रखना, साथ ही किसी भी व्यक्तिगत पूर्वाग्रह और व्यक्तिगत आस्था के दबाव से मुक्त होना भी बेहद ज़रूरी है।
यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि मौलाना आज़ाद ने शैक्षणिक संस्थानों के जटिल कामकाज और आज़ाद हुए नए देश में उनके स्तर को सुधारने, राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली को आधुनिक भारत की ज़रूरतों के अनुरूप बनाने और इसे अन्य जगहों की उन्नत शिक्षा प्रणालियों से मुक़ाबला करने के लिए मज़बूत बनाने के लिए ज़रूरी सुधारों से परिचित होने के लिए कोई औपचारिक शिक्षा नहीं प्राप्त की थी। भारत के तत्कालीन नेतृत्व की किसी खास समुदाय को खुश करने की मजबूरी का विश्लेषण करते समय, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि यह राजनीतिक खेल जानबूझकर खेला गया था; क्योंकि 1947 से 1977 के दौरान, 1958 से 1963 के वर्षों को छोड़कर (जब एक हिंदू, के.एल. श्रीमाली को दूसरा शिक्षा मंत्री नियुक्त किया गया था), बाकी सभी शिक्षा मंत्री मुस्लिम थे। जहाँ तक हाल ही में मौलाना आज़ाद की धार्मिक कट्टरता को लेकर हुई तीखी बहस की बात है, तो यह हैरानी की बात है कि उनके चरित्र की इस खतरनाक विशेषता को क्यों नज़र अंदाज़ किया गया, जबकि उन्हें इतना महत्वपूर्ण विभाग सौंपा गया था। इस विभाग का मक़सद छात्रों और समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों के बीच सद्भाव और सम्मानजनक समानता पर आधारित मिली-जुली संस्कृति को बढ़ावा देना था, जिसमें अलग-अलग धर्मों के लोगों का सम्मान हो, न कि घोषित नफ़रत पर आधारित हो। असल में, समस्या की जड़ इंसानी कमज़ोरी में है—सदियों से पुरानी और बेकार हो चुकी धार्मिक शिक्षाओं, जीवन जीने के तरीकों और उस समय की मान्यताओं पर आधारित सोच का गुलाम बने रहना। इनमें से कई बातें आधुनिक वैज्ञानिक सोच और सभ्य समाज के विपरीत हैं।
विडंबना यह है कि अज्ञानता की उन बेड़ियों से बाहर निकलने के बजाय, लोग आधुनिक धर्मगुरुओं के प्रभाव में आते रहते हैं और अंधेरे के युग में ही बने रहने के लिए ईशनिंदा (धर्म-अपमान) के और भी सख़्त नियम बना लिए हैं।