Saturday, September 5, 2026
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हिंदी दिवस के समोसे और गुलाब जामुन…

इस संपादकीय की शुरुआत में ही ‘पुरवाई’ पत्रिका यह घोषणा करती है कि हिंदी भाषा को लेकर भारत सरकार के पास न तो कोई नीति है और न ही नीयत। जब भारत सरकार की ही इस विषय में कोई नीति नहीं है, तो भला विदेशों में भारतीय दूतावासों एवं उच्चायोगों से यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि उनके पास हिंदी भाषा या साहित्य को लेकर कोई तयशुदा नीति हो!

एक बच्चे को कहा गया कि हिंदी दिवस पर प्रस्ताव लिखो। उसने शुरू किया… “भारत में बहुत से दिवस मनाए जाते हैं, जैसे कि स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, बाल दिवस, प्रवासी भारतीय दिवस, शिक्षक दिवस, पितृ दिवस, मातृ दिवस, वरिष्ठ नागरिक दिवस, मित्रता दिवस… आदि-आदि। ऐसा ही एक दिवस है, जिसे हर वर्ष 14 सितंबर को मनाया जाता है, जिसे कहा जाता है हिंदी दिवस! पूरे दो सप्ताह तक हिंदी के बारे में भाषण दिए जाते हैं, प्रतियोगिताएँ होती हैं, पुरस्कार बाँटे जाते हैं… हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने के प्रस्ताव पारित किए जाते हैं।… इन कार्यक्रमों में समोसे और गुलाब जामुन भी खाने को दिए जाते हैं।”

हिंदी भाषा को लेकर यह नाटक करते 76 वर्ष हो चुके हैं, मगर हिंदी अभी तक वहीं की वहीं खड़ी है। हमें आज भी हिंदी दिवस मनाना पड़ता है। हिंदी भाषा को लेकर जो कुछ इन सालों में सोचा गया है, उसे हम लागू क्यों नहीं कर पा रहे हैं? हिंदी को भारत की राजभाषा घोषित करने के बाद व्यवहार में यह कब भारत की राजभाषा बनेगी… इस सवाल के जवाब हम आज भी खोज रहे हैं।

हालाँकि ‘पुरवाई’ के पाठक यह सवाल कर सकते हैं कि पहला हिंदी दिवस तो 14 सितंबर 1953 को मनाया गया था, तो भला हम 76वाँ हिंदी दिवस क्यों कह रहे हैं। वास्तविकता यह है कि हिंदी को राजभाषा बनाने का निर्णय 1949 में ले लिया गया था… इस हिसाब से पहला हिंदी दिवस 1950 में बनता है…

फिर एक नया फ़ंडा शुरू हो गया… हिंदी पखवाड़ा!… अब दो सप्ताह तक देश-विदेश में हिंदी का मर्सिया पढ़ा जाने लगा। हिंदी से जुड़े आयोजनों में बढ़-चढ़कर राजनीति होने लगी।

हाल ही में जंतर-मंतर पर जेन-ज़ी ने साबित कर दिया कि युवा पीढ़ी को हिंदी में केवल गालियाँ देनी आती हैं… बाकी की बातचीत इस पीढ़ी को अंग्रेज़ी में करनी होती है। इसे भी भारत की 1949 से 2026 तक की सरकारों की उपलब्धि ही कहा जा सकता है कि हिंदी के नाम पर लाखों रुपये ख़र्च हो जाते हैं, मगर हिंदी बेचारी बनी अपनी बदहाली पर रोती रहती है।

हिंदी भाषा को लेकर संसदीय मंडल बनाया जाता है। हर सरकारी संस्था में यह संसदीय मंडल हिंदी की स्थिति को समझने और समझाने के लिए जाता है। वहाँ के हिंदी अधिकारी संसदीय दल की आवभगत करते हैं, ताकि एक बेहतर रिपोर्ट हासिल की जा सके। विभाग के कुछ कर्मचारी हिंदी की शान में गीत गाते हैं, वाद-विवाद और भाषण प्रतियोगिताएँ होती हैं। दिन की समाप्ति पर संसदीय दल और हिंदी अधिकारी अपने अंग्रेज़ी मीडियम से पढ़ रहे बच्चों के साथ रात का खाना खाते हुए अंग्रेज़ी में बातचीत करते हैं।

भारत में हिंदी का हाल यह है कि केंद्रीय हिंदी संस्थान और अन्य हिंदी से जुड़ी संस्थाओं ने अभी तक हिंदी को एक विदेशी भाषा के तौर पर पढ़ाए जाने के लिए (Teaching Hindi as a Foreign Language) कोई पाठ्यक्रम तक नहीं बनाया है। विदेशों में केवल अंग्रेज़ी ही नहीं बोली जाती। हिंदी को फ़्रेंच, जर्मन, जापानी, रूसी और अन्य भाषाओं के माध्यम से पढ़ाने के लिए भी इन संस्थाओं को कदम उठाने होंगे।

विदेशों में हिंदी को लेकर बहुत बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। आँकड़े बताए जाते हैं। अंग्रेज़ी में एक कहावत है- “There are lies, more lies and then there are statistics!” यानी कि एक तो झूठ होता है, और फिर बहुत से झूठ होते हैं और उन सबसे ऊपर होते हैं आँकड़े।

आँकड़े कभी-कभी बहुत गुमराह करते हैं। यह घोषणा सुनकर मन प्रसन्न हो जाता है कि विश्व भर में सौ से भी अधिक विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा रही है। या फिर कि हिंदी विश्व में बोली जाने वाली दूसरी सबसे अधिक लोकप्रिय भाषा है। यह कोई नहीं बताता कि किन देशों के स्कूलों में हिंदी भाषा पढ़ाई जाती है। बिना स्कूलों में पढ़ाए, विश्वविद्यालयों में हिंदी भाषा का विभाग कैसे खुल जाता है?

जहाँ तक ब्रिटेन का सवाल है- यहाँ के स्कूलों में 1990 के दशक तक हिंदी एक ऐच्छिक विषय के तौर पर दसवीं (जी.सी.एस.ई.) और बारहवीं (ए-लेवल) तक पढ़ाई जाती थी। हुआ कुछ यूँ कि भारतीय मूल के माता-पिता को कुछ ऐसा महसूस हुआ कि हिंदी पढ़कर उनके बच्चे क्या पा सकते हैं। बच्चों के करियर के चक्कर में माता-पिता ने उन्हें फ़्रेंच, स्पैनिश, जर्मन और अन्य भाषाएँ सिखाईं। इससे एक विचित्र-सी स्थिति उत्पन्न हो गई।

अब स्कूलों में हिंदी पढ़ाने वाले अध्यापक तो थे, मगर हिंदी पढ़ने वाले विद्यार्थी नहीं थे। नतीजा यह हुआ कि शिक्षा विभाग को हिंदी विषय की पढ़ाई बंद करनी पड़ी। भला बिना काम के अध्यापकों को पगार देने का क्या औचित्य हो सकता है?

सरकार ने एक नया फ़ॉर्मूला बनाया- मातृभाषा फ़ॉर्मूला। यानी कि जो भी प्रवासी अपनी मातृभाषा में शिक्षा लेना चाहे, उसके लिए स्कूल में प्रबंध किया जाएगा। अब समस्या यह है कि ब्रिटेन में भारतवंशियों में बहुसंख्यक पंजाबी और गुजराती ही हैं। इसलिए स्कूलों में गुजराती और पंजाबी पढ़ाने की सुविधा प्रदान कर दी गई।

ब्रिटेन में बंगाली भाषा को बांग्लादेश और उर्दू को पाकिस्तान की भाषा कहा जाता है। थोड़ी हैरानी इस बात की है कि पाकिस्तान के लोग मातृभाषा उर्दू लिखते हैं, जबकि वहाँ उर्दू किसी भी प्रांत की भाषा नहीं है। इसलिए बंगाली और उर्दू की पढ़ाई भी स्कूलों में करवाई जाती है। क्योंकि हिंदी किसी की मातृभाषा है नहीं, तो हिंदी पढ़ाई भी नहीं जाएगी।

तो हिंदी स्कूलों से निकलकर मंदिरों में पहुँच गई। यहाँ मंदिरों ने अपना सामाजिक कर्तव्य निभाया और शनिवार-रविवार हिंदी की क्लासें लगानी शुरू कर दीं। स्वेच्छा से बिना कोई पैसा लिए अध्यापक भी जुट गए। मगर न तो कोई तयशुदा पाठ्यक्रम था और न ही कोई ढंग की परीक्षा। भारत के महत्वपूर्ण संस्थानों, जैसे कि केंद्रीय हिंदी संस्थान, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया। संभवतः उनके पास कोई डेटाबेस भी नहीं होगा कि किस-किस देश में कौन-कौन-सी संस्था हिंदी शिक्षण से जुड़ी है।

यहाँ एक बात कहना चाहूँगा कि भारत में हिंदी को लेकर राजनीति होती है। तमिलनाडु और अन्य दक्षिण भारतीय राज्य हिंदी के विरुद्ध आंदोलन करते रहते हैं और अपने-अपने राज्य की भाषा की वकालत करते दिखाई देते हैं। मगर विदेशों में हिंदी को लेकर कोई ऐसी स्थिति नहीं है। यहाँ हिंदी को लेकर कोई लड़ाई नहीं हो रही। भारत सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए कि हिंदी को वैश्विक स्तर पर पहचान बनाने के लिए विदेशों में हिंदी पर गंभीर रूप से कार्य किया जाए।

हम तो नक्कारख़ाने में अपनी तूती बजाकर भारत सरकार को नींद से जगाने का प्रयास कर रहे हैं। हमारा सपना शायद हमारे जीवन में तो कभी पूरा नहीं हो पाएगा। हमारा सपना है कि जब एक रूसी एक जापानी से मिले, तो हिंदी में बात करे!

तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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