सन् 1999 में मैं दिल्ली आ गया लेकिन साहित्य से नाता सन् 2001 से हुआ, नाता क्या हुआ लेखन शुरू हुआ। अस्सी के दसक से पहले से ही देश के कोने-कोने से साहित्यकार, पत्रकार और शिक्षक दिल्ली आकर अपनी साधना में रत् थे। दिल्ली एक विशेष सारस्वत दीप्ति से भरी रही है। उस दीप्ति का एक भाग मेरे हिस्से भी यदा-कदा आता रहा है।
इसी कड़ी में 15 सितम्बर २०२० की शाम सुभाष नीरव का फोन आया।
“आज शाम को फ्री (खाली) हो?”
“जी, बताइये, क्या काम है?”
“नरेंद्र मोहन राजोरी गार्डन रहते हैं, उनसे मिलने जाने का तय है, मैं चाहता था तुम भी साथ चलो।“
“…..”
“क्या बात है मूड नहीं है चलने का?”
‘‘नहीं, वह बात नहीं है।’’
‘‘तो क्या बात है?’’
“बिना पूर्व परिचय के क्या इस प्रकार जाना उचित रहेगा?”
‘‘अरे भाई, वे अनूठे व्यक्तित्व के स्वामी हैं। उनसे तुम्हें साथ लाने की अनुमति भी ले ली है और तुम्हारा और तुम्हारे साहित्य का हल्का-फुल्का परिचय भी दे दिया है। उनसे तुम्हारे बारे में चर्चा हो चुकी है।’’
‘‘मुझे खुशी होगी। आप समय बताइये, मैं आपको घर से ले लूँगा, इत्मीनान से अपने स्कूटर से आपको ले चलूँगा।’’
मैं बेहद खुश था, खुश इसलिए कि काफी समय से सोच रहा था कि उम्रदराज साहित्यकारो की सूची बनाकर उनसे भेंटवार्ता करूँगा, उनका एक औपचारिक साक्षात्कार लूँगा। अच्छा था कि सुभाष नीरव की मार्फत नरेन्द्र मोहन जी से भेंट हो जायेगी।

राजोरी गार्डन के हरे रंग के फ्लैट्स की सोसाइटी में थोड़ी खोजबीन के बाद उनका मकान खोजने में हम दोनों कामयाब हो गए। मकान का पहला कमरा काफी बड़ा और किताबों से भरा हुआ, सुभाष जी ने बताया कि यहाँ नरेंद्र जी की बेटी बैठती है। हम मकान के सबसे अंतिम छोर तक गए जहाँ नरेंद्र जी का अध्ययन कक्ष था। पहली मुलाक़ात के चलते मैं थोड़ा नर्वस और शांत था। औपचारिक अभिवादन के साथ हम सोफ़े पर पसर गए।
इस बीच नरेन्द्र मोहन जी खाने के लिए नमकीन-बिस्किट लेकर आ गए। बैठकर बातचीत शुरू हुई। उनका व्यवहार और बातचीत का अंदाज देखकर मैं गहरे में प्रभावित हुआ। प्रभावित इसलिए भी हुआ कि एक समीक्षक, नाटककार, कवि से संयुक्त रूप से इस तरह पहली बार मिल रहा था।
“नरेंद्र जी, आपको बहुत पहले से दैनिक जागरण के माध्यम से जान रहा हूँ, प्रत्यक्ष मुलाक़ात पहली बार हुई है।“
सुनकर वे असमंजस में मुझे देखने लगे।
“सर, दैनिक जागरण के रविवारीय पृष्ठ पर आपकी कवितायें छपती थी, जिनकी कटिंग आज भी मेरे पास हैं।“
अब उन्होने मामले का खुलासा करते हुए कहा-“संदीप! जिनकी बात तुम कर रहे हो, वे अलग नरेंद्र हैं, भाई तुम्हें अकेले को नहीं बल्कि बहुतों को ये भ्रम होता रहा है, कई बार तो उनकी (उनके व्यक्तित्व की) बजह से मुझे स्पष्टीकरण भी देना पड़ा की मैं वह नरेंद्र मोहन नहीं हूँ।“
इस बात पर हम तीनों खूब देर तक हँसते रहे।
दिल्ली का लॉक-डॉउन, फिर अनलॉक डॉउन और इस कोरोना काल में घर में बन्द रहते-रहते उकताहट, बोरियत और अवसाद के क्षणों के बीच सुभाष जी का स्वास्थ्य का ग्राफ़ ऊपर-नीचे होता रहा था, हालाकि इस बीच भी वे कभी कुछ अनुवाद, कभी कुछ मौलिक लेखन करते रहे। उनसे बात करते हुए मुझे लगता मानो वे हाथ मिलाकर और गले मिलकर मिलने की कमी को ज्यादा महसूस कर रहे हैं। फोन पर निरंतर बातचीत के जरिये मैं इस कमी को कम करने का प्रयास करता रहा। एक दिन मैंने घरों से कुछ देर बाहर निकल कहीं बैठने की योजना बनाई और हम पहली बार घरों से बाहर निकले, सिर्फ़ अपने लिए, एक-दूजे से मिलने के लिए। 29 अगस्त 2020 को हम जनकपुरी के एक रेस्टोरेंट में ढाई-तीन घण्टे बैठे, उन एतिहातों का पालन करते हुए जो कोरोना काल में बेहद ज़रूरी हैं।
ऐसा ही अवसर था डॉ. नरेन्द्र मोहन जी से उनके राजौरी गार्डन निवास पर मिलने का। जैसे इस समय सब बेताब थे कि किसी अपने से मुलाक़ात हो, हमें लगा कि वह भी बेताब थे किसी से मिलने को… उनके चेहरे पर प्रसन्नता थी, वह खुश दिख रहे थे। उनके निवास पर मेरी उनसे पहली और सुभाष जी की यह दूसरी मुलाकात थी।
यह बेहद खुशनुमा मुलाकात थी, ढेर-ढेर बातों भरी मुलाकात। इसमें साहित्य, किताबों, नाटकों, प्रकाशनों से जुड़ी बातें शामिल थी। देश-दुनिया की बातें करते हुए हम भूल गए कि कोरोना क्या है।
एक दिन पहले ही डॉ. साहब की मंटो पर लिखी जीवनी ‘मंटो ज़िन्दा है’ का तेलुगु संस्करण छपकर आया था। जिसे Chaaya Resources Centre, Hyderabad ने बहुत खूबसूरत छापा है। इसका तेलुगु में अनुवाद डॉ. टी. सी. वसंता ने किया है। उनके निवास-स्थान पर हिन्दी के सुपरिचित कथाकार, कवि एवं अनुवादक श्री सुभाष नीरव के हाथों डॉ. साहब की इस पुस्तक का लोकार्पण हुआ, इस गौरवमयी क्षण का गवाह मैं भी बना। इस मुक़द्दस मौके पर तब मैंने कहा था–“गोर्की, चेखव और मोपासाँ जैसे कथाकारों के साथ विश्व के कथा-शीर्ष पर खड़ा मंटो अपने समय का बेहतरीन लेखक है। आज उस लेखक का जन्मदिन है। और आज हम उस महान लेखक से भारत की नयी पीढ़ी को परिचित करने वाले लेखक के साथ उसे याद कर रहे हैं।


आत्मीय, सराहनीय संस्मरण तोमर जी का। नरेन्द्र जी से मिलना निःसन्देह सुखद रहा होगा।
abhaar
संदीप तोमर जी बहुत अच्छा संस्मरण है बस पहली मुलाक़ात का आख़िरी होना दुखद अहसास है ।
Dr Prabha mishra
JI, VAKAI
❤❤❤❤❤
Thanks
आशीर्वाद