भारतीय रेल में जब आप थर्ड एसी की टिकट बुक करते हैं तो आपसे बड़ी विनम्रता से पूछा जाता है,लोअर चाहिए या अपर, मिडिल चलेगी या साइड लोअर? यह प्रश्न लोकतंत्र का भ्रम पैदा करता है। असल में फैसला पहले ही हो चुका होता है। और अगर आपकी किस्मत ने ज़रा भी आपकी लेनी चाही है,तो वह फैसला होता है सीट नंबर 7।
सीट नंबर 7 कोई साधारण सीट नहीं है। यह रेल व्यवस्था की काली स्याह आत्मा है। यह वही सीट है जो कोच के दरवाज़े से सटी होती है, जहाँ से पूरी बोगी की दुखती नब्ज़ गुजरती है। इसे देखकर लगता है कि रेलवे ने इसे यात्री के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था के दुरूपयोग के लिए बनाया है। अगर आपकी टिकट वेटिंग या आरएसी में रही है, तो समझ लीजिए कि आपका अंतिम पड़ाव यही सीट है। टीटी के लिए यह सीट पनौती नहीं, संभावनाओं का खजाना है। यहीं से वे तीन-चार अस्थायी यात्रियों को एडजस्ट कर लेते हैं,कुछ मजबूरी के मारे, कुछ पहचान के, और कुछ चाय पानी की अतिरिक्त व्यवस्था के नाम पर।
थर्ड एसी और स्लीपर में अंतर सिर्फ़ इतना है कि यहाँ आप खिड़की से बाहर झाँककर यह नहीं देख सकते कि स्टेशन आ गया या नहीं। एसी चले तो स्वर्ग, न चले तो अंडमान-निकोबार के काले पानी की चलती-फिरती सज़ा। रात दो बजे अगर आप थर्ड एसी में घुसें तो दृश्य किसी अस्पताल की मोर्चरी जैसा लगता है,सफेद चादरों में लिपटे शरीर, एक-दूसरे के ऊपर सजे हुए। और इन सबके बीच,दरवाज़े के पास,सीट नंबर 7 जागती रहती है।
दरवाज़ा रात भर खुलता-बंद होता रहता है। “चूं…चूं…” की आवाज़ आपके सपनों का स्थायी साउंडट्रैक बन जाती है। सीट की लंबाई इतनी होती है कि चादर फैलाने पर पैर सिकुड़ जाते हैं। घुटनों के बल सोने की मुद्रा अपनानी पड़ती है। अगर घुटने ज़रा भी गैलरी की ओर निकल आए, तो आप ट्रॉली बैग, वेंडर की केतली, समोसे के ढक्कन और ठंडे की बाल्टी के रास्ते में बाधा बन जाते हैं। संभव है कि भविष्य में रेलवे इसके लिए जुर्माने का प्रावधान भी ले आए,“यात्री द्वारा घुटना फैलाने का दंड।”
लेकिन अगर आपको सीट नंबर 7 मिली है, तो इसे दुर्भाग्य मत समझिए। यह रेलवे का आप पर विश्वास है। कहीं न कहीं सिस्टम को यह खबर मिल चुकी है कि आप अच्छे नागरिक हैं। अब आपको मुस्कुराकर अपनी अतिरिक्त ज़िम्मेदारियाँ निभानी होंगी। वेंडर आपकी सीट को काउंटर समझेगा,समोसे, चाय की केतली वहीं टिकेगी। उतरने वाले यात्री स्टेशन आने से आधा घंटा पहले ही आपके पास डेरा डाल देंगे। उनका सामान संभालना, ट्रेन रुकते ही उन्हें थमाना,यह आपका कर्तव्य है। क्योंकि भारतीय यात्री को जितनी जल्दी चढ़ने की रहती है, उससे ज़्यादा जल्दी कूदने की।
सीट नंबर 7 पर बैठे व्यक्ति को बोगी का सूचना केंद्र बनना पड़ता है। “अगला स्टेशन कौन सा है?”, “यह कौन-सी बोगी है?”, “टाइम क्या हुआ?”,इन सबका जवाब आपको पता होना चाहिए। बीच-बीच में टीटी पसीना पोंछते हुए सुस्ताने आएगा। आपको शिष्टाचार दिखाते हुए अपनी टाँगें समेटनी होंगी। कोई महिला बच्चे को लेकर आए तो उसके लघुशंका लौटने तक बच्चे की ज़िम्मेदारी भी आपकी। अटेंडेंट बेडशीट का पुलिंदा आपके पास रख जाएगा,“ज़रा संभाल लेना।”
आपके ठीक पास बने शौचालय बार-बार अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगे। उनके दरवाज़े खुलते-बंद होते रहेंगे, और दुर्गंध आपको यह याद दिलाती रहेगी कि आप व्यवस्था के कितने क़रीब हैं। एसी का तापमान, डस्टबिन की स्थिति, नल में पानी, चार्जिंग पॉइंट,हर शिकायत का पहला पड़ाव आप ही हैं। वेटिंग वाले यात्री आपकी सीट को शरणस्थली समझेंगे। बोगी की सारी लाइटें बुझ जाएँगी, लेकिन आपकी सीट पर अंधेरा कभी नहीं होगा। गलियारे की स्थायी जलती रोशनी आपको सजग रखेगी।
यह मत भूलिए,आप भारतीय रेल के अवैतनिक नाइट चौकीदार हैं। आपकी आँख लग गई तो व्यवस्था चरमरा सकती है। संभव है भविष्य में रेलवे आपको लालटेन भी पकड़ा दे और “जागते रहो” का बोर्ड टाँग दे। सुरक्षा गार्ड आपको स्टाफ समझेंगे, स्टाफ आपको गार्ड,और आप बाथरूम के बहाने खिसकने का सपना देखते रहेंगे।
सीट नंबर 7 बड़ी ज़िम्मेदारी है। ऐसा लगता है जैसे पूरी रेल व्यवस्था का हेडक्वार्टर यहीं हो। हो सकता है आने वाले समय में रेलवे इस सीट के लिए प्रीमियम किराया वसूले,क्योंकि फीडबैक अगर कोई दे सकता है, तो वही जो इस सीट पर बैठा है। बाक़ी यात्री तो सफ़र करते हैं, सीट नंबर 7 वाला व्यवस्था चलाता है।

- डॉ. मुकेश ‘असीमित’
पता: डॉ. मुकेश गर्ग, गर्ग हॉस्पिटल, स्टेशन रोड, गंगापुर सिटी, राजस्थान – 322201
पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ, लेखन विधाएँ: हास्य-व्यंग्य, लेख, संस्मरण, कविता आदि
नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक, व्यंग्य संकलन गिरने में क्या हर्ज, Roses and Thorns , अंतिम दर्शन का दर्शन शास्त्र, काव्य संकलन समय के साए एवं अन्य कृतियाँ प्रकाशित। विभिन्न संस्थाओं द्वारा पुरस्कारों से सम्मानित।
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