रामापुर नामक गांव में एक आदमी रहता था। उसका नाम कपूरचंद था। कपूरचंद बड़ा ही आलसी और कामचोर था। इस कामचोरी और आलसीपन से उसकी पत्नी कमलाबाई और बच्चे परेशान हो थे। गांव के लोग भी कई बार उसे समझा चुके थे कि वह कुछ काम-धाम किया करे। इससे उसके घर की गरीबी दूर हो जाएगी किंतु उसमें जरा भी सुधार नहीं हुआ। किसी साधु ने बताया था कि एक दिन उसे कहीं से गुप्त धन की प्राप्ति होगी, बस फिर क्या था बैठे-बैठे वह यही सोचता रहता कि वह गुप्त धन मुझे कैसे और कब मिलगा! परिवार और गांव वाले उसे हर तरह से समझा बुझाकर थक गए थे इसलिए लोगों ने उसके आगे हाथ जोड़ लिए थे।  
वह पत्नी से कहता, काश! वह धन जल्दी मिल जाता तो वह अपने लिए एक शानदार कोठी बनवाता। वहां काम करने के लिए वह ढ़ेर सारे नौकर-चाकर रखता और खुद आराम से पड़ा रहता। जब भी वह गुप्त धन की बात करता तो उसकी पत्नी कमलाबाई उसे कोसने लगती, “आग लगे तुम्हारे उस गुप्त धन को। तीन बच्चे हो गए और अभी तक वह धन नहीं मिला। अब बुढ़ापा आ रहा है क्या करेंगे उस धन का?” 
कपूरचंद के इस हवाई सपने से परेशान उसकी पत्नी बेचारी खुद दिनभर मेहनत मजदूरी करके अपना घर किसी तरह से चलाती थी। यदि कभी वह अपने पति पर काम करने के लिए जोर डालती तो वह उसे मारता पीटता था। इसलिए उसने अब कुछ कहना ही छोड़ दिया था।     उनकी अपनी कुछ खेती थी परंतु फसल न उगाने से आधे से अधिक जमीन बंजर हो गई थी। खेती करना कमलाबाई के अकेले के बस की बात नहीं थी। जितना उससे संभव हो पाता, उतना वह करती थी जिससे घर में दाल-रोटी का इंतजाम हो जाता था।        
एक बार उस क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ा और चारो ओर हाहाकार मच गया था। लोग भूख से मरने लगे। कमलाबाई ने जो थोड़ी बहुत रकम बचा कर रखी थी, वह भी खत्म होने लगी थी।   
ऐसे में वह बेहद चिंतित रहती थी कि, अब उसका घर कैसे चलेगा? मगर कपूरचंद पर इसका कोई असर नहीं हुआ था, इस स्थिति में भी वह हमेशा की तरह ख्यालों की दुनिया में खोया रहता था। 
ऐसे समय में उस गांव में एक संत पधारे। उनका नाम कान्होजी बाबा था। वे बड़ी मीठी वाणी में प्रवचन करते और लोगों को हिम्मत न हारने की सलाह देते। लोगों में यह विश्वास जगाते थे कि ये दिन भी गुजर जाएंगे, धीरज धरो। गांव के लोग बड़ी श्रद्धा से उनका प्रवचन सुनते थे। उनके प्रवचन से लोगों में आस्था की ज्योत जगने लगी थी और लोग जो काम मिलता उसे मन लगाकर करते थे। खाली समय में अपना ध्यान भक्ति में लगाते थे।      
कान्होजी बाबा के बारे में कमलाबाई ने भी सुना। वह भी गांव की अन्य औरतों के साथ प्रवचन सुनने जाने लगी। एक दिन मौका देखकर वह बाबाजी के पास गई और अपना दुखड़ा रोई।  उसकी पीड़ा सुनकर कान्होजी बाबा मुस्कुराए और बोले, “चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा। जाओ, अपने पति को मेरे पास भेज दो। उससे कहना कि संत बाबा ने बुलाया है और वे गुप्त धन के बारे में कुछ जानकारी देने वाले हैं।” कमलाबाई ने प्रणाम किया और घर चली गई। 
घर पहुंचकर उसने अपने पति को संत बाबा वाली बात बताई। गुप्त धन का नाम सुनते ही कपूरचंद दौड़ा-दौड़ा उनके पास गया। प्रणाम किया और बोला, “महाराज-महाराज, मुझे जल्दी से गुप्त धन के बारे में बताएं, मैं अब और इंतजार नहीं कर सकता।” 
संत बाबा बोले, “धैर्य धरो बेटा। पहले मेरी बात गौर से सुनो। मैं तुम्हें गुप्त धन की प्राप्ति का मार्ग जरूर बताऊंगा पर तुम वादा करो कि अपनी उस जिम्मेदारी तुम पूरे मन से निभाओगे।” 
“बिलकुल महाराज, बरसों से जिसका मुझे इंतजार है, उसे पाने के लिए मैं कुछ भी करूंगा, अब और देर ना करें महाराज, मेरी व्याकुलता बढ़ती जा रही है।” कपूरचंद ने कहा।  
“उस धन को प्राप्त करना इतना आसान नहीं है पुत्र। पहले तुम्हें बड़ी मेहनत करनी होगी।” 
“मैं कुछ भी करने को तैयार हूँ महाराज।”  कपूरचंद उतावला हुआ जा रहा था।  
कान्होजी बाबा कुछ देर तक आंखे बंद करके चिंतन करते रहे, फिर बोले, 
“तुम्हारे पास कोई खेत है?” कपूरचंद ने ‘हां’ मे सिर हिलाया।  
“तो चलो मैं तुम्हें वहीं बताऊंगा।”
संत जी को लेकर कपूरचंद अपने खेत की तरफ चल पड़ा। वहां पहुंचकर कान्होजी बाबा ने एक समतल जगह पर बहुत बड़ा गोला खींच दिया और बोले, 
“देखो वत्स, वह गुप्त धन इसी गोल जमींन के भीतर गड़ा हुआ है। यहां खुदाई प्रारंभ कर दो।  मगर हां इतना ध्यान रखना कि यदि परिश्रम से जी चुराया, तो कुछ भी हाथ नहीं लगेगा।”
“मैं आपकी आज्ञानुसार ही काम करूंगा, महाराज। मेहनत से जरा भी जी नहीं चुराऊंगा।” कपूरचंद ने कहा।  
भागते हुए वह घर पहुंचा और सारी बात पत्नी को बताकर तुरंत खांची, कुदाल, फावड़ा इत्यादि लेकर खेत की ओर भागा। उसकी पत्नी समझ गई कि यह संत बाबा का असर है इसलिए आगे कुछ नहीं बोली। पीछे-पीछे वह भी खेत में पहुंची और खुदाई के काम में पति का मदद करने लगी। बच्चे भी उनके साथ हो लिए। कपूरचंद को पहली बार अपने परिवार के प्रति अपनत्व का एहसास हुआ। उसके अंदर का सोया इंसान जाग गया था। उसके सिर पर गड़े हुए गुप्त धन को पाने का भूत सवार था। मशीन की तरह वह दिन-रात जमीन की खुदाई करता रहा। 
जैसे-जैसे वह गड़्ढ़ा गहरा होता जा रहा था, एक कुएं का आकार ले रहा था। और उस दिन  कपूरचंद ने जैसे ही फावड़ा जमीन पर मारा, पानी का फौव्वारा फूट पड़ा। धीरे-धारे पानी का स्तर बढ़ता गया। कपूरचंद को धन नहीं मिला। वह परेशान हो गया और भागते हुए संत जी के पास पहुंचा।  
“महाराज-महाराज वहां धन नहीं मिला। मगर वह गड्ढ़ा पानी से भर गया है। अब वहां से मुझे धन कैसे मिलेगा?” 
“धीरज रखो बेटा, तुम धन के पास पहुंच गए हो। अब तुम उस खेत की जुताई करो। उसमें बीज बोकर उसी कुएं के पानी से खेत की सिंचाई करना शुरु कर दो। कुछ दिनों बाद वहां पौधे उगेंगे और उनमें से सोने की बालियां निकलेंगी और उससे ही तुम मालामाल हो जाओगे।” 
उनकी बात मानकर कपूरचंद पुन: अपने खेत में दिन-रात मेहनत करने लगा। इस काम में उसका परिवार भी उसका साथ दे रहा था। कपूरचंद के सिर से गुप्त धन पाने का भूत अभी तक उतरा नहीं था। उसने खेतों की जुताई करके उसमें बीज बो दिए और उसी कुएं के पानी से सिंचाई भी की। कुछ दिन बाद बीज से पौधे निकले और समय के साथ-साथ बढ़ने लगे। इस बीच कान्होजी बाबा दूसरे किसी गांव की ओर रवाना हो गए थे।  
कुछ दिनों बाद अपने खेतों में लहलहाती फसलों को देखकर कपूरचंद बड़ा प्रसन्न हुआ। बालियों को देखकर उसका मन झूम उठता था। उसके इस लगाव से उसका परिवार भी सुखी हो गया था। गांव वाले उसे बधाई देने लगे थे। कमलाबाई मन ही मन कान्होजी बाबा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर रही थी। उसका पति खेती के काम में मगन हो गया था। इससे बड़ी खुशी उसके लिए और क्या हो सकती थी! 
अपने खेत में मेहनत करते हुए धीरे-धीरे कपूरचंद के दिमाग से गड़े हुए गुप्त धन को पाने का पागलपन दूर होने लगा था। वह पूरी लगन से फसल की देखभाल में रम गया था। उस क्षेत्र में अकाल के बावजूद उसके खेतों में अनाज रूपी सोने की बालियां लहलहा रहीं थीं। संत बाबा की बात उसे सच लगने लगी थी। खेतों में लहलहाती फसल उसके कठिन परिश्रम का ही फल था।  अब वह मेहनत का मूल्य समझ चुका था। 
पूरे गांव में उसकी चर्चा हो रही थी। अकाल के इस कठिन दौर में उसकी खेती रंग लाई थी।  सारे गांव वाले उससे अनाज खरीदकर खा रहे थे। बाजार में उसने अपना अनाज ऊंचे दाम पर बेचा। देखते ही देखते उसकी गरीबी दूर हो गई थी। इस दौर में वह गांव का अमीर और एक महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गया था। उसके खेत में जो कुआं खुदा था, वह संत बाबा का आशीर्वाद ही तो था। लोग उस कुएं का पानी गंगा समान मानने लगे थे।   
एक दिन कान्होजी बाबा घूमते हुए पुन: उस गांव में आए। सबसे पहले वे कपूरचंद के खेत की ओर गए। कपूरचंद का परिवार वहीं पर मौजूद था। “तुझे धन मिल गया बेटा?” जैसे ही बाबा की आवाज सुनी कपूरचंद उनके पैरों पर गिर पड़ा और कहने लगा, “आपने तो मेरी आंखें खोल दी महाराज। इस बात को मैं कितने सालों से समझ नहीं पा रहा था कि मेहनत से बड़ा कोई धन नहीं होता है। मैं मेहनत और परिश्रम के महत्व को अब अच्छी तरह से समझ गया हूँ मुझे आशीर्वाद दें महाराज।” 
कान्होजी बाबा ने उसकी पीठ थपथपाई और बोले, 
“ये सब तेरी मेहनत और योग्य समय का नतीजा है वत्स।” कमलाबाई की आंखों से खुशी के आंसू रूकने का नाम नहीं ले रहे थे। वह संत बाबा के चरणों में गिर पड़ी। बाबा ने उसे भी आशीर्वाद दिया।   
इस प्रकार कपूरचंद अपनी मेहनत से गांव का सुखी और सम्पन्न किसान बन गया। कान्होजी बाबा ने लोगों को बताया कि आलस्य ही हमारा सबसे बड़ा दुश्मन होता है। अतः हमें इस आलस को त्यागकर स्वावलंबी बनना चाहिए। मेहनत से हमें जी नहीं चुराना चाहिए। सच्ची लगन और कठिन परिश्रम से किए गए कार्यों का फल हमेशा मीठा होता है। भले देर से मिले पर मिलता जरूर है इसलिए इसे गुप्त धन कहते हैं। 

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