अनिरुद्ध सिन्हा की पाँच ग़ज़लें
आप बोलेंगे या कि मैं बोलूँ
एक उम्मीद है अभी दिल में
ग़म की अपनी दुकानदारी है
वो अगर बोझ बन भी जाए तो
इश्क़ जो बेजुबान है अब तक
अपनी परछाई से ये पता लीजिये
रतजगे आने पाए न आँखों तलक
फूल की सोहबतों से तो काँटे मिले
याद की गुलिस्ताओं में शबनम भी हैं
खूं में डूबी हुई जिनकी तहरीर हो
झूठ जब लाजवाब होता है
फूल के बीच फूल-सा बनना
हर्फ़-दर- हर्फ़ वो पढ़ा लेगा
खर्च माँ-बाप पर हुए कितने
उनके हिस्से में कोठियाँ होतीं
ख़ुशबुओं के हक़ में क्या जनाब दे गए हैं
लफ़्ज़ के फ़रेब से हरेक मर्तबा ही
बस ये सोच-सोच के गुरूर कीजिएगा
जो खुशी न आज भी करीब है न कल थी
हम नहीं बदल सकें हुज़ूर इसलिए तो
सच झूठ के जो सामने पन्ने बिखर गए
हम भी किसी मुक़ाम पे जाकर ठहर गए
आगे था चंद गाम पे नफ़रत का कारोबार
दुनिया का कोई आदमी हिम्मत न कर सका
होशो- हवास गुम हुए कच्चे मकान के
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