एक
आप  बोलेंगे  या कि मैं बोलूँ
राज़ दिल का छुपाऊं या खोलूँ 
एक  उम्मीद  है  अभी दिल में
क्यों दिया मैं बुझाऊं और सो लूँ
ग़म  की  अपनी  दुकानदारी है
तू बता तुझको किस तरह तो लूँ 
वो अगर बोझ बन भी जाए तो
अपने  कांधे  पे उम्र भर ढो लूँ 
इश्क़ जो  बेजुबान है अब तक
आ  ज़रा इससे हमजुबां हो लूँ 
दो 
अपनी  परछाई  से ये पता लीजिये
धूप का क्या है रुख जायजा लीजिये 
रतजगे  आने  पाए  न  आँखों तलक
दिन की मेहनत का थोड़ा मज़ा लीजिये
फूल की  सोहबतों  से तो  काँटे मिले
पत्थरों  का  नया  दिल बना लीजिये 
याद की गुलिस्ताओं में शबनम भी हैं
अपनी आँखों में इनको छुपा लीजिये 
खूं में  डूबी  हुई  जिनकी तहरीर हो
उनके  साये  से दामन बचा लीजिये
तीन
झूठ  जब  लाजवाब  होता है
सच का  चेहरा खराब होता है 
फूल  के बीच  फूल-सा बनना
कितना मुश्किल जनाब होता है 
हर्फ़-दर- हर्फ़  वो  पढ़ा  लेगा
वक़्त  ऐसी  किताब  होता है
खर्च  माँ-बाप पर हुए कितने
भाइयों  में  हिसाब  होता है 
उनके हिस्से  में कोठियाँ होतीं
मेरे  हिस्से  में ख़्वाब होता है   
चार 
ख़ुशबुओं के हक़ में क्या जनाब दे गए हैं
इक  हसीन  काग़जी  गुलाब  दे गए हैं
लफ़्ज़  के  फ़रेब  से  हरेक  मर्तबा ही
क्या मेरा  सवाल  क्या जवाब दे गए हैं
बस  ये  सोच-सोच  के गुरूर कीजिएगा
रतजगों की आँख में वो ख़्वाब दे गए हैं 
जो खुशी न आज भी करीब है न कल थी
उस  खुशी  की उम्र का हिसाब दे गए हैं 
हम  नहीं  बदल  सकें हुज़ूर इसलिए तो
वायदों  की  फिर  नयी किताब दे गए हैं 
पाँच 
सच झूठ के जो सामने पन्ने बिखर गए
कुछ दोस्तों के जाने क्यों चेहरे उतर गए 
हम भी किसी  मुक़ाम पे जाकर ठहर गए
तुम भी तो राहे-इश्क़ में पत्थर से डर गए
आगे  था चंद गाम पे नफ़रत का कारोबार
अच्छा हुआ कि लौट के तुम अपने घर गए
दुनिया का कोई आदमी हिम्मत न कर सका
अपने ही  घर के  लोग थे जो पर क़तर गए
होशो- हवास   गुम  हुए  कच्चे  मकान  के
गड्ढे सड़क  के किस कदर पानी से भर गए
कृतियाँ- 18 मौलिक पुस्तकें (8 ग़ज़ल-संग्रह) (7 आलोचना(ग़ज़ल)2 कविता-संग्रह 1 कहानी -संग्रह तथा 7 संपादित पुस्तकें प्रकाशित. बिहार उर्दू अकादमी,नई धारा का रचना सम्मान,विद्यावाचस्पति सहित दर्जनों साहित्यिक सम्मान. रचनाएँ देश के तमाम स्तरीय पत्रिकाओं में प्रकाशित. आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी निरंतर ग़ज़लों का प्रसारण. संपर्क- 7488542351, anirudhsinhamunger@gmail.com

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