ग़ज़ल 1
लग रहा था कि घर में तन्हा हूँ
मैं तो लेकिन नगर में तन्हा हूँ
साथ मेरे है क़ाफिला फिर भी
है तअज्जुब सफ़र में तन्हा हूँ
चाहने वाले है हज़ार मगर
हर किसी की नज़र में तन्हा हूँ
बुझ चुका इक चराग हूँ गोया
कौन सा मैं असर में तन्हा हूँ
मिल ही जाएगा हाँ मुक़ाम मुझे
गर यक़ीनन हुनर में तन्हा हूँ
ग़ज़ल 2
शराफत का जो गाएगा तराना!
उसे ही काट खाएगा ज़माना!
जो ख़ुद डूबे हुए हों उनकी ख़ातिर
बताओ लाज़िमी क्या डूब जाना!
फ़क़त माँगी मोहब्बत कब कहा था!
सितारे आसमां से तोड़ लाना!
कोई जब थामने वाला न आया!
मेरे क़दमो ने छोड़ा लड़खड़ाना!
ज़रूरत सील देती है लबों को!
बहुत मुश्किल है खुल के मुस्कुराना!
ग़ज़ल 3
प्यार की पहली निशानी भूल जा!
अपने माज़ी की कहानी भूल जा!
ज़हन पर तेरे ही तो होगा असर!
किसने की है बदज़ुबानी भूल जा!
खूँ में शामिल उसके है धोखा अगर!
ये कमी है ख़ानदानी भूल जा!
दो घड़ी का चैन पाने के लिए!
प्यास अश्कों से बुझानी भूल जा!
आ गया कमज़र्फ की महफ़िल में तो!
ख़ुद ही होगा पानी-पानी भूल जा!
- बलजीत सिंह, संगीत अध्यापक
पता: 103/19, पुरानी कचहरी कॉलोनी, निकट इम्प्रैशन इंस्टीट्यूट, हांसी – 125033, जिला हिसार, हरियाणा, भारत
मोबाइल: +91 9812214462
सधन्यवाद।
भवदीय,
बलजीत सिंह
