कैलाश सेंगर की ग़ज़लें : सब के नसीब में कहां इज़्ज़त की रोटियां
मेहनत के बाद भी मिलीं नफ़रत की रोटियां
आंखों से देखने की नहीं चीज़ मां का प्यार
जब जब हमारी भूख की ये आग जल उठी
आटा ही नहीं, प्यार है, ईमान है इस में
है स्वाद इनका खूब, मगर सच तो यही है
बीवी से हम ने सच ये छुपाया है उम्र भर
आंखों में बहुत बाढ़ है, फिर शेष सब कुशल
गीतों से, सिसकियों से, यादों से ना कटे
उस मोगरे को आंख से हम देख ही लेंगे
हम-तुम जहां मिले थे उसी झोपड़ी का अब
जो भी कहेंगे आप हम गायेंगे उम्र भर
रमुआ का नाम हाथ पर लिखती है ननदिया
जब से सजन का पत्र इधर में नहीं
तुम्हारे क़िस्से में दिल का मेरे मक़ान जला
अभी भी रात को बुढ़िया वो महक उठती है
वहां यूं देर शाम आग जली चूल्हे में
वहां कुरान था, गीता थी और क़समें थीं
गवाह ख़ौफ़ से, रिश्वत से बेज़ुबान हुए
सभी तो टांक के आये थे अपना चांद वहां
RELATED ARTICLES
