महराजगंज आये मुझे अभी कुछ ही दिन हुये थे कि एक दिन अचानक नारी मुक्ति मंच की कुछ महिलाएं मेरे पास आई और मुझसे नारी मुक्ति मंच की उपाध्यक्ष का पद स्वीकारने का अनुरोध करने लगी। मेरे विगत पन्द्रह वर्षों के समाज सुधार के कार्यों का पूरा कच्चा चिट्ठा था उनके पास। समाज सेवा के क्षेत्र में जाने का निर्णय मेरा अपना था। बड़ा सुकून मिलता था मुझे किसी पीड़ित को थोड़ी भी राहत पहुँचा कर। मेरे पति ने मेरी इस भावना को समझा, सराहा और प्रोत्साहन दिया। परिणामतः मेरा वैवाहिक जीवन समाज सेवा में बाधक न बनकर सहायक बन गया। मैं डेढ़ दशक से निरन्तर अपने स्तर पर समाज सेवा के कार्य करती आ रही हूँ बिना किसी प्रतिदान की चाह के, बना किसी प्रचार के। मैं चकित थी, गुप-चुप किये मेरे सभी छोटे-बड़े कार्यों की इतनी विस्तृत रिपोर्ट उनके पास कहाँ से आई।
साथ ही मैं इस उधेड़-बुन में गोते लगाने लगी कि आखिर महराजगंज जैसे पिछड़े, गरीब इलाके में नारी मुक्ति मंच की स्थापना का विचार किसी के मन में कैसे आया होगा। तराई के इस क्षेत्र को प्रकृति ने हरियाली का वरदान दिया है किन्तु गरीबी और अशिक्षा उस पर भारी पड़ गई है। एक ओर नेपाल की सीमा दूसरी ओर विकासशील गोरखपुर इनके बीच ‘‘सैन्डविच’’ बने महराजगंज को विकास की कोई रेखा छू भी नहीं सकी है। आठ-दस वर्ष पूर्व जिला बनने के बावजूद भी विकास की कछुआ चाल महराजगंज पहुँचने में अभी सफल नहीं हुई है। ऐसे में ‘‘नारी मुक्ति मंच’’ का कई वर्षों पूर्व यहाँ उदय हो जाना नारी मुक्ति आंदोलन की गहरी पैठ दर्शाने के लिए पर्याप्त था। साथ ही मैं अभिभूत थी कि मेरे निःस्वार्थ कार्यों के मोल को पहचाना गया है। अपने कर्म से कुछ पा लेने की उपलब्धि मन को रोमांचित कर रही थी। मेरी मौखिक स्वीकृति पाकर वे सब प्रसन्न मन से विदा हो गई।
अजब आलम था, एक अनोखी अनुभूति। पति के कार्यालय से वापस आने तक की प्रतीक्षा भी कठिन जान पड़ रही थी। खुशी थी कि छुपाये नहीं छुप रही थी। जैसे-तैसे सांझ घिरी, पति को अपने नीड़ में घुसते ही कुछ नया घटित होने का भान हो गया। होता भी क्यो न? मेरा तो रोम-रोम पुलकित था हर हाव-भाव मेरी प्रसन्नता दर्शा रहे थे। मंजिल पा लेने का नशा छाया था मुझ पर ।
‘‘क्या बात है? आज चेहरे पर नूर कुछ ज्यादा ही छलक रहा है।’’ शोभित मुझे देखते ही बोले।
‘‘आप अन्दाजा लगाइये।’’ पति की आँखों में झाँकते हुये मैंने जवाब दिया।
‘‘कुछ पा लेने जैसी आभा छलक रही है तुम्हारी आँखों से।’’ मुस्कुराते हुये शोभित बोले।
‘‘अरे, कमाल है। आपने तो एकदम सही पहचाना।’’ मैं चकित रह गई थी।
‘‘अरे भाई, आपको मुझसे बेहतर कौन जाता है? आखिर तो आपके पति हैं।’’
सब कुछ सुनकर शोभित कुछ पल मुझे देखते रहे। मेरी छोटी-छोटी उपलब्धि से खिल उठने वाले शोभित की प्रतिक्रिया अप्रत्याशित रूप से चौंकाने वाली थी।
‘‘तुम नारी मुक्ति आंदोलन की पक्षधर कब से हो गई?’’
‘‘मतलब?’’ मैं चौंक गई थी।
‘‘मतलब, तुम तो घर-परिवार को समेट कर चलने वाली स्त्री हो। नारी मुक्ति जैसा मुहावरा तुम पर फिट नहीं बैठता।’’
‘‘मतलब, आपको लगता है मैं इस पद के योग्य नहीं हूँ।’’ मेरे विश्वास को आघात पहुँचा था।
‘‘नहीं-नहीं। बात तुम्हारी योग्यता की नहीं है। तुम जानती हो, तुम्हारी योग्यता का मैं कायल हूँ।’’ शायद मेरे दर्द को मेरी आँखों में शोभित ने पढ़ लिया था।
‘‘फिर…………….?’’
‘‘क्या तुम नारी मुक्ति की पक्षधर हो?’’
‘‘………………..’’ मैं अपलक शोभित को निहार रही थी।
‘‘मेरे प्रश्न ने तुम्हें सोच में डाल दिया न? यही कहना चाह रहा था मैं। किसी भी आंदोलन से जुड़ने से पहले उस पर विश्वास होना आवश्यक है। यदि आंदोलनकर्ता और विशेष रूप से आंदोलन का नेतृत्व करने वालों को ही अपने उद्देश्य पता नहीं होंगे, यदि उनके सामने अपना लक्ष्य स्पष्ट नहीं होगा तो पूरा आंदोलन अपने लक्ष्य से भटक जायेगा। और इस आंदोलन की त्रासदी यही है। यह आंदोलन से अधिक मुहावरा बनकर रह गया है।’’
मैंने प्रतिवाद किया, ‘‘आज मेरी उन लोगों से बहुत विस्तार से बात हुई है। ऐसा नहीं है। दरअसल इस आंदोलन को लेकर पुरुषों में एक डर बैठ गया है इसी कारण इसका इतना विरोध होता है। वे लोग बता रही थीं कितनी ही पीड़ित महिलाओं को उनके मंच ने राहत पहुँचाई है। दहेज उत्पीड़न के विरूद्ध पूरा जिहाद छेड रखा है इस मंच ने। अभी पिछले हफ्ते ही एक बहू को जलाकर मारने वाले अपराधियों को इस मंच ने जेल पहुँचाया है।’’
‘‘अच्छा। किसको-किसको जेल की सजा हुई है?’’
‘‘बहू की सास, ननद और पति तीनों को। उसके पति की शह पर सास और ननद ने मिलकर बेचारी को जला दिया था।’’
‘‘उसके पति को तो फांसी होनी चाहिये। जिसके साथ जीवन बिताने का वादा किया उसी की हत्या के षडयंत्र में शामिल होना अक्षम्य अपराध है। किन्तु, तुम देखो उसे जलाया किसने?………..एक स्त्री को दूसरी स्त्री ने। मतलब पीडित़ और प्रताड़क एक ही समुदाय के हैं। फिर मुक्ति किसको किससे चाहिये?’’
‘‘यानि आप चाहते हैं मैं इस आंदोलन से न जुडूँ?
‘‘जुड़ना और न जुड़ना यह तुम्हारा अपना निर्णय है। अगर तुम्हें लगता है इस मंच से जुड़कर तुम बेहतर काम कर सकती हो तो जरूर जुड़ो। मैं तो सिर्फ यह कह रहा हूँ कि अत्याचार किसी पर भी हो और कोई भी करे, उसके विरूद्ध आवाज उठानी ही चाहिए। इस काम में मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा। नारी को यदि सचमुच मुक्ति दिलाना है तो उसे शिक्षा का हथियार थमा दो। उसके अकेलेपन को काटो, उसके मानसिक उत्पीड़न को रोको। इस तरह की भ्रामक बातों का क्या लाभ कि साड़ी पहनना नारी को बन्धन में जकड़ना है या विभिन्न सुहाग चिन्ह बेड़ियाँ हैं, इन्हें तोड़ फेंको। क्या लाभ होगा इससे? वैसे तुम यदि इन्हें उतारना चाहो तो मुझे कोई एतराज नहीं होगा, परन्तु क्या तुम अपना मंगलसूत्र, पायल, बिछिया, चूड़ियाँ और नाक की लौंग उतारना चाहोगी?
‘‘…………………’’ मैं आवाक सी मुँह बाए अपने पति को देख रही थी उनकी बातों ने मेरे विचारों को उद्वेलित कर दिया था।
‘‘अरे, कहाँ खो गई तुम? अभी फैसला करने को बहुत समय है। आराम से करना।’’ शोभित मेरी आँखों के आगे चुटकी बजा रहे थे।
‘‘अ……………….’’ चौंक कर मैंने शोभित की ओर देखा।
‘‘मुझे दो दिन के लिये बनारस जाना है चलोगी?’’
‘‘हाँ-हाँ। कब जाना है?’’
‘‘बस एक घन्टे में निकलेंगे।’’
‘‘आज ही?’’
‘‘हाँ। चलो मैं तैयारी में तुम्हारी मदद कर देता हूँ।’’
‘‘न बाबा। वो मैं कर लूँगी। आप बस अपनी चाय पी लीजिये और बच्चों को मना कर दूध पिला दीजिये। इतनी मदद बहुत है।’’
बनारस जाते हुये मैं रास्ते भर शोभित की बातों का मंथन करती रही। उनकी बातों में सार दिखाई दिया। मन विचलित होने लगा। समाज सेवा के क्षेत्र में अलग-अलग तरह की समस्याओं से मेरा परिचय होता रहा है। अब वही सब शोभित की बातों का समर्थन करती प्रतीत हो रही थीं। पाँच पुत्रियों को जन्म देने वाली रमिया की सास उसके नाक में दम किये रहती थी किन्तु उसकी सास को समझाना मेरे लिये टेढ़ी खीर था। ग्यारह वर्षीय संजू का विवाह इतनी कम उम्र में न करने के लिये उसके पिता को तो समझा लिया किन्तु उसकी माँ और दादी कहाँ कुछ सुनने को तैयार थीं। काश ये सब कुछ पढ़ी होतीं। सुरेन्दर की माई को क्या कहूँ? पति ने दूसरी औरत बिठा ली तो अपना बेटा लेकर वापस अपने गाँव चली आई। अब वह बड़ा हो गया है परन्तु शिक्षा के नाम पर कोरा है। कहती है ‘‘मरद पढ़ा रहा तो हमके छोड़़ दीहिस अब बिटवा के पढ़ा देब तौ यहू हमके छोड़ देई। हम आपन पाँव मा कुल्हाड़ी नहीं मारब।’’ सोचते-सोचते मेरा दिमाग घूमने लगा।
बनारस की भागम-भाग में अनुश्री से मिलना हुआ। अनुश्री से मिलना उसके एकाकीपन से मिलना था, उसकी निराशाओं से साक्षात्कार था। बुरी तरह हिला कर रख दिया उसने मुझे। मेरे अंदर एक तूफान उठ खड़ा हुआ। कहाँ जाना चाहते हैं हम? एक ओर नितांत अकेले अपना-अपना युद्ध लड़ते अनु जैसे अनेक लोग हैं, दूसरी ओर हर गली मुहल्ले में खुली समाज सेवा की अनगिनत दुकानें? बैनर, जलूस, नारे बाजी और अखबार में फोटो-परिणाम वही ढाक के तीन पात।
हवा से फड़फड़ाते कागज की आवाज से मैं वर्तमान में लौट आई। सामने मेज पर नारी मुक्ति मंच की उपाध्यक्ष पद पर नियुक्ति का पत्र रखा था। जब से बनारस से लौटी हूँ यह नियुक्ति पत्र और अनुश्री का चेहरा मेरी नजरों के सामने बारम्बार गडमड होने लगे हैं। नियुक्ति पत्र के साथ जुड़ा रूतबा और सामाजिक प्रतिष्ठा अपनी ओर खींचती है तो अनुश्री का चेहरा याद दिलाता है अभी बहुत कुछ करना बाकी है बिना किसी बन्धन में बँधे हुये। यह निर्णय की घड़ी थी और मेरे अन्दर समुद्र मंथन जैसी हलचल।
‘‘कहाँ खोई हुई हो?’’ शोभित की आवाज से मैं चौंक उठी।
‘‘क्या बात है, तुम कुछ परेशान लग रही हो?’’
कुछ पल पति की ओर देखकर मैंने अपनी उलझन को शब्दों का जामा पहना दिया।
‘‘अनुश्री के कहे शब्दों की अनुगूँज, गूँज बनकर मेरे कानों में अब भी गूंज रही है। जब से बनारस से वापस आई हूँ घर को संजोते संवारते, कुछ भी करते अनुश्री का भोला मुखड़ा, दुर्बल काया मेरी आँखों के आगे हर पल तैरती रहती है। उसके शब्दों में छुपी निराशा मुझे विचलित कर रही है।’’
‘‘……….दीदी, मेरी प्रेरणा तो महराजगंज चली गई…………अब सब खत्म।’’ यही कहा था न?’’ शोभित ने अनुश्री के शब्द दोहरा दिये थे।
‘‘हाँ’’
‘‘तो तुम इतना विचलित क्यों हो रही हो? ये तो इतना बड़ा ‘‘काॅम्पलीमेन्ट’’ है तुम्हारे लिये।’’ शोभित के चेहरे पर सहज मुस्कान थी।
‘‘काॅम्पलीमेन्ट? ……..आप इसे काॅम्पलीमेन्ट कह रहे हैं? मैं तो यह सोचने पर विवश हूँ कि आखिर मैंने ऐसा क्या कर दिया उसके लिये कि वह इतना विह्वल हुई जा रही थी। इतनी बड़ी बात कहने वाली लड़की को आखिर मैंने दिया ही क्या है?’’
‘‘…………..और तुम इसे छोटी सी साधारण बात समझती हो? हकीकत यह है कि आज हमारे समाज में इसी भावात्मक सहारे का नितांत अभाव हो गया है, जो तुमने उसे दिया। इसी कारण तुम्हारे चले आने से उसके जीवन में एक गहरी शून्यता घिर आई है। जो उसे विचलित कर रही है।’’ शोभित ने सरल शब्दों में स्थिति का विश्लेषण कर दिया।
‘‘यही बात तो मुझे परेशान कर रही है। इंसान अपने आप में इतना क्यों सिमट गया है? हम इतने एकाकी और स्वार्थी क्यों होते जा रहे हैं? क्या हम भावात्मक रूप से इतने निर्धन हो गये हैं कि किसी का सुख-दुख नहीं बांट सकते? भरे पूरे परिवार के बीच यह एकाकीपन क्यों? अनुश्री का चेहरा इसी प्रश्न का ज्वार-भाटा लिये मेरे मन में उथल-पुथल मचा रहा है।’’
‘‘तुम्हारी बात सोचने पर विवश करती है परन्तु मुझे दस बजे एक मीटिंग में पहुँचना है इसलिए मैं चलता हूं। तुम भी किसी काम में मन लगाने की कोशिश करना। शाम को बात करेंगे।’’ मेरे विचारों से सहमती जताते हुये शोभित बाहर चल दिये।
‘‘मैं पति को गाड़ी तक छोड़कर लौटी तो अनुश्री के जीवन में डूबने-उतराने लगी। अनुश्री एक साधन सम्पन्न परिवार की तीन संतानों में सबसे बड़ी संतान है प्रखर बुद्धि वाली इस कन्या की शिक्षा बी0ए0 करते ही बन्द करा दी गई और आरम्भ हो गया एक सूत्रीय कार्यक्रम ‘‘योग्य वर की तलाश’’। समय बीतने के साथ-साथ योग्य शब्द लुप्त हो गया और यह ‘वर की तलाश’ में परिवर्तित हो गया। सुन्दर, सुशील इस कन्या हेतु वर की तलाश द्रौपदी का चीर साबित हुई। समय की हर आहट के साथ अनुश्री की उम्र बढ़ती गई, साथ ही बढ़ती गई उसकी कुंठा और परिजनों की चिन्ता। परिवार की लाडली बेटी से वह बेचारी बन गई। चेहरे पर पड़ती उम्र की थाप को वह कैसे रोक सकती थी? अब तो कुछ चाँदी के तार भी झाँकने लगे थे। जो भी आता कुछ उम्र को रोकने के सुझाव उसकी ओर उछाल देता। दर्द की तेज चुभन उसके हृदय को बेध जाती। डरती है वह इनसे। अतः आगन्तुकों से कतराना उसकी नियति बनता गया। परन्तु उसके अकेलेपन का एहसास किसी को नहीं। आज भी वर की खोज जारी है परन्तु कन्या को उसके पैरों पर खड़ा करने का किसी परिजन को स्वप्न में भी ख्याल नहीं आता। संस्कारी परिवार की नाक जो कट जायेगी।
परिजनों के बीच एकाकीपन की पीड़ा को पीते हुये जीने को अभिशप्त कितने ही लोग मिल जायेंगे। परन्तु क्यों होता है ऐसा? हम इतने हृदयहीन कैसे हो गये? इस यक्ष प्रश्न का उत्तर किसके पास है?
अतीत मुझ पर हावी होता जा रहा था। मेरी आँखों के आगे वह दृश्य साकार हो उठा जब तपती दोपहरी में किसी कामवश मैं बालकनी में निकली तो अनुश्री को तेजी से सामने सड़क पर जाते देखा। आश्चर्य के वशीभूत बरबस मैंने उसे ऊपर बुला लिया। आते ही वह फूट पड़ी। उसके आँसू रूक नहीं रहे थे। गहरी निराशा की घड़ी में वह आत्म हत्या करने जा रही थी इस सत्य से अनजान मैं पूछ बैठी, ‘‘अरे रो क्यों रही हो? अनु, इतनी धूप में कहाँ जा रही थी? सब ठीक तो है?’’
‘‘मैं आत्म हत्या करने जा रही थी।’’
‘‘क्या ऽऽऽ…………’’ मैं बुरी रह चौंक गई थी।
‘‘विश्वास नहीं हो रहा न? मेरी पीड़ा कोई नहीं समझ सकता। इसीलिये मैंने निर्णय लिया है, न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी।’’ विद्रुप हंसी के साथ वह बोली।
‘‘तुम होश में नहीं हो अनु।’’
‘‘मुझे तो अब होश आया है दीदी।’’
‘‘पागल मत बनो। आत्म हत्या तो पलायन है। जीवन में दुख-सुख तो लगा ही रहता है।’’
‘‘यह सब किताबों में लिखा अच्छा लगता है परन्तु जब जीवन में भुगतना पड़ता है खैर………..मैंने पलायन का मार्ग ही चुना है।’’ उसने अपनी बात स्वयं ही काट कर समाप्त कर दी। शायद कोई सफाई नहीं देना चाहती थी।
‘‘नहीं अनु, तुम्हारे जैसी प्रतिभावान लड़की पलायन नहीं कर सकती।’’
‘‘कौन सी प्रतिभा? जिसे जंग लग जाये उसे आप प्रतिभा कहेंगी? खैर! छोड़िये दीदी, मेरी चेतना को जगाने का व्यर्थ प्रयास मत कीजिये। मैंने अपनी मंजिल चुन ली है।’’
‘‘अरे अनु, तुम्हारे इस आत्म हत्या के चक्कर में मैं तो असली बात भूल ही गई जिसके लिए मैंने तुम्हें बुलाया था।’’ मैंने चौंकने का अभिनय किया।
‘‘……………’’ उसने किसी प्रकार की कोई उत्सुकता नहीं दिखाई।
‘‘अनु, मेरी एक सहेली है वह अपना बुटीक खोल रही है। उसे कुछ सहयोगी चाहिये। मुझे तुम्हारा ध्यान आया। तुम खाली रहती हो। इस काम के लिये तुम्हें घर से बाहर भी नहीं निकलना पड़ेगा इसलिये घर वालों को भी कोई एतराज नहीं होगा। सिलाई-कढ़ाई तुम्हें आती ही है। कपड़े बना-बना कर उसकी बुटीक पर रखती रहना उसकी मदद हो जायेगी और तुम्हारी आमदनी।’’
‘‘सच दीदी, क्या यह सम्भव है?’’ उसकी आँखों में पल भर को चमक आ गई।
‘‘हाँ। क्यों नहीं? बस तुम्हें थोड़ी सी ट्रेनिंग लेनी होगी।’’
‘‘नहीं। यह ट्रेनिंग मैं कसे ले पाऊँगी? घर वालों को तो आप जानती ही हैं।’’ वह पुनः बुझ गई थी।
‘‘अरे, पड़ोस की कालोनी की श्रीमती खन्ना को तो जानती हो न? उनके पति ने उन्हें एक-एक पैसे के लिये तरसा दिया था। उन्होंने भी तो पत्राचार के द्वारा ही सीखा है, अब पास-पड़ोस के कपड़े सिलती हैं और देखो अपनी मेहनत से कितना बढ़िया घर चला रही हैं।’’
‘‘उन्होंने पत्राचार से सीखा है?’’
‘‘हाँ’’
‘‘दीदी…………मैं………..मैं क्या यह कर सकूँगी?’’ उसकी उत्सुकता उसकी आँखों में छलक उठी थी।
‘‘हाँ, अनु, तुम जरूर कर लोगी। बस एक फार्म भर कर भेजना होगा।’’
‘‘कहाँ मिलेगा फार्म?’’
‘‘तुम चिन्ता मत करो। मैं मंगा कर दूँगी तुम्हें।’’
‘‘सच!’’
‘‘हाँ एकदम सच। लेकिन तुम अब कोई गलत कदम नहीं उठाओगी।’’
‘‘नहीं दीदी। अब जब आप जैसा मार्ग दर्शक मिल गया है, तो मैं अपनी राह स्वंय बना लूँगी।’’
एक नई आशा की डोर थामे अनुश्री मेरे घर से वापस अपने घर चली गई। परन्तु मैं चिन्तित थी। उसे आशा का दीप तो थमा दिया था परन्तु ऐसी सहेली कहाँ से लाऊँगी जो बुटीक खोल रही हो या जिसका बुटीक हो। फिर भी मैं अपने त्वरित झूठ पर प्रसन्न थी। जिसने एक कोमल कली के जीवन को मृत्यु का ग्रास बनने से बचा लिया था। यह आशा भी मन के किसी कोने में दबी बैठी थी कि ट्रेनिंग के बाद बने अच्छे वस्त्र कोई भी बुटीक वाला अपने यहाँ रख लेगा। अनु का हुनर तो मैंने अपनी आँखों से देखा है। बिना सीखे वो इतना अच्छा बनाती है तो सीखकर तो और निखार ही आयेगा।
अतीत में मैं पूरी तरह डूब चुकी थी। अनुश्री की ट्रेनिंग अच्छी चल रही थी। श्रीमती खन्ना ने खुद भुगता था सो दूसरे का दर्द समझती थीं। वह भी मदद कर देती थीं। अनु यह जान चुकी थी कि मेरा किसी बुटीक से कोई परिचय नहीं है फिर भी वह आशावान थी। अपनी मेहनत और हुनर पर भरोसा था उसे। उसके साथ अनेक बुटीक के चक्कर मैं भी मार चुकी थी। आशा-निराशा के झूले में हम झूल रहे थे तभी मेरे पति का स्थानान्तरण महराजगंज से हो गया और हम अपना बोरिया-बिस्तर बांध कर नये परिवेश और नये लोगों के बीच आकर बस गये और मैं नारी मुक्ति मंच की उपाध्यक्षा का गरिमामय पद सम्हालने पर भी विचार करने लगी।
परन्तु बनारस की इस बार की यात्रा से मेरे विचारों को गहरा झटका लगा था। अनुश्री का अकेलापन और उसके जीवन में आई शून्यता ने मेरी चेतना को हिला दिया था। हम नारी मुक्ति तक सीमित होते जा रहे हैं जबकि पूरे समाज को ही अपनी बुराई से मुक्ति की आवश्यकता है।
अतीत से बाहर आकर अब मुझे अपनी अन्तरात्मा की आवाज स्पष्ट सुनाई दे रही थी। नारी ही क्या, हर इंसान को जीने के लिये एक सहृदय समाज की आवश्यकता होती है। जब तक पनघट पर रहकर कोई प्यासा रह जाए, पनघट का होना सार्थक नहीं। नारी को ही क्या पूरे समाज को सामाजिक चेतना की आवश्यकता है।
मैं धीमी चाल से आगे बढ़ी और मेज पर रखे नारी मुक्ति मंच की उपाध्यक्षा पद का नियुक्ति पत्र मैंने हाथ में उठा लिया। एक गहरी नज़र उस पर डालकर मैं उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में बदलने लगी। नारी को वस्त्रों और अपने संस्कारों से मुक्ति नहीं, मानसिक दासता से मुक्ति चाहिये, अपनी बेचारगी से मुक्ति चाहिये। हमारे आंदोलन को सही दिशा चाहिये। मैं सधे हुए कदमों से खिड़की तक पहुँची और उन नन्हे टुकड़ों को खिड़की के बाहर हवा में उछाल दिया। हवा में तैरते श्वेत पत्रों के बीच मुझे अपना लक्ष्य स्पष्ट दिख रहा था।
- नीलम राकेश
उत्तर-प्रदेश में 1961 में जन्मीं श्रीमती नीलम राकेश नीलम राकेश की 53 पुस्तकें प्रकाशित हैं। पाँच पुस्तकों एवं एक बाल पत्रिका का संपादन किया है। ब्रेल लिपि में भी दो पुस्तकें हैं। आपकी रचनाएँ विभिन्न कक्षाओं में बच्चों को पढ़ाई जा रही हैं।
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