Monday, May 25, 2026
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कुलदीप दहिया ‘मरजाणा दीप’ की कविता – आ अब लौट चलेें

हैं चारों ओर वीरानियाँ
खामोशियाँ, तन्हाईयाँ,
परेशानियाँ, रुसवाईयाँ
सब ओर ग़ुबार है !
आ अब लौट चलें…………………
चीत्कार, हाहाकार है
मृत्यु का तांडव यहाँ,
है आदमी के भेष में
यहां भेड़िये हजार हैं !
आ अब लौट चलें……………….

खून से सनी यहाँ
इंसानियत की ढाल है,
नफ़रतों के ज़हर से
भरी आँधियाँ बयार हैं !
आ अब लौट चलें……………..

ज़मीर मिट चला यहाँ
क़ायनात शर्मसार है,
घोर अंधकार में यहां
गुमनामियाँ सवार हैं !
आ अब लौट चलें…………….

कस्तियां यहाँ डूब रही
लहरों में उभार है
है डूबता वही यहाँ
गुमाँ का जिसमें ख़ुमार है !
आ अब लौट चलें………………..

मुफ़लिसी के दौर में
मजबूरियां बेशुमार हैं,
नज़र जहां भी पड़े
अंगार ही अंगार हैं !
आ अब लौट चलें………………….

मंज़र ये कैसा यहाँ
फ़िक्र में जहान है
ना सरहदें महफ़ूज यहाँ
सब  दिलों में ख़ार हैं !
आ अब लौट चलें…………………

स्वार्थ की  बेड़ियों से बंधे
सब गुमनामियों की कैद में,
सब्र है किसे यहाँ
तंग सोच से बीमार हैं !
आ अब लौट चलें……………….

विश्वास के पनपते बूटों पे
दगाबाज़ इल्लियाँ सवार हैं,
कब तलक जलेगा “दीप”
दामन सभी दाग़दार हैं !
आ अब लौट चलें……………….!
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