ग्राम्य जीवन (सॉनेट)
नीले अंबर के आंगन में भोर का सूरज उगता
सोकर उठ जाने को मानो सारे जग से कहता
जल भरने घट लेकर जातीं ललनायें पनघट पर
करने को स्नान जमा हों नारी सब सरि तट पर
हरीतिमा की चादर ओढ़े वसुंधरा इठलाती
खेतों की ये मेड़ भी देखो इधर उधर बल खाती
सर्पीले लंबे रस्ते पर पसरी बूढ़े बरगद की छाया
स्वेद बिन्दु , चमकायें क्लांत कृषक की काया।
फूली सरसों शीत पवन से मंद मंद सी लहराये
चारा खाकर गौ माता भी बैठ चैन से पगुराये
मधुर मधुर घंटी की ध्वनि नीरवता में स्वर भरती
पेड़ों के झुरमुट में छिपकर कोयल कलरव करती
प्रेम दया करुणा से सुरभित, रहता जीवन ग्राम्य
जीना- मरना इस माटी में, एकमात्र हो काम्य।।
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स्वप्न में रहा गाँव (सॉनेट)
जिस मिट्टी से परंपरा की आती सुगंध
जिसकी भाषा से बनते मीठे हैं संबंध
जिसका गगन होता स्वच्छ निर्मल पथ
जिसके कण-कण में है रहता जीवथ
जिसके जल में घुलती हंसों की परछाई
जिसकी आँखों में रहती प्रेम की गहराई
जिसके आँचल में मुग्ध होते चाँद सितारें
जिसकी राह सदा घर के चौखट निहारें
क्या है वह धरा का भाग जो मैंने चाहा
क्या है वह गगन-पवन जो है खो रहा
क्या है वह पगदण्डी जहाँ धूल है उड़ती
क्या लाती है वह सुबह बूँदें ओस की?
स्वप्न में रहा वह गाँव जो कभी था सरल
मिथ्या-नगर से इस ओर बह रहा गरल।

