तृप्ति आँगन में मेहमान बनी बैठी है। सब उसे घेरकर बैठे हैं।
चाय का कप दोनों हथेलियों के बीच दबाए पीने के बहाने चेहरे के करीब कर लिया है और कप की आड़ ले धीरे से एक लम्बी-गहरी सांस ली है उसने। कप के पीछे से ही नजर घूम गई सबके चेहरों पर …जहाँ सवालों की छिपी छाया तैर रही थी, लेकिन उसके आने के उत्साह के नीचे दबे थे जैसे सारे सवाल।
आई भी तो शादी के तीन साल बाद है, मगर अकेली और वह भी बिना किसी सामान के, सबसे बड़ा सवाल तो सबके जहन में यही बना हुआ है। सबके मुँह उसने यह कहकर बन्द तो कर दिए कि रास्ते में सामान चोरी हो गया , मगर नजरों में अविश्वास साफ नजर आ रहा था।
शादी से तुरंत बाद एक बार आई थी बस। उसके बाद तो अनन्त बहाने। कितना कुछ बदल गया है समय के इस तीन वर्षीय बहाव में।भाभी समय के साथ थोड़ी मुखर हो गई हैं। छोटी बहिन शालू अब और निखर गई है, उम्र का कमसिन रुपहला दौर जम के बरस रहा है उस पर। पापा भी थोड़े अमीर हुए हैं समय के साथ, उनकी कनपटियों और माथे के ऊपर चाँदी के तार झिलमिलाने लगे हैं। लम्बी-सतर माँ भी हल्का-सा झुक आई हैं आगे को। उनकी रीढ़ में तो शुरु से ही दिक्कत थी। शालू के जन्म के समय हुई सर्जरी के बाद से बनी दिक्कत आज भी बनी है। डॉक्टर्स के झुकने को मना करने के बाबजूद भी माँ कब मानती हैं।
वह यहाँ थी तो माँ का काफी बोझ हल्का रहता था। अभी शालू भी पढाई में और भाभी बच्चे में व्यस्त। पापा और भाई तो बदलने से रहे।
“फिर माँ की तकलीफ पता भी तो नहीं चलती, बताती वो हैं नहीं ।” सुबह से उसके पीछे -पीछे लगी शालू ने अपनी अल्हड़ता से बात उड़ा दी।
माँ रसोई में जुटी हैं। बहाने से उसके चेहरे को ताक लेती हैं। मानो तीन साल का इतिहास वह चेहरे पर लिए घूम रही है और कोशिश करने पर वह उसे पढ़ ही लेंगी। माँ तो शुरू से ही चेहरे की किताब पढ़ने में माहिर थीं। उनकी इसी बात से तो घबराती है वो।
“अरे तृप्ति, ये प्याज की पकौड़ी नहीं ले रही तू, बेसन से नहीं बनाई, बेटा !आटे से बनाई है, तुझे तो बहुत पसंद है न।”
“हाँ माँ! ले रही हूँ ना।”
उसे याद है, इलाहाबाद वाली आंटी, माँ की खास सहेली की यह खास रेसिपी। एक बार उनके घर पर आटे संग प्याज के छल्लों से बनी पकौडियां खाईं तो वह आश्चर्य से भर उठी थी।
“आंटी, आपने आटा यूज किया है पकौड़ी में ? वाह !! कितनी टेस्टी है। माँ! आप भी सीखो ना आंटी से।” वह माँ के पीछे पड़ गई थी रेसिपी सीखने के लिए। और माँ ने सीखी भी थी उसके लिए।
लेकिन आज …आज उसे पकौड़ी में कोई स्वाद ही नहीं पता चल रहा। वह कितनी देर से एक पकौड़ी लिए चूहे जैसी कुतर रही है।
“मैं तो तेरा चेहरा देखने को ही तरस गई, तृप्ति ! पता नहीं तेरे घर वाले तुझे यहाँ भेजने में इतनी आनाकानी क्यूँ करते हैं।”
माँ रसोई समेट पास ही आ बैठी थीं। पल्लू से गीले हाथ पोंछ धीरे से माँ ने उसके सिर पर हाथ रख दिया। तृप्ति माँ का स्पर्श पा सिहर उठी। उसके पेट में कुछ अजीब -सी चहलकदमियाँ शुरू हो गईं। आँखें नजरें चुराने के लिए कहीं जगह नहीं पा रही थीं। माँ एकदम ही तो सामने आ बैठीं। खिसियानी मुस्कराहट से उसका चेहरा कितना अजीब हो उठा होगा यह सोच वह और जोर से नकली हँसी हँस उठी।
“अरे माँ ,आप भी ….। सब कितना बिजी रहते हैं वहाँ। इनके विदेश दौरे ही खत्म नहीं होते। माँजी इतना बड़ा एनजीओ चला रही हैं, सो उन्हें भी फुरसत नहीं मिलती। और पापाजी भी …” कहते-कहते तृप्ति का चेहरा विवर्ण हो उठा।
उसकी बातों से उसका चेहरा मेल नहीं खा रहा, यह माँ की पारखी नजर ने पकड़ लिया लेकिन सभी की उपस्थिति ने उन्हें खामोश रखा।
“चल…ठीक है बेटा! तू खुश तो मैं भी खुश , अबकी अचानक तू आ गई तो पहले तो मैं घबरा ही गई थी।”
“मम्मा, आप ‘सावधान इंडिया’ देखना कम करो पहले।”
शालू की बात पर सब हँस पडे़ और तृप्ति ने भी शालू के सर पर हल्की सी चपत लगा दी।
क्या बताए तृप्ति ?…कैसे बताए ? बताने लायक है सब कुछ …? क्या बताए कि हाँ उसकी जिन्दगी भी ‘सावधान इंडिया’ का एक एपीसोड बन गई है…।
लेकिन … नहीं बताएगी तो …? क्या करेगी ? कहाँ जाएगी? …तो क्या यहाँ रहेगी तृप्ति?
भाभी, शालू, भाई, पापा, माँ सबके चेहरे जैसे उसकी आँखों के सामने तेजी से लेफ्ट-राइट करने लगे। सबके चेहरों पर अनगिनत सवाल। सवालों के उठते बबंडर से घबरा तृप्ति हाथों से चेहरा पोंछते हुए उठ खड़ी हुई जैसे सारे सवालों के जबाब उसके चेहरे पर लिखे थे और हाथ फिरा उन्हें मिटा डाला हो।
सबसे नजरें चुराते हुए वह वॉशरूम में घुस गई। मगर सीट पर बैठते ही जैसे नदी का बाँध टूट गया। एक तेज हिलक के साथ रूलाई ने अपने सारे बंधन ढीले कर दिए। अपनी हिलकियाँ रोकने के लिए तृप्ति ने अपना चेहरा हथेलियों से बुरी तरह रगड़ डाला। मुँह पर हाथ कसकर बाँध दिए जिससे आवाज बाहर न जाए, लेकिन आँसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। आँसुओं ने जैसे अपनी तीन साल की कैद का बदला लेने का ठान लिया था। आँखें बरसाती नदी बन गईं थीं जो उफने जा रही थीं।
आज वह अपने अंदर का सारा दुख कलेजा फाड़कर निकाल देना चाह रही थी। मन हो रहा था चीख-चीख कर रोए … माँ-पापा को आवाजें लगाए। अपने दिल में चुभी अनगिनत फांसों को आज वह निकाल देना चाहती थी, जो हर सांस के साथ और अंदर गड़ जा रहीं थीं। सांस लेना मुहाल था। आज तीन साल से वह नटी बनी जर्जर रस्सी पर चल रही है अगर एक साँस भी तेजी से ली तो सारा बोझ कमजोर रस्सी पर और वह जाने किन अतल गहराइयों में …।
लेकिन नहीं… अब नहीं, बहुत हुआ । आखिर किसलिए… किसलिए वह यूँ अपने वजूद को ले खाक होती रहे, वह तो खाक होने को भी तैयार थी, लेकिन जलाने वाला तो अपना हो …।
वहाँ तो उसे यही समझ नही आ रहा, वह खड़ी किस आधार पर हो। पैरों तले तो नितांत खोखली जमीन है। भुरभुरी मिट्टी और नीचे हैं पाताल की अतल गहराईयाँ। किस तरह तीन साल से उन अदृश्य खाईयों से बचा रही है अपने को, कभी खोल कर बता पाएगी …? अपने कमजोर, नपुंसक गुस्से का बोझ उठाए-उठाए उसकी आत्मा ही मरती जा रही है।
और, कितनी डरपोक हो गई है वह। अपने साए से ही जैसे डर सहम जाती है। वहाँ सबकी निगाहों के साए में कैद उसकी जिन्दगी …दम तोड़ती ख्वाहिशें …। आत्मविश्वास की कमी के चलते गलतियों का पुलिंदा बनी वह…। कारागार के कैदी सी जिन्दगी, शायद कैदी भी उससे अच्छे हालात में होते हैं ….वह तो सनकियों के गिरोह में जा फसी है जैसे।
माँजी की तेज, चौकस नजरों का साया हमेशा ही उसके आसपास मँडराता रहता। एक फोन तक करने की हिम्मत नहीं होती उसकी अकेले में। घर की बैठक ही एनजीओ का ऑफिस और वहाँ से भी उनकी सतर्क निगाहें उसका पीछा करती रहतीं। चेहरा दूसरी तरफ होने पर भी उसकी हर हरकत पर नजर रहती उनकी, जैसे पीठ में भी आँखे उगी थी। कभी उन्हें व्यस्त देख वह माँ को फोन लगाना चाहती भी, तो न जाने कहाँ से अलादीन के जिन्न- सी प्रकट हो जातीं।
रोज ही दुखियारियों का रेला आता रहता, और तृप्ति देखती दुखियारियों के दुखों से कितनी द्रवित हो उठतीं हैं माँजी। उनकी आँखे छलक-छलक उठतीं। अपनी पहुँच, रसूख, सामाजिक सरोकारों, लेनी पड़े तो पुलिस सहायता से भी समस्याओं के निराकरण में जुटी रहतीं।
तृप्ति आश्चर्य से उनका यह रूप देखती। क्या पुत्र मोह इतना प्रबल था कि उन्हें उसकी तकलीफ का रंचमात्र भी आभास नहीं था। बल्कि तकलीफें किस तरह बढ़ सकती हैं उसकी , इसी उधेड़बुन में रहतीं जैसे। उन्होंने अपने चारों तरफ एक मायाजाल बुन लिया था अपने अहम, प्रतिष्ठा, नकली इज्ज़त का। और शायद हर क्षण उन्हें भय था उस मायाजाल के टूटने का और उस मायाजाल में फसी मछली बनी तृप्ति के निकल जाने का।
कभी-कभी तो उसका दिल चाहता, वह सासू माँ के सामने एक फरियादी बनकर ही पहुँच जाए और उनकी शिकायत उन्हीं के दरबार में कर दे। तो ही शायद उनकी मृत आत्मा में कुछ जान आ जाए।
उस घर का एक-एक शख्स कितना रहस्यमयी है …क्या बता पाएगी वह कभी किसी को? बता पाएगी वह? कि जिस चित्रांश को वह विदेश दौरों में बिजी बता रही है वह कहाँ गायब हो जाता है इतने-इतने दिनों के लिए ? बता पाएगी…चित्रांश ने मन तो क्या …उसके तन को भी इन तीन सालों में तीन बार भी स्पर्श नही किया…?
अँधेरी-काली-सर्द रातों में चित्रांश के खर्राटे गूँजते थे केवल कमरे में। और वह उन सर्द रातों में भी बिना लिहाफ न जाने किस ताप से जलती अपने आप पर शर्मिंदा होती रहती। अपने में ही सिकुड़ी -सिमटी शुरू में तो वह अपनी साँसों से ही डर जाती थी कि कहीं उसकी साँसों की आवाज या हिलने-डुलने से चित्रांश की नींद न टूट जाए। और उसकी …, जिसे वह खुद भी नहीं जानती ऐसी लालसा की खबर चित्रांश को हो जाए, वह कछुए जैसी अपने खोल में सिमट जाना चाहती ।मगर समय के साथ उसका सिमटा-सिकुड़ापन कसमसाहट में बदलने लगा। कभी हाथ, कभी पैर नींद में चित्रांश के ऊपर जाने लगे। उसे पता भी नहीं चलता कब उसकी भारी-गर्म साँसें चित्रांश के चेहरे से टकराने लगती। और…चित्रांश ठंडे पत्थर जैसा पड़ा रहता या तेज झटके से उसे हटाकर करवट बदल लेता। तृप्ति पानी-पानी हो बहती नदी बन जाती , शर्म से अपने वजूद को पिघला देना चाहती। अपना-आप पहाड़ जैसा दीर्घकाय लगता जिसे वह चिंदी जैसा कर सबकी नजरों से छुपा देना चाहती। दिन की रौशनी तृप्ति के लिए कहर बन जाती। दिन में चित्रांश की वह दृष्टि, होठों के किनारे की तिरछी भंगिमा उससे झेली नहीं जाती। जबान से कुछ न कहकर भी चित्रांश उसे शर्मिंदा करने का मौका ढूँढता। बड़ी स्टूपिड चीजों को ले वह उसका मजाक बनाता।
“मुम्बई के घर में ए सी था क्या ?, तुम्हें ए सी से परेशानी तो नहीं होती मतलब ठंड-वंड तो नहीं लगती, दरअसल मैं तो बिना ए सी के सो ही नहीं पाता। लोग केवल फैन से कैसे काम चला लेते हैं, पता नहीं..।”
चॉकलेट पसंद न होने की बात पर चित्रांश आश्चर्य से कह उठता,- “अरे,तुम्हें चॉकलेट नहीं पसंद …गजब हो यार तुम! असल में ऐसी चीजों की आदत बचपन में ही लगती है ।” अक्सर__ वह उसके मायके की गरीबी पर चोट करता।
“तृप्ति, तुम्हारा ड्रेस सेंस कमाल है भई ! कैसी मुम्बई की लड़की हो तुम, पटियाला के साथ इतना लम्बा कुर्ता कौन पहनता है ?”
नी लेंथ से थोड़े ऊपर कुर्ते को भी वह लम्बा कहता। कभी उसका हेअर स्टाइल पिछडा लगता तो कभी चेहरा भारी। कभी उसके हाथ का खाना बेमजा -बेस्वाद तो कभी स्वाद बनाने के चक्कर में डाले गए मिर्च-मसालों पर लम्बी हैल्थकेअर स्पीच। कुंठित हो-होकर तृप्ति गलती पर गलती करती और वह उसकी उन गलतियों को उसके अक्षम्य अपराधों की लिस्ट में डालता जाता।
तृप्ति के कलेजे में धीरे-धीरे वह दर्द के बीज बो खेती करता रहा, दर्द की फसल उसके कलेजे को चीर लहलहाने लगी। उस लहलहाती फसल को अपनी खोखली हँसी की दँराती से जब भी तृप्ति काटने की कोशिश करती , तो माँजी और चित्रांश मिलकर उसकी हँसी की दराँती को भोथरा कर डालते।
उसकी एक-एक हरकत पर बंदिश लगती गई। कभी मन को थोड़ा सुकून देने के लिए म्यूजिक सिस्टम चला दिया तो माँजी को एकदम सरदर्द पकड़ लेता। वह तुरन्त सॉरी बोल गाना बंद कर देती। शादी से पहले शालू और उसकी रिमोट को लेकर कितनी लड़ाईयां हुईं हैं लेकिन वहाँ वह रिमोट हाथ में लेना भूल ही गई।
शुरु-शुरु में वह टीवी चला लेती थी मगर प्रोग्रेम के बीच में ही हमेशा माँजी आकर कुछ ऐसा काम बताती कि उसे उठना ही होता और उसके वहाँ से हटते ही टीवी बंद कर वह अपनी फाइल्स फैला लेतीं।
धीरे-धीरे वह भूल ही गई टीवी और संगीत के अपने शौक को। उसके पढ़ने के शौक को भी बड़े शातिराना तरीके से माँजी ने ठिकाने लगाने की कोशिश की थी। दोपहर में जो थोड़ा आराम का समय चुराकर ससुर जी के ऑफिस की पत्रिकाएं पढ़ती तो उसके उठने के पश्चात पत्रिका गायब मिलती। बहुत खोजने पर भी न मिलती और फिर अचानक किसी दिन सफाई करते हुए स्टोर में सन्दूकों के पीछे मुडी-तुडी अवस्था में पड़ी मिलती।
लेकिन ये सब तो सतही चीजें थीं। इनसे शायद वह विचलित भी न होती। चित्रांश की बेरुखी को भी वह पचाए बैठी थी और धीरे-धीरे आदत बना रही थी। इसी से मायके आने से डरती थी कि कहीं जो अपने चारों ओर एक मिट्टी की परत चढाई है वह मायके के नेह की पहली बारिश में ही बह न जाए।
चित्रांश की हरकतों का सबब तो उसे बहुत बाद में समझ आया … कुंठाओं से भरा चित्रांश अपनी कमजोरी, हीनता छिपाने के लिए ही उसे अपमान का गरल पिला -पिला, उसके स्व को कुचल उसे ग्रंथियों की पोटली बनाए डाल रहा था। तृप्ति अपनी अनकरी गलतियों का ठीकरा सर पर ढोए जाती और बेशर्मों की तरह साँस लेने की गलती किए जाती।
वह भयानक रात उसके मस्तिष्क से निकलती नही हजार कोशिशों के बाद भी ।चित्रांश का घृणित सच इस तरह उसके सामने आना था? काश… उस दिन वो पानी रखना ना भूलती…, काश, प्यास से बेबस हो रसोई घर ना गई होती … काश, उसने वो वीभत्सता ना देखी होती। कितने काश….।
प्यास से बेबस हो वह बिना रोशनी किए ही ड्राइंगरूम में रखे चाइनीज फ्लावरपॉट से आती हल्की रोशनी की किरणों में ही रसोई में चली गई थी। हल्की-सी रोशनी रसोई तक भी पहुँच रही थी। फिर इतनी देर में आँखें अंधेरे की अभ्यस्त भी हो गई थीं। फ्रिज का दरवाजा खोलने ही लगी थी कि कुछ अजीब सी सरगोशियां कानों में पड़ी , गहरी लम्बी साँसें।
तृप्ति के अंदर भय की लहर दौड़ गई। सास-ससुर का कमरा ऊपर के पोर्शन में था वहाँ से रसोई तक आवाजें आना मुमकिन नही था। आवाजें थोड़ी तेज होने लगीं , बड़ी अजीब, कुछ भद्दी-सी आवाजें ।
इससे तो उसने चित्रांश को ही उठा लिया होता। लेकिन चित्रांश का तो डर ही उसे खाए जाता है। उसके डर की वजह से ही वह बिना आहट किए निकल आई थी। बिजली तक नहीं जलाई थी। वरना जरा-सी नींद टूटने पर चित्रांश यह उपालंभ दिए बिना न रहता कि अब भूतों की जिम्मेदारी भी तुमने ही सँभाल ली है।
हिम्मत करके फ्रिज दोबारा खोलने ही लगी थी कि एक तेज आह और अजीब हलचल जैसे दो बिल्लियाँ बिना आवाज लड़ रही हों। घबराहट में झन्न से गिलास हाथ से जमीन पर गिरा और कँपकँपाता हाथ स्विच बोर्ड पर जा पड़ा।
तीव्र प्रकाश से रसोई नहा उठी। रसोई से लगे स्टोर तक उजाला फैल गया। छिपकलियों जैसे चिपके दो मानव शरीरों को देख उसके मुख से तेज चीख निकल गई और हथेलियों में चेहरा छिपाते-छिपाते भी उसने क्षण के हजारवें हिस्से में स्टोर से भागती उस नग्न पुरुष काया को बारामदे के अंधकार में विलीन होते देखा। उस क्षणांश में भी उसने पहचान लिया था। सोलह-सत्रह वर्ष का रसोइया रघु, जो कुछ दिन पहले ही काम पर रखा गया था। रघु के भागने के साथ ही एक चादर में लिपटा बबंडर, जैसे गर्मी की टीक दुपहरी में गाँवों के खेतों में धूल का गोला सा गोल-गोल चक्कर लगाते हुए दिखता है, उसे याद है बचपन में गर्मी की छुट्टियों में गाँव जाने पर दोपहरी भर चचेरे भाई के साथ खेतों में घूमना। धूल के ऐसे बबंडर को देख चचेरा भाई भूत-भूत चिल्लाने लगता, वह भी डरकर चिल्लाने लगती थी। आज भी उसके मुख से चीख निकलने को हो गई जब उसके करीब से निकला, चादर में लिपटा वह बबंडर ड्राइंगरूम के दूसरी तरफ गायब हो गया। वह कितनी देर खड़ी वहाँ काँपती रही, याद नहीं।
तृप्ति अपने को लाख भुलावा दे मगर चित्रांश को पहचानने में वह भूल कर सकती थी भला ? भले ही चित्रांश ने अपने को उससे हमेशा विलग रखा मगर तृप्ति तो बंद आँखों से भी चित्रांश को उसकी गंध से ही पहचान लेती।
तो सच यह है तृप्ति रानी ….तुम…तुम इस मरिचिका के पीछे भाग रही थीं ? वह असहाय क्रोध से बिलबिला कर रह गई थी । पैरों ने जबाब दे दिया तो काँपते-काँपते फ्रिज से लगी दीवार के सहारे गिरती चली गई। क्रोध में आँसू भी सूख जाते हैं, चीखने की क्षमता भी खो चुकी थी जैसे। वह कुछ उठाकर फेंक देना चाहती थी। तोड़फोड़ कर, शोर मचा, चीख-चीखकर अपना सर फोड़ लेना चाह रही थी। मगर मस्तिष्क में चलती आँधी के अलावा उसका बाहर सब शांत, एकदम मुर्दा जड़वत-ठंडा।
कैसे वह कमरे में पहुँची , बेड के दूसरी तरफ चित्रांश था या नहीं, उसे कुछ याद नहीं। रात भर वह फटी आँखों से छत ताकती रही , दिमाग में खालीपन के अलावा कुछ नहीं था जैसे।
उसके बाद भी न जाने कितने दिनों तक जड़वत बनी, बस चलती-फिरती मशीन बनी काम करती और बिस्तर पर निढाल जा पड़ती।
चित्रांश भी जैसे डर गया था उसके इस रूप से। अब वह न मजाक बनाता, न नुक्स निकालता , न कुछ कहता ही अपनी सफाई में। सास को कुछ पता था या नहीं, लेकिन उनका व्यवहार बदला- बदला लगता।
“अरे तृप्ति , खाना खाया तुमने। पहले खाना खालो , फिर काम करती रहना।”
“देखो तो तृप्ति, टीवी पर तुम्हारा पसंदीदा प्रोग्रेम आ रहा है, आजाओ, खाना बन जाएगा, अभी किसी को भूख भी नहीं है।”
“ये पत्रिका पढ़ी, बड़ी अच्छी कहानियां हैं इसबार …भई मुझे तो कहानियां ही पसंद हैं मैगजीन में, तुम तो लेख वगैरह भी पसंद करती हो।”
आश्चर्य होता …ये वहीं माँजी हैं …इतना नकली कोई कैसे हो सकता है ..? रीढ़ बिना खड़ी कैसे रह पाती हैं?
इस बनावटी व्यवहार पर उसका चीखने का मन होता- ‘क्यूँ… आखिर क्यूँ किया मेरे साथ ऐसा आप लोगों ने? दूसरे की जिन्दगी का मर्सिया पढ़ने की इजाजत किसने दी आप लोगों को? क्या लगती हूँ मैं आपकी …जो आप लोगों ने अपनी सारी गजालत मेरे सर थोप दी ….? क्यूँ एक औरत को ही चुना जाता है हमेशा समस्याओं के समाधान के लिए? भले ही वह अपनी माँ, बहन, बेटी, बुआ हो या दूसरे घर से ब्याह कर लाई गई बहू , भाभी, बीबी। औरत के सर थोप दिया जाता है कि लो जी अब, तुम महानता की मूरत! सँभालो हमारे राजकुमारों का गंद-फंद। तुम सहो-झेलो -सुलटाओ और …और अगर कहीं तुम हार गईं इस महान बनने की लड़ाई में …तो दोष भी तुम्हारा ही है।’
“अरे …कुछ न कुछ तो कमी है, वरना औरत तो वो शै है जो नर्क को स्वर्ग बना दे। आदमी को सही राह लाने में औरत जो कर सकती है, वो माँ-बाप थोडे ही कर पाएँगे।”
पापा जी से खुसुरफुसुर करती माँजी के ये बोल कानों में पडे़ तो उसकी समझ में आ गया कि ‘औरत ही औरत की दुश्मन हुआ करती है,’ यह घिसीपिटी कहावत ही सही, पर है सच…।
औरतें भी न जाने कितनी गाँठें पाले चलती हैं अपने मन के अंदर की अँधेरी कोठरियों में … शायद खुद भी कभी उधर झाँककर नहीं देखतीं… अपने जख्मों को देखती रहें तो अगले की तकलीफ़ भी समझ पाएँ शायद। पत्थर ही हो जाती है जैसे दर्द सहते-सहते, और अपने को महान समझने का जैसे रोग ही हो जाता है। एक जबरदस्त ईर्ष्या से भरकर वो दूसरे से अपने हालातों की तुलना अनजाने ही करने लगती हैं और दूसरे का जरा -सा सुख असह्य हो उठता है उन्हें। साम-दाम-दंड-भेद से जुटी रहती हैं दूसरी औरत की चूलें हिलाने में। वरना माँजी कभी तो एक पल को उसके बारे में ख्याल करतीं।
रात-दिन तृप्ति ऐसे ही उलजुलूल सवालों से घिरी रहती और अंदर ही अंदर माँजी और चित्रांश से सवालों-जबाबों का दौर चलता रहता। मगर जबान पर तो ताले जड़ गए थे जैसे उसके। उसकी लगातार चुप्पी से चित्रांश और माँजी जैसे धीरे-धीरे अपने डर के खोल से बाहर निकलने लगे। उसकी चुप्पी को उसकी कायरता समझ वो फिर शेर होने लगे।
तृप्ति अंदर से बेड़िया काटने में तो लगी थी, लेकिन जंजीरें मजबूत भी तो बहुत थीं। कहाँ से लाए इतनी हिम्मत? अपना कोई भी कदम उठाने से पहले उसे मंजिल तो दूर-दूर तक नजर नहीं आती… नजर आता है तो पापा का शर्मिंदगी से झुका चेहरा … माँ के बहते आँसू।
भाभी की व्यंग भरी नजरें! तृप्ति की शादी के वक्त कितनी जलन से भर गई थीं। अब तो उन्हें मौका ही मिल जाएगा कहने का कि और उड़ो … बडा ऊँचा हाथ मारने चली थीं।
सबसे ऊपर मासूम शालू … जिसके जीवन की शुरुआत भी अभी नहीं हुई है। उसके किसी भी कदम से क्या शालू की जिन्दगी अनछुई रह पाएगी…?
जब भी वह कदम बढ़ाने की सोचती, ये सारे चेहरे उसकी नजरों के समक्ष नाचने लगते और वह वहीं अपने को जज्ब कर लेती। धीरे-धीरे अपने को सामान्य करने की कोशिश करती रहती। लेकिन इधर कुछ दिनों से चित्रांश की हरकतें उसकी कोशिशों पर पानी फेरने लगीं थीं।
कभी उसे अपने पलंग पर किसी पत्रिका का पेज खोलकर मुड़ा कोई ‘आर्टिकल’ नजर आता, जिसमें ‘होमोसेक्सुअलिटी’ की पुरजोर तरीके से हिमायत की गई हो। उनके रिश्तों को वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक तरीकों से ‘जस्टिफाई’ किया गया हो। कभी रूम में उसके घुसने से पहले कोई इसी तरह की मूवी चला देता जो सम्बंधों की उलट-पुलट को, उसकी समलैंगिकता को सही ठहराती हो। वह बुरी तरह झुंझला जाती चित्रांश के डबल स्टैंडर्ड , कायरता और अपने को सही साबित करने की जबरदस्ती देखकर।
वह सीधे-सीधे उससे कह देना चाहती कि “चित्रांश ,यह तुम्हारी कायरता और रिश्तों को खेल समझने की तुम्हारी नीच बुद्धि के अलावा और कुछ नहीं। तुमने केवल अपने रसूख, अपनी और अपने माँ-बाप की झूठी प्रतिष्ठा, इज्ज़त के लिए मेरी जिन्दगी को तमाशा बना दिया। अगर इतने ही हिमायती हो इन सम्बंधों के तो …. जमाने के सामने खुलकर क्यूँ नहीं आए। दुनिया को दिखाने के लिए एक शोपीस, बीवी नाम का तुमने लाकर घर में सजा दिया और अब उस शोपीस के टूटने का डर तुम्हें खाए जा रहा है। तुम किसी भी तरह बस उस शोपीस को बचाने में लगे हो, वरना तुम्हारे इस सो कॉल्ड प्रतिष्ठित परिवार की कितनी जगहँसाई होगी ।” लेकिन वह कुछ नहीं कह पाती, उसे घिन आती चित्रांश से बात करने में भी।
कभी तृप्ति को लगता, वह खुद भी तो कायर है, कभी कह पाएगी यह सब वह किसी से? उसे भी तो बार-बार पापा की इज्ज़त, माँ के आँसू , शालू का जीवन रोक लेते हैं। क्यों नहीं वह इन झूठें बंधनों को तोड़कर इस जाल से निकल जाती। क्या है यहाँ उसके लिए…? केवल नाम के रिश्ते…?
इधर कुछ अजीब से बदलाव देख रही थी वो, रात में अचानक चौंक जाती अजीब से स्पर्शों से। आँख खुलती तो पता चलता कभी चित्रांश का हाथ उसके ऊपर है या पैर उसके पैर पर रखा होता। वह चिंहुक कर करवट बदल लेती। कभी चित्रांश की साँसें उसके चेहरे से टकराने लगतीं। सिनेरियो वही था, मगर जैसे पात्र बदल गए थे। वह गुस्से से बिलबिला कर चेहरा घुमा लेती। उस पलंग, उस कमरे, उस घर से दूर…कहीं दूर, बहुत दूर भाग जाना चाहती लेकिन उसका गुस्सा भी …नपुंसक -सा , बस करवट बदल पाता।
अचानक एक रात तृप्ति ने अपनी सांस घुटती महसूस की। सांस घुटने से नींद टूटी और घबरा कर अँधेरे में देखने की कोशिश की, लेकिन वह चेहरा इधर से उधर हिला भी नहीं पा रही थी…। जाने कितने अजगरों ने जैसे उसे अपने लपेटे में लिया हुआ था, उसके होठ एक अजीब लिसलिसी गिरफ्त में थे।
वह अपनी पूरी ताकत लगाकर भी अपने को मुक्त नहीं कर पा रही थी। जकड़न बढ़ती जा रही थी। तृप्ति ने तड़प कर अपनी सारी शक्ति अपने बाजूओं में इकट्ठा कर दोनों बाजू छाती पर समेट लिए और घुटना मोड़ घुटने को सामने वाले की टांगों के बीच कसकर मारा। और जोर से अपने ऊपर पड़ी आफत को परे धकेल दिया। वह हाँफती हुई उठ खड़ी हुई। आफत बना चित्रांश दर्द से बिलबिला पलंग से नीचे लुढ़क गया।
“ये क्या हरकत है, तृप्ति?” चित्रांश की रोष भरी आवाज अँधेरे में गूँजी।
तृप्ति खड़ी काँपती रही, उसे जोरों की रुलाई आ रही थी …लेकिन आज उसे रोना नहीं था। आज उसे फैसला लेना ही होगा।
“अरे, हमारा पति-पत्नी का सम्बंध है। इतना हक तो मेरा बनता है।” चित्रांश की जहर भरी हंसी कमरे में गूँज गई।
काँपते हाथों से तृप्ति ने लाइट जला दी और जलती आँखों से चित्रांश को देखा । उसकी आँखों की भयावहता देख एक क्षण को चित्रांश भी काँप गया।
“तुम कमरे से बाहर जाओगे या मैं जाँऊ?” तृप्ति के होठों से जलते अँगारे गिरे जैसे।
“लेकिन क्यूँ… कमरे से बाहर जाने का क्या मतलब है। तुम बात क्यों नहीं कर रही हो। किस बात पर खफा हो?”
उफ्फ ….इस आदमी की चोरी और सीनाजोरी…. कपटता की पराकाष्ठा…। सारी बातों को ही भुलावे में डालकर उसे महामूर्ख समझ रहा है। वह गुस्से से खड़ी काँपती रही। घृणा का ज्वार उसके हलक तक भर गया था। उसकी अर्थहीन बातों का जबाब देने से ही जैसे उसे उल्टी हो जाएगी। वह तकिया उठाकर कमरे से बाहर जाने लगी। चित्रांश ने कूदकर उसका रास्ता रोक लिया।
“तृप्ति, आखिर इतनी नाराज क्यों हो?”
तृप्ति की जलती निगाहें चित्रांश के चेहरे पर जम गईं। लेकिन इस बार चित्रांश ने उसकी निगाहों का ताप सह लिया।
“अरे भई, कुछ पता तो चले … क्या प्रोब्लम है तुम्हारी? मेरा साथ मजा नहीं देता तुम्हें?”
लिजलिजेपन के अहसास से तृप्ति का शरीर काँप उठा। घुटनों पर तकिया रख वह जमीन में गढ़ती चली गई, मुँह तकिए में धंसा लिया और कान हथेलियों से दबा लिए।
लेकिन चित्रांश पर कोई पागलपन सवार था जैसे। वह वहीं जमीन पर बैठ गया। वो तृप्ति जो उसके सामने गाय बनी रहती थी, आज उसकी खामोश उपेक्षा ने उसके अंदर के अहं का फन उठवा दिया था और फन डसने को तैयार था।
तृप्ति के घुटने पर हाथ रख चित्रांश उसके ऊपर झुक आया।
“आखिर क्या चाहती हो तुम? तुम्हारे आगे-पीछे घूमूं … तुम्हारे तलवे चाटूँ,… तुम्हारे शरीर की पूजा करूँ जिसमें मेरी कोई रुचि नहीं। हाँ, नहीं है रुचि मुझे तुम्हारे शरीर में … नहीं मजा आता तुम्हारे संसर्ग में। अपने को जबरदस्ती ठेलकर कभी तुम्हारे नजदीक आया भी तो उकताहट ही बढी।”
“तो शादी क्यूँ की …? ” तकिए में मुँह गड़ाये हुए ही तृप्ति की घुटी-घुटी-सी आवाज निकली।
“हमारा समाज ऐसा है क्या? माँ-पापा का सम्मान, परिवार की इज्ज़त, मान-मर्यादा कुछ मायने रखती है कि नहीं… मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी बाबा।”
तृप्ति रेत पर पड़ी मछली-सी तड़प उठी, -“और… हिम्मत तुमने केवल एक अनजान लड़की पर दिखाई… न जिसे तुम जानते थे , न वो तुम्हारी कुछ थी, न कभी मिले थे उससे….क्या तुम्हें एक पल को भी डर नहीं लगा, चित्रांश!… अपने ज़मीर से?”
चित्रांश एक पल को सहम गया जैसे। उसका सिर नीचे झुक गया, कुछ रुककर अफसोस मनाते जैसा बोला, -“मैं अपनी गलती मानता हूँ , तृप्ति! शादी का विरोध नहीं कर पाया …। माँ-पापा के सामने अपनी सच्चाई नहीं बता पाया।”
“झूठ बोलते हो तुम, चित्रांश ! माँजी ,पापाजी सब को मालूम था।” तृप्ति क्रोध में चीखते हुए बोले जा रही थी। आज भय की पराकाष्ठा पर पहुंच उसका भय चकनाचूर हो गया था जैसे,
“तुम लोगों ने जानबूझकर, सोची-समझी साजिश से मुझे बलि का बकरा बनाया है। तुम्हारा और माँजी का मेरे साथ आजतक जो भी व्यवहार रहा उसमें अपने किए का कहीं रंचमात्र भी गिल्ट था? …बल्कि तुम लोगों ने मुझे गिल्ट्स का टोकरा बना दिया।” तृप्ति हाँपे जा रही थी, “और चलो …हो भी गई थी तुमसे गलती … समाज में हम सब डरकर ही रहते हैं, नहीं ले पाते बोल्ड डिसीजन …. .लेकिन एक बार….एक बार तो कहा होता, पति न सही दोस्त ही बनकर देख लेते… निराश न होते। लेकिन तुम …तुम तो अपने अपराधों को छिपाने के लिए मेरे अनकिए अपराधों का बोझ मेरे सर डालते रहे… मेरे आत्मसम्मान और आत्मविश्वास को चूर-चूर करते रहे। क्यूँ … आखिर क्यूँ , चित्रांश?”
“मानता हूँ , तृप्ति! गलती हुई है … अब तुम्ही कहो… क्या करूँ?” चित्रांश उसके और समीप खिसक आया और आवाज को काफी धीमा कर लिया, -“…इस समस्या का एक ही हल नजर आता है तृप्ति! अब…जैसा चल रहा है, वैसा चलने दो प्लीज्। तुम्हारा साथ देने के लिए मेरा एक दोस्त तैयार है।…किसी को पता भी नहीं चलेगा। मेरा नाम हमेशा तुम्हारे साथ जुड़ा रहेगा। पत्नी तुम मेरी ही कहलाओगी। बच्चों को भी मेरा ही नाम मिलेगा। घर-परिवार की इज्ज़त भी बची रहेगी और हम दोनों नॉर्मली जी पाएंगे। अरे पुराने राजा-महाराजाओं के जमाने में तो यह सब खूब होता था।”
तृप्ति का चेहरा धधकती भट्टी सा दहकने लगा। चेहरे के ताप को सहना उसके लिए असह्य हो उठा। सम्पूर्ण शरीर में काँटे उग आए जैसे। वह तड़प कर उठ खड़ी हुई। चित्रांश भी घबरा कर खड़ा हो गया। कुछ पल लाल-लाल आँखों से उसे तकती रह गई। अचानक चेहरा भयानक हो उठा । अंदर की सारी घृणा गले तक आ गई और न जाने कब चित्रांश के चेहरे पर फैल गई। चित्रांश की आँखे थूक से मुंद-सी गईं ।
जब तक वह उसके पीछे अरे-अरे करता भागा, वह बिजली की गति से बाहर निकल गई। आज वह नहीं रुक सकती। जानती है चारों तरफ फैले सास के साम्राज्य के बारे में।
अगर अभी नहीं तो शायद कभी नहीं। अपनी आज तक की मूर्खताओं पर रह- रहकर वह क्रोध से कांप उठ रही थी। क्यूँ इस गलीजता को इतने दिन झेलती रही, अपने आत्मसम्मान को ताक पर रखकर।
उस कहर ढाती रात को तृप्ति ने इतिहास लिखने की ठान ही ली थी शायद और उसके भगवान भी उसपर मेहरबान हो ही गए थे वरना कैसे मुमकिन था कि इतनी डरपोक-सी तृप्ति दुर्गा-रूप में , ऑटोचालक से पूर्ण आत्मविश्वास से स्टेशन चलने के लिए कह पाई और किराए की जगह अपनी हाथ की चूड़ी दे कुछ रुपए भी माँग लिए ।वह ऑटोचालक ही अच्छा आदमी था या उसके जबरदस्त आत्मविश्वास से घबराकर उसके कहे अनुसार करता गया?
लेकिन आज मायके के इस छोटे से बाथरूम की सीलन भरी दीवारों से उतरती चूने की परतों संग उसके जख्मों के खुरंट भी उतरते चले गए जैसे। और खुरंटों के नीचे से फिर से ताजा हुए घाव की पीड़ा से बिलबिला वह फफकती रही , जोर -जोर से फफकती रही। आज सारे पुराने सूख चुके घावों को नाखूनों की मार से जैसे ताजा कर लिया तृप्ति ने।
“तृप्ति… तृप्ति… तृप्ति बेटा, क्या हुआ? दरवाजा खोल … बच्चा! दरवाजा खोल ।” वॉशरूम के दरवाजे के बाहर माँ लगातार चीख रहीं थीं, दरवाजा पीट रही थीं और पापा पर चिल्लाए जा रहीं थीं- “मैं न कहती थी, कुछ बात है। मेरी फूल-सी बच्ची कैसी कुम्हला गई …. आपने कभी जाने की जरुरत नहीं समझी वहाँ…। आप उनकी अमीरी के झाँसे में आ ग …। .बेटा! बाहर आ … आजा बाहर मेरे बच्चे! .बतादे सब, हम तो तेरे साथ हैं, बेटा! तू क्यूँ चिंता करती है।”
पापा अवाक, स्तब्ध थे… रह-रहकर अपनी मूर्खता पर गुस्सा रहे थे। माँ पापा पर आरोप लगाए जा रही थीं कि उन्होंने ज्यादा छानबीन नहीं की और मेट्रोमोनियल पर भरोसा करके बेटी की जिन्दगी खराब कर दी। उनको एकबार जाकर पता तो करना चाहिए था। शालू ने तो एलान ही कर दिया कि वह तो कभी शादी ही नहीं करेगी।
तृप्ति रोते-फफकते, टुकड़ों में अपनी पीड़ा जैसे सबको बाँटती जा रही थी … और सब उसके साथ दर्द की ताबीर अपने कलेजों पर लिखते जा रहे थे। दर्द सबके साथ साझा कर थोड़ी हल्की हो उठी तृप्ति की नजर अब घर वालों से मिली तो वह काँप उठी, सब कैसे सुन्न हो गए … इसी का तो डर था उसे।
उफ …!ये क्या कर दिया उसने, अब ये माँ क्या फिर उस उत्साह से रसोई में गुनगुनाते हुए कभी घूम पाएंगी? पापा शालू से मजाकों में भावी सास पर जोक मार पाएंगे? भाभी की तरफ नजर गई तो घबरा ही गई वह। वे तो पत्थर-सी बनी खड़ी थीं।
तृप्ति घबराकर बोल उठी,- “आप लोग घबराइए नहीं, मैं किसी को पता नहीं चलने दूँगी…। वहाँ तो खैर किसी हालत में नहीं जाऊँगी , मगर यहाँ भी नहीं रहूँगी। किसी दूसरे शहर जाकर नौकरी कर लूँगी ।”
“ऐसा क्यों कह रही है, बेटा ! तू चिंता मत कर, हम तेरे साथ हैं। नौकरी भी करना, सब-कुछ करना, जो तू चाहती है। ….बहुत सह ली तूने दर्द की मार बस अब और नहीं …तूने इतने दिन छिपाया, यही कसूर है बस तेरा, बाकी तो सारी गलती मेरी ही है। तेरी माँ सच ही कह रही है, मैं उनकी अमीरी का रौब खा गया…, अपने कमजोर हालातों से हमेशा परेशान ही रहा, जो चाहता था वो सहूलियतें कभी अपने बच्चों को नहीं दे पाया…, अचानक तेरी शादी इतने अमीर घराने में तय हुई तो मैं बौरा ही गया जैसे , वरना तेरी माँ ने तो बहुत चेताया था मुझे … मैं ही कुछ सुनने को तैयार नहीं होता था।”
घर भर उसके साथ खड़ा था, लेकिन किसी की समझ नहीं आ रहा था जैसे कि अब आगे क्या? माँ-पापा बिलकुल टूट चुके थे। समय के साथ उन्हें लगने लगा था कि तृप्ति की ससुराल वालों के साथ लड़कर वह जगहँसाई के अलावा कुछ नहीं पा सकेंगे शायद।
एक लम्बी कानूनी लड़ाई के लिए उनके संसाधन कितने कमजोर हैं, यह स्पष्ट नज़र आ रहा था। ऊपर से समाज का भय, शालू की शादी। मगर शालू और भैय्या का मत था कि उन लोगों को ऐसे ही नहीं छोड़ना है।
लेकिन मत से क्या होना था। अभी भैय्या की नौकरी तक पक्की न थी। भाभी बिलकुल चुप थीं। तृप्ति उनकी चुप्पी से और घबरा रही थी। उसे अपना आना घर वालों को बोझ तले दबाना लग रहा था।
मोहल्ले की औरतों से झूठ बोलती माँ को देखती तो वह ग्लानि से भर उठती। तृप्ति अपने खोल में फिर से सिमटने लगी थी। वह जल्द से जल्द वहाँ से हट जाना चाह रही थी। अखबारों के नौकरियों के इश्तहारी कॉलम में लाल निशानों की केवल संख्या बढ़ रही थी। मगर केवल बीए की डिग्री से आज के टेक्निकल युग में नौकरी थीं कहाँ? कोई हुनर भी ऐसा नजर नहीं आ रहा था उसे, जिसे जीने का जरिया बना सके। चारों तरफ अंधकार ही अंधकार था। पापा आगे पढा़ने को तैयार थे लेकिन क्या करे वह….?
किसी भी कोर्स की फीस इतनी ज्यादा होती कि वह मना कर देती कोई न कोई बहाना बनाकर। और जरूरतें कम थीं क्या जो वह इतनी बड़ी जरूरत बनकर खड़ी हो गई यहाँ। कोई छोटा-मोटा काम भी नहीं शुरु कर सकती वह…वही- लोग क्या कहेंगे?
सारे समाज में यह बात फैल जाएगी, माँ-पापा की कितनी बदनामी होगी। फिर कुछ भी शुरु करने के लिए कुछ तो जमापूंजी होनी चाहिए।
किस तरह जीओगी तृप्ति! यहाँ?
हटना तो तुम्हें यहाँ से भी पडेगा…यह रिकॉर्ड लगातार तृप्ति के मस्तिष्क में बजता रहता। एक माह होने को आया उसे यहाँ और वह कोई हल नहीं निकाल पा रही । पापा-भैय्या परेशान, वकीलों के चक्कर लगा रहे हैं कि कोई सस्ता वकील मिल जाए मगर वकील, अदालत, मुकदमा , न्याय ये सब भी शायद अमीरों के चोंचलें हैं। गरीबों के लिए तो सब दुस्वप्न ही बन जाते हैं।
कड़वा सच तो यही था कि माँ-पापा मन में कहीं,… नहीं चाहते थे कि बात बढ़े या फैले। तृप्ति का दुख, अपमान उसका नरक उन्हें याद तो था लेकिन शालू का जीवन सामने सवाल बना खड़ा था।
“बेटा, एक बार चित्रांश से भी बात करें क्या? शायद अकल आ गई हो अब।” पापा डरते-डरते तृप्ति के नजदीक बैठ गए ।
तृप्ति ने कातर हो माँ की तरफ देखा, माँ सिर झुकाए मटर छील रही थीं। उनका सिर झुका ही रहा। दो बूँद आँसू की माँ के हाथों के ऊपर चमकती नजर आईं और हाथों से ढुलकती हुई मटर में जा मिली। माँ की झुकी नजर और आँख से टपके आँसू के साथ ही जैसे …उसकी हल्की सी चमकती आस भी चमककर गुम हो गई। अब उसके सारे सपने मटर के साथ ही पक कर खा लिए जाने वाले थे, इस निहायत ही कड़वे अहसास के साथ तृप्ति वास्तविकता की कठोर जमीन पर आ गिरी।
“नहीं पापा! अब कुछ करने की जरूरत नहीं। अक्ल चित्रांश को तो क्या मुझे आ गई है। अब जो करना है मुझे ही करना है।” कहते हुए तृप्ति भाभी के पास आ खड़ी हुई –”हाँ, भाभी लाइए वह अपनी बैंगलौर वाली डॉक्टर दोस्त का नम्बर …और हाँ उनको बता दीजिए मैं वहाँ आ रही हूँ और जो भी काम वो मुझे देंगी , मुझे मंज़ूर है।”
भाभी के जिस ऑफर को पूरे परिवार ने एक स्वर में नकार दिया था कि कहाँ तृप्ति अकेली बैंगलौर जैसे सिटी में रह पाएगी । किसी को जानते तक नहीं। बहू की दोस्त के पास कैसे लड़की को भेज दें। फिर खुद तृप्ति भी कहाँ अपने अंदर साहस बटोर पा रही थी इस कदम के लिए। अंजान जगह, अंजान लोग… कभी देखा नहीं, जाना नहीं।
बस भाभी के मुँह से ही जाना था उन्हें। उन्हीं से सुना कि डॉक्टर विभावरी अकेली बैंगलौर में रहती हैं। बहुत ही बुद्धिमान, सरल और मीठे स्वभाव की है उनकी यह दोस्त। बस किस्मत उसकी भी कुछ-कुछ तृप्ति जैसी है। तृप्ति धोेखा खाकर अपना सब गँवा आई और डॉक्टर विभावरी को धोखा खाने का मौका तक नहीं मिला। उनके काले आबनूसी रंग और थुलथुल शरीर को देख, उनके वैभव को धोखा देने की हिम्मत भी किसी ने न की ।
“विभा धन से ही नहीं दिल से भी अमीर है, तृप्ति! …वह कमजोर लड़कियों की ताकत बनी हुई है। अपने बूते अपना नर्सिंग होम चला रही है और एक तरह मसीहा ही बन बैठी है वह। तुम जाओगी तो समझोगी।” उसवक्त भाभी जब यह सब बता रही थीं वह उनका विश्वास नहीं कर पा रही थी जैसे, क्योंकि उसके आने के बाद भाभी की चुप्पी से वह सहमी हुई थी। मगर रात से ही शालू की बातों से तृप्ति सोच में पड़ी हुई थी। शालू ने तो भाभी के प्रति उसकी धारणा को सिरे से ही गलत कर दिया।
“ भाभी बुरी नहीं हैं, दी! बस उनका स्वभाव कम बोलने का है और भैय्या की नौकरी की वजह से भी मायूस रहती हैं। आपकी शादी भैय्या की शादी के तुरन्त बाद हो गई थी सो आप उनके साथ ज्यादा नहीं रहीं हैं। जानती हैं मेरे एडमिशन फॉर्म के लिए उन्होंने अपनी अँगूठी तक बेच दी थी।”
इस सब के बाबजूद भी तृप्ति उनके ऑफर से असमंजस में थी मगर आज माँ के दो आँसूओं ने उसके असमंजस को जैसे धोकर बहा दिया। उसके रास्ते को बिलकुल ही धोकर साफ कर दिया। और उसे …एकदम साफ …स्पष्ट नजर आने लगी अपनी राह। माँ के आँसूं संजीवनी बन बैठे जैसे, उसे न जाने कितनी ताकत दे दी निर्णय लेने की।
अब निर्णय लिया जा चुका था। तृप्ति पूरे परिवार को अवाक छोड़ , चित्रांश को छोड़ते वक्त के आत्मविश्वास से भर उठी। माँ-पापा की बदहवासी, उलझन, घबराहट उसके कदम नहीं रोक सकते थे अब। अपने कदमों से लिपटी सारी बेड़ियों को काटने के लिए उद्धत हो उठी तृप्ति। बस अब और नहीं… अब और नहीं जीएगी वह ऐसे रिश्तों के लिए… केवल नाम के रिश्तों के लिए…।
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इला सिंह
एम.ए.(इतिहास), बी.एड., एक कहानी संग्रह ‘मुझे पंख दे दो’- विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में कहानी एवं लघुकथाएं प्रकाशित।
पता: 104,Ghanshyam palace, Near Indian oil petrol pump, Munshi pulia chauraha, Sector -16,Indira Nagar, Lucknow-226016
(7839040416) [email protected]

स्त्री जीवन की उलझनों को रेखांकित करती कहानी अबला के सबला में परिवर्तन का संकेत देती है । यहै वो क्षण है जब स्त्री अपने अतीत को छोड़कर आगे बढ़ती है । अच्छी कहानी के लिए खूब बधाई
आपको ढेर सारी बधाई, इला जी।
गे मेंटैलिटी, सास-ससुर का छल, स्त्री का सहना—इन सबके बीच गनीमत है कि नायिका को इतना स्पेस मिलता है कि वह मायके लौट आती है। यह भी छोटी बात नहीं, क्योंकि वर्तमान समय में मध्यमवर्गीय परिवारों में बेटी को आज भी मायके लौट आने की सहज छूट नहीं मिलती।
और सबसे सुंदर बात यह लगी कि स्त्री सिर्फ मायके नहीं, अपनी ओर लौटती है।
इन सब बातों से ऊपर आपकी कथा कहने की शैली की तारीफ़ करूँगी। कैसी-कैसी भाषाई फिरकियाँ हैं आपकी कलम में! कथा-रस को कहीं खंडित किए बिना भाषा का यह खिलंदड़ापन आपकी लेखकीय सामर्थ्य की गवाही देता है।
खूब-खूब बधाई और बहुत सारा स्नेह। ❤️