आज कमरे में नीरवता छाई हुई थी । गिटार को दीवान पर उदास बैठा देखकर, पर्दा भी उदास-सा धीरे-धीरे उड़ा जा रहा था । दीवारों ने तो जैसे चुप्पी-सी साध ली थी।पर्दे से रहा ना गया । “कब तक ऐसे उदास रहोगे? ज़रा तो मुस्करा दो !” उसने गिटार से कहा।जीवन संगीत - ऊषा भदौरिया

“तुम्हें तो सब पता है। तीन दिन हो गए हैं, रौनक कमरे में नहीं आया ।” गिटार मायूस होकर बोला।

“हाँ, तीन दिनों से ना तो तुम्हारे तारों को किसी ने छेड़ा है और न ही तुमने कोई धुन ही निकाली। आज मुझे महसूस हुआ है कि जीवन में संगीत है तो सब कुछ है । अब देखो ना, ये उदासी भरी सुबह और शाम … किस तरह कटेगा जीवन?”पर्दा बोला।

“और संगीत के बिना मेरा तो कोई अस्तित्व ही नहीं । पर इससे ज्यादा चिंता अब मुझे रौनक की है । आखिर, वह आया क्यों नहीं ?” गिटार चिंतित स्वर में बोला। “कोई उपाय तो ढूँढना ही होगा ।” पर्दा कुछ सोचते हुए बोला।

अचानक तेज़ हवा के सहारे, पर्दा उड़ता हुआ आया और गिटार के तारों को छेड़ दिया । तार झंकृत हो उठे … ।

तभी अंदर से आवाज़ आयी।

“मम्मा, मुझे वहाँ जाना है ।“ यह रौनक की ही आवाज़ थी। गिटार ने चौंक कर पर्दे की ओर देखा।

“ बेटा,अभी तो हम हॉस्पिटल से आये हैं । आपको अभी आराम करना चाहिए। “ मम्मा ने उसे समझाया

“नहीं मम्मा, मुझे गिटार बजाना है ।” कमजोर आवाज से ने सब बयाँ कर दिया।

“ओह, तो रौनक बीमार था।” पर्दे के कहते ही गिटार की आँखें भर आयीं।

अचानक , कमरे मे माँ का हाथ थामे रौनक को आते देखकर गिटार और पर्दे के चेहरे खिल उठे । मगर अगले ही पल उदास हो गए। रौनक का चेहरा कितना पीला पड़ गया था और कमज़ोर भी !

रौनक मम्मा के साथ दीवान पर बैठ गया। कमज़ोर हाथ की उंगलियाँ गिटार की तरफ बढ़ी, पर अभी भी वह पहुँच के बाहर था। मम्मा ने गिटार को उठाकर उसके पास खिसका दिया।

बज उठे तार … और वातावरण संगीतमय हो उठा।

रौनक का स्पर्श पाकर गिटार की आंखों से खुशी के आँसू बह उठे। अब रौनक की कोमल उँगलियाँ उसे गुदगुदा रही थी और गिटार अपनी धुन में मगन पर्दे के साथ झूम रहा था।


ऊषा भदौरियाऊषा भदौरिया
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1 टिप्पणी

  1. भावना प्रधान बढ़िया मानवेत्तर लघुकथा।सुरमन्दिर में संगीत न हो तो ज़र्रा-ज़र्रा उदास हो जाता है।हार्दिक बधाई।

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