पुस्तक- चाहत की डोर(काव्य संग्रह) प्रकाशक- मेधा बुक्स नवीन शाहदरा दिल्ली।
लेखक – अमित कुमार पाण्डेय ‘अमित कृष्ण’ मूल्य- ₹300
समीक्षा- सूर्यकांत शर्मा
काव्य एक ऐसी विधा है जो मन और मस्तिष्क दोनों के करीब है।काव्य में भावों का अहम योगदान है।ये भाव ही तो हैं जो शब्द और फिर भाव प्रवणता को प्रवीणता से प्रस्तुत करते हैं।यह बात भी निर्विवादित सत्य है कि अनगढ़े भावों और कविताओं का भी एक अपना ही सौंदर्य होता है जिसमें ईमानदारी, साफगोई सत्यता के साथ कभी हमकदम तो कभी कविता रूप में झूले में दोलन करती नज़र आती है।ऐसा ही कुछ समीक्षित काव्य संग्रह में स्पष्ट रूप से सादगी से विद्यमान है।
युवा कवि अमित कृष्ण का यह अभी दूसरा काव्य संग्रह है। तिस पर भी इसे कुछ अनुभवी जन का सहयोग मिला है। पुस्तक का आवरण कला के क्षेत्र में रमी प्रतिमा जी की मैथिली कलाकृति का अक्स सरीखा है,जो पुस्तक की अपील को बढ़ता है।
काव्य संग्रह में सौ एक कविताएं और अंत में शायरी व संवाद में कुछ उम्दा उर्दू भाषा की छटा सी बिखेरी गई है। इस काव्य संग्रह को को कवि ने अपने दिवंगत पिता श्री कृष्ण दत्त पांडेय जी की स्मृति को समर्पित किया है। पहली रचना ही पिता को कुछ ऐसे याद करती है,,,
कभी डरो नहीं मृत्यु की आहट पाकर /जियो जितने दिन मृत्यु को डरा कर।
माँ दुर्गा और उनके विभिन्न रूपों को केंद्र में रख कर बहुत सी कविताएं कही गई हैं यथा मां दुर्गा भवानी, नौ देवियों की कहानी, देवी स्वर की,कंठ विराजो,अपने आंचल में छुपा दो। शीर्षक कविता – चाहत की डोर,काव्य संग्रह के मध्य में है और यह इस काव्य संग्रह की श्रेष्ठ रचनाओं में से एक है उसकी बानगी पाठकों के हेतु – अपना सिरा पकड़े रखना, कहीं देना न तुम छोड़, पता नहीं कब छूट जाए रिश्तों की नाज़ुक डोर।
आज का युवा कवि किताबों से भी प्रेम करता है और इसे एक लघु कविता – किताबें आईना होती हैं, में देखा जा सकता है। रचनाओं में लय है और शब्दों का आडंबर तो कतई नहीं है।तिस पर भी इन अनगढ़ी रचनाओं में काव्य सौष्ठव और परिपक्वता की काफी गुंजाईश है।
- सूर्यकांत शर्मा
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