Tuesday, June 30, 2026
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भारतीय पासपोर्ट और नागरिकता…

मुझे अच्छी तरह याद है कि भारतीय पासपोर्ट में लिखा रहता है कि धारक भारतीय नागरिक है। 1980 के दशक में, जब पासपोर्ट की जिल्द पक्के गत्ते की होती थी, उसके पहले ही पन्ने पर अंग्रेज़ी में एक रबर स्टैंप लगी रहती थी ” सिटिज़न ऑफ़ इंडिया” आज के पेपरबैक पासपोर्ट में भी यह अंग्रेज़ी में ही लिखा होता है। उसमें भी स्पष्ट रूप से अंकित रहता है “Nationality – INDIAN”

अपने पिछले संपादकीय में मैंने लिखा था, “ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर वैसे भी इन दिनों काफ़ी दबाव में हैं। उनकी कुर्सी के प्रबल दावेदार एंडी बर्नहैम संसद का उपचुनाव भारी बहुमत से जीत गए हैं। उन्होंने यह चुनाव लड़ने के लिए मैनचेस्टर के मेयर पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। यह चुनाव एंडी बर्नहैम ने मुख्यतः कीर स्टार्मर को प्रधानमंत्री पद के लिए चुनौती देने के उद्देश्य से लड़ा था। ऐसे समय में ऑक्सफ़र्डशायर काउंसिल का यह निर्णय कहीं वर्तमान प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए घातक सिद्ध न हो जाए।”

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने 22 जून को अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया। कायदे से मुझे इस सप्ताह का संपादकीय इसी विषय पर लिखना चाहिए था। इसका एक विशेष कारण यह भी था कि कीर स्टार्मर ने मुझे एक निजी पत्र लिखकर अपने त्यागपत्र देने के कारण बताए। मगर इस बीच भारत के विदेश मंत्रालय ने एक ऐसा बयान दे दिया कि मैं इसी विषय पर संपादकीय लिखने को बाध्य हो गया। विदेश मंत्रालय ने बयान दिया कि भारतीय पासपोर्ट नागरिकता का सबूत नहीं है।

मुझे अच्छी तरह याद है कि भारतीय पासपोर्ट में लिखा रहता है कि धारक भारतीय नागरिक है। 1980 के दशक में, जब पासपोर्ट की जिल्द पक्के गत्ते की होती थी, उसके पहले ही पन्ने पर अंग्रेज़ी में एक रबर स्टैंप लगी रहती थी- “सिटीज़न ऑफ़ इंडिया”  आज के पेपरबैक पासपोर्ट भी अंग्रेज़ी में ही होते हैं, मगर उनमें भी साफ़ लिखा रहता है-“Nationality – INDIAN”

फिर अचानक भारत के विदेश मंत्रालय को यह क्या सूझी कि उन्होंने पूरे भारतवर्ष में एक तूफ़ान-सा खड़ा कर दिया। एक सवाल के जवाब में विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा, “भारतीय पासपोर्ट का मक़सद लोगों को विदेशी बंदरगाहों और इलाक़ों में आवाजाही में मदद करना है। इसलिए इसकी तुलना उन दस्तावेज़ों से नहीं की जानी चाहिए, जिनका इस्तेमाल नागरिकता संबंधी अधिकार स्थापित करने के लिए किया जाता है।”

विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि भारतीय पासपोर्ट को नागरिकता साबित करने वाले दस्तावेज़ के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज़ है, न कि नागरिकता का प्रमाणपत्र। सैद्धांतिक रूप से पासपोर्ट को नागरिकता के प्रमाण के रूप में देखा जाता है और यही बात इसे अन्य दस्तावेज़ों से अलग बनाती है। विदेश यात्रा के दौरान पासपोर्ट आपकी राष्ट्रीयता की पुष्टि करता है, लेकिन इसे नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।”

दरअसल, विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने यह बात उस सवाल के जवाब में कही, जिसमें पूछा गया था कि क्या भारतीय पासपोर्ट का इस्तेमाल एस.आई.आर. के दौरान मतदाता सूची से बाहर किए जाने को चुनौती देने के लिए किया जा सकता है।

मगर यह बयान सार्वजनिक होते ही भारत के राजनीतिक माहौल में एक बवाल-सा आ गया। जितने मुँह, उतनी बातें। पूर्व कांग्रेस नेता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा, “अगर पासपोर्ट भी नागरिकता का प्रमाण नहीं है, तो आम नागरिक अपनी नागरिकता कैसे साबित करेंगे?” उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि सरकार के अनुसार कोई भी दस्तावेज़ नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है। 2030 तक सिर्फ़ एक दस्तावेज़ बचेगा- भाजपा का सदस्यता कार्ड!

एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “देश जिस दिशा में बढ़ रहा है, उसे देखते हुए ऐसा लगता है कि आने वाले दिनों में भाजपा का सदस्यता कार्ड नागरिकता का सबूत बन सकता है।”

कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यदि पासपोर्ट, आधार कार्ड, पैन कार्ड और वोटर आईडी भी नागरिकता का प्रमाण नहीं हैं, तो आम नागरिक आखिर किस दस्तावेज़ के आधार पर अपनी नागरिकता साबित करेगा? उन्होंने सोशल मीडिया पर सरकार की नीति पर सवाल उठाते हुए तीखी टिप्पणी भी की।

उनका ट्वीट कुछ इस भाषा में था- “मोदी सरकार का कहना है कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है। क्या हिंदुस्तान का पासपोर्ट ग़ैर-हिंदुस्तानियों को भी दिया जाता है? पासपोर्ट जारी करने से पहले पुलिस क्या जाँच करने आती है?

  • आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है।
    • पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है।
    • पैन नागरिकता का प्रमाण नहीं है।
    • वोटर आईडी नागरिकता का प्रमाण नहीं है।

तो फिर नागरिकता का प्रमाण है क्या? मोदी का चरणवंदन? भाजपा का आईडी? आरएसएस की टोपी?”

एन.सी.पी. (शरद पवार गुट) के प्रवक्ता क्लाइड क्रास्टो ने कहा कि पहले आधार कार्ड को नागरिकता का प्रमाण नहीं माना गया, फिर वोटर आईडी को भी पर्याप्त नहीं बताया गया और अब पासपोर्ट पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं। उन्होंने सरकार से स्पष्ट जवाब देने की माँग की। उन्होंने कहा कि फिर नागरिकता साबित करने का मान्य आधार क्या है। क्रास्टो ने तंज कसते हुए कहा कि कहीं ऐसा न हो कि भविष्य में भाजपा की सदस्यता को ही नागरिकता का प्रमाण मान लिया जाए।

पूर्व विदेश मंत्री सलमान ख़ुर्शीद ने भी वर्तमान सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए कुछ तीखे प्रश्न किए। मगर उन्हें ऐसा करने का हक़ कदापि नहीं था, क्योंकि जब वे भारत सरकार में विदेश मंत्री थे, तब पासपोर्ट और नागरिकता के नियम लागू किए जा चुके थे। उन्हें इन नियमों का ज्ञान होना अति आवश्यक था।

भारतीय नागरिकता कानून 1955 में लागू किया गया और पासपोर्ट अधिनियम 1967 में। 1955 में भारत के विदेश मंत्री का कार्यभार पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संभाला हुआ था, जबकि 1967 के सितंबर माह तक जस्टिस मुहम्मद करीम छागला भारत के विदेश मंत्री थे। सितंबर के बाद इस मंत्रालय का दायित्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी के पास चला गया।

कांग्रेस पार्टी के किसी भी नेता को यह हक़ नहीं बनता कि वे अपनी सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों की सफ़ाई वर्तमान सरकार से माँगें। दरअसल, 2013 में ही मुंबई हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में कह दिया था कि, “जन्म प्रमाणपत्र, पासपोर्ट और आधार कार्ड यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकते कि आप भारतीय नागरिक हैं, ख़ासकर अगर आपका जन्म 1 जुलाई 1987 के बाद हुआ है।”

दरअसल, ऐसा होता है कि हम किसी विषय पर एक धारणा बना लेते हैं, जबकि हमें उसकी कानूनी (लीगल) स्थिति का कोई ज्ञान नहीं होता। ठीक वैसे ही अब तक आम भारतीय के मन में यह धारणा पूरी तरह से बैठी हुई थी कि पासपोर्ट का अर्थ है नागरिकता का सबूत। अचानक विदेश मंत्रालय ने सच्चाई का ठीकरा सार्वजनिक रूप से फोड़ दिया। तो ज़ाहिर है कि चाहे किसी को इस बारे में सही ज्ञान हो या नहीं, हर व्यक्ति अपना-अपना ज्ञान प्रदर्शित कर रहा है।

भारत में नागरिकता के नियम और भी विस्तृत हैं। संविधान के अनुच्छेद 5 से लेकर अनुच्छेद 11 तक नागरिकता से जुड़े प्रावधान दिए गए हैं। वहीं, नागरिकता अधिनियम में नागरिकता पाने के पाँच मुख्य आधार बताए गए हैं।

सबसे पहला आधार है जन्म से नागरिकता। भारत में जन्म लेने वाला व्यक्ति नागरिक हो सकता है, लेकिन 1 जुलाई 1987 के बाद जन्म लेने वालों के लिए एक शर्त जुड़ गई है कि उनके माता-पिता में से कम-से-कम एक का भारतीय नागरिक होना ज़रूरी है।

दूसरा आधार है वंश के आधार पर नागरिकता। यानी यदि कोई व्यक्ति भारत के बाहर जन्मा है, लेकिन उसके माता या पिता में से कोई एक भारतीय नागरिक है, तो उसे नागरिकता मिल सकती है।

तीसरा तरीका है पंजीकरण के ज़रिए नागरिकता प्राप्त करना। कुछ विशेष श्रेणी के लोग, जैसे भारतीय मूल के व्यक्ति जो लंबे समय से भारत में रह रहे हैं, वे आवेदन करके नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं।

चौथा तरीका है नैचुरलाइज़ेशन, अर्थात देशीकरण। इसमें कोई विदेशी नागरिक, निर्धारित समय तक भारत में रहने और नियम पूरे करने के बाद नागरिकता के लिए आवेदन कर सकता है।

पाँचवाँ आधार है किसी क्षेत्र के भारत में विलय होने पर नागरिकता मिलना। इतिहास में कई ऐसे उदाहरण हैं, जहाँ क्षेत्र भारत में शामिल हुए और वहाँ के लोगों को नागरिकता मिली।

इसके अलावा भी नागरिकता से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कानून है, जिसके तहत अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को कुछ शर्तों के साथ नागरिकता देने का प्रावधान किया गया है।

‘पुरवाई’ का मानना है कि विदेशों में आज भी भारतीय पासपोर्ट का अर्थ यही है कि आपको वहाँ भारत का नागरिक माना जाता है। विदेश मंत्रालय ने कुछ तकनीकी बयान दिए हैं, मगर रोज़मर्रा के जीवन में पासपोर्ट नागरिकता का एक पुख़्ता सबूत है।

तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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20 टिप्पणी

  1. इस बार का संपादकीय ‘भारतीय पासपोर्ट और नागरिकता’ अभी हाल ही के विदेश मंत्रालय द्वारा दिए गए एक बयान पर केंद्रित है। इस बयान ने पूरे भारत में उथल-पुथल मचा दी थी। राजनेताओं के साथ-साथ पूरा सोशल मीडिया इसी को लेकर तरह-तरह की बातें लिख रहे थे।
    चूंकि नागरिकता का सवाल था तो इस पर मैंने भी काफी खोजबीन की। इतना तो मैं जानता हूं कि वर्तमान सरकार इस मामले में झूठे तथ्य नहीं रखेगी। झूठे तथ्य रख दिए तो विपक्ष सरकार पर हावी हो जाता। होने का प्रयास किया भी।
    विपक्ष ने नागरिकता के बयान पर सरकार को घेरा है पर SIR के दरमियान आमजन इससे गुजर चुका है। यही कारण है कि आमजन पर ज्यादा असर नहीं पड़ा। यह मामला जितने जल्दी उठा उतने ही जल्दी ठंडा पड़ गया।
    आपकी इस बात में लाॅजिक है कि कांग्रेस सरकार इतने सालों तक सत्ता में रही और उनके कुछ नेताओं को पता ही नहीं है कि भारतीय नागरिकता का आधार क्या है? उन्हें होमवर्क करना चाहिए था जो नहीं किया गया। भारतीय नागरिकता कानून 1955, पासपोर्ट अधिनियम 1967 को देखना चाहिए था।
    संपादकीय के शुरुआत में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर का इस्तीफा और उनके द्वारा आपको इस इस्तीफे का कारण बताना काफी दिलचस्प लगा। इतने बड़े पद पर बैठे लोगों तक आपकी पहुंच आपके विराट व्यक्तित्व की गवाही देता है।
    समसामयिक विषय पर गंभीर संपादकीय आपको जीनियस सिद्ध करती है सर। इसके लिए आपको बहुत-बहुत बधाई

    • भाई लखन लाल पाल जी, इतनी त्वरित और सारगर्भित टिप्पणी आप ही कर सकते हैं। नतमस्तक!

  2. समसामयिक विषय पर गंभीर संपादकीय।
    पूरे भारतवर्ष में इस विषय को लेकर सोशल मीडिया में उथल पुथल चल रहा है।

  3. नमस्कार
    1 -जब जन्मप्रमाण पत्र होता है तो उसके आधार पर 18वर्ष की आयु होने पर वोटर आई डी बनाया जाता है अर्थात यह आयु प्रमाणपत्र है।
    2-वोटर आई डी से आप वोट दे सकते हैं, कोई भी वाहन चलाने का लाइसेंस मिलता है।
    3-जन्म प्रमाणपत्र और वोटर आईडी के आधार पर आधार कार्ड बनता है ।आप जिस देश में आय अर्जित करते हो उसका टैक्स देने के लिए
    पेन कार्ड बनता है।
    उपरोक्त सभी डॉक्यूमेंट से पासपोर्ट बनता है
    पासपोर्ट अकेला नागरिकता का प्रमाण नहीं है
    इससे विदेश जाने का वीजा मिलता है।भारत में यहाँ वहाँ से आने वाले घुसपैठीयों ने पासपोर्ट के आधार पर उपरोक्त सभी डॉक्यूमेंट फर्जी बनवा लिए हैं इन्हें रोकने की कवायद चल रही है
    विषय गम्भीर है।
    Dr Prabha mishra

  4. संपादकीय होते ही समीचीन मुद्दे या मुद्दों की पड़ताल ! यही हुआ भी है इस संपादकीय के साथ ,,,,और संपादक ने भी इसे सही ठहराया है कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के इस्तीफे का पुख़्ता अहसास पिछ्ले संपादकीय में पाठकों को करवा दिया गया था।
    तिस पर भी पाठकों ने इस एंगल को पकड़ा ही नहीं और किसी भी नियमित टिप्पणीकर्ता ने इसे पकड़ कर बताया भी नहीं?!?;?
    खैर यह संपादकीय समीचीनता और मुद्दे की अहमियत को लेकर बेहद संजीदा है यह बात पासपोर्ट वाले मुद्दे से स्वतः स्पष्ट ये वर्णित हो जाती है।

    मैं भी इस संपादकीय से सहमत हूँ,,,और संपादकीय की टिप्पणी
    पासपोर्ट का अर्थ यही है कि आपको वहाँ भारत का नागरिक माना जाता है। विदेश मंत्रालय ने कुछ तकनीकी बयान दिए हैं, मगर रोज़मर्रा के जीवन में पासपोर्ट नागरिकता का एक पुख़्ता सबूत है।”
    उम्दा संपादकीय

    • बहुत सधा हुआ और तार्किक संपादकीय।
      नागरिकता के संबंध में बिल्कुल यही बातें पत्रकार मधुकर उपाध्याय भी अपने पाॅडकास्ट में बता चुके हैं। जिन लोगों ने नागरिकता के संबंध में प्रतिकूल टिप्पणियां दी हैं, वे पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं या नागरिकता की सामान्य समझ के आधार पर ऐसा कह रहे हैं और अपने ज्ञान (?) पर ही प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं।

  5. ज्वलंत विषय पर महत्वपूर्ण सम्पादकीय। आम लोगों में यह धारणा है कि अब केवल जन्म प्रमाण पत्र ही भारत की नागरिकता का प्रमाण होगा और वह सबके पास होता नहीं।आपके सम्पादकीय से तथ्यपरक जानकारी मिली।
    यह हमारा सौभाग्य है कि आप जैसे व्यक्तित्व के माध्यम से हमारे ज्ञान में वृद्धि हो रही है। साधुवाद तेजेंद्र जी।

  6. पुरवाई- अंक 27/6/26
    ——————-
    वास्तव में भारत के विदेश मंत्रालय का यह बयान चौंकाने वाला लगा कि –
    “भारतीय पासपोर्ट नागरिकता का सबूत नहीं है।” इस बयान से संबंधित चिंताजनक तथ्यों पर “पुरवाई” के इस अंक का सम्पादकीय केंद्रित है । यह ठीक भी है कि विदेशों में रहने , जॉब करने , व्यवसाय के सिलसिले में आवागमन , अध्ययन , भ्रमण आदि उद्देश्यों से नियोजित लाखों लोगों की यह चिंता का विषय है । सम्पादक श्री तेजेंद्र शर्मा ने ब्रिटेन के प्रधान मंत्री के इस्तीफ़े के संबंध में लिखा है –
    “कायदे से मुझे इस सप्ताह का संपादकीय इसी विषय पर लिखना चाहिए था। इसका एक विशेष कारण यह भी था कि कीर स्टार्मर ने मुझे एक निजी पत्र लिखकर अपने त्यागपत्र देने के कारण बताए। मगर इस बीच भारत के विदेश मंत्रालय ने एक ऐसा बयान दे दिया कि मैं इसी विषय पर संपादकीय लिखने को बाध्य हो गया। “ वाजिब है भारतीय नागरिकता विषय पर सम्पादकीय लिखना । ब्रिटेन के प्रधानमंत्री का इस्तीफ़ा देना घटित हो चुका है जबकि नागरिकता संबंधी भारत के विदेश मंत्रालय का बयान घटित होने वाले मानसिक तनावों को उद्वेलित करता है । सम्पादकीय में भारतीय नागरिकता कानून 1955 में लागू होने से ले कर
    पासपोर्ट अधिनियम 1967 और उसके बाद तक नागरिकता के लिए किये गये प्रावधानों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है । जिसके अनुसार पासपोर्ट को नागरिकता का पुख्ता प्रमाण माना जाए। सन् 2013 के मुंबई हाईकोर्ट के आदेश का हवाला दे कर विदेश मंत्रालय के बयान को उन तथ्यों के निकट ले जाया गया है । न्यायालय का आदेश, विदेश मंत्रालय के बयान के संदर्भ अलग हैं । इस ओर सम्पादक ने संकेत कर नागरिक भावनाओं से यह अभिमत पुष्ट किया है कि -“ मगर रोज़मर्रा के जीवन में पासपोर्ट नागरिकता का एक पुख़्ता सबूत है।”
    विदेश मंत्रालय का बयान कहीं न कहीं न्यायालय के उपरोक्त आदेश के निकट प्रतीत होता है कि जिनका जन्म 1 जुलाई 1987 के बाद हुआ है उनके लिए “ जन्म प्रमाणपत्र, पासपोर्ट और आधार कार्ड यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं । इसके मूल में जैसा कि सम्पादक ने सम्पादकीय के अंतिम वाक्य में “कुछ “ शब्द का प्रयोग किया है, यह उसकी परिधि में है। इस पर उन्होंने आगे किसी तथ्य को जानबूझकर स्पष्ट नहीं किया है। क्योंकि विदेश मंत्रालय का बयान किसी अंतिम निर्णय तक नहीं पहुंचता। इनमें “कुछ “ की गुंजाइश निहित है ।
    बहरहाल पासपोर्ट पर लिखा हुआ- ” सिटिज़न ऑफ़ इंडिया” के आधार पर विदेशों में मान्य भारतीय नागरिकता से आश्वस्त हुआ जा सकता है। वैसे भी नागरिकता अधिनियम के अन्तर्गत जिन प्रावधानों का उल्लेख किया गया है, उससे संदेह का समाहार होना ज्यादा संभावित है। वर्तमान वैश्विक जीवन के परिवर्तनों पर ग़ौर करें तो प्रावधानों में आंशिक रूप से कुछ नहीं जुड़ना या घटना बहुत असंभव नहीं ।
    सम्पादकीय के आरंभिक भाग में जिन राजनैतिक प्रतिक्रियाओं का ज़िक्र किया गया है वह लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वाभाविक है। हाँ एक बात ज़रूर कि पद पर रहने और हटने के फलस्वरूप नीतिनिर्धारण परिवर्तित वहीं होता। इस पर सम्पादक श्री तेजेंद्र जी एक रचनाकार से अधिक प्रखर बुद्धिजीवी होने का भी प्रमाण देते हैं । ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के त्यागपत्र देने और निजी पत्र द्वारा उसके कारणों की जानकारी संपादक को देने से इसकी पुष्टि हो जाती है। उसी तरह भारत के विदेश मंत्रालय से बतौर विमर्श जानकारी हासिल करना भी इसमें शुमार है ।
    बहुत अच्छा सम्पादकीय । ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के इस्तीफ़ा देने विषयक आपके दृष्टिकोण से अगले
    सप्ताह वाक़िफ़ हुआ जा सकेगा, ऐसा माना जा सकता है ।
    इस अंक के सम्पादकीय और अन्य पठनीय रचनाओं के लिए बधाई ।
    ——
    मीनकेतन प्रधान
    27/6/26

  7. आज के संपादकीय ने फिर से आदरणीय तेजेंद्र जी के ” फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी ” वाली भूमिका को उभारा है l ब्रिटेन की राजनीतिक उथल-पुथल पर केन्द्रित हो कर भी उनके अंदर के पत्रकार की लेखनी ने भारतीय संदर्भ को विमर्श का मुद्दा बनाया l पासपोर्ट हमेशा हम भारतीयों के लिए कोहिनूर जितना महत्वपूर्ण होता है जो हमे विदेश में पक्के ठिकाने का भ्रम भी डाल deta है परंतु तेजेंद्र जी ने बहुत स्पष्टवादिता से हकीकत ब्यान की है l विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारतीय पासपोर्ट मुख्य रूप से एक यात्रा दस्तावेज़ है, न कि नागरिकता का अंतिम या अकाट्य प्रमाणपत्र। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय आवाजाही को सुगम बनाना है। इस बयान के बाद विपक्ष (कांग्रेस, एआईएमआईएम, एनसीपी) ने सरकार पर तीखा हमला बोला है। नेताओं का तर्क है कि यदि पासपोर्ट, वोटर आईडी और अन्य मुख्य दस्तावेज़ भी नागरिकता का प्रमाण नहीं हैं, तो आम जनता अपनी राष्ट्रीयता कैसे साबित करेगी। संपादक महोदय ne स्पष्ट किया है है कि यह नियम नया नहीं है। नागरिकता अधिनियम 1955 और 2013 के मुंबई हाईकोर्ट के एक फैसले के अनुसार, पासपोर्ट या जन्म प्रमाणपत्र को नागरिकता का पूर्ण प्रमाण नहीं माना गया है (विशेषकर 1 जुलाई 1987 के बाद जन्मे लोगों के लिए, जहाँ माता-पिता की नागरिकता भी अनिवार्य है)। तकनीकी और कानूनी रूप से विदेश मंत्रालय का बयान सही है, लेकिन व्यावहारिक और रोज़मर्रा के जीवन में आज भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय पासपोर्ट को नागरिकता का सबसे पुख़्ता और मान्य दस्तावेज़ माना जाता है। पुनः समाज सापेक्ष लेखन हेतु आभार एवं साधुवाद l

  8. आदरणीय सर,
    सादर प्रणाम।
    ‘पुरवाई’ का ताजा संपादकीय ‘भारतीय पासपोर्ट और नागरिकता’ एक अत्यंत संवेदनशील और ज्वलंत विषय पर देश के आम नागरिक से लेकर प्रबुद्ध वर्ग तक के भीतर सुलगते संशय को बहुत तार्किक ढंग से सामने लाता है। विदेश मंत्रालय के इस तकनीकी बयान ने कि “भारतीय पासपोर्ट नागरिकता का सबूत नहीं है”, जिस तरह अचानक पूरे देश के राजनीतिक और सामाजिक माहौल में एक उथल-पुथल पैदा कर दी, उसे आपने इतिहास और कानून के झरोखे से देखकर बहुत सलीके से साफ़ किया है। ब्रिटेन के बड़े राजनीतिक घटनाक्रम और कीर स्टार्मर के इस्तीफे जैसे वैश्विक विषय के ठीक बीच में भारत के इस आंतरिक और महत्त्वपूर्ण विमर्श पर अपनी पैनी कलम चलाना आपके भीतर के सजग पत्रकार के जीवंत सरोकारों को दर्शाता है।
    संपादकीय की सबसे बड़ी खूबी इस बात में निहित है कि यह केवल सतही बहस पर नहीं रुकता, बल्कि सीधे इसकी जड़ों में जाता है। विपक्षी नेताओं की तीखी और तल्ख राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के समानांतर आपका यह याद दिलाना बहुत प्रासंगिक है कि नागरिकता कानून 1955 और पासपोर्ट अधिनियम 1967 जैसे बुनियादी नियम खुद उन्हीं के दौर की व्यवस्था का हिस्सा रहे हैं। सन् 2013 के मुंबई उच्च न्यायालय के फैसले और 1 जुलाई 1987 के बाद जन्मे लोगों के लिए तय कानूनी शर्तों का हवाला देकर आपने यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि जिसे लोग रातों-रात पैदा हुआ बवंडर समझ रहे हैं, वह दरअसल एक स्थापित कानूनी यथार्थ है। आम जनता में अपनी ही व्यवस्था की कागज़ी पेचीदगियों को लेकर जो अज्ञान है, उस पर आपका यह विश्लेषण बहुत गहराई से चोट करता है।
    विमर्श के बीच जो बात सीधे दिल को छूती है, वह है आपकी यह व्यावहारिक और आत्मीय स्थापना कि कागज़ी दांव-पेचों और तकनीकी बयानों से इतर, आम नागरिक की रोज़मर्रा की ज़िंदगी और अंतरराष्ट्रीय पटल पर आज भी भारतीय पासपोर्ट ही हमारी राष्ट्रीयता का सबसे मज़बूत, पुख्ता और गर्व से भरा हुआ दस्तावेज़ है। इस विचारोत्तेजक और समाज-सापेक्ष संपादकीय के लिए आपको हृदय से साधुवाद।
    सादर, सद्भावनाओं सहित।
    आपका
    चन्द्रशेखर

  9. जन्म प्रमाणपत्र तो है ही नागरिकता का सबूत। एक डोमिसाइल सार्टिफिकेट भी है। अनावश्यक भ्रम खत्म करने के लिए सरकार को एक संविधान संशोधन के साथ ही पासपोर्ट को भी नागरिकता का प्रमाण मान लेना चाहिए।

  10. बढ़िया संपादकीय।वैसे पासपोर्ट लगभग 15 करोड़ लोगों के पास है। और भारत के नागरिक लगभग 140 करोड़ हैं।

  11. जितेन्द्र भाई: – हालांकि आपके इस सम्पादकीय ने बहुत जानकारी दी है फिर भी दिमागी घोड़ा बहुत तेज़ी से भाग रहा है और बहुत से सवाल ज़हन में घूम रहे हैं। अभी तक हम राष्ट्रीयता और नागरिकता को एक समझ रहे थे लेकिन सम्पादकीय पढ़कर जब थोड़ी से खोज की तो यह स्पष्ट हो गया कि इन दोनों शव्दों के अर्थ अलग अलग हैं। चलो एक बार यह मानकर चलें कि “भारतीय पासपोर्ट का मक़सद लोगों को विदेशी बंदरगाहों और इलाक़ों में आवाजाही में मदद करना है। इसलिए इसकी तुलना उन दस्तावेज़ों से नहीं की जानी चाहिए, जिनका इस्तेमाल नागरिकता संबंधी अधिकार स्थापित करने के लिए किया जाता है।”
    पास्पोर्ट की नई व्याख्या को देखते हुए भारतीय नागरिकता के लिये तो आपने छ: तरीके बता दिए। पासपोर्ट लेने के लिए क्या क्वालिफ़िकेशन होनी चाहिए, क्या आम जंता को इस बारे में पता है?
    यहाँ यह समझना बहुत ज़रूरी है कि यदि कोई भारतीय पास्पोर्ट होल्डर भारत से बाहर किसी संकट में पड़ जाता है तो उसे वहाँ पर कॉनसलर सर्विस देना भारतीय दूतावास का फ़र्ज़ बन जाता है। क्या इस सर्विस के लिए भारतीय नागरिक होना ज़रूरी है या फिर भारतीय पास्पोर्ट होना काफ़ी है।
    यहाँ एक बात आप से साझा करना चाहूँगा। भारतीय राष्ट्रीयता के कई मित्र जिन्होने कैनेडियन नागरिकता ले ली है OCI लेते हुए घबराते हैं। उन्हें डर है कि यदि भारत में कोई संकट आगया तो उनके पास OCI होने के कारण शायद कैनेडियन हाई कमीशन उन्हें भारतीय नागरिक मानकर कोई मदद न करे और भारतीय सरकार उनकी कोई मदद करेगा इस पर उन्हें विश्वास नहीं है।

  12. जब कोई आश्चर्य बड़े से आश्चर्य में बदल जाए तो मैं मान लेता हूँ कुछ तो छूट रहा है। कुछ खोज करने पर पता चला जैसा कि संपादकीय में स्पष्ट है, कोई नया नियम नहीं बनाया गया; नागरिकता और पासपोर्ट के नियम क्रमशः: 1955 में और 1967 में बने थे उनकी व्याख्या हुई है।
    विशिष्ट स्थिति में, सार्वजनिक हित में विदेशी नागरिक को भी भारत का पासपोर्ट दिया जाता है। इस तकनीकी बारीकी को लेकर 1967 में नियम बना दिए गए।
    समस्या यही है कि इस नियम का दुरुपयोग न हो तथा जानना जरूरी है इसे पकड़ कर दुरुपयोग करने की संभावना कितनी है? यह भी कि कोई एक जाली दस्तावेज के द्वारा अन्य वैध प्रमाण पत्र प्राप्त कर लेने की संभावना कितनी है?

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