भगवती चरण वर्मा के उपन्यास ‘चित्रलेखा’ में एक चरित्र हैं कुमारगिरि, जो महाप्रभु रत्नांबर के शिष्य हैं और एक तपस्वी योगी हैं। वे मानते थे कि स्त्री-मोह मोक्ष के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। उन्हें अपने योग-बल और संयम पर बहुत घमंड था।
ख़ैर, उपन्यास में तो चित्रलेखा उनका मनोबल तोड़ देती है, मगर वर्ष 2026 में कुमारगिरि की आत्मा केरल के ग्रैंड मुफ़्ती शेख अबू बकर अहमद के दिमाग़ में प्रवेश कर गई तो दूसरी तरफ़ BAPS यानी बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संप्रदाय के साधु भी कुमारगिरि की सोच के दायरे में घिर गए। स्वामीनारायण संप्रदाय के इन साधुओं के लिए महिलाओं को छूना तो दूर, उन्हें देखना भी पाप माना जाता है।
ग्रैंड मुफ़्ती के लिए ये साधु काफ़िर हैं, मगर सोच इन सबकी एक ही है। अबू बकर ने कहा, “महिलाओं को अपने घरों तक ही सीमित रहना चाहिए। उन्हें सार्वजनिक जगहों पर नहीं जाना चाहिए। पवित्र क़ुरान ऐसा कहता है।” ग्रैंड मुफ़्ती के वक्तव्य को लेकर पूरे भारत में इस समय बहस हो रही है।
ध्यान देने लायक बात यह है कि केरल पुलिस ने सोमवार को टेलीविज़न पत्रकार अपर्णा कुरुप के खिलाफ़ टीवी पर एक राजनीतिक चर्चा के दौरान धार्मिक भावनाएँ आहत करने के आरोप में मामला दर्ज किया। अपर्णा कार्यक्रम की प्रस्तोता थीं। यह चर्चा सुन्नी इस्लामिक विद्वान कंथापुरम ए. पी. अबू बकर मुसलियार की महिलाओं के खिलाफ़ विवादित टिप्पणी को लेकर हुई थी।
पुलिस ने बताया कि कासरगोड निवासी अब्दुल हकीम की शिकायत के आधार पर कोच्चि सिटी साइबर पुलिस ने पत्रकार अपर्णा कुरुप के खिलाफ़ भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराओं 192, 299, 302 और 353(2) के तहत मामला दर्ज किया।
अब ‘पुरवाई’ लंदन से फ़्रांस की तरफ़ बहने लगी है, जहाँ पेरिस के आइफ़िल टॉवर पर स्वामीनारायण संप्रदाय के साधुओं की यात्रा ने विवाद खड़ा कर दिया है। इस संप्रदाय के लगभग सौ साधु आइफ़िल टॉवर देखने पहुँच रहे थे। इन साधुओं की ओर से आग्रह किया गया कि उनके भ्रमण के दौरान इस दर्शनीय स्थल पर महिलाओं से “सीमित संपर्क” हो। आइफ़िल टॉवर के प्रबंधन ने उनकी बात का मान रखा, क्योंकि साधु लोग सुबह-सवेरे आने वाले थे। उन्होंने महिला कर्मचारियों की शिफ़्ट का समय बदल दिया, ताकि संतों को कोई असुविधा न हो।
आइफ़िल टॉवर की कर्मचारी यूनियन को जैसे ही इस निर्णय की सूचना मिली, उन्होंने एक तरह की हड़ताल कर दी और काम छोड़कर निकल गए। फ़्रांस में पुरुषों और स्त्रियों को समान अधिकार देने की एक परंपरा है। इसे बहुत शिद्दत से माना भी जाता है। स्टाफ़ यूनियन की प्रतिनिधि डायन डेवोइन ने इस विषय पर बोलते हुए कहा, “महिला कर्मचारियों से कहा गया कि वे अपने काम की जगह छोड़ दें।” ज़ाहिर है कि उन्हें अपमानित महसूस हुआ। अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करने के लिए कर्मचारियों के हड़ताल पर चले जाने के कारण सोमवार को टॉवर बंद कर दिया गया।
फ़्रांस एक सेक्युलर देश है, जो पुरुष और नारी में किसी प्रकार का भेद नहीं करता। भारत के कुछ नेताओं की तरह वे वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए नारी के अधिकारों की बात नहीं करते। इसलिए फ़्रांस के राजनीतिक नेताओं ने भी आइफ़िल टॉवर के प्रबंधन की ख़ासी आलोचना की। इस सिलसिले में एक जाँच समिति भी बना दी गई है, जो जल्दी ही अपनी रिपोर्ट देगी।
मुझे निजी तौर पर थोड़ी हैरानी भी हुई, क्योंकि लंदन के स्वामीनारायण मंदिर में मैंने साधुओं को मुख्य पूजा भवन में पुरुषों और महिलाओं के सामने आरती करते हुए देखा है। ज़ाहिर है, मेरे मन में यह प्रश्न खड़ा हुआ कि ये भला कौन-से साधु-संत हैं, जिनके कारण पेरिस में इतना बखेड़ा हो गया।
मुझे जानकारी मिली कि इन साधुओं ने ब्रह्मचर्य का व्रत ले रखा है। महिलाओं को लेकर उन पर आठ प्रतिबंध लगे रहते हैं। पहला नियम है कि ‘स्त्रियों की बातें नहीं सुनना’…महिलाओं द्वारा कही जा रही किसी भी बात को ध्यान से या फिर आसक्ति-भाव से न सुनना।
इससे अगली शर्त है कि ‘स्त्रियों के बारे में बात नहीं करना’…किसी भी परिस्थिति में स्त्रियों के बारे में चर्चा या बातचीत करने की अनुमति नहीं है।
जब स्त्रियों की बातें सुन नहीं सकते और उनके बारे में बात नहीं कर सकते, तो भला उनसे बात करने का प्रश्न कैसे उठ सकता है? इसलिए तीसरा प्रतिबंध है- ‘स्त्रियों से बात नहीं करना’… ये साधु-संत महिलाओं से आम तौर पर सीधे संवाद या बातचीत नहीं कर सकते।
जब पहले से ही इतने कठोर नियम लागू हैं, तो भला स्त्रियों के साथ मनोरंजन के बारे में कैसे सोचा जा सकता है? इन्हें महिलाओं के साथ किसी भी प्रकार का हास-परिहास, खेल या मनोरंजन करने की अनुमति नहीं है।
अपनी इंद्रियों को नियंत्रण में रखने के लिए उनकी आँखों पर भी प्रतिबंध लगा है, यानी वे जानबूझकर स्त्रियों को देख भी नहीं सकते। आदेश है कि महिलाओं को सचेत होकर या रुचि के साथ नहीं देखना है।
इन संतों को अपनी सोच को केवल ईश्वर पर केंद्रित रखना है। उन्हें स्त्रियों के बारे में सोचना भी पूरी तरह प्रतिबंधित है। वे मन में महिलाओं से जुड़े किसी भी विचार या कल्पना को नहीं ला सकते।
जब इतने कठोर नियम पहले से बने हैं, तो भला ‘स्त्रियों की संगति’ चाहने की अनुमति कैसे मिल सकती है? ये संत महिलाओं के पास रहने या उनकी संगति पाने का प्रयास नहीं कर सकते।
भला ऐसे में कोई भी स्वामीनारायण संत ‘स्त्रियों के साथ यौन संबंध या उसकी इच्छा’ कैसे रख सकता है? काम-भाव या शारीरिक संबंध का कोई भी विचार उनके निकट भी नहीं फटक सकता।
आप पूछ सकते हैं कि यह बोचासन क्या होता है? इस संस्था का नाम ‘बोचासनवासी’ इसलिए पड़ा, क्योंकि इसका पहला प्रमुख मंदिर गुजरात के आणंद ज़िले के बोचासन गाँव में ही बना था। यहीं से इस आध्यात्मिक आंदोलन का विस्तार हुआ। यह गाँव बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था के मूल उद्गम स्थल के रूप में जाना जाता है। यह एक ऐसा आंदोलन है, जिसकी मान्यताएँ 18वीं सदी से जुड़ी हैं। यह मूल सनातन धर्म का हिस्सा नहीं है। यह गुजरात का एक संप्रदाय है। इस संप्रदाय में पुरुषों और महिलाओं को सख़्ती से अलग रखा जाता है। मंदिर में भी पुरुषों और महिलाओं के बैठने की अलग-अलग व्यवस्था होती है।
आइफ़िल टॉवर को चलाने वाली कंपनी के मुखिया एरियल वेल ने इसके प्रबंधकों को इस बात के लिए ज़िम्मेदार ठहराया कि उन्होंने यह सोचे बिना कि अनुरोध “अनुचित” है या नहीं, उसे पूरा करने में “कुछ अधिक ही उत्साह” दिखाया। एरियल वेल ने, जो पेरिस सेंटर के मेयर भी हैं, ज़ोर देकर कहा कि यह घटना “पूरी तरह से चौंकाने वाली और अस्वीकार्य” थी।
भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने एक वक्तव्य जारी करते हुए कहा कि यह मामला दो संस्थाओं के बीच है। इसमें भारत या फ़्रांस की सरकार का कुछ लेना-देना नहीं है।
‘पुरवाई’ पत्रिका महिला और पुरुषों में किसी भी भेदभाव के विरुद्ध है और उसकी निंदा करती है। हम स्वामीनारायण संप्रदाय के संतों के इस हक़ का सम्मान करते हैं कि वे ब्रह्मचर्य का पालन करें, मगर अपने प्रांगण में रहकर। यदि उन्हें सार्वजनिक स्थलों पर जाना है, तो उन्हें वहाँ के नियमों को समझना होगा और उनका पालन करना होगा। निजी स्वतंत्रता तभी तक जायज़ है, जब तक वह समाज द्वारा तय किए गए नियमों के साथ नहीं टकराती या अन्य लोगों की परेशानी का सबब नहीं बनती।
पेरिस में स्वामीनारायण मंदिर की स्थापना हाल ही में की गई है। 29 अगस्त से 16 सितंबर तक वहाँ स्थापना समारोह मनाए जा रहे हैं। हमें उम्मीद है कि आइफ़िल टॉवर विवाद का साया इन समारोहों पर नहीं पड़ेगा।

भारत के विशेष सोच को शिरोधार्य करते पंथ विशेष की अपरिपक्व और अनुचित व्यवहार को भगवती चरण वर्मा की कृति चित्रलेखा के प्रमुख पात्र के प्रतिमान से मापते हुए, संपादक महोदय का एक और मास्टरपीस संपादकीय!!!
स्त्री और पुरुष के बीच आज भी लैंगिक भेद कितने गहराए हुए हैं,इसी की तस्दीक वैश्विक स्तर पर करता है यह संपादकीय?!
कुमारगिरी के सहोदर धर्म विशेष में तो बहुत है पर न तो आज चित्रलेखा है न ही सृजक आदरणीय भगवती चरण वर्मा।
यह संपादकीय एफिल टावर,फ्रांस तक की पुरानी सोच को आज भी बताता है कि महिला स्वतंत्रता और अधिकार के क्षेत्र में अभी भी कार्य होने शेष हैं।
सादर
सूर्यकांत शर्मा
भाई सूर्य कांत जी, आपका समर्थन हमारे लिए महत्वपूर्ण है। हार्दिक आभार।
“साधु ऐसा चाहिए जैसे सूप सुभाय
सार- सार को गहि रही, थोथा देई उड़ाए l”
कितनी हैरानी की यह बात है कि जिस स्त्री स्त्री के गर्भ से ये स्वयं जन्में हैं, उसी स्त्री से परहेज l यह गणित आज तक समझ नहीं आया l मेरा प्रश्न है इनसे कि इसी लोक में जन्में हैं न ये लोग? या किसी अदृश्य शक्ति से उद्भव हुआ है इनका?
This is not acceptable anymore. इन्हें अपनी मानसिकता बदलने की सख्त जरूरत है l वर्ना इनकी दशा भी कुमारगिरि जैसी न हो जाए l
” नारी तन की झांई परत , अँधा होत भुजंग l
कबीरा तिन की कौन गति, जो नित नारी के संग l”
लगता है कबीर को बहुत follow करते हैं ऐसे लोग l
महत्वपूर्ण संपादकीय sir.
चैताली, आपने लिखा है कि -This is not acceptable anymore. इन्हें अपनी मानसिकता बदलने की सख्त जरूरत है l वर्ना इनकी दशा भी कुमारगिरि जैसी न हो जाए। – हार्दिक धन्यवाद।
क्या यहां पर आत्मसंयम को प्रमुख भूमिका नही निभानी चाहिये? गार्गी, लोपामुद्रा जैसी परंपरा से आते हुए हमने आज भी अनेक ’गृहस्थ सन्यासी दंपत्तियों’ को प्रपंच और परमार्थ का सुवर्णमध्य साधते देखा है। स्वयं की साधना या कहें प्रतिबंधों का प्रदर्शन करना कितना सही है? इन नियमों को पढ़कर भी हैरानी हुई। क्या इन साधकों के जीवन में मातृतत्व शून्य है?
प्रत्येक जीवात्मा के साथ एकाकार होकर निर्विकल्प समाधि को लक्ष्यित आत्मतत्व की साधनाओं के मार्ग में जैसे सिद्धियां एक अवरोध होती हैं, यह कुछ वैसा ही प्रकार है। प्रार्थना यही है कि हम सबका विस्तार हो!
एक आवश्यक मुद्दे पर प्रखर लेखन हेतु साधुवाद!
अंतरा इस सार्थक एवं सारगर्भित टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार।
विचारणीय लेख…सबके अपने अपने मत हैं। महत्वपूर्ण विषय पर बेहतरीन संपादकीय
धन्यवाद संगीता।
प्रणाम भाई
चित्रलेखा उपन्यास मैने भी बी ए में पढा है। आपने कुमारगिरि का उल्लेख कर उसके पात्रों की याद दिला दी।इस बार संपादकीय में बिल्कुल आश्चर्यजनक मुद्दा और सहज स्वीकार्य न होने वाला प्रसंग चौंकाता है। हमारा देश अब स्त्री पुरुष समानता की राह पर है।कुछ विकृतियां हैं जो सुधारी जा रही हैं।परंतु फ्रांस में स्वामीनारायण संप्रदाय के सन्यासियों द्वारा यह विचित्र व्यवहार और नियम कदापि स्वागत योग्य नहीं है। महिलाओ को भी पुरुषोः के समकक्ष सम्मान मिलना चाहिए न कि उनसे बात करना , सुनना और अवहेलना करना किसी धर्म या संप्रदाय के नियमों में शामिल कर उन्हे अपमानित करना जायज हो.सकता है।फ्रांस की सरकार सराहना के योग्य है पुरवाई की तरह मैं भी इस विचारधारा से बिल्कुल सहमत नहीं.हूं।
एक बार फिर नये और महत्वपूर्ण मुद्दे को संपादकीय का विषय बनाने के लिए हार्दिक धन्यवाद भाई। आभार पुरवाई।
पद्मा आपने लिखा है कि – फ़्रांस की सरकार सराहना के योग्य है पुरवाई की तरह मैं भी इस विचारधारा से बिल्कुल सहमत नहीं.हूं।
एक बार फिर नये और महत्वपूर्ण मुद्दे को संपादकीय का विषय बनाने के लिए हार्दिक धन्यवाद भाई। आभार पुरवाई।
आपका बहुत बहुत शुक्रिया।
इतनी मान्यताओं और मर्यादा वाला सम्प्रदाय है तो उसे सार्वजनिक स्थलों पर नहीं जाना चाहिए और न ही जनसामान्य के लिए परेशानी का सबब बनना चाहिए ।
उन्हें अपने एकांत में रहना ही उचित है बाकी तो बहुत बड़ी दुनिया है और कई पंथ भी।काश महिलाओं का भी ऐसा रिजर्व पंथ हो जाये
Dr Prabha mishra
आपसे पूरी तरह सहमत प्रभा जी। हार्दिक धन्यवाद।
विचारणीय एवं महत्वपूर्ण सम्पादकीय। उससे भी महत्त्वपूर्ण है, आपका शोध परक दृष्टिकोण , जो पूरी तह में जाकर तथ्यों को उजागर करता है।
पुरुष और महिला के बीच के भेद को वैश्विक स्तर दूर करने की अत्यंत आवश्यकता है।
हर पंथ के अपने नियम होते हैं, जिनका पालन करना अनुयायियों के लिए अनिवार्य होता है। पर यह बात समझ से परे है कि माँ के गर्भ से जन्म लेकर, उसकी गोद में खेलकर छत्र छाया में पलकर, उसी की जाति से परहेज़। अग्नि से दूर रहकर,उसकी उसकी ऊष्मा से बच जाना बड़ी बात नहीं है।अग्नि के सान्निध्य में इंद्रियों को साधकर नियन्त्रित कर, उसके ताप को सहन करने की क्षमता रखना बड़ी बात है। हर बार नई जानकारी देने के लिए साधुवाद तेजेंद्र जी
सुदर्शन जी, आपने लिखा है कि – विचारणीय एवं महत्वपूर्ण सम्पादकीय। उससे भी महत्त्वपूर्ण है, आपका शोध परक दृष्टिकोण , जो पूरी तह में जाकर तथ्यों को उजागर करता है।
पुरुष और महिला के बीच के भेद को वैश्विक स्तर दूर करने की अत्यंत आवश्यकता है।-
आपको हार्दिक धन्यवाद।
इस पंथ के लोग यदि ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं तो फिर स्त्रियों के सामने होने या ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। यह एक आत्म संयम होता है और यदि हमारे में संयम है तो अवश्य ही हमारे सामने कोई भी आ जाए हम उसको नहीं तोड़ सकते। गांधी जी की सत्य के साथ अनुभव में यही बात कही गई कि वह अपने ब्रह्मचर्य की परीक्षा लेने के लिए महिलाओं से घिरे रहते थे, इससे भी स्वयं को परीक्षित करते थे कि उनका संयम उनके बस में है या नहीं। किसी भी धर्म में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है कि वे स्त्रियों की बात ना सुने या स्त्रियों के साथ कोई कार्य नहीं कर सकते अथवा वे अपने को एक सीमित सीमा में ही रखें। यह तो एक आवश्यकता से अधिक प्रतिबंध कहा जाएगा और फिर इसी तरह लोगों को बंधन में बांधकर धर्म का पालन नहीं कराया जा सकता। हमारे देश में इस तरह की कुछ संस्थाएं – जैसे ब्रह्म कुमारी विचारधारा के अनुयायी, लेकिन यहां तक मुझे पता है वहां पर ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि पुरुष वर्ग का प्रवेश या पुरुष वर्ग का जाना आना प्रतिबंधित हो। ऐसी स्थिति में ब्रह्मचर्य का पालन पूर्णतया नियंत्रण और अपने भावों पर नियंत्रण के द्वारा ही संभव है। तो इसके लिए परिस्थितियों कोई भी हो कोई किसी के हो ब्रह्मचर्य को भंग नहीं कर सकता स्त्रियां सिर्फ प्रेयसी ही नहीं हो सकती , वह मां हो सकती है, बेटी हो सकती और यह सभी संत किसी मां की ही संतान है और वह मां स्त्री ही है फिर यह सब बेकार के नियंत्रित करने वाले नियम है अगर यह बात भारत में धर्म भीरुता बहुत अधिक है वहां तो यह प्रतिबंध पाया जा सकता है लेकिन भारत से बाहर यदि इसको लागू कराया जाए या उनके अनुरूप व्यवस्था की जाए तो इसको कहीं से भी उचित नहीं कहा जाएगा। साधु और संत का अर्थ संयम और आत्म नियंत्रण होता है, चाहे वह किसी भी मत को मानने वाले हो।
रेखा जी, आपने लिखा है कि – इस पंथ के लोग यदि ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं तो फिर स्त्रियों के सामने होने या ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। यह एक आत्म संयम होता है और यदि हमारे में संयम है तो अवश्य ही हमारे सामने कोई भी आ जाए हम उसको नहीं तोड़ सकते। –
आपसे सहमत।
आपकी विषय को पटाक्षेप करती रक्तवर्णी पंक्तियाँ ही निचोड़ हैं। हम सार्वजनिक स्थलों पर वैसा ही आचरण करें जिससे किसी को कोई आपत्ति न हो।