Sunday, August 30, 2026
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सोनिया गाँधी की प्रेम यात्रा…

ऐसा बहुत कम ही सुनने में आया है कि कोई प्रकाशक किसी महत्वपूर्ण पुस्तक को छापने के लिए हामी भरने के बाद अपने हाथ पीछे खींच ले। पुरवाई क्योंकि मूलतः साहित्यिक पत्रिका है, इसलिए ज़रूरी है कि हम अपने पाठकों को इस नए खड़े हुए विवाद की अधिक से अधिक जानकारी उपलब्ध करवा सकें।

हम जिस पुस्तक के बारे में बात करने जा रहे हैं, उसका नाम है- ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ़ लव’ (Belonging-A Journey of Love) और यह कांग्रेस की मुखिया श्रीमती सोनिया गाँधी की आत्मकथा है।

हुआ कुछ यूँ है कि सोनिया गाँधी ने पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया को अपनी आत्मकथा प्रकाशित करने के लिए पांडुलिपि सौंप दी। प्रकाशक ने प्रचार के लिए पुस्तक का कवर पेज भी जारी कर दिया, जो कि रंगीन होने के स्थान पर ब्लैक एंड व्हाइट है। शायद प्रकाशक कहने का प्रयास कर रहा था कि इस पुस्तक में सब ब्लैक एंड व्हाइट है- कुछ छिपाया नहीं गया है।

सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था कि अचानक एक समाचार उछला कि प्रकाशक ने सोनिया गाँधी से किताब के कुछ हिस्सों को संपादित करने और हटाने के लिए कहा था, जिससे उन्होंने इनकार कर दिया। इस कारण प्रकाशक ने पुस्तक को प्रकाशित करने से मना कर दिया और अपने हाथ पीछे खींच लिए।

ज़ाहिर है कि हर कोई यही सोच रहा है कि पुस्तक में ऐसा क्या लिखा गया था कि प्रकाशक को उसे छापने में असुविधा हो रही थी। क्या प्रकाशक पर कोई राजनीतिक दबाव थे, जिन्होंने उसे ऐसा निर्णय लेने पर बाध्य किया? याद रहे कि पुस्तक के लोकार्पण की तिथि भी घोषित कर दी गई थी – 10 नवंबर 2026…

आम तौर पर सोनिया गाँधी अपने बारे में बहुत कम बोलती हैं। मगर इस विषय में उन्होंने कहा, “मेरे परिवार के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है, लेकिन बहुत कम ही ऐसी बातें सामने आईं, जो उनके इरादों, उनके कामों और उनकी इंसानी कमियों की सच्चाई तक पहुँच पाईं।”

उन्होंने आगे कहा, “कई मायनों में, यह किताब उनके इंसानी पहलू को सम्मान देने वाली है। मेरी कहानी पाठकों को उन सामाजिक और राजनीतिक बदलावों का एक अनोखा नज़रिया भी देती है, जिन्हें मैंने अपने इस प्यारे देश में छह दशकों तक देखा है… दिल टूटने और नुकसान झेलने के बाद ही मैं राजनीति की सार्वजनिक दुनिया में आई। उससे पहले तक मैंने अपनी निजता को बहुत सख्ती से बचाकर रखा था।”

अपनी रचनात्मक प्रक्रिया के बारे में उन्होंने कहा- “अपनी ज़िंदगी के बारे में लिखना मेरे लिए आसान नहीं था। इसका मतलब था ख़ुद को खोलना, उन पलों और अनुभवों को साझा करना, जिन्हें मैंने हमेशा अपने अंदर छिपाकर रखा था। फिर भी, जैसे-जैसे मैं राजनीतिक दुनिया से दूर होती गई और मैंने जो कुछ भी देखा था, उस पर पीछे मुड़कर देखा, तो मेरी कहानी में गुँथे प्यार और वफ़ादारी के धागों ने ख़ुद को परिभाषित करना शुरू कर दिया, इटली के एक छोटे से शहर में मेरे बचपन की सादगी से लेकर, भारत में राजीव गाँधी की पत्नी और प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की बहू के तौर पर बिताए सालों की जटिलताओं तक।”

पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया का कहना है कि वे ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ़ लव’ को छापना चाहते थे, लेकिन उससे पहले “तथ्यों की जाँच” करना ज़रूरी था, लेकिन कांग्रेस के सूत्रों का कहना है कि पांडुलिपि के चरण में जो हिस्से सामने आए, वे मुख्य रूप से इन तीन विषयों से जुड़े थे।

प्रकाशकों ने तो इस विषय पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया कि उनके और सोनिया गाँधी के बीच क्या बातचीत हुई। मगर कांग्रेस के कुछ नेताओं ने बयान देते हुए कहा कि सोनिया गाँधी की आने वाली किताब के तीन हिस्सों को लेकर कांग्रेस नेता और पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया के बीच बातचीत हुई थी, जिसके बाद पब्लिशर ने देश में किताब को प्रकाशित न करने का फ़ैसला किया। ये हिस्से थे: भारत की सीमाओं पर चीन की घुसपैठ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लीडरशिप और केंद्र सरकार की नीतियाँ, और भारत के सामाजिक इतिहास में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका।

पहला मुद्दा चीन के साथ सीमा विवाद का था। सूत्रों के मुताबिक, इस किताब में भारतीय इलाके में चीन की घुसपैठ और सीमा पर मौजूदा हालात का विशेष तौर पर ज़िक्र किया गया है। यह ऐसा मुद्दा है, जिसे सोनिया गाँधी और उनके बेटे राहुल गाँधी (जो वर्तमान में लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं) की अगुवाई वाली कांग्रेस पार्टी ने संसद और उसके बाहर कई बार उठाया है।

सूत्रों ने बताया कि सोनिया गाँधी ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और काम करने के तरीके के साथ-साथ केंद्र सरकार की कई अहम नीतियों पर भी सवाल उठाए हैं।

तीसरा मसला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) का है, जो सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की मूल संस्था है और मोदी ने पूर्णकालिक राजनीति में आने से पहले इसी संगठन में काम किया था। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, इस संस्मरण में राष्ट्रीय मामलों और भारत के सामाजिक ताने-बाने पर आर.एस.एस. के प्रभाव के बारे में उनके विचार शामिल हैं।

बताया जा रहा है कि जब पेंगुइन इंडिया ने किताब के कुछ हिस्सों को संपादित करने और कुछ हिस्सों को हटाने का प्रस्ताव रखा, तो सोनिया गाँधी ने इसे ठुकरा दिया। उनका कहना था कि किताब में दिए गए तथ्य और विचार उनके अपने अनुभव और नज़रिए पर आधारित हैं, इसलिए उनमें कोई बदलाव नहीं किया जा सकता। कांग्रेस ने इस मामले को लेकर बीजेपी पर निशाना भी साधा है, पार्टी सूत्रों ने किताब को लेकर बने दबाव को “भाजपा की सोची-समझी चाल” बताया है।

पेंगुइन रैंडम हाउस की भारतीय शाखा ने कहा कि वे कभी भी इस किताब के प्रकाशक नहीं रहे हैं। बयान में आगे कहा गया, “एक प्रकाशक के तौर पर, तथ्यों की जाँच करना और लेखकों को ऐसी सलाह देना, जो उनकी किताबों के लिए सबसे अच्छी हो, हमारा अधिकार और ज़िम्मेदारी दोनों है। यह प्रकाशन प्रक्रिया का एक सामान्य हिस्सा है।”

प्रकाशकों ने आगे कहा, “इस मामले से जुड़ी बातचीत के दौरान पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया का रुख यही रहा कि हम किताब को प्रकाशित करने के लिए तैयार और इच्छुक थे। हम लेखक के साथ हुई गोपनीय बातचीत पर और कोई टिप्पणी नहीं करेंगे।” यह एक ज़िम्मेदार और परिपक्व तरीका कहा जा सकता है।

इस सप्ताह हम पर बहुत दबाव था कि हम राहुल गाँधी के मनुस्मृति और महिलाओं के बलात्कार पर दिए गए बयानों पर संपादकीय लिखें। यह भी कहा गया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत पर न्यूयॉर्क के मेयर ममदानी ने जो रवैया अपनाया है, उस पर लिखा जाए। कनाडा और ब्रिटेन में भी मोहन भागवत को प्रवेश न देने पर नारेबाज़ी हो रही है… मगर ‘पुरवाई’ की संपादकीय टीम के लिए साहित्य और पत्रकारिता राजनीति से अधिक महत्वपूर्ण है। इसलिए आज आपके लिए ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ़ लव’ यानी कि सोनिया गाँधी की प्रेम यात्रा लेकर आए हैं हम!

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25 टिप्पणी

  1. “पुरवाई “ की यह सोच महत्त्वपूर्ण है कि
    “साहित्य और पत्रकारिता राजनीति से अधिक महत्वपूर्ण है। “
    इस अवधारणा के मद्देनज़र
    सम्पादकीय में उल्लिखित तथ्य प्रकाशक की सामाजिक ज़िम्मेदारी और राष्ट्रीय कर्तव्य के विचारों पर निर्भर करता है कि वह किस पुस्तक को किस रूप में प्रकाशित करेगा । लेखक के लिए विषयवस्तु की पक्षधरता और स्वतंत्रता हो सकती है, प्रकाशक के लिए नहीं । यह तथ्य सम्पादकीय में प्रख्यात साहित्यकार- सम्पादक श्री तेजेंद्र शर्मा द्वारा दी गई जानकारी से सामने आता है ।
    साहित्यिक पत्रिका ‘पुरवाई’ की सोच का फलक विशाल है इसलिए ऐसा विषय भी उस दायरे में आना लाजिमी है।राजनीतिक विचारधाराओं में अन्तर्विरोधों का होना स्वाभाविक है । इसे किसी आत्मकथा के रूप में समाहित किया जाता है तो यह लेखक के निजी विचार हैं । जिसके लिए वह स्वयं उत्तरदायी होता है । ऐसी पुस्तकों का साहित्यिक स्तर और सामाजिक प्रभाव प्रश्नांकित हो सकता है।
    सम्पादक को “पुरवाई” के इस अंक के लिए शुभकामनाएँ ।
    साहित्यिक विधाओं से सम्बन्धित विषय पठनीय हैं ।
    बहुत बधाई ।
    —-
    मीनकेतन प्रधान

    • भाई मीनकेतन जी, आपने संपादकीय के कई पहलुओं पर नज़र डाली है और सार्थक टिप्पणी लिखी है। स्नेह बनाए रखें।

  2. इस बार के संपादकीय में बहुत ही महत्वपूर्ण सूचना से पाठकों को अवगत करवाया है।सोनिया गाँधी की आत्मकथा पर विवाद होना अचंभित नही कर रहा।यह किसी सामान्य महत्वपूर्ण व्यक्ति की आत्मकथा नही है।वह कितने ही उतार -चढ़ाव ,उथल-पुथल की साक्षी रही होंगी।आज वह विपक्ष में हैं ,सत्ता में बी.जे.पी.,यदि वह दोनों को खुश करने के लिए बाध्य की जाती हैं तो उनका अपना नजरिया कहाँ रह जाए गा। हाँ राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा हो तो रोक लगाना न्यायोचित है।यहाँ राजनैतिक दबाव तो आएगा ही,उससे वह बच नही पाएं गी।

  3. आत्मकथा लिखना मतलब अपनी जीवन यात्रा के बारे में लिखना। जब लेखक किसी सरकारी अथवा राजनीतिक पद पर नहीं है तो चीन की घुसपैठ या देश के प्रधानमंत्री की नीतियों के बारे में अपनी आत्मकथा में लिखना क्या जायज़ होगा? लेखक को अपने जीवन,अपने कार्यकलापों के बारे में सच्चाई से लिखना चाहिए। सम्पादकीय में लेखक ने बेबाकी से अपने विचार व्यक्त किए हैं

  4. राजनीति मेरा विषय नहीं है पर आजकल राजनीति के नाम पर जो भाषा प्रयोग में लाई जा रही है और मानसिक व शारीरिक अत्याचार हो रहे हैं, वे दुखद है.आपने साहित्यिक पक्ष को प्राथमिकता दी यह सुखद है.

  5. आपने सही कार्य किया है सोनिया गांधी के बारे में जानकारी देकर। पुरवाई का अंक सदा से निष्पक्ष,सही विचार और ज्वलंत मुद्दे को लेकर सुर्खियों में रहता है। सोनिया जी की पुस्तक आती तो बहुत सारे तथ्य उजागर होते। पर एक जिज्ञासा आपने मोहन भागवत वाले तथ्य पर क्यों नहीं लिखा। और सभी स्तंभ काफी अच्छे हैं।आज भारत की राजनीति में जिस भाषा शब्द का प्रयोग हो रहा निंदनीय है।

  6. मेरे विचार में पेंग्विन इंडिया ने सोनिया जी आत्मकथा के कथ्य का संपादन करने की चेष्टा करके भूल की है! यदि विवादित अंश मिथ्या धारणाओं पर आधारित हैं तो लेखिका पहचानी जाती और यदि सरकार के लिए असहज तथ्यों पर आधारित हैं तो सरकार बेनकाब होती! दोनों ही सूरतों में पुस्तक अपने उद्देश्य का निर्वाह कर सकती थी। यदि दबाव में छापने से इंकार किया है तो यह प्रकाशन संस्था और सरकार दोनों की छवि को बट्टा लगाएगा और यदि कथ्य को सुधारने की नीयत से इंकार किया है तो यह अनधिकार चेष्टा माना जाएगा! देश में न छाप कर विदेशों में बिक्री बढ़ाने का विज्ञापनी हथकंडा है तो और भी निंदनीय है।

  7. आत्मकथा विवादित होती जाएगी अनुवाद बढ़ेंगे लोग पढ़ेंगे। आपकी बात संतुलित और साफ है। अभी आत्मकथा के विषय में कुछ कहना जल्दबाजी होगी।

  8. अखबार में यह खबर पढ़ी थी पर आपके संपादकीय से विस्तृत जानकारी मिली। तथ्यों की सत्यता जांचना, प्रकाशक का काम है। शेष जितना विवाद बढ़ेगा लोगों की रुचि किताब की तरफ बढ़ती जायेगी।
    बहुत ही बढ़िया व ज्वलंत विषय पर संपादकीय।

  9. तेजेंद्र शर्मा का यह संपादकीय ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ़ लव’ के बहाने साहित्य, राजनीति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के जटिल संबंधों को सामने लाता है। सोनिया गाँधी की आत्मकथा के प्रकाशन से जुड़े विवाद, प्रकाशक द्वारा तथ्य-जाँच और कथित संपादन के आग्रह को लेखक ने रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है। संपादकीय की विशेषता यह है कि यह सीधे राजनीतिक पक्षधरता में जाने के बजाय पुस्तक और प्रकाशन-संस्कृति के प्रश्न को केंद्र में रखता है। भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और जिज्ञासा जगाने वाली है। अंततः यह संपादकीय पाठक के मन में एक महत्वपूर्ण सवाल छोड़ता है—क्या आत्मकथा से असहज सत्य हटाए जा सकते हैं?

    Dr Vijai Dikshit

  10. विजय भाई, आपने लिखा है कि – “संपादकीय की विशेषता यह है कि यह सीधे राजनीतिक पक्षधरता में जाने के बजाय पुस्तक और प्रकाशन-संस्कृति के प्रश्न को केंद्र में रखता है। भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और जिज्ञासा जगाने वाली है। अंततः यह संपादकीय पाठक के मन में एक महत्वपूर्ण सवाल छोड़ता है—क्या आत्मकथा से असहज सत्य हटाए जा सकते हैं?”… आसानी से कहा जा सकता है कि आपके शब्द संपादकीय के लिये बेहतरीन शाबाशी है।

  11. ज्वलंत विषय है
    आपने अच्छा लिखा
    राजनीतिक विषय आने स्वाभाविक हैं आत्मकथा में,अगर व्यक्ति राजनीति से जुड़ा है। परन्तु आखिर वे विषय कैसे आए हैं यह महत्वपूर्ण है।.

    अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या ?

    कोई स्वतंत्रता देश की गोपनीयता और अखंडता से आगे…

    पुस्तक तो कहीं नहीं कहीं से आ ही जाएगी ख़ैर
    विवाद उसमें जिज्ञासा अवश्य जगा देगा।

  12. अभी तक इसे कम लोग जानते थे लेकिन इस विवाद के बाद इसे लोग न केवल जान गए ब्लकि अब पढ़ना भी चाहेंगे बाकी चीन का समर्थन और देश पर झूठ बोलना, RSS और पीएम मोदी को गलत कहना उनका प्रिय विषय है…इसमें कुछ भी नया नहीं है..इसे बाजार की रणनीति कह सकते हैं..

  13. ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ़ लव’ की पहले लोकार्पण की तिथि निर्धारित कर देना और फिर उसे प्रकाशित करने से अस्वीकार कर देना, वास्तव में कई प्रश्न उत्पन्न करता है। क्या प्रकाशक के ऊपर कोई राजनीतिक दबाव था या सचमुच उसके इस कथन में सच्चाई है कि तथ्यों की जांच करना जरूरी था।
    आपके संपादकीय में दिए गए तथ्य के अनुसार पहला मामला भारत पर चीन की घुसपैठ का, दूसरा प्रधानमंत्री की लीडरशिप और केंद्र सरकार की नीतियों का तथा तीसरा मामला भारत के सामाजिक इतिहास में आर.एस.एस. की भूमिका का है। सूत्रों ने बताया कि सोनिया गांधी ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और काम करने के तरीके के साथ-साथ केंद्र सरकार की कई अहम नीतियों पर सवाल उठाए हैं। सोनिया गांधी विरोधी पार्टी से हैं कांग्रेस और बीजेपी की विचारधारा भिन्न है अतः सोनिया गांधी जो लिखेंगी, वह मोदी के विरोध में तो होगा ही; हां इतना ध्यान ज़रूर होना चाहिए कि देश के बारे में कोई ऐसी बात न हो, जो देश के लिए हितकारी न हो।
    पुस्तक प्रकाशित होगी, यहां नहीं विदेश में होगी। चर्चा में रहकर इसकी लोकप्रियता और बढ़ेगी। महत्वपूर्ण संपादकीय के लिए धन्यवाद स्वीकार करें

  14. इस बार का संपादकीय “सोनिया गांधी की प्रेम यात्रा…” दमदार संपादकीय है। कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी जी की आत्मकथा ‘बिलाॅन्गिंग: अ जर्नी ऑफ लव’ प्रकाशित हो और राजनीतिक हलकों में हलचल न हो ऐसा संभव नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि हलचल के बीच प्रकाशक की ओर से पुस्तक प्रकाशित न करने की खबर आ गई ।
    सोनिया गांधी जी भारतीय राजनीति का एक बड़ा व्यक्तित्व है। मुख्य विपक्षी दल की प्रमुख होने के नाते सत्ता पक्ष की कमजोरियों और सरकार की नीतियों पर उनकी अपनी दृष्टि जरूर आई होगी। ऐसे में यह मानकर चलना चाहिए कि जब भी यह पुस्तक प्रकाशित होगी, इसके कुछ अंश राजनीतिक बहस के विषय बन सकते हैं।
    आत्मकथा लिखना आसान नहीं होता है। विशेषकर तब, जब लेखक का जीवन देश की राजनीति के इतने महत्वपूर्ण दौर से जुड़ा हो। उसमें अपने जीवन के कई अनुछुए पहलुओं को सामने रखना पड़ता है। खासकर उन प्रसंगों को भी जो बेहद निजी होते हैं। बचपन से लेकर शादी तक का वाकया पाठकों की जिज्ञासा का केन्द्र रहेगा। श्रीमती इंदिरा गांधी जी की हत्या फिर राजीव गांधी जी की हत्या जैसे दुखद प्रसंगों से देश परिचित हैं। इन कठिन परिस्थितियों के बीच सोनिया गांधी जी ने स्वयं को, अपने परिवार और राजनीतिक जीवन को किस तरह से संभाला, यह जानना पाठकों के लिए निश्चित रूप से दिलचस्प होगा। लोगों की दिलचस्पी अपने परिचित व्यक्तित्वों के संघर्षों को जानने में हमेशा रहती है। सोनिया गांधी जी का जीवन भी संघर्षों से भरा है।
    सोनिया जी का इटली में जन्म लेना और भारत आकर यहां के राजनीतिक सामाजिक जीवन का हिस्सा बनना भी आत्मकथा को इस नजरिए से देखा जाएगा।
    भारतीय राजनीति के अच्छे और बुरे दोनों पक्षों का उल्लेख भी आत्मकथा में होना स्वाभाविक है। ऐसे प्रसंगों के संदर्भ में मजबूत तथ्य और साक्ष्यों का होना बहुत महत्वपूर्ण है। पाठक इस बात पर विशेष ध्यान देंगे कि यह आत्मकथा केवल एक व्यक्ति के जीवन की कहानी न रहकर भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण दौर का दस्तावेज किस सीमा तक बन पाती है। वैसे भी आत्मकथा में तटस्थता के साथ ईमानदारी की अपेक्षा की जाती है। यह आत्मकथा भारत के बाहर भी पढ़ी जाएगी इसलिए इसमें लोग भारतीय राजनीति और उसके बदलते स्वरूप को एक अलग दृष्टिकोण से देखने का प्रयास किया जाएगा।
    प्रकाशक की ओर से पुस्तक प्रकाशन को लेकर जो स्थिति सामने आई है, उसने कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं। क्या इसकी वजह केवल तथ्यों की जांच से जुड़ी है प्रकाशकीय प्रक्रिया है, या इसके पीछे अन्य कोई कारण भी है, अभी यह स्पष्ट नहीं है। इसलिए इस विषय में अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले पुस्तक के वास्तविक प्रकाशन और उससे संबंधित आधिकारिक जानकारी की प्रतीक्षा करना उचित होगा।
    वर्तमान भारतीय राजनीति का स्तर भी कई स्तरों पर तीखे राजनीतिक मतभेदों और वैमनस्य से प्रभावित दिखाई देते हैं। ऐसे वातावरण में प्रमुख राजनीतिज्ञ व्यक्तित्व की आत्मकथा का सामने आना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक बहस को तीखा कर सकता है।
    अब यह देखना दिलचस्प रहेगा कि यह आत्मकथा कब प्रकाशित होती है और अपने मूल स्वरूप में कितनी सामने आती है। यदि सोनिया गांधी जी अपने अनुभवों और विचारों में किसी प्रकार का परिवर्तन स्वीकार नहीं करती है, तो पुस्तक का प्रकाशन निश्चित रूप से और अधिक उत्सुकता पैदा करेगा।
    संपादक जी ने इस आत्मकथा को केन्द्र में रखकर अच्छा संपादकीय लिखा है। इससे जुड़े विभिन्न कोणों को पाठक के सामने रखना और सोचने पर विवश करना संपादकीय की बड़ी उपलब्धि है।

  15. “पुरवाई’ की संपादकीय टीम के लिए साहित्य और पत्रकारिता राजनीति से अधिक महत्वपूर्ण है। ” ये मूल्य सराहनीय हैं । किसी भी साहित्यिक पत्रिका के लिए साहित्य राजनीति से ऊपर ही होना चाहिए। सोनिया गांधी की इस आत्मकथा के बारे में बहुत अधिक जानकारी हमें नहीं है किन्तु न जाने क्यों ऐसा लगता है कि इस पुस्तक के लिखे जाने के पीछे के कारणों में “राजनीति” सबसे प्रमुख कारण है; अन्यथा चीन और उसकी हमारी सीमा में घुसपैठ जैसे संवेदनशील विषयों से बचा जाता। छवि-प्रक्षालन के प्रयोजन से भी ऐसी आत्मकथाऍं लिख दी जाती हैं । यह देखने वाली बात थी कि इसमें सत्य के साथ कितनी सत्यता बरती गई थी। इन तमाम विषयों की वजह से पुस्तक को लेकर कौतूहल तो उपजा ही है।
    पुस्तक लिखी गई है तो प्रकाशित भी होगी आज नहीं तो कल ।
    बढ़िया संपादकीय के लिए साधुवाद!

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