Tuesday, September 8, 2026
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सोनिया गाँधी की प्रेम यात्रा…

ऐसा बहुत कम ही सुनने में आया है कि कोई प्रकाशक किसी महत्वपूर्ण पुस्तक को छापने के लिए हामी भरने के बाद अपने हाथ पीछे खींच ले। पुरवाई क्योंकि मूलतः साहित्यिक पत्रिका है, इसलिए ज़रूरी है कि हम अपने पाठकों को इस नए खड़े हुए विवाद की अधिक से अधिक जानकारी उपलब्ध करवा सकें।

हम जिस पुस्तक के बारे में बात करने जा रहे हैं, उसका नाम है- ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ़ लव’ (Belonging-A Journey of Love) और यह कांग्रेस की मुखिया श्रीमती सोनिया गाँधी की आत्मकथा है।

हुआ कुछ यूँ है कि सोनिया गाँधी ने पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया को अपनी आत्मकथा प्रकाशित करने के लिए पांडुलिपि सौंप दी। प्रकाशक ने प्रचार के लिए पुस्तक का कवर पेज भी जारी कर दिया, जो कि रंगीन होने के स्थान पर ब्लैक एंड व्हाइट है। शायद प्रकाशक कहने का प्रयास कर रहा था कि इस पुस्तक में सब ब्लैक एंड व्हाइट है- कुछ छिपाया नहीं गया है।

सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था कि अचानक एक समाचार उछला कि प्रकाशक ने सोनिया गाँधी से किताब के कुछ हिस्सों को संपादित करने और हटाने के लिए कहा था, जिससे उन्होंने इनकार कर दिया। इस कारण प्रकाशक ने पुस्तक को प्रकाशित करने से मना कर दिया और अपने हाथ पीछे खींच लिए।

ज़ाहिर है कि हर कोई यही सोच रहा है कि पुस्तक में ऐसा क्या लिखा गया था कि प्रकाशक को उसे छापने में असुविधा हो रही थी। क्या प्रकाशक पर कोई राजनीतिक दबाव थे, जिन्होंने उसे ऐसा निर्णय लेने पर बाध्य किया? याद रहे कि पुस्तक के लोकार्पण की तिथि भी घोषित कर दी गई थी – 10 नवंबर 2026…

आम तौर पर सोनिया गाँधी अपने बारे में बहुत कम बोलती हैं। मगर इस विषय में उन्होंने कहा, “मेरे परिवार के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है, लेकिन बहुत कम ही ऐसी बातें सामने आईं, जो उनके इरादों, उनके कामों और उनकी इंसानी कमियों की सच्चाई तक पहुँच पाईं।”

उन्होंने आगे कहा, “कई मायनों में, यह किताब उनके इंसानी पहलू को सम्मान देने वाली है। मेरी कहानी पाठकों को उन सामाजिक और राजनीतिक बदलावों का एक अनोखा नज़रिया भी देती है, जिन्हें मैंने अपने इस प्यारे देश में छह दशकों तक देखा है… दिल टूटने और नुकसान झेलने के बाद ही मैं राजनीति की सार्वजनिक दुनिया में आई। उससे पहले तक मैंने अपनी निजता को बहुत सख्ती से बचाकर रखा था।”

अपनी रचनात्मक प्रक्रिया के बारे में उन्होंने कहा- “अपनी ज़िंदगी के बारे में लिखना मेरे लिए आसान नहीं था। इसका मतलब था ख़ुद को खोलना, उन पलों और अनुभवों को साझा करना, जिन्हें मैंने हमेशा अपने अंदर छिपाकर रखा था। फिर भी, जैसे-जैसे मैं राजनीतिक दुनिया से दूर होती गई और मैंने जो कुछ भी देखा था, उस पर पीछे मुड़कर देखा, तो मेरी कहानी में गुँथे प्यार और वफ़ादारी के धागों ने ख़ुद को परिभाषित करना शुरू कर दिया, इटली के एक छोटे से शहर में मेरे बचपन की सादगी से लेकर, भारत में राजीव गाँधी की पत्नी और प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की बहू के तौर पर बिताए सालों की जटिलताओं तक।”

पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया का कहना है कि वे ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ़ लव’ को छापना चाहते थे, लेकिन उससे पहले “तथ्यों की जाँच” करना ज़रूरी था, लेकिन कांग्रेस के सूत्रों का कहना है कि पांडुलिपि के चरण में जो हिस्से सामने आए, वे मुख्य रूप से इन तीन विषयों से जुड़े थे।

प्रकाशकों ने तो इस विषय पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया कि उनके और सोनिया गाँधी के बीच क्या बातचीत हुई। मगर कांग्रेस के कुछ नेताओं ने बयान देते हुए कहा कि सोनिया गाँधी की आने वाली किताब के तीन हिस्सों को लेकर कांग्रेस नेता और पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया के बीच बातचीत हुई थी, जिसके बाद पब्लिशर ने देश में किताब को प्रकाशित न करने का फ़ैसला किया। ये हिस्से थे: भारत की सीमाओं पर चीन की घुसपैठ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लीडरशिप और केंद्र सरकार की नीतियाँ, और भारत के सामाजिक इतिहास में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका।

पहला मुद्दा चीन के साथ सीमा विवाद का था। सूत्रों के मुताबिक, इस किताब में भारतीय इलाके में चीन की घुसपैठ और सीमा पर मौजूदा हालात का विशेष तौर पर ज़िक्र किया गया है। यह ऐसा मुद्दा है, जिसे सोनिया गाँधी और उनके बेटे राहुल गाँधी (जो वर्तमान में लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं) की अगुवाई वाली कांग्रेस पार्टी ने संसद और उसके बाहर कई बार उठाया है।

सूत्रों ने बताया कि सोनिया गाँधी ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और काम करने के तरीके के साथ-साथ केंद्र सरकार की कई अहम नीतियों पर भी सवाल उठाए हैं।

तीसरा मसला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) का है, जो सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की मूल संस्था है और मोदी ने पूर्णकालिक राजनीति में आने से पहले इसी संगठन में काम किया था। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, इस संस्मरण में राष्ट्रीय मामलों और भारत के सामाजिक ताने-बाने पर आर.एस.एस. के प्रभाव के बारे में उनके विचार शामिल हैं।

बताया जा रहा है कि जब पेंगुइन इंडिया ने किताब के कुछ हिस्सों को संपादित करने और कुछ हिस्सों को हटाने का प्रस्ताव रखा, तो सोनिया गाँधी ने इसे ठुकरा दिया। उनका कहना था कि किताब में दिए गए तथ्य और विचार उनके अपने अनुभव और नज़रिए पर आधारित हैं, इसलिए उनमें कोई बदलाव नहीं किया जा सकता। कांग्रेस ने इस मामले को लेकर बीजेपी पर निशाना भी साधा है, पार्टी सूत्रों ने किताब को लेकर बने दबाव को “भाजपा की सोची-समझी चाल” बताया है।

पेंगुइन रैंडम हाउस की भारतीय शाखा ने कहा कि वे कभी भी इस किताब के प्रकाशक नहीं रहे हैं। बयान में आगे कहा गया, “एक प्रकाशक के तौर पर, तथ्यों की जाँच करना और लेखकों को ऐसी सलाह देना, जो उनकी किताबों के लिए सबसे अच्छी हो, हमारा अधिकार और ज़िम्मेदारी दोनों है। यह प्रकाशन प्रक्रिया का एक सामान्य हिस्सा है।”

प्रकाशकों ने आगे कहा, “इस मामले से जुड़ी बातचीत के दौरान पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया का रुख यही रहा कि हम किताब को प्रकाशित करने के लिए तैयार और इच्छुक थे। हम लेखक के साथ हुई गोपनीय बातचीत पर और कोई टिप्पणी नहीं करेंगे।” यह एक ज़िम्मेदार और परिपक्व तरीका कहा जा सकता है।

इस सप्ताह हम पर बहुत दबाव था कि हम राहुल गाँधी के मनुस्मृति और महिलाओं के बलात्कार पर दिए गए बयानों पर संपादकीय लिखें। यह भी कहा गया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत पर न्यूयॉर्क के मेयर ममदानी ने जो रवैया अपनाया है, उस पर लिखा जाए। कनाडा और ब्रिटेन में भी मोहन भागवत को प्रवेश न देने पर नारेबाज़ी हो रही है… मगर ‘पुरवाई’ की संपादकीय टीम के लिए साहित्य और पत्रकारिता राजनीति से अधिक महत्वपूर्ण है। इसलिए आज आपके लिए ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ़ लव’ यानी कि सोनिया गाँधी की प्रेम यात्रा लेकर आए हैं हम!

तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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54 टिप्पणी

  1. “पुरवाई “ की यह सोच महत्त्वपूर्ण है कि
    “साहित्य और पत्रकारिता राजनीति से अधिक महत्वपूर्ण है। “
    इस अवधारणा के मद्देनज़र
    सम्पादकीय में उल्लिखित तथ्य प्रकाशक की सामाजिक ज़िम्मेदारी और राष्ट्रीय कर्तव्य के विचारों पर निर्भर करता है कि वह किस पुस्तक को किस रूप में प्रकाशित करेगा । लेखक के लिए विषयवस्तु की पक्षधरता और स्वतंत्रता हो सकती है, प्रकाशक के लिए नहीं । यह तथ्य सम्पादकीय में प्रख्यात साहित्यकार- सम्पादक श्री तेजेंद्र शर्मा द्वारा दी गई जानकारी से सामने आता है ।
    साहित्यिक पत्रिका ‘पुरवाई’ की सोच का फलक विशाल है इसलिए ऐसा विषय भी उस दायरे में आना लाजिमी है।राजनीतिक विचारधाराओं में अन्तर्विरोधों का होना स्वाभाविक है । इसे किसी आत्मकथा के रूप में समाहित किया जाता है तो यह लेखक के निजी विचार हैं । जिसके लिए वह स्वयं उत्तरदायी होता है । ऐसी पुस्तकों का साहित्यिक स्तर और सामाजिक प्रभाव प्रश्नांकित हो सकता है।
    सम्पादक को “पुरवाई” के इस अंक के लिए शुभकामनाएँ ।
    साहित्यिक विधाओं से सम्बन्धित विषय पठनीय हैं ।
    बहुत बधाई ।
    —-
    मीनकेतन प्रधान

    • भाई मीनकेतन जी, आपने संपादकीय के कई पहलुओं पर नज़र डाली है और सार्थक टिप्पणी लिखी है। स्नेह बनाए रखें।

  2. इस बार के संपादकीय में बहुत ही महत्वपूर्ण सूचना से पाठकों को अवगत करवाया है।सोनिया गाँधी की आत्मकथा पर विवाद होना अचंभित नही कर रहा।यह किसी सामान्य महत्वपूर्ण व्यक्ति की आत्मकथा नही है।वह कितने ही उतार -चढ़ाव ,उथल-पुथल की साक्षी रही होंगी।आज वह विपक्ष में हैं ,सत्ता में बी.जे.पी.,यदि वह दोनों को खुश करने के लिए बाध्य की जाती हैं तो उनका अपना नजरिया कहाँ रह जाए गा। हाँ राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा हो तो रोक लगाना न्यायोचित है।यहाँ राजनैतिक दबाव तो आएगा ही,उससे वह बच नही पाएं गी।

  3. आत्मकथा लिखना मतलब अपनी जीवन यात्रा के बारे में लिखना। जब लेखक किसी सरकारी अथवा राजनीतिक पद पर नहीं है तो चीन की घुसपैठ या देश के प्रधानमंत्री की नीतियों के बारे में अपनी आत्मकथा में लिखना क्या जायज़ होगा? लेखक को अपने जीवन,अपने कार्यकलापों के बारे में सच्चाई से लिखना चाहिए। सम्पादकीय में लेखक ने बेबाकी से अपने विचार व्यक्त किए हैं

  4. राजनीति मेरा विषय नहीं है पर आजकल राजनीति के नाम पर जो भाषा प्रयोग में लाई जा रही है और मानसिक व शारीरिक अत्याचार हो रहे हैं, वे दुखद है.आपने साहित्यिक पक्ष को प्राथमिकता दी यह सुखद है.

  5. आपने सही कार्य किया है सोनिया गांधी के बारे में जानकारी देकर। पुरवाई का अंक सदा से निष्पक्ष,सही विचार और ज्वलंत मुद्दे को लेकर सुर्खियों में रहता है। सोनिया जी की पुस्तक आती तो बहुत सारे तथ्य उजागर होते। पर एक जिज्ञासा आपने मोहन भागवत वाले तथ्य पर क्यों नहीं लिखा। और सभी स्तंभ काफी अच्छे हैं।आज भारत की राजनीति में जिस भाषा शब्द का प्रयोग हो रहा निंदनीय है।

  6. मेरे विचार में पेंग्विन इंडिया ने सोनिया जी आत्मकथा के कथ्य का संपादन करने की चेष्टा करके भूल की है! यदि विवादित अंश मिथ्या धारणाओं पर आधारित हैं तो लेखिका पहचानी जाती और यदि सरकार के लिए असहज तथ्यों पर आधारित हैं तो सरकार बेनकाब होती! दोनों ही सूरतों में पुस्तक अपने उद्देश्य का निर्वाह कर सकती थी। यदि दबाव में छापने से इंकार किया है तो यह प्रकाशन संस्था और सरकार दोनों की छवि को बट्टा लगाएगा और यदि कथ्य को सुधारने की नीयत से इंकार किया है तो यह अनधिकार चेष्टा माना जाएगा! देश में न छाप कर विदेशों में बिक्री बढ़ाने का विज्ञापनी हथकंडा है तो और भी निंदनीय है।

  7. आत्मकथा विवादित होती जाएगी अनुवाद बढ़ेंगे लोग पढ़ेंगे। आपकी बात संतुलित और साफ है। अभी आत्मकथा के विषय में कुछ कहना जल्दबाजी होगी।

  8. प्रोफेसर (डॉ.) अश्विनीकुमार शुक्ल, सेवानिवृत्त प्रोफेसर (डॉ.) अश्विनीकुमार शुक्ल, सेवानिवृत्त

    ‘पुरवाई’ एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका है और समसामयिक विषय पर संपादकीय प्रकाशित करके यह अन्य पत्रिकाओं से आगे निकल गई है। निजी तौर पर मेरा यह कहना है कि आजकल प्रकाशनाधीन पुस्तक पर विवाद खड़ा करके चर्चा में लाने की प्रवृत्ति बन गई है, क्योंकि इस प्रकार के विवाद से पुस्तक का अघोषित प्रचार और विज्ञापन हो जाता है।

  9. समकालीन मुद्दों पर लिखते समय बहुत से लोग एक पक्षीय ही लिखा करते हैं, परंतु आपकी खासियत है कि आप हर बात को न्याय के तराजू पर तौल कर ही तथ्यों को ही सामने लाते हैं। हमें इस पर गर्व है।

  10. अखबार में यह खबर पढ़ी थी पर आपके संपादकीय से विस्तृत जानकारी मिली। तथ्यों की सत्यता जांचना, प्रकाशक का काम है। शेष जितना विवाद बढ़ेगा लोगों की रुचि किताब की तरफ बढ़ती जायेगी।
    बहुत ही बढ़िया व ज्वलंत विषय पर संपादकीय।

  11. तेजेंद्र शर्मा का यह संपादकीय ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ़ लव’ के बहाने साहित्य, राजनीति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के जटिल संबंधों को सामने लाता है। सोनिया गाँधी की आत्मकथा के प्रकाशन से जुड़े विवाद, प्रकाशक द्वारा तथ्य-जाँच और कथित संपादन के आग्रह को लेखक ने रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है। संपादकीय की विशेषता यह है कि यह सीधे राजनीतिक पक्षधरता में जाने के बजाय पुस्तक और प्रकाशन-संस्कृति के प्रश्न को केंद्र में रखता है। भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और जिज्ञासा जगाने वाली है। अंततः यह संपादकीय पाठक के मन में एक महत्वपूर्ण सवाल छोड़ता है—क्या आत्मकथा से असहज सत्य हटाए जा सकते हैं?

    Dr Vijai Dikshit

  12. विजय भाई, आपने लिखा है कि – “संपादकीय की विशेषता यह है कि यह सीधे राजनीतिक पक्षधरता में जाने के बजाय पुस्तक और प्रकाशन-संस्कृति के प्रश्न को केंद्र में रखता है। भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और जिज्ञासा जगाने वाली है। अंततः यह संपादकीय पाठक के मन में एक महत्वपूर्ण सवाल छोड़ता है—क्या आत्मकथा से असहज सत्य हटाए जा सकते हैं?”… आसानी से कहा जा सकता है कि आपके शब्द संपादकीय के लिये बेहतरीन शाबाशी है।

  13. ज्वलंत विषय है
    आपने अच्छा लिखा
    राजनीतिक विषय आने स्वाभाविक हैं आत्मकथा में,अगर व्यक्ति राजनीति से जुड़ा है। परन्तु आखिर वे विषय कैसे आए हैं यह महत्वपूर्ण है।.

    अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या ?

    कोई स्वतंत्रता देश की गोपनीयता और अखंडता से आगे…

    पुस्तक तो कहीं नहीं कहीं से आ ही जाएगी ख़ैर
    विवाद उसमें जिज्ञासा अवश्य जगा देगा।

  14. अभी तक इसे कम लोग जानते थे लेकिन इस विवाद के बाद इसे लोग न केवल जान गए ब्लकि अब पढ़ना भी चाहेंगे बाकी चीन का समर्थन और देश पर झूठ बोलना, RSS और पीएम मोदी को गलत कहना उनका प्रिय विषय है…इसमें कुछ भी नया नहीं है..इसे बाजार की रणनीति कह सकते हैं..

  15. ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ़ लव’ की पहले लोकार्पण की तिथि निर्धारित कर देना और फिर उसे प्रकाशित करने से अस्वीकार कर देना, वास्तव में कई प्रश्न उत्पन्न करता है। क्या प्रकाशक के ऊपर कोई राजनीतिक दबाव था या सचमुच उसके इस कथन में सच्चाई है कि तथ्यों की जांच करना जरूरी था।
    आपके संपादकीय में दिए गए तथ्य के अनुसार पहला मामला भारत पर चीन की घुसपैठ का, दूसरा प्रधानमंत्री की लीडरशिप और केंद्र सरकार की नीतियों का तथा तीसरा मामला भारत के सामाजिक इतिहास में आर.एस.एस. की भूमिका का है। सूत्रों ने बताया कि सोनिया गांधी ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और काम करने के तरीके के साथ-साथ केंद्र सरकार की कई अहम नीतियों पर सवाल उठाए हैं। सोनिया गांधी विरोधी पार्टी से हैं कांग्रेस और बीजेपी की विचारधारा भिन्न है अतः सोनिया गांधी जो लिखेंगी, वह मोदी के विरोध में तो होगा ही; हां इतना ध्यान ज़रूर होना चाहिए कि देश के बारे में कोई ऐसी बात न हो, जो देश के लिए हितकारी न हो।
    पुस्तक प्रकाशित होगी, यहां नहीं विदेश में होगी। चर्चा में रहकर इसकी लोकप्रियता और बढ़ेगी। महत्वपूर्ण संपादकीय के लिए धन्यवाद स्वीकार करें

  16. इस बार का संपादकीय “सोनिया गांधी की प्रेम यात्रा…” दमदार संपादकीय है। कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी जी की आत्मकथा ‘बिलाॅन्गिंग: अ जर्नी ऑफ लव’ प्रकाशित हो और राजनीतिक हलकों में हलचल न हो ऐसा संभव नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि हलचल के बीच प्रकाशक की ओर से पुस्तक प्रकाशित न करने की खबर आ गई ।
    सोनिया गांधी जी भारतीय राजनीति का एक बड़ा व्यक्तित्व है। मुख्य विपक्षी दल की प्रमुख होने के नाते सत्ता पक्ष की कमजोरियों और सरकार की नीतियों पर उनकी अपनी दृष्टि जरूर आई होगी। ऐसे में यह मानकर चलना चाहिए कि जब भी यह पुस्तक प्रकाशित होगी, इसके कुछ अंश राजनीतिक बहस के विषय बन सकते हैं।
    आत्मकथा लिखना आसान नहीं होता है। विशेषकर तब, जब लेखक का जीवन देश की राजनीति के इतने महत्वपूर्ण दौर से जुड़ा हो। उसमें अपने जीवन के कई अनुछुए पहलुओं को सामने रखना पड़ता है। खासकर उन प्रसंगों को भी जो बेहद निजी होते हैं। बचपन से लेकर शादी तक का वाकया पाठकों की जिज्ञासा का केन्द्र रहेगा। श्रीमती इंदिरा गांधी जी की हत्या फिर राजीव गांधी जी की हत्या जैसे दुखद प्रसंगों से देश परिचित हैं। इन कठिन परिस्थितियों के बीच सोनिया गांधी जी ने स्वयं को, अपने परिवार और राजनीतिक जीवन को किस तरह से संभाला, यह जानना पाठकों के लिए निश्चित रूप से दिलचस्प होगा। लोगों की दिलचस्पी अपने परिचित व्यक्तित्वों के संघर्षों को जानने में हमेशा रहती है। सोनिया गांधी जी का जीवन भी संघर्षों से भरा है।
    सोनिया जी का इटली में जन्म लेना और भारत आकर यहां के राजनीतिक सामाजिक जीवन का हिस्सा बनना भी आत्मकथा को इस नजरिए से देखा जाएगा।
    भारतीय राजनीति के अच्छे और बुरे दोनों पक्षों का उल्लेख भी आत्मकथा में होना स्वाभाविक है। ऐसे प्रसंगों के संदर्भ में मजबूत तथ्य और साक्ष्यों का होना बहुत महत्वपूर्ण है। पाठक इस बात पर विशेष ध्यान देंगे कि यह आत्मकथा केवल एक व्यक्ति के जीवन की कहानी न रहकर भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण दौर का दस्तावेज किस सीमा तक बन पाती है। वैसे भी आत्मकथा में तटस्थता के साथ ईमानदारी की अपेक्षा की जाती है। यह आत्मकथा भारत के बाहर भी पढ़ी जाएगी इसलिए इसमें लोग भारतीय राजनीति और उसके बदलते स्वरूप को एक अलग दृष्टिकोण से देखने का प्रयास किया जाएगा।
    प्रकाशक की ओर से पुस्तक प्रकाशन को लेकर जो स्थिति सामने आई है, उसने कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं। क्या इसकी वजह केवल तथ्यों की जांच से जुड़ी है प्रकाशकीय प्रक्रिया है, या इसके पीछे अन्य कोई कारण भी है, अभी यह स्पष्ट नहीं है। इसलिए इस विषय में अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले पुस्तक के वास्तविक प्रकाशन और उससे संबंधित आधिकारिक जानकारी की प्रतीक्षा करना उचित होगा।
    वर्तमान भारतीय राजनीति का स्तर भी कई स्तरों पर तीखे राजनीतिक मतभेदों और वैमनस्य से प्रभावित दिखाई देते हैं। ऐसे वातावरण में प्रमुख राजनीतिज्ञ व्यक्तित्व की आत्मकथा का सामने आना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक बहस को तीखा कर सकता है।
    अब यह देखना दिलचस्प रहेगा कि यह आत्मकथा कब प्रकाशित होती है और अपने मूल स्वरूप में कितनी सामने आती है। यदि सोनिया गांधी जी अपने अनुभवों और विचारों में किसी प्रकार का परिवर्तन स्वीकार नहीं करती है, तो पुस्तक का प्रकाशन निश्चित रूप से और अधिक उत्सुकता पैदा करेगा।
    संपादक जी ने इस आत्मकथा को केन्द्र में रखकर अच्छा संपादकीय लिखा है। इससे जुड़े विभिन्न कोणों को पाठक के सामने रखना और सोचने पर विवश करना संपादकीय की बड़ी उपलब्धि है।

    • भाई लखन लाल पाल जी आपने अपनी विस्तृत टिप्पणी में हमेशा की तरह कई मुद्दे उठाए हैं। इनसे पाठकों को संपादकीय समझने में सहायता मिलेगी। आपका हमेशा की तरह बहुत शुक्रिया।

  17. “पुरवाई’ की संपादकीय टीम के लिए साहित्य और पत्रकारिता राजनीति से अधिक महत्वपूर्ण है। ” ये मूल्य सराहनीय हैं । किसी भी साहित्यिक पत्रिका के लिए साहित्य राजनीति से ऊपर ही होना चाहिए। सोनिया गांधी की इस आत्मकथा के बारे में बहुत अधिक जानकारी हमें नहीं है किन्तु न जाने क्यों ऐसा लगता है कि इस पुस्तक के लिखे जाने के पीछे के कारणों में “राजनीति” सबसे प्रमुख कारण है; अन्यथा चीन और उसकी हमारी सीमा में घुसपैठ जैसे संवेदनशील विषयों से बचा जाता। छवि-प्रक्षालन के प्रयोजन से भी ऐसी आत्मकथाऍं लिख दी जाती हैं । यह देखने वाली बात थी कि इसमें सत्य के साथ कितनी सत्यता बरती गई थी। इन तमाम विषयों की वजह से पुस्तक को लेकर कौतूहल तो उपजा ही है।
    पुस्तक लिखी गई है तो प्रकाशित भी होगी आज नहीं तो कल ।
    बढ़िया संपादकीय के लिए साधुवाद!

    • रचना आप हमेशा उल्लेखनीय टिप्पणी लिखती हैं। इस बार में सवाल उठाए हैं। दिल से शुक्रिया।

  18. एक समीचीन ,नितांत आवश्यक मुद्दे को साहित्यिक पत्रिका होने के नाते इसे उठाना और रोचक परंतु सजग अंदाज़ में उठाना,,,यह संपादक की लेखन कला और सरोकार की अनूठी बानगी है। यद्यपि यह मुद्दा जोरों शोरों से आया उठा और दूध के उफ़ान की मानिंद बैठ कर सो गया!!!!
    पुरवाई पत्रिका के संपादकीय ने इसे समग्रता और वैशिष्ट्य से सुरुचिपूर्ण और बेहद मर्यादित अंदाज में पाठकों को परोसा या प्रस्तुत किया है।
    भारत का लोकतंत्र ही है कि विदेशी मूल के लोगों को अपना भाग्यविधाता बना देता है और कर्तव्य शून्यता की स्थिति में सिंहासन से पदच्युत भी बस वोट से कर देता है और हाँ केवल पदच्युत?!!
    यदि कोई स्थिति परिस्थिति या संवेदना या संवाद श्रृंखला समय के रथ पर औचित्य के कवच और ज्ञानास्त्र से विभूषित हो कर आती है तो उसे पुनः सिंहासन पर आरूढ़ भी कराया जा सकता है और यह परंपरा पिछ्ले सत्तर या उन्यासी वर्षों से प्रचलित है।
    पुस्तकीय मुद्दा रहा है ,इस बार के संपादकीय में जो प्रशंसनीय और अनुकरणीय दोनों ही है।
    पुनः बधाई हो संपादक महोदय।

    • भाई सूर्य कांत जी, आपने लिखा है कि – “एक समीचीन, नितांत आवश्यक मुद्दे को साहित्यिक पत्रिका होने के नाते इसे उठाना और रोचक परंतु सजग अंदाज़ में उठाना… यह संपादक की लेखन कला और सरोकार की अनूठी बानगी है।… पुरवाई पत्रिका के संपादकीय ने इसे समग्रता और वैशिष्ट्य से सुरुचिपूर्ण और बेहद मर्यादित अंदाज में पाठकों को परोसा या प्रस्तुत किया है।” … इस बेहतरीन टिप्पणी के लिये हार्दिक आभार।

  19. बिलोगिंग…सोनिया गाँधी की प्रेम कहानी में क्या होगा, सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है क्योंकि अगर पक्ष -विपक्ष के नजरिये से देखा जाए तो किसी भी राजनायिक का जीवन एक खुली किताब होता है। कांग्रेस की नीतियाँ, चीन से प्रेम, मोदी सरकार और RSS से नफरत जगजाहिर है, अतः इस सम्बन्ध में उनके विचार किसी से छिपे नहीं हैं और न ही उन्होंने छिपाने की कोशिश की होगी। हाँ, कुछ अँधेरी गलियां भी हो सकती हैं जिनको चाहकर भी कोई उजागर नहीं करना चाहेगा। जहाँ तक कि प्रकाशक की स्वीकृति मिलने के पश्चात् भी कुछ बिन्दुओं पर असहमति के कारण प्रकाशन न करने का निर्णय, मेरे विचार से पब्लिसिटी स्टंट अधिक है जैसे जरनल नरवणे की पुस्तक के समय हुआ था।
    सामयिक विषय पर बेबाकी से कलम चलाने के लिए साधुवाद। निकट भविष्य में आरएसएस और मनुस्मृति पर भी आपका आलेख पढ़ना चाहूँगी।

  20. भारत में न सही अमेरिकी पब्लिशर छाप ही रहा है इसे। पता नहीं चीन के साथ कांग्रेस पार्टी के एक विवादित किंतु अभी तक अज्ञात समझौते का जिक्र इसमें है या नहीं?

  21. आत्मकथा अगर आत्मा से लिखी जाए तो दिल पर दस्तक देती है और अगर दिमाग से लिखी जाए तो दिल पर चोट करती है बढ़िया संपादकीय

  22. सोनिया गाँधी की आत्मकथा को लेकर उठा यह विवाद निश्चित ही साहित्य, प्रकाशन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, तीनों से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है। संपादकीय ने पूरे घटनाक्रम को रोचक ढंग से सामने रखा है और पाठक के मन में यह जिज्ञासा भी जगाई है कि आखिर पुस्तक में ऐसा क्या है, जिस पर मतभेद पैदा हुआ। किसी भी आत्मकथा में लेखक के अनुभव और दृष्टिकोण का सम्मान होना चाहिए, वहीं तथ्यों की पुष्टि भी प्रकाशक की जिम्मेदारी है। अगर बात तथ्यों की नहीं है तो यह प्रचार है और कुछ नहीं। शानदार संपादकीय के लिए साधुवाद!

    • पूनम आपने कहा है कि – संपादकीय ने पूरे घटनाक्रम को रोचक ढंग से सामने रखा है और पाठक के मन में यह जिज्ञासा भी जगाई है कि आखिर पुस्तक में ऐसा क्या है, जिस पर मतभेद पैदा हुआ। – इस मामले में संपादकीय सफल कहा जा सकता है। हार्दिक धन्यवाद।

  23. जैसी की उम्मीद थी उसी के अनुसार किताब पर विवाद हुआ । आत्मकथाएँ व्यक्ति के नजरिए का उद्घोष होती हैं । मैं और मेरे नजरिए का तथ्य आधारित होना जरूरी है । लेकिन अक्सर ऐसा होता नहीं है । पहले भी ऐसी साहित्यिक किताबें पढ़ चुकी हूँ , जहां कटघरे में खड़े किए गए व्यक्ति का उत्तर जानने की उत्कंठा हुई । फिर भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से भी इनकार नहीं किया जा सकता । किसी भी समस्या के लिए लेखक प्रकाशक का आपसी संवाद आवश्यक पहलू है । वैसे किताब का विवादित होना प्रकाशक को आर्थिक लाभ ही पहुंचाता है और किताब को चर्चित करता है। ऐसे में जब प्रकाशक इसे विदेशों में प्रकाशित कर ही रहा है तो क्या पता भारत में ये मार्केटिंग स्कीम ही निकले। खैर जो भी हो किताब का स्वागत है और सोनिया गांधी जी के नजरिए को जानने समझने का भी । इस महत्वपूर्ण संपादकीय के लिए आभार ।

    • वंदना जी, यह नज़रिया – किसी भी समस्या के लिए लेखक प्रकाशक का आपसी संवाद आवश्यक पहलू है । वैसे किताब का विवादित होना प्रकाशक को आर्थिक लाभ ही पहुंचाता है और किताब को चर्चित करता है। – संपादकीय और विवाद दोनों पर प्रकाश डालता है। आपका हार्दिक धन्यवाद।

  24. साहित्यिक स्वायत्तता और राजनीतिक दबाव में ‘पुरवाई’ के संपादक महोदय का स्वतंत्र रुख अच्छा लगा l आदरणीय तेजेंद्र जी का यह महत्वपूर्ण संपादकीय प्रतिष्ठित नेत्री की आगामी प्रकाशित आत्म कथा ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ़ लव’ को लेकर उठे विवाद और पेंगुइन इंडिया के बयान साहित्यिक स्वतंत्रता, प्रकाशन नैतिकता और राजनीतिक प्रभाव के बीच एक संवेदनशील बहस को जन्म दे सकता है । पुस्तक में चीन सीमा विवाद, नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) के सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव जैसे ज्वलंत मुद्दों पर बेबाक राय शामिल होना यह दर्शाता है कि संपादकीय केवल व्यक्तिगत अनुभवों तक सीमित न होकर समकालीन भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ भी है।​पेंगुइन रैंडम हाउस का यह रुख कि तथ्यों की जाँच करना जहां प्रकाशन घर के परिपक्व व्यावसायिक दृष्टिकोण को रेखांकित करता है वहीं दूसरी ओर, सोनिया गाँधी द्वारा किसी भी तरह के संपादन या बदलाव को स्वीकार न करना एक लेखक के अपनी मौलिक अभिव्यक्ति और व्यक्तिगत अनुभवों पर दृढ़ रहने के अधिकार को दर्शाता है।
    ​इस पूरे प्रकरण में तेजेंद्र जी की संपादकीय नीति विशेष रूप से ध्यानाकर्षण योग्य है। वर्तमान समय में, जब मुख्यधारा मीडिया अक्सर राजनीतिक बहसों, बयानों और आरोप-प्रत्यारोपों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहता है, तब ‘पुरवाई’ का राजनीतिक दबावों से दूर रहकर साहित्य और रचनात्मक पत्रकारिता को प्राथमिकता देना एक सराहनीय निर्णय है।​राजनीतिक विवादों और शोर-शराबे के बीच किसी कृति के साहित्यिक मूल्य और उसके मानवीय पक्ष (‘ए जर्नी ऑफ़ लव’) को केंद्र में रखना यह साबित करता है कि तेजेंद्र जी का एक पत्रकार ki भुमिका में मूल उद्देश्य केवल सनसनीखेज राजनीतिक घटनाक्रमों को कवर करना नहीं, बल्कि विचारों की मौलिकता और साहित्यिक प्रतिबद्धता को बनाए रखना भी है। ..संपादकीय सनसनीखेज है .. पर संपादक महोदय के लेखन कौशल ने इसे पटल पर विवादित होने से बचा लिया है … और लिखा इतनी बारीकी से कि एक शायर का कहा स्मरण हो उठा:
    *मिलो दोस्तों से, हँसो बतियाओ*
    *बहुत कुछ कहो पर कुछ न बताओ*

    • किरण जी, आपका कहना है कि – वर्तमान समय में, जब मुख्यधारा मीडिया अक्सर राजनीतिक बहसों, बयानों और आरोप-प्रत्यारोपों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहता है, तब ‘पुरवाई’ का राजनीतिक दबावों से दूर रहकर साहित्य और रचनात्मक पत्रकारिता को प्राथमिकता देना एक सराहनीय निर्णय है।​ – यह पुरवाई टीम के लिये बहुत उत्साहवर्धक टिप्पणी है। आपने निजी तौर पर संपादक की भी सराहना की है। स्नेह बनाए रखें।

  25. जितेन्द्र भाई: बहुत बढ़िया विषय चुना आपने इस बार। छ: दशक से ऊपर राज्य करने के बाद कांग्रेस की श्रेष्ठ नेता सोनिया गांधी एकाएक नींद से जागी और अपनी आत्मकथा लिखने का फ़ैसला लिया। सत्ता हाथ से निकल जाने के बाद, विपक्ष में रहकर, जो गांधी परिवार ने अपना भारत प्रेमी चरित्र दिखाया है वो सब को पता है। अब तो यह देखना है कि, सोनिया गांधी के, अपने अन्दर छिपाए हुए कौन कौन से अनुभव साझा होते हैं और उन में गुँथे हुए प्यार और वफ़ादारी के धागे क्या क्या परिभाषित करते हैं। मुझे तो यह पुस्तक एक पब्लिसिटी स्टंट लगती है। बाकी समय बताएगा जब इसे पढ़ने का मौका मिलेगा।

    “लम्हों ने ख़ता की थी/सदियों ने सज़ा पाई”। क्या चीन के मुद्दे को लेकर, इस पुस्तक में, 1962 की लड़ाई का ज़िक्र होगा जिस में भारत ने मुँह की खाई थी ओर उसके लिए कौन ज़िम्मेवार था? हो सकता है, सोनिया जी, अपने लेखन में, चीन की घुसपैठ और सीमा पर मौजूद हालात का कोई हल सुझा दें।

    नरेंद्र मोदी के काम करने के तरीके पर और उनकी सरकार की अहम नीतियों पर कुछ कहने से पहले ज़रा अपने ग्रेबान में झाँक कर देख लें कि अपने राजयकाल में नेहरू/गान्धी परिवार का क्या इतिहास रहा है। अब रही बात RSS कि, इसके बारे में सिवाए नफ़रत करने के इलावा तुम और क्या जानते हो। इन देशभक्तों से कुछ सीखो।

    इस सब के बावजूद भी पुस्तक पढ़ने का अपना ही आनन्द होगा। पुस्तक का बेसब्री से इन्तज़ार रहेगा।

  26. सादर नमस्कार सर…..
    बहुत सुंदर प्रभावी विचारणीय संपादकीय है…
    पुस्तक आती तो सच -झूठ का पता चलता…. नहीं आई है.. तो भविष्य में आने की संभावना अवश्य होगी…

    साधुवाद….

  27. आदरणीय तेजेन्द्र जी!

    इस बार का संपादकीय सोनिया गाँधी की प्रस्तावित आत्मकथा Belonging: A Journey of Love के प्रकाशन-विवाद, साहित्य, राजनीति, स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वायत्तता से संदर्भित प्रश्न उठाता है।
    सबसे पहले तो शीर्षक ने ही आकर्षित किया।
    प्रेम कहानी चाहे जिस किसी की भी हो पाठकों का ध्यान आकर्षित करती ही है और अगर चरित्र राजनीतिक और वह भी महत्वपूर्ण पात्र है, तो यह ध्यानकर्षण का केंद्र वाली बात है। जानने की जिज्ञासा कई गुना बढ़ जाती है।

    एक बात जो महत्वपूर्ण लगी कि इस बार आपने अपेक्षाकृत ताजा और विवादित प्रसंग को साहित्यिक पत्रकारिता के दायरे में लाने का प्रयास किया है। आरंभ में ही यह कहना कि,” “किसी प्रकाशक द्वारा प्रकाशन की स्वीकृति देने के बाद पीछे हटना असामान्य घटना है।” पाठक की जिज्ञासा को तुरंत जाग्रत करता है। इसके बाद पुस्तक, प्रकाशक, प्रस्तावित प्रकाशन-तिथि और विवाद के संभावित कारण विषय के प्रति वैचारिक प्रतिबद्धता जाग्रत करते हैं।

    पढ़कर महसूस हुआ कि यह संपादकीय उस व्यापक प्रश्न को सामने लाता है कि जब किसी लेखक की निजी स्मृतियाँ राजनीति के सार्वजनिक और विवादास्पद प्रश्नों से टकराती हैं,तब साहित्य और प्रकाशन की स्वतंत्रता की सीमाएँ कहाँ निर्धारित होती हैं?

    जैसा की शीर्षक है,”सोनिया गाँधी की प्रेम यात्रा”!
    संपादकीय को पढ़ने के बाद प्रतीत हुआ कि यह सिर्फ दांपत्य प्रेम का संकेत नहीं देता, बल्कि सोनिया गाँधी द्वारा अपने जीवन को प्रेम, परिवार, निष्ठा,निजी दर्दनाक और बेहद करुण भारी क्षति के साथ सार्वजनिक जीवन से जोड़कर देखने की कोशिश का प्रयास है।

    संपादकीय में उद्धृत सोनिया गाँधी के कथनों से भी यही भाव उभरता है कि उनकी जीवन-कथा केवल राजनीतिक घटनाओं का विवरण नहीं, बल्कि निजी अनुभवों और संबंधों की कहानी है। इटली के छोटे से शहर में बचपन से लेकर भारत में राजीव गाँधी की पत्नी और इन्दिरा गाँधी की बहू बनने तक की यात्रा को जिस तरह निजी जीवन से सार्वजनिक राजनीति तक प्रस्तुत किया गया है, उससे पुस्तक का मानवीय पक्ष तो महसूस होता है।

    आपके संपादकीय की तारीफ इसलिये की जानी चाहिए कि आपने सोनिया गाँधी को केवल एक राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत नहीं किया बल्कि उनके अपने कथनों के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया कि आत्मकथा उनके लिए आत्म-उद्घाटन की कठिन प्रक्रिया रही होगी। संभवतः यहीं संपादकीय का साहित्यिक उजला पक्ष नजर आता है।

    आत्मकथा जीवन में घटी घटनाओं की यात्रा मात्र नहीं होती, वह स्मृतियों,अनुभवों और आत्मदृष्टि की रचनात्मकता होती है। व्यक्ति अपने अतीत को वर्तमान की चेतना से देखकर उसका अर्थ निर्धारित करता है।इसीलिये आत्मकथा में ‘तथ्य’ और ‘दृष्टिकोण’ दोनों की महत् भूमिका ,होती है।

    संपादकीय भी अप्रत्यक्ष रूप से इसी प्रश्न की ओर इशारा करता प्रतीत हुआ है कि किसी लेखक के निजी अनुभवों को प्रकाशन-पूर्व संपादन के नाम पर क्यूँकर और कितना बदला जा सकता है?

    संपादकीय में सबसे अधिक चर्चित हिस्सा पुस्तक के उन कथित अंशों से संबंधित है जिनका संबंध चीन के साथ सीमा विवाद से, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व व केंद्र सरकार की नीतियों से तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका से संबंधित है।

    यहाँ संपादकीय का साहित्य से विषयगत राजनीति के क्षेत्र में प्रवेश करना संपादकीय का उसका अपना सामर्थ्य भी है और उसकी सीमा भी।
    सामर्थ्य इस दृष्टि से कि आत्मकथा यदि किसी ऐसे व्यक्ति की है जिसने दशकों तक भारतीय राजनीति के केंद्र में रहकर घटनाओं को देखा है, तो उसकी राजनीतिक स्मृतियाँ स्वाभाविक रूप से सार्वजनिक महत्व रखती हैं। लेकिन सीमा इसलिये कि इन दावों का बड़ा हिस्सा ‘सूत्रों के अनुसार’ अथवा ‘कांग्रेस सूत्रों के अनुसार’ पर आधारित है।
    इसलिये महसूस हुआ कि विवरण उपलब्ध समाचारों और सूत्रों पर आधारित हैं।

    जैसा कि प्रकाशक पेंगुइन इंडिया कि भारतीय शाखा का कहना था कि,” एक प्रकाशक के तौर पर तथ्यों की जाँच करना और लेखकों को ऐसी सलाह देना जो उनकी किताबों के लिए सबसे अच्छी हो, हमारा अधिकार और ज़िम्मेदारी दोनों है। यह प्रकाशन प्रक्रिया का एक सामान्य हिस्सा है।”

    इसे पढ़ने के बाद यह महसूस हुआ कि संपादकीय के केन्द्र में मूल प्रश्न ही यह है कि,” क्या प्रकाशक को लेखक की पांडुलिपि में हस्तक्षेप करने का अधिकार है?”
    प्रकाशन-पूर्व संपादन प्रकाशकीय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है। भाषा, तथ्य, कानूनी जोखिम, संदर्भ और संरचना की जाँच प्रकाशक की जिम्मेदारी का हिस्सा हो सकती है। संपादकीय स्वयं पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया के इस पक्ष को स्थान देता है कि तथ्य-जाँच करना और लेखक को सलाह देना प्रकाशक के अधिकार तथा दायित्व दोनों हैं।
    यह संतुलन संपादकीय परिपक्वता को दर्शाता है।आपने केवल सोनिया गाँधी के पक्ष को प्रस्तुत करके बात समाप्त नहीं की, बल्कि प्रकाशक का आधिकारिक पक्ष भी सामने रखा है।

    हम ऐसा सोचते हैं कि तथ्य-जाँच और वैचारिक संपादन अलग-अलग विषय हैं।यदि किसी तथ्य में त्रुटि है तो लेखक से उसका प्रमाण माँगना जायज़ है; लेकिन यदि किसी लेखक की राजनीतिक दृष्टि या व्यक्तिगत निष्कर्ष से असहमति का कारण उसे हटाने का दबाव हो,तो प्रश्न अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हो जाता है(ऐसा हम सोचते हैं।)

    जब आप यह कहते हैं कि आपसे इस सप्ताह राहुल गाँधी के मनुस्मृति और महिलाओं के बलात्कार संबंधी कथित बयानों तथा मोहन भागवत से जुड़े अंतरराष्ट्रीय प्रसंगों पर लिखने की अपेक्षा की जा रही थी, लेकिन आपने साहित्य को प्राथमिकता दी…आपका यह लेख कथ्य संपादकीय की अपनी पहचान घोषित करता है कि तुलनात्मकता में साहित्य और पत्रकारिता को तत्कालीन राजनीतिक शोर से अलग रखकर साहित्यिक विमर्श को ही प्राथमिकता देनी चाहिये; किंतु यहाँ संपादकीय राजनीति से दूर नहीं जा सकता क्योंकि लेखक स्वयं ही राजनीति का महत्वपूर्ण चरित्र है। संभवतः इसीलिये आपने राजनीति को साहित्य और प्रकाशन की दृष्टि से देखने का प्रयास किया।

    हालांकि हमारी पाठकीय सोच कहती है कि-
    “क्या राजनीतिक व्यक्तित्व की निजी आत्मकथा राजनीतिक स्तर पर वास्तव में निजी रह सकती है?”

    प्रश्न यह भी है कि प्रकाशक की तथ्य-जाँच की सीमा क्या और कहाँ तक होनी चाहिये?

    लेखक की वैचारिक स्वतंत्रता और प्रकाशक की कानूनी जिम्मेदारी में संतुलन कैसे बन सकता है?

    कई प्रश्न दिमाग में उठे।गद्य की विधाओं में आत्मकथा में जीवन के बेहद आंतरिक और मार्मिक प्रसंग भी होते हैं! ऐसे में क्या राजनीतिक रूप से संवेदनशील पुस्तक का प्रकाशन लोकतांत्रिक विमर्श के लिए आवश्यक है?

    बहरहाल इस संपादकीय की सबसे बड़ी सफलता यह लगी कि यह पाठकों में पुस्तक पढ़ने की जिज्ञासा उत्पन्न करता है। संपादकीय पढ़ने वालों के मन में विचार उठता है कि ,”पुस्तक तो अभी प्रकाशित भी नहीं हुई है और उसके प्रकाशन को लेकर विवाद खड़ा हो गया।यह सोच अपने आप में पाठकीय उत्सुकता का विषय बन जाती है।साथ ही, सोनिया गाँधी के निजी जीवन, राजीव गाँधी से संबंध, इंदिरा गाँधी के बाद साथ उनके अनुभव और सार्वजनिक जीवन में प्रवेश की उनकी आत्मकथात्मक दृष्टि की झलक पाठक को उस पुस्तक के मानवीय पक्ष की ओर भी आकर्षित करते हैं।
    आत्मकथा की
    ‘सोनिया गाँधी की प्रेम यात्रा’ को केवल सोनिया गाँधी की आत्मकथा पर लिखा गया संपादकीय मानना उसके महत्व को सीमित करना होगा। इसका केंद्रीय प्रश्न इससे कहीं बड़ा है—क्या किसी लेखक को अपने अनुभवों और विचारों को बिना वैचारिक दबाव के अभिव्यक्त करने का अधिकार है?और क्या प्रकाशक को उन विचारों से असहमति होने पर पुस्तक के प्रकाशन से पीछे हटने का अधिकार है?

    सोनिया गाँधी की प्रस्तावित आत्मकथा का विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है कि यहाँ सोनिया गाँधी की निजी स्मृति, सार्वजनिक इतिहास, राजनीति और प्रकाशन की स्वतंत्रता एक ही बिंदु पर आकर मिलते हैं।
    हालांकि इसे अंतिम सत्य नहीं कहा जा सकता। सच्चाई तो प्रकाशन के बाद ही पता चलेगी।
    संपादकीय पढ़कर एक बात तो महसूस हुई कि हर बीता दिन राजनीति को इतिहास बनाता चलता है और जब वही इतिहास निजी स्मृतियों में दर्ज होता है, तब साहित्य उन स्मृतियों को प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता देता है।
    सामयिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस संपादकीय के लिये आपको बहुत-बहुत बधाई।
    पुरवाई का आभार।

    • आदरणीय नीलिमा जी, यह टिप्पणी संपादकीय से लंबी भी है और समग्र रूप से टिप्पणी भी करती है। यदि यह टिप्पणी पहले पढ़ ली होती तो संपादकीय और बेहतर ढंग से लिखा जा सकता था।

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