कभी-कभी सोचता हूँ कि विश्व में कितने लोग मांसाहारी हैं! उन मांसाहारी लोगों के लिए कितने मुर्गे, बकरे, भेड़, गाय, भैंस आदि काटे जाते होंगे। ज़ाहिर है कि इन जानवरों को विशेष रूप से पाला जाता होगा, ताकि रोज़ाना उन्हें काटा जा सके और इंसान के खाने के लिए परोसा जा सके। बहुत से देश दूसरे देशों से मांस आयात भी करते होंगे। मगर क्या कभी हम सोच सकते हैं कि निरीह-से दिखने वाले मुर्गे कभी इंसान से अनजाने में कैसे बदला ले सकते हैं?
मित्रो, ब्रिटेन में कुछ ऐसा घटित हुआ है, जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया है। दरअसल, मुझे एक ई-मेल 38 डिग्रीज़ ग्रुप से प्राप्त हुआ, जो कुछ इस प्रकार था-
“तेजिंदर, क्या तुम्हें पता है कि हमारे जल-स्रोतों में प्रदूषण के सबसे बड़े कारणों में से एक चिकन की गंदगी (मल) है? और अभी, बड़े फ़ैक्टरी फ़ार्म और उनके लॉबिस्ट सरकार पर नियमों में ढील देने के लिए दबाव डाल रहे हैं, जिससे यह समस्या और भी गंभीर हो सकती है।”
ई-मेल में आगे लिखा था- “फ़ैक्टरी फ़ार्म्स से भारी मात्रा में बिना साफ़ किया हुआ मुर्गियों का मल निकलता है। बारिश होने पर यह कचरा हमारी नदियों में बहकर जा सकता है, जिससे ऐसे बैक्टीरिया फैलते हैं, जो जंगली जानवरों को मारते हैं और हमें बीमार करते हैं। इस बीच, ये कंपनियाँ तो लाखों कमाती हैं, जबकि इसके नतीजे हमें भुगतने पड़ते हैं।”
इस ई-मेल में नेटफ़्लिक्स पर दिखाई गई एक डॉक्युमेंट्री का भी ज़िक्र किया गया है- Big Chicken: A Fast Food Conspiracy (बिग चिकन- एक फ़ास्ट फ़ूड साज़िश)। ज़ाहिर है कि इस डॉक्युमेंट्री के माध्यम से इस ख़तरे से बड़ी संख्या में लोग परिचित हो पाएँगे।
38 डिग्रीज़ का मानना है कि केवल जानकारी से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। ब्रिटिश सरकार को और अधिक फ़ैक्टरी फ़ार्म बनाने की योजनाएँ छोड़ देनी चाहिए और पहले से जमा ज़हरीले कचरे के ढेर से ठीक से निपटना सीखना चाहिए। इसीलिए ‘रिवर एक्शन’ ने एक इमरजेंसी याचिका शुरू की है; जितने ज़्यादा लोग इस पर साइन करेंगे, मंत्रियों के लिए हमारी बात को नज़रअंदाज़ करना उतना ही मुश्किल हो जाएगा।
इस समस्या के बारे में शायद ही किसी ने पहले कभी सोचा होगा। के.एफ.सी., नैंडोज़, चिकन कॉटेज, पॉपीज़, मॉर्लेज़, स्लिम चिकन्स, सैम्स चिकन जैसी चिकन आउटलेट्स से न जाने कितने अनगिनत लोग रोज़ तरह-तरह के चिकन का मज़ा लूटते हैं। मगर किसी ने यह नहीं सोचा होगा कि इंसान के लिए कटने से पहले कभी ये चिकन जीवित भी रहे होंगे। और फिर, जीवित चाहे इंसान हो या जानवर या फिर पक्षी… वे खाते भी हैं और मल-मूत्र भी त्यागते हैं। यही काम तो मुर्गे और मुर्गियाँ भी करते होंगे।
अब अंदाज़ा लगाया जाए कि यूके में एक चिकन फ़ार्म में लगभग कितने मुर्गे-मुर्गियाँ रखे जाते होंगे। एक सर्वेक्षण के अनुसार, ब्रिटेन के एक आम चिकन फ़ार्म में चालीस से साठ हज़ार मुर्गे-मुर्गियाँ पाले जाते हैं। मगर जो चिकन फ़ार्म सच में बड़े होते हैं, उनमें डेढ़ लाख से दस लाख मुर्गे-मुर्गियाँ रखे जाते हैं। अब सोचा जाए कि इतनी बड़ी संख्या में जब मुर्गे-मुर्गियाँ मल त्यागते होंगे, तो एक दिन में कितना मल एकत्रित हो जाता होगा… और फिर सप्ताह भर में कितना जुड़ जाता होगा।
यदि इस मल को साफ़ करने का कोई वैज्ञानिक तरीका न अपनाया जाए, तो क्या मुर्गे-मुर्गियों के मल का एक पहाड़ नहीं खड़ा हो जाएगा? …और जब बारिश होगी, तो बारिश के पानी के साथ यह मल बहना शुरू करेगा… यदि बदकिस्मती से नज़दीक कोई नदी बहती है, तो यह मल जाकर उस पानी में घुल जाएगा… सोचकर डर लगता है कि उस पानी में कितने बैक्टीरिया पैदा हो जाएँगे!
यही हुआ भी है… वेल्श-इंग्लिश बॉर्डर के पास नदियों के किनारे रहने या काम करने वाले 4,500 से अधिक लोगों ने ‘अवारा फूड्स’ और ‘वेल्श वॉटर’ के ख़िलाफ़ एक अहम केस में शामिल होने के लिए एक याचिका पर हस्ताक्षर किए हैं। ब्रिटेन की सबसे बड़ी चिकन उत्पादक कंपनियों में से एक और वेल्श वॉटर कंपनी पर वाई, लग्ग एवं उस्क नदियों को प्रदूषित करने का आरोप है।
ज़्यादातर बड़े पैमाने वाले इंटेंसिव पोल्ट्री फ़ार्म (IPU) वेल्स-इंग्लैंड बॉर्डर के पास, ख़ासकर हेरेफ़ोर्डशायर, श्रॉपशायर और पोविस में हैं, ये इलाके सेवरन और वाई नदियों के किनारे बसे हैं। 2024 तक, इन घाटियों में बने IPU में 51 मिलियन से ज़्यादा मुर्गियाँ रखी जाती थीं।
श्रॉपशायर में रहने वालीं एकेडमिक डॉ. एलिसन कैफ़िन, जो एक नए IPU के ख़िलाफ़ कानूनी समीक्षा की अगुवाई कर रही हैं, ने ‘द गार्डियन’ समाचार-पत्र से बात करते हुए बताया: “अब श्रॉपशायर में हर व्यक्ति के लिए लगभग 65 मुर्गियाँ हैं।” अमेरिकी स्टाइल के बड़े फ़ार्म की ओर यह बदलाव यूनाइटेड किंगडम में विवाद का विषय बना हुआ है… क्योंकि सस्ते प्रोटीन की ग्राहकों की माँग, जानवरों की भलाई या पर्यावरण पर पड़ने वाले असर की चिंताओं से ज़्यादा अहम क्या है, यह सोचने की बात है।
वाई नदी यूनाइटेड किंगडम की सबसे लंबी और मशहूर नदियों में से एक है। लेकिन हाल के सालों में, इसके आस-पास रहने वाले लोगों ने शिकायत की है कि गर्मियों में इसका पानी अक्सर हरा हो जाता है और इसमें से बदबू आने लगती है और यह चिपचिपा हो जाता है।
इस ग्रुप का कानूनी दावा है कि इसके लिए किसानों के खेतों में मुर्गी की खाद का इस्तेमाल और सीवेज का रिसाव ज़िम्मेदार है। वे माँग कर रहे हैं कि नदी की हालत सुधारने के लिए कदम उठाए जाएँ और जिन लोगों की ज़िंदगी और कारोबार पर इसका असर पड़ा है, उन्हें मुआवज़ा दिया जाए।
अभियान चलाने वाले निवासी लंबे समय से ‘वाई’ नदी के पास बड़े पैमाने पर हो रही इंडस्ट्रियल चिकन फ़ार्मिंग की ओर इशारा करते रहे हैं। अभी इस इलाके में लगभग 2.4 करोड़ मुर्गियाँ पाली जा रही हैं-और ये ज़्यादातर बड़े-बड़े शेड (सायबान) में रखी जाती हैं। यह संख्या यूनाइटेड किंगडम में माँस के लिए पाली जाने वाली कुल मुर्गियों का लगभग पाँचवाँ हिस्सा है।
कुछ समय पहले तक, वाई क्षेत्र के चिकन शेड से निकलने वाली खाद को आस-पास के किसानों के खेतों में सस्ते फ़र्टिलाइज़र के तौर पर डाला जाता था। ऐसा आरोप लगाया गया है कि खाद से मिलने वाले पोषक तत्व अक्सर मिट्टी से बहकर जल-स्रोतों में चले जाते थे, जिससे नदियों में फ़ॉस्फ़ोरस, नाइट्रोजन और बैक्टीरिया का स्तर बढ़ जाता था। गर्म मौसम में, पोषक तत्वों की इस अधिकता के कारण पानी हरा हो जाता था, जिसे “शैवाल का पनपना” (algal blooming) कहा जाता है।
वर्ष 2023 में, यूनाइटेड किंगडम सरकार की आधिकारिक सलाहकार संस्था ‘नेचुरल इंग्लैंड’ ने ‘वाई’ की स्थिति को “प्रतिकूल-बिगड़ती हुई” बताया। 2024 में आए ‘वाई नदी एक्शन प्लान’ में खेती और गंदे पानी के बहाव से आने वाले ज़्यादा पोषक तत्वों के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन को भी ज़िम्मेदार ठहराया गया, इन कारणों से गर्मी और सूखे के मौसम में पानी का तापमान बढ़ रहा है और बहाव कम हो रहा है।
तत्काल बदलाव के बिना, जलवायु परिवर्तन से नदी प्रदूषण और भी बढ़ जाएगा। गर्म ग्रीष्मकाल और अनियमित वर्षा से शैवाल का विकास तेज़ी से होगा और उर्वरित खेतों से अपवाह में वृद्धि होगी। पर्यावरण एजेंसी का अनुमान है कि 2050 तक कृषि से फ़ॉस्फ़ोरस अपवाह में 30% की वृद्धि होगी (पर्यावरण एजेंसी-2019), जो कुछ शैवालों, जिनमें नीले-हरे रंग की प्रजातियाँ भी शामिल हैं, की संख्या में वृद्धि से संबंधित है। ये शैवाल मनुष्यों के लिए विषैले होते हैं, जिससे त्वचा में जलन, उल्टी, दस्त और यहाँ तक कि श्वसन संबंधी समस्याएँ भी हो सकती हैं। 2026 में मौसम में आई अतिरिक्त गर्मी ने हालात को और अधिक चिंताजनक बना दिया है।
इस समस्या के हल के लिए हमें केवल सरकार की ओर नहीं देखना है। एक उपभोक्ता के तौर पर हमारा भी कोई फ़र्ज़ बनता है। प्रदूषण फैलाने वाले IPU (जैसे नैंडोज़) से सामान लेने वाले ब्रांड्स का बहिष्कार करें… कुल मिलाकर, पशु-आधारित उत्पादों के मामले में ‘कम लेकिन बेहतर’ वाला तरीका अपनाएँ। अगर आप माँस या अंडे खरीदते हैं, तो पक्का कर लें कि वे स्थानीय हों, ‘फ़्री-रेंज’ (खुले में पाले गए जानवरों) से हों और यदि हो सके तो ऑर्गेनिक या ‘पास्चर फ़ॉर लाइफ़’ सर्टिफ़ाइड हों। सुपरमार्केट पर दबाव डालें कि वे नुकसानदायक सप्लायर्स को हटा दें।

भारत में भी हम सबको इस ओर ध्यान देना चाहिए। चिकन फ़ार्मिंग तो अब भारत में भी बड़े पैमाने पर हो रही है। हमारे लिए बहुत ज़रूरी है कि हम इस तरह की फ़ार्मिंग के पर्यावरण पर पड़ रहे प्रतिकूल असर के बारे में अभी से चिंतित होकर कुछ त्वरित कदम उठाएँ। यहाँ हमें समस्या को पहले से ही समझकर उसका हल ढूँढ़ना शुरू कर देना होगा।

ब्रिटेन सरीखे देश के जन से चिकन बदला ले रहा ,,,है, आँखे खोलने वाला मामला और संपादकीय दोनों ही है।38डिग्री संस्था का औचित्यपूर्ण खुलासा काबिल ए तारीफ़ है। व्यापार का बेशर्म न्यूट्रल जेंडर बस लाभ पर आमादा है फिर चाहे लॉबिंग हो या के आम जन के जीवन और प्राकृतिक संसाधनों की सुपारी!?!
ब्रिटेन तो ठहरा लूट मार का इतिहास लिए विकसित देश!!! सो एक बोल्ड संपादकीय प्रकाशित हुआ,बधाई हो!?!
अब भारत या इंडिया अंग्रेजी की ऐतिहासिक पिछलग्गुपन का कैंसर सरीखा नासूर लिए। यहाँ पर तो रोज़ कभी चिकन कभी प्रदूषण बदला ले रहा होता है।मीडिया की शब्दावली भी मौसमी टेक्नीकी शब्दों के गुलगुले तैयार रखे रहती है और सरकारी इंतज़ाम तो मानों हर मौसम में आम जन का इम्तहान और उनसे इंतकाम लेते रहने का रिवाज़ चला ही रहे हैं।
खैर देखें कि चिकन की बदला लेने की फितरत भारत से बदला कोरोना की तर्ज़ पर कब लेती है।
अच्छा और आँखें खोल कर रहने की सलाह देता संपादकीय।
प्रिय भाई सूर्य कांत शर्मा जी, मेरी फ़्लाइट अभी लंदन में लैंड भी नहीं हो पाई थी कि आप संपादकीय को पढ़ कर उस पर टिप्पणी भी लिख चुके थे। आपका कमिटमेंट कमाल का है। आपने संपादकीय को – अच्छा और आँखें खोल कर रहने की सलाह देता संपादकीय – कहा है। आपका स्नेह हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण है। हार्दिक आभार।
“चिकन बदला ले रहा है “
एक आकर्षक शीर्षक है जो एक तरह से जल प्रदूषण की बात करता है। मैंने कई विदेशी नदियों को देखा है जो साफ सुथरी चमचमाती हुई होती हैं और बचपन में हम जो पेंटिंग क्लास में नीला पानी बनाते थे;ठीक वैसे ही ब्लू मन मोहते पानी को भी। उस संदर्भ में मुर्ग़ियों के मल से प्रभावित होते जल स्रोतों पर चर्चा जायज है, चिंताजनक है।
भारत में हम क्या ही नदी प्रदूषण की बात करें जहाँ मुर्ग़ियों के मल तो क्या मनुष्यों और न जाने किन किन के अनवरत जल स्रोतों को दूषित करते हैं। नदियाँ तो हमारे देश की सबसे बड़ी डस्टबीन हैं।
रीता जी, आपकी टिप्पणी आपके अनुभव संसार के बारे में भी बताता है और संपादकीय को एक अनुभवी नज़र से देखती भी है। हार्दिक आभार आपका।
बड़ा ही ज्वलन्त मुद्दा है हमारे जल श्रोतों के लिए और इस पर ज़रूरी कदम उठाया जाना अनिवार्य हो गया है
धन्यवाद आलोक भाई।
ज्वलन्त विषय पर सटीक विश्लेषण! भारत में यह समस्या तो बहुत पहले से ही है पर विदेशों में यह समस्या विकराल रूप ले रही है। इस विषय पर कलम चलाना निश्चित रूप से आवश्यक व कठिन है। साधुवाद
अनीता जी बहुत बहुत शुक्रिया आपका इस सार्थक टिप्पणी के लिये।
एक बहुत जरूरी विषय की जानकारी दी है आपने। मुर्गी बीट को तो एक्सपोर्ट कर अच्छा खासा लाभ लिया जा सकता है। यह एक बेहतरीन आर्गैनिक मेन्योर है। मगर शंका है कि फार्मिंग के मुर्गे मुर्गियों को एंटीबायोटिक आदि भी दिये जाते हैं जिनके रेजिड्यू बीट में होंगे।
आपने बहुत बढ़िया सलाह दी है… मगर आपकी चिन्ता भी वाजिब है।
वाह वाह जितेन्द्र भाई: कहाँ कहाँ से ढूण्ढ़ कर लाते हो ऐसे चुटकीले विषय? आजके इस सम्पादकीय के लिए बहुत बहुत साधुवाद। आपके इस सम्पादकीय ने तो मूवी का केवल ट्रेलर ही दिखाया है। पूरी मूवी तो अभी बाकी है। यहाँ आप ने बेचारे चिकन की पैरवी में तो बहुत कुछ बता दिया लेकिन बुचरखाने में जो और बहुत से जानवर, जीभ के स्वाद के लिए, बलि का बकरा बनते हैं अगर उनको भी शामिल करलें तो फ़हरिस्त बहुत बड़ी हो जाएगी और इसका असर इन्सानी ज़िन्दगी पर क्या पड़ रहा है उसका भी पर्दा फ़ाश हो जाएगा। अभी तो इब्तदा-ए-इश्क का ज़िक्र हुआ है जहाँ पर केवल मुर्गे मुर्गियों की बीट का परिवारण पर कितना बुरा असर पड़ रहा है। ज़िब्हा किए हुए इन मुर्गे मुर्गियों के जिस्म में से और भी बहुतेरे टुकड़े निकले होंगे जो की परिवारण को दूषित करते होंगे। अब अगर इस लिस्ट में और बाकी उन सभी जानवरों को शामिल करलो जिन्हें ज़िब्हा किया गया है और उनके जिस्म के बहुत से ऐसे हिस्से हैं जो आम जन्ता के लिए हानिकारक होंग तो इस बात का अंदाज़ा हो जाएगा कि यह समस्या केवल मुर्गे मुर्गियों तक सीमित नहीं है।
काश आम इन्सान इस बात को सोचकर उन सभी बिज़नैसों को जो अपने फ़ायदे के लिए आम इंसान की ज़िन्दगी की परवाह किए बग़ैर बस अपने फ़ायदे का सोच रहे हैं बायकॉट करे।
विजय भाई आपने तो संपादकीय को एक विस्तृत नज़रिये से परखा है और अन्य जानवरों को लेकर भी अपनी चिन्ता ज़ाहिर की है। हार्दिक आभार आपका।
आदरणीय संपादक महोदय को बहुत बहुत साधुवाद एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय को हमारे समक्ष प्रस्तुत करने के लिए ।
“यह लेख केवल मुर्गियों के मल से नदियों के प्रदूषण की कहानी नहीं है, बल्कि मनुष्य की उस विडंबना का आईना है जिसमें हमारी थाली तक पहुँचने वाला निवाला प्रकृति से कितनी बड़ी कीमत वसूलता है। हम जिस चिकन को एक स्वादिष्ट व्यंजन समझकर भूल जाते हैं, उसके पीछे एक जीवित प्राणी, एक औद्योगिक व्यवस्था, पानी, मिट्टी, खेत और अंततः पूरी पारिस्थितिकी छिपी होती है।
प्रकृति बदला नहीं लेती—वह केवल हमारे कर्मों का हिसाब लौटाती है। जिस मल को हमने समस्या न मानकर खेतों और नदियों पर छोड़ दिया, वही धीरे-धीरे पानी का रंग, उसकी गंध और उसमें पलने वाले जीवन को बदलने लगा। शायद ‘मुर्गे का इंसान से बदला’ कहने से अधिक सटीक यह कहना होगा कि मनुष्य अपने ही उपभोग से पैदा किए संकट का सामना कर रहा है।
सस्ते मांस की हमारी माँग ने पशुपालन को उद्योग बना दिया, और उद्योग ने जीव को संख्या में बदल दिया—एक मुर्गा नहीं, लाखों मुर्गे; एक दिन का कचरा नहीं, वर्षों का अपशिष्ट। सवाल इसलिए केवल यह नहीं कि हम मांस खाते हैं या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि हम अपने भोजन की वास्तविक कीमत जानना चाहते हैं या नहीं।
इस लेख की सबसे बड़ी सार्थकता यही है कि यह हमें थाली से उठाकर नदी के किनारे ले जाता है और पूछता है—क्या हमारी भूख केवल हमारी निजी पसंद है, या उसके पीछे प्रकृति की भी कोई कीमत चुकाई जा रही है?
शायद अब समय आ गया है कि ‘कम लेकिन बेहतर’ केवल भोजन का सिद्धांत न रहे, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच जिम्मेदार रिश्ते का सिद्धांत बने।”
डॉ.ऋतु शर्मा ननंन पाँडे-नीदरलैंड्स
प्रिय ऋतु जी आपने अपनी महत्वपूर्ण टिप्पणी में लिखा है – इस लेख की सबसे बड़ी सार्थकता यही है कि यह हमें थाली से उठाकर नदी के किनारे ले जाता है और पूछता है—क्या हमारी भूख केवल हमारी निजी पसंद है, या उसके पीछे प्रकृति की भी कोई कीमत चुकाई जा रही है? – वैसे तो यह पूरी टिप्पणी ही उद्धृत की जा सकती है।… आपकी सलाह कि – शायद अब समय आ गया है कि ‘कम लेकिन बेहतर’ केवल भोजन का सिद्धांत न रहे, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच जिम्मेदार रिश्ते का सिद्धांत बने।” – हम सब को सोचने पर मजबूर करता है। हार्दिक आभार।
एक महत्वपूर्ण एवं ज्वलंत विषय को लेकर लिखा सम्पादकीय ‘ चिकन बदला ले रहा है’ आँखें खोलने वाला है। प्रदूषण की समस्या कैंसर की तरह जानलेवा बनती जा रही है। उद्योगों का कचरा, काटे गए जानवरों के अवशेष सब नदियों को समर्पित हो रहे हैं या जलाये जा रहे हैं। जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण सब अपनी सीमायें लाँघ रहे हैं। तेजेंद्र जी जब मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति से खिलवाड़ करेगा तो वह बदला तो लेगी ही। हम चेते नहीं तो प्रदूषित पर्यावरण हमें पूरी तरह लील लेगा । इससे बचने के लिए विशेषरूप से प्रभावित देशों को युद्ध स्तर पर केवल सोचना ही नहीं कुछ करना भी होगा। यह सरकारों को ही नहीं हर मनुष्य की ज़िम्मेदारी होनी चाहिए।नई जानकारी देने के लिए साधुवाद तेजेंद्र जी।
सुदर्शन जी, आपकी टिप्पणी से पूरी तरह सहमत। बहुत बहुत शुक्रिया।
सादर प्रणाम भाई।
इस बार संपादकीय न केवल ज्वलंत प्रश्न उठाता है बल्कि आम आदमी के स्वास्थ्य और नदियों प्रदूषण के प्रति चिंता भी व्यक्त की है।शीर्षक सचमुच चौंकाता है.और यह चिंता स्वाभाविक रूप से.मुर्गियों के मल से प्रदूषित होने वाली नदियों के जल और उनसे उत्पन्न अनेक वैकटीरिया, तदजनित बीमारियां मानवता के लिए घातक हैं जैसी चिंता 38 डिग्री संस्था के द्वारा जाहिर की गई है गलत नहीं है। भारतीय संदर्भ में यह और भी अधिक चिंतनीय है क्योकि यहां मांसाहार का बढता चलन और नदियों के समुचित रखरखाव न होने से उत्पन्न गंभीर प्रदूषण पहले से ही खतरनाक स्थिति में आ चुके हैं। भारत सरकार तथा आमजन को भी इस दिशा में सजग और सतर्क हो जाना चाहिए। वैश्विक स्तर पर तो यह और भी आवश्यक है कारण कि.वहां भोजन का मुख्य स्रोत मांसाहार ही.है और बढते हुए फार्मों के कारण यह और भी शोचनीय है।
बहुत बहुत धन्यवाद और आभार भी इस दिशा में सभी का ध्यान आकृष्ट करने के लिए और सजग रहने की अनुशंसा के लिए 48 डिग्री संस्था का भी आभार। बहुत अच्छा संपादकीय। धन्यवाद पुरवाई।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
भाई लखन लाल पाल जी आपने संवेदना और जिजीविषा की तुलना के माध्यम से संपादकीय की बेहतरीन समीक्षा की है। हार्दिक आभार।
चिकन बदला ले रहा…! संपादकीय लेख मानव निर्मित समस्या पर गहनता से विचार करता है।
38 डिग्रीज ग्रुप द्वारा संपादक जी को भेजे गए ईमेल में चिकेन के मल से फैलने वाले प्रदूषण की रिपोर्ट दी गई है। वर्तमान समय में चिकेन सस्ता एवं पौष्टिक आहार होने के कारण मानव इसका खूब उपयोग करता है।
जिस चीज की ज्यादा खपत होती है उसका उत्पादन भी बढ़ाना पड़ता है। इसमें चिकेन भी इसी श्रेणी में आता है। जिस कारण उत्पादन में वृद्धि हुई। अब समस्या इसके मल से हो रही है। इंग्लैंड की नदियां बुरी तरह प्रदूषित हो रही हैं । मनुष्य के साथ-साथ अन्य प्राणियों के लिए उनका मल हानिकारक सिद्ध हो रहा है।
मानव की संवेदनाएं कभी जिजीविषा पर हावी नहीं हो सकी हैं। जिजीविषा सदा संवेदना पर हावी रही है। इसलिए कौन मर रहा है, कौन जी रहा है जिजीविषा को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। जीवन की बात आती है तब संवेदना काव्यात्मक अभिव्यक्ति से ज्यादा कुछ नहीं होती है। उसे जिस चीज में फायदा दिखता है वही काम करता है। मुर्गी पालन में उसे लाभ होता है तो जनहानि उसके लिए कोई महत्व नहीं रखती है। कितने मर रहे हैं, कितने जी रहे हैं उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। लाभ के लिए वे मुर्गी का व्यवसाय करेंगे ही करेंगे।
आम आदमी चाहेगा भी तो इससे मुंह न मोड़ पाएगा। वह चिकेन खाना बंद न करेगा। सरकार भी कुछ न कर पाएगी।
इस धरती पर सबसे ज्यादा समस्या मनुष्य ही खड़ी करता है। जितना बुद्धिमान होता जाता है उसी एवरेज की समस्याएं भी ईजाद करता रहता है।
इस सबके बावजूद भी सरकार को ये मुर्गी फार्म बंद करने चाहिए। क्योंकि ये चीजें संपूर्ण पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही हैं।
38 डिग्रीज ग्रुप द्वारा संपादक जी को ईमेल भेजना वाकई में शानदार है। उन्हें विश्वास है कि ये समस्या संपादकीय का विषय बनी तो सकारात्मक परिणाम आ सकते हैं। सोशल मीडिया के दौर में पुरवाई के संपादकीय की ऐसी इमेज सुखद आश्चर्य से कम नहीं है। इस उपलब्धि के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर । आप इस पर गर्व कर सकते हैं
भाई लखन लाल पाल जी आपने संवेदना और जिजीविषा की तुलना के माध्यम से संपादकीय की बेहतरीन समीक्षा की है। हार्दिक आभार।
एक विरल विषय पर संपादकीय जहां किसी जेनुइन व्यक्ति की ही दृष्टि जा सकती है। हम तो बकरीद पर जिबह होने वाले बेजुबान जानवरों के नालियों में बहते रक्त के परनालों के नदियों में मिलने से ही उत्पन्न भयावहता से ही व्यथित थे पर समस्या उससे भी कहीं अधिक मानव-नाशक है। ईश्वर ने मनुष्य को ही अधिक विवेकशील और संवेदनशील बनाया है पर मनुष्य बनता क्या है? वह प्रकृति को अपनी नापाक हरकतों से नष्ट करने पर तुला है और बदले में अपने नुकसान का सामान तैयार करता रहता है। उस मायने में आपके संपादकीय का शीर्षक कितना सटीक है। पर्यावरणविद् चेतावनी यह भी है कि इस प्रकार निरीह प्राणियों को खाने की मेज तक पहुंचाने तक के सफर में प्रदूषण-प्रदूषण ही पैदा होता है, यही नहीं, इस प्रक्रिया पर मानव के लिए दूर्लभ होता जल भी बहुत खर्च होता है, कुल मिलाकर मनुष्य प्रकृति को दांव पर लगाता था रहा है, उसका बदला तो उसे चुकाना होगा ही।
संतोष जी आपकी चिंता जायज़ है। हम सबको इस विषय पर सक्रिय होना आवश्यक है।
“चिकन बदला ले रहा है” सम्पादकीय अपने नाम से ही आकर्षित करता है। आपने एक नए तरीके की समस्या को उजागर किया है, जो हमारा पर्यावरण झेल रहा है। आपने तथ्यों के साथ बहुत तार्किक ढंग से अपनी बात रखी है । वस्तुतः इंसान सभी जीव-जंतुओं का हक मारकर अपने स्वाद , ऐश्वर्य और भोग को बढ़ा रहा है जो अंततः उसी पर आन गिरेगा । कोविड में भी हम देख चुके हैं। ये तो खैर नए तरीके की समस्या है। समय रहते चेत जाए तो आने वाली समस्याओं से बचा जा सकता है । आपका सम्पादकीय इस ओर सचेत करता है ।
वंदना जी, आपने संपादकीय में वर्णित समस्या को ठीक से समझा है और सार्थक टिप्पणी की है… हार्दिक धन्यवाद।
आज के संपादकीय का विषय ऐसा है जिसके बारे में आमजन ने कभी गंभीरता से सोचा भी नहीं होगा। इसे पढ़ने के बाद हमने चिकन के मल से फैलने वाली बीमारियों के बारे में जानने की कोशिश की तो दंग रह गए।अनेक संक्रमणों में से एक E. Coli भी है। भारत में E. Coli के अनेक cases सामने आये हैं। हाल ही में CAG report में यहॉं के रेलवे स्टेशनों के पेयजल नमूनों में इस बैक्टीरिया की चिंताजनक उपस्थिति बताई गई है।
हमारे भारत देश में comercial poultry farms के अतिरिक्त backyard poultry भी ख़ूब होती है। ग्रामीण इलाकों में तो घर-घर में मुर्गी पालन होता है । यहॉं hygiene की परवाह कितनों को और कितनी होती है, हम सब जानते हैं; फिर उम्मीद करना ही व्यर्थ है कि सतर्कता बरती जाती होगी।
यह मल पानी को तो प्रदूषित करता ही है, सूखकर हवा में घुलकर भी शरीर में प्रवेश करता है और बीमारियों का कारण बनता है। ऐसे में इस तरह के प्रदूषण को रोकना बहुत ज़रूरी हो जाता है ।
इस विषय पर जानकारी देने के लिए बहुत धन्यवाद!
आशा करते हैं इस संपादकीय के माध्यम से लोगों में जागरूकता बढ़ेगी और concerned authorities भी कुछ कदम उठायेंगी।
प्रिय रचना, आपने बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए हैं। बहुत बहुत शुक्रिया।
बहुत बढ़िया सच बात है
धन्यवाद आदरणीय भाग्यम जी।
चिकन फ़ार्मिंग भारत में भी बड़े पैमाने पर हो रही है। ऐसे में आपने संपादकीय में सही कहा, हम नागरिकों का भी फर्ज बनता है कि पर्यावरण पर पड़ रहे प्रतिकूल असर डालनेवाले इस तरह की फ़ार्मिंग की.समस्या समझें।
उसका हल ढूँढ़ना शुरू करें और ऐसे फ़ार्मिंग का हम बहिष्कार करें। ।
बहुत अच्छा, समाजोपयोगी संपादकीय
इस प्यारी सी टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद अनिता।
बदला चिकन नहीं, प्रकृति लेती है…
तेजेन्द्र शर्मा जी का संपादकीय “चिकन बदला ले रहा है…!” शीर्षक पढ़ते ही पहले मुस्कराने और फिर ठहरकर सोचने को विवश करता है। एक सहज, लगभग चुटीले-से प्रश्न से आरंभ हुई बात धीरे-धीरे उस गंभीर पर्यावरणीय संकट तक पहुँचती है, जिसे हमारी सुविधाभोगी जीवन-शैली प्रायः देखना ही नहीं चाहती।
फ़ैक्टरी फ़ार्मिंग में बड़े पैमाने पर होने वाला उत्पादन केवल हमारी थाली तक पहुँचने वाले भोजन की कहानी नहीं है; उसके पीछे अपशिष्ट, जल-प्रदूषण, मिट्टी, नदियों और अंततः मनुष्य के स्वास्थ्य तक पहुँचती एक पूरी शृंखला है। ब्रिटेन की ‘वाई’ नदी के संदर्भ में संपादकीय इसी अदृश्य शृंखला को सामने लाता है।
मुझे संपादकीय की सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह लगी कि प्रश्न केवल सरकार या बड़े उद्योगों के सामने नहीं रखा गया है। प्रश्न हमारे सामने भी है—एक उपभोक्ता के रूप में। हमारी माँग, हमारी खरीद और हमारी सुविधा भी उस व्यवस्था का हिस्सा है जिसके परिणाम अंततः प्रकृति को भुगतने पड़ते हैं।
हम अक्सर पर्यावरण की बात पेड़ों, प्लास्टिक, धुएँ और जलवायु परिवर्तन तक सीमित कर देते हैं; लेकिन हमारी थाली भी पर्यावरण से जुड़ी हुई है—यह बात सामान्य बातचीत में शायद उतनी जगह नहीं पाती। इस अर्थ में संपादकीय एक परिचित विषय के भीतर से अपेक्षाकृत कम चर्चित प्रश्न निकालकर सामने रखता है।
और शायद शीर्षक का व्यंग्य भी यहीं अपना अर्थ खोलता है। चिकन सचमुच बदला नहीं ले रहा; प्रकृति केवल हमारे किए का परिणाम हमें लौटा रही है। हमने उत्पादन और उपभोग की एक ऐसी शृंखला बनाई जिसमें प्रकृति की वहन-क्षमता को भूलते गए, तो उसका प्रभाव किसी न किसी रास्ते हमारे पानी, भोजन और स्वास्थ्य तक लौटना ही था।
संपादकीय का भारत की ओर मुड़ना भी महत्त्वपूर्ण है। किसी दूसरे देश के पर्यावरणीय संकट को केवल वहाँ की समस्या मानकर पढ़ लेने के बजाय उससे समय रहते सीख लेना अधिक उपयोगी है। समस्या पैदा हो जाने के बाद समाधान खोजने से बेहतर है कि विकास और उत्पादन के साथ उसके पर्यावरणीय प्रभावों की चिंता भी आरंभ से जुड़ी रहे।
“चिकन बदला ले रहा है…!” दरअसल चिकन की कहानी नहीं, मनुष्य और प्रकृति के बिगड़ते संतुलन की कहानी है। और शायद इसकी सबसे बड़ी चेतावनी यही है—प्रकृति प्रतिशोध नहीं लेती, वह केवल हमारे कर्मों का हिसाब अपने ढंग से लौटा देती है।
सुनीता जी आपने लिखा है कि – मुझे संपादकीय की सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह लगी कि प्रश्न केवल सरकार या बड़े उद्योगों के सामने नहीं रखा गया है। प्रश्न हमारे सामने भी है—एक उपभोक्ता के रूप में। हमारी माँग, हमारी खरीद और हमारी सुविधा भी उस व्यवस्था का हिस्सा है जिसके परिणाम अंततः प्रकृति को भुगतने पड़ते हैं। – इस सार्थक टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
1950 के दशक के पर्यावरण संकट के बाद लंदन के बीच से बहती टेम्स नदी को महानगर के घरेलू और औद्योगिक कचरे से प्रदूषित कर दिये जाने के कारण उसे जैविक रूप से मृत घोषित कर दिया गया था। मगर वहाँ की सरकार ने 60 वर्षों के युद्ध -स्तरीय प्रयत्नों के पश्चात उसे पुन: जीवित कर लिया था। लंदन में जब भी इतनी साफ-सुथरी कलकल बहती नदी को देखा तो अपने यहाँ की यमुना और गंगा याद हो आईं। दिल्ली में तो यमुना किसी स्थिर गंदे नाले का प्रतीक बन कर रह गयी है। पवित्र गंगा का जल भी त्वचा और आंतों के लिए खतरा बन चुका है। 2014 के नमामी गंगा प्रोजेक्ट के बावजूद गंगा के पानी में ईकोली बैक्टीरिया की मात्रा सुरक्षित पैमाने पर नहीं लाई जा सकी। मुर्गियों की बीट के वहाँ के पानी के प्राकृतिक साधनों को प्रदूषित करने की इस नई विपदा से यू के की सरकार और संबंधित अभिकरण सख्त कदम उठा कर अवश्य शीघ्र ही निपट लेंगे क्योंकि वहाँ उन्हें लोगों और मुर्गी-पालकों का सहयोग मिलेगा। मगर हमारे यहाँ ऐसा नहीं है। लोग अभी भी शहरों की आबादियों से डेरी फॉर्म चलाते हैं; घरों में ही मुर्गियां पालते हैं और वातावरण को प्रदूषित करते हैं। अभी हाल ही में लखनऊ जैसे बड़े शहर में भैंसों को पालने वालों ने पुलिस पर ही हमला कर दिया। आम आदमी की जिह्वा लोलुपता और पैसों के लालच के कारण असहाय जानवरों की नस्लें व्यवस्थित तरीके से मिटाई जा रही हैं। उन निरीह बेजुबान जानवरों को समर्पित की थी मैंने यह कविता:
*खेल अंडे मुर्गी का*
अंडा पहले आया या मुर्गी
यह तो हो गया बस
एक थोथा, पुराना चिंतन;
नए काल में
अंडे-मुर्गी के आने से पहले ही
नियति कर देती है निर्धारित
उनके जाने का समय
और उसकी प्रक्रिया।
बीते दिनों मुर्गियाँ देती थी अंडे
और अंडों से निकलते थे चूज़े
और फिर वह मिल कर
अंडे-मुर्गी का खेल चलाते थे आगे।
नए निधान में मुर्गियाँ
अंडे तो देती हैं नियमित
पर अंडों से चूज़े नहीं निकलते-
खेल को आगे बढ़ाने,
अपनी ज़िम्मेदारी निभाने।
बहुधा, कोई चतुर मदारी
दोनों को चुरा,
छिपा आता है
अपनी गर्मजोशी से भरमाते
किन्हीं रहस्यमयी
चूल्हों के खुले किवाड़ों के पीछे-
तमाशा-सा करते-
उनसे आँख-मिचौली खेलते,
और निकलते हैं फिर वो
खनकते सिक्के बन
मदारी की जेब से।
एकत्रित भीड़
पीटती रहती है ताली,
बेतहाशा ख़ुशी से उछलते,
और इस बीच
तमाशे के घेरे से निकल
चल देता है मदारी
मुस्कुराते, डुगडुगी बजाते।
-बिमल सहगल
बिमल जी आपने टिप्पणी के साथ एक अर्थपूर्ण कविता भी पोस्ट की है… आपका बहुत बहुत शुक्रिया।
‘चिकन बदला ले रहा है’ संपादकीय इंसान द्वारा इंसान के जीवन को संकट में डालने की चेतावनी दे रहा है। यह तो नदियों को जानवरों के अपशिष्ट से प्रदूषित करने की बात है। इंसान की जद से जंगल और आकाश भी नहीं बच रहे हैं। जंगलों की अनियंत्रित कटाई और औद्योगिकीकरण के कारण जहाँ एक ओर वन सिमट रहे हैं, वहीं दूसरी ओर विषैली गैसों और उपग्रहों के कचरे से अनंत आकाश भी अपनी स्वाभाविकता खो रहा है।
इस सार्थक टिप्पणी के लिये बहुत शुक्रिया सुधा जी।
वाह्ह्ह… बहुत ही गहराई से शोध करते हुए संपूर्ण विचार को रखा गया है। मुझे तो यह समझ में नहीं आता लोग जीव हत्या करते क्यों है… अपनी भूख मिटाने के लिए किसी निरीह प्राणी की हत्या करना क्या न्यायपूर्ण है? तो प्रकृति भी ऐसे ही प्रतिशोध लेती है….
सादर नमस्कार सर….
आदरणीय तेजेन्द्र जी!
सर्वप्रथम 38 डिग्री ग्रुप का तहेदिल से धन्यवाद, जिन्होंने अपना उत्तरदायित्व समझते हुए एक संपादक की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण जानकारी आप तक पहुँचाना जरूरी समझा।एक तरह से उन्होंने विषय और स्थितियों की गंभीरता को समझते हुए और अपने महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व का निर्वाह करते हुए ई- मेल द्वारा आपको सूचित किया।
जहाँ तक हम समझते हैं, कोई भी महत्वपूर्ण बात उसी को बताई जाती है, जो उसके योग्य होता है। और यही कारण है कि इस विषय पर संपादकीय आज पाठकों के सम्मुख है।
संपादकीय शीर्षक ने पहले चौंकाया और फिर डराया ही नहीं, दिल दहला दिया। इसे संवेदनहीनता व अमानवीयता ही कहा जा सकता है।
यह संपादकीय-
प्राकृतिक जल श्रोत के रूप में नदियों,पर्यावरण, उपभोक्ता और हमारे उत्तरदायित्व की ओर इशारा करता है।
मांसाहार के अधिकता की कल्पना सिर्फ”बहुत अधिक!, कितनी अधिक!!” तक थी,पर इतनी अधिक भयावहता का अंदाज कल्पना से परे ही रहा।
अगर हम सच कहें तो हमारे लिये यह विषय वीभत्स है किंतु आँखें बंद कर लेने से भले ही अपने को कुछ दिखाई ना दे लेकिन वास्तविकता छुप नहीं सकती।
आपके संपादकीय ने जिस तरह का परिदृश्य खींचा है, ई-मेल 38 डिग्री ग्रुप से प्राप्त,वह वाकई एक गंभीर समस्या है।
पूरा पढ़ने के बाद समझ में आता है कि संपादकीय केवल पशु-हत्या या शाकाहार-मांसाहार जल-प्रदूषण, औद्योगिक उत्पादन, पर्यावरणीय असंतुलन और उपभोक्ता की जिम्मेदारी जैसे गंभीर प्रश्नों को सामने रखता है।
वह भी ब्रिटेन की।
ब्रिटेन की वाई, लग्ग और उस्क नदियों के उदाहरण से अपने कथ्य की पुष्टि करते हुए आपने बड़े पैमाने पर चल रहे पोल्ट्री फार्मों से निकलने वाले मल और उसका जलस्रोतों में पहुँचना किस प्रकार नदियों के प्रदूषण का कारण बन सकता है, यह बताते हुए उपभोक्ताओं की आँखें खोलने का प्रयास किया।
आपकी संपादकीय दृष्टि मुर्गियों के मल से निकलने वाले पोषक तत्वों, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और बैक्टीरिया के जलस्रोतों में पहुँचने तथा उससे होने वाले शैवाल-विस्फोट की ओर ध्यान आकर्षित करती है।
आजकल पूंजीवादी व्यवस्था मात्र लाभ और पैसे की चमक पर ठहरी हुई है। मानवीयता से दूर-दूर तक कोई परिचय नहीं। इंसान कितना संवेदनहीन हो गया है कि उसे अपने लाभ के सिवा किसी भी नुकसान की कोई चिंता नहीं है। चाहे वह व्यक्ति हो,समाज हो,नदी हो या पर्यावरण हो।
मध्यमवर्गीय और निम्नवर्गीय समाज हर जगह सिर्फ चोट खाने के लिए ही बने हैं।
आपने सही समझाया कि Big chicken: A Fast Food Conspiracy , यह डॉक्यूमेंट्री सबको देखना चाहिये। सिर्फ ब्रिटिश सरकार ही नहीं; बल्कि जिस भी देश में इस तरह की कुव्यवस्थाएँ हैं, उन सभी को पहले से जमा ज़हरीले कचरे ढेर से ठीक से निपटना सीखना चाहिये।
चिकन आउटलेट्स के नाम सुनकर हमें तो आश्चर्य ही हुआ।
हमारे लिए तो यह पूरी ही जानकारी बिल्कुल नई,अकल्पनीय अविश्वसनीय किंतु सत्य है।
कितनी अजीब बात है कि इंसान स्वयं का भला भी नहीं सोच पाता। अगर सभी लोग नॉनवेज खाना बंद कर दें तो सभी कंपनियाँ अपने आप बंद हो जाएँगी,पर ऐसा होगा नहीं।
बहरहाल आपकी संपादकीय की समझाइश अधिक महत्वपूर्ण है कि एक उपभोक्ता के तौर पर अपने दायित्व का सब को निर्वाह करना ही चाहिये।
शैवाल शब्द से हमारा परिचय कुछ सालों पहले तब हुआ था जब नर्मदा नदी में एजोला (Azolla) और अन्य शैवाल (Algae) के अत्यधिक फैलाव और प्रदूषण की समस्या को National Green Tribunal (NGT) ने मुख्य रूप से वर्ष 2016 (3 फरवरी 2016) में गंभीरता से लिया था और जबलपुर और आसपास के क्षेत्रों में नर्मदा नदी में फैल रहे शैवाल को लेकर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निर्देश जारी किए थे।
उस समय इसका मुख्य कारण शहरों का गंदा पानी (सीवेज) और डेयरियों का अपशिष्ट सीधे नदी में मिलना रहा। जिससे औपानी में ऑक्सीजन की कमी और जलीय जीवों के लिए संकट रहा इसके कारण नर्मदा नदी में स्नान बंद कर दिया गया था। जबलपुर से नर्मदा जी का बहाव होशंगाबाद की ओर है।
हमें याद है कि यहाँ भी पानी हरा हो गया था लंबे समय तक नर्मदा स्नान बंद रहा और नर्मदा जी के पानी का उपयोग नहीं हुआ। वृहद स्तर पर इसका सफाई अभियान चला था।
गर्मी में यह समस्या और अधिक बढ़ जाती है। उस समय हजारों ,लाखों की तादाद में बहुत मछलियाँ मर गई थीं। मछलियाँ पकड़ने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था।
आपके संपादकीय में “वाई नदी”के बारे में पढ़कर वह सारा मंजर एक बार फिर आँखों के सामने तैर गया।आपके तथ्य और आँकड़े वाकई चौंकाने वाले हैं।
संपादकीय की समझाइश काबिले गौर है कि भारत में भी बड़े पैमाने पर होने वाले चिकन फार्मिंग को लेकर त्वरित कदम उठाये जाएँ।
समस्या के पूर्व ही उसका समाधान ढूँढना व उस क्षेत्र में क्रियाशील होना ही समझदारी है।
आपने आज ऐसे विषय की जानकारी दी है जो शायद कभी किसी की कल्पना में भी नहीं रही होगी।
आपका “बदला” शब्द सिर्फ बदला नहीं है ,प्रतिकात्मकता में यह बड़ा अर्थ रखता है।
हिंदी में इसके लिए कई कहावतें हैं-
जैसा करोगे, वैसा भरोगे।
बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से खाए।
और एक गाने की पंक्ति याद आ रही है-
“जो बोया है वही पाएगा
तेरा किया सामने आएगा ”
हर क्रिया की कोई न कोई प्रतिक्रिया अवश्य होती है उपभोक्ता की लालसा और पूँजी का प्रभाव किस हद तक जा सकता है यह काबिले गौर है। यह तो सही है कि व्यापार में माँग और पूर्ति का नियम चलता है। पर यह भी ध्यातव्य है कि माँग उचित हो और पूर्ति व्यवस्था के अंतर्गत। लेकिन मशीनी जिंदगी में इतना कोई सोचता नहीं।
आपके इस संपादकीय ने चिकन खाने की एक सामान्य सी आदत को एक बड़े पर्यावरणीय संकट से जोड़कर पाठकों को अपनी रोजमर्रा की जीवनशैली पर विचार करने के लिए विवश किया।
—”विश्व में कितने लोग मांसाहारी हैं और उनके लिए कितने पशु-पक्षी प्रतिदिन काटे जाते होंगे?; ”
आपके इस एक सामान्य-से प्रश्न ने औद्योगिक चिकन फार्मिंग की भयावहता तक पहुँचा दिया।
जहाँ तक ‘चिकन बदला ले रहा है’ वाली बात है तो वास्तव में यह एक रूपक है। चिकन स्वयं मनुष्य से बदला नहीं ले रहा; बल्कि मनुष्य द्वारा बड़े पैमाने पर किये जा रहे पशु-उत्पादन और उपभोग के पर्यावरणीय परिणाम ही अंततः मनुष्य के सामने लौटकर आ रहे हैं।
कुल मिलाकर, ‘चिकन बदला ले रहा है…!’ केवल चिकन फार्मिंग पर लिखा गया संपादकीय नहीं, बल्कि मनुष्य की उपभोग-केंद्रित जीवनशैली और पर्यावरण के बीच बिगड़ते संबंध का आईना है।आपने मांसाहारी खाद्य पदार्थ को केंद्र में
रखकर नदी, भूमि, पशु, उद्योग, जलवायु और मनुष्य—इन सभी को एक ही प्रश्न से जोड़ दिया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लेख पढ़ने के बाद पाठक के सामने प्रश्न केवल यह नहीं रहता कि “हम चिकन खाते हैं या नहीं?”, बल्कि यह बन जाता है कि हम जो खाते हैं, उसके पर्यावरणीय परिणामों के प्रति कितने जागरूक हैं। यही इस संपादकीय की वास्तविक सफलता है।
एक बेहद जरूरी और महत्वपूर्ण संपादकीय के तहेदिल से शुक्रिया आपका। पुरवाई का आभार तो बनता है।
सम्पादक
पुरवाई
नमस्कार l आज आपने इतना महत्तवपूर्ण विषय उठाया है, जिसकी आज के समय मेँ बहुत अधिक आवश्यकता है l मांसाहारी लोग, इसने होने नुकसान को अच्छी तरह से जानते हैं, फिर भी उससे बचते नहीं हैं l बल्कि शाकाहारियों को कहते हैं, तुम नहीं जानते, तुम क्या मिस कर हो, मैं उनसे कहती हूँ तुम नहीं जानते तुम क्या कर रहे हो I
हम बात कर रहे हैँ बदला लेने की l जहां तक बदला लेने का सवाल है, एक चिड़िया के बच्चे को छूने की कोशिश करोगे, वह भी ची ची करेगी और आपको काटने को आएगी l फिर वह तो चिकन है, जिसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाते हैं l प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वह बदला लेगा ही l बुद्धिमान नाथ जी की बात से मैं पूर्णतया सहमत हूँ कि क्या शाकाहारी लोग खुशनुमा और स्वस्थ्य जीवन नहीं जीते l वे शाकाहार में अनेकों सुस्वादु भोजन का आनंद नहीं लेते हैं l
चिकन जिंदा होने पर नुकसान पहुंचाता ही है,मरने के बाद भी उसके अवशेष हानि पहुंचाते हैं l उनके शरीर से निकली हुई गंदगी पानी को दूषित करती है l
जब बकरे या मुर्गे आदि को हलाल करने को, घसीटकर बूचड़खाने लेकर जाते हैं, तब वे
मानसिक तौर पर बहुत बिचलित होते हैं और उनके शरीर में एक केमिकल पैदा हो जाता है, जो मानव शरीर को बहुत हानि पहुंचाता है l
भगवान महावीर अहिंसा के सिद्धांत सिर्फ धर्म के लिये नहीँ हैं बल्कि वैज्ञानिक कसौटी पर भी य़ह सिद्ध हो गया है कि यह मानव स्वास्थ्य के लिए भी आवश्यक है l
आज यह जरूरी है कि भारत जैसे सनातनी देश में,व्यक्तिगत तौर पर लोगों को इसके नुकसान समझाये जाएं l पब्लिकली तो नहीं कह नहीं कह सकते ‘प्रजातंत्र’ आ जाएगा, कि हमारे खाने पर रोक लगा रहे हैं l ‘मछली भात’ का विवाद तो चल ही रहा है l
सादर
धन्यवाद जी
उषा
मुंबई
आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी का इस बार का पुरवाई का साप्ताहिक संपादकीय भी हर बार की भाँति अनूठा और अप्रत्याशित है, जिसमें वे मुर्गे मुर्गियों की बीट से नदियों में होने वाले जल प्रदूषण की ब्रिटिश समस्या की ओर संकेत करते हैं। भारत में तो इस दिशा में कभी सोचा भी नहीं गया है कि पशुओं विशेषकर मुर्ग़े मुर्गियों की बीट से भी जल प्रदूषित हो सकता है। मुझे जानकारी है कि इस बीट का भारत में खाद की भाँति खेतों में उपयोग किया जाता है। हालाँकि भारत में ऐसा कोई आँकड़ा उपलब्ध नहीं है जिसके आधार पर ज्ञात किया जा सके कि भारत में कुल कितने ब्रायलर और पोल्ट्री फ़ार्म हैं और उनमें कितने मुर्गे मुर्गियाँ औसतन रहते हैं या प्रति भारतीय कितने मुर्गी मुर्गे की खपत है। फिर भी यह एक ऐसी समस्या अवश्य है, जो इंसानों के स्वास्थ्य से प्रत्यक्षतः जुड़ी हुई है। भारत में लगभग हर साल इसी वर्षा ऋतु के दौरान बर्ड फ़्लू के मामले आते रहते हैं और कई बार मुर्गे मुर्गियों को सामूहिक रूप से दफ़न कर मानव स्वास्थ्य को बचाने की क़वायद की जाती रही है, लेकिन संपादक महोदय की पारखी निगाह ने इस समस्या को सामने लाकर बड़ा उपकार किया है और संभव है कि भारत सरकार भी जल प्रदूषण के इस पहलू के अध्ययन के उपरांत इससे बचने के उपाय खोजे। बहरहाल एक शानदार और आवश्यक विषय पर संपादकीय लेखन के लिए अग्रज शर्मा जी के प्रति आभार व्यक्त करना तो बनता है।
धरती पर जब से इंसान पैदा हुआ है तब से पर्यावरण की समस्याओं का विस्तार होता चला जा रहा है।प्रकृति को यह घात सिर्फ मनुष्य की देन है। एक के बाद एक नई समस्या पैदा होती जा रही है।
हद से ज्यादा किसी भी वस्तु का भर जाना और फिर उसका निवारण न किया जाना वाकई एक गंभीर समस्या है
प्रदुषण से बचा क्या! पानी, खाद्य, ध्वनि,प्रकाश,वायु कुछ नहीं बचा है, समस्या पैदा करने से। मिट्टी, रेत तक समस्या हैं।
और तो और संवेदनाएँ प्रदूषित हैं, तो फिर और क्या बचता है, कहाँ जाएगा समाज, विश्व समाज की बात है मैं किसी एक देश की बात नहीं करती।
आदमी के द्वारा प्रदूषण फैलाया जाना बूमरैंग सरीखा है सब कुछ लौटकर उसकी ही तरफ आना है।
आपके सम्पादकीय बहुत गंभीर और सामयिक विषय उठाते हैं, आपकी साधुवाद।
“चिकन बदला ले रहा है” परम आदरणीय तेजेंद्र शर्मा जी द्वारा लिखित ब्रिटेन में घटित घटना पर आधारित संपादकीय अत्यंत यथार्थवादी एवं वास्तव को सामने रखने वाला है। आपने जिस संवेदनशीलता और गंभीरता के साथ इस विषय को प्रस्तुत किया है, वह निश्चित रूप से विचार करने पर विवश करता है।
मैं अब तक सोचता था कि इस प्रकार की घटनाएँ केवल भारत में ही होती हैं; लेकिन आपके संपादकीय को पढ़ने के बाद यह स्पष्ट हुआ कि यह समस्या वास्तव में वैश्विक स्तर पर भी मौजूद है। यह स्थिति निश्चित रूप से चिंताजनक और भयावह है।
आपने इस विषय को अत्यंत गंभीरता, संवेदनशीलता और सटीकता के साथ प्रस्तुत किया है। एक महत्वपूर्ण सामाजिक प्रश्न को प्रभावी ढंग से सामने लाने के लिए आपको हार्दिक धन्यवाद एवं साधुवाद।
प्रोफेसर (डॉ.)प्रकाश शंकरराव चिकुर्डेकर वारणानगर जिला-कोल्हापुर महाराष्ट्र भारत।
प्रधानाचार्य श्री गुजराती सेवा समाज द्वारा संचालित श्रीमती चंपाबेन बालचंद शाह महिला महाविद्यालय सांगली महाराष्ट्र। 9156724545
हमेशा की तरह बेहतरीन संपादकीय
अलग हटकर महत्वपूर्ण विषय पर जानकारी देने हेतु बहुत-बहुत आभार