Thursday, May 14, 2026
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डॉ मनोज मोक्षेंद्र का लेख – बाइबिल के अनुसार एडम का मनु और ईव का श्रद्धा न होना—नारी पात्रों के प्रति दिव्या की दिव्य दृष्टि

दिव्या माथुर के कथा-साहित्य में द्वंद्वात्मक स्थितियों का सहज-स्वाभाविक प्रस्फुटन होता है. दो भिन्न-भिन्न संस्कृतियों, प्रदेशों, जन-समूहों, व्यक्तियों, कालों आदि के बीच भी द्वंद्व साफ-साफ रूपायित होता है। ये द्वंद्वात्मक स्थितियां उनके कथा-साहित्य की पृष्ठभूमि में और पात्रों के चरित्र-चित्रण में साफ दृष्टिगोचर होती हैं। जिस तरह वह अपनी स्त्री-पात्रों के चरित्र और व्यक्तित्व को सश्रम निखारती-संवारती हैं, उससे यह कतई कयास नहीं लगाना चाहिए कि उनका इरादा पुरुष पर नारी के वर्चस्व को प्रदर्शित करना है; वह पुरुष-पात्रों के साथ भी वांछित न्याय करती हैं। यह कहा जाना उचित नहीं है कि उनका दृष्टिकोण अन्य नारीवादी कथाकारों की भांति पुरुष समाज के प्रति रुक्ष है। जैसाकि वह सोचती हैं, पारिवारिक और सामाजिक समरसता के लिए दोनों का साहचर्य आवश्यक है और इसी साहचर्य को बनाए रखने के लिए वह आजीवन संघर्षरत रहने वाली स्त्री-पात्रों को सर्वथा-सर्वदा मुखर रखना चाहती हैं क्योंकि उनका मुखर रहना दोनों के संबंधों को सहज बनाने के लिए एक सकारात्मक क्रियाविधि है। नारी-सुलभ इस मुखरता का कोई नकारात्मक पहलू भी नहीं है और हम यह नहीं कह सकते कि दिव्या, नारी के वर्चस्व को अभिभावी बनाकर एक विषमतापूर्ण समाज की कल्पना करती हैं। अधुनातन समाज में दोनों की शख़्सियत को समान रूप से पल्लवित-पुष्पित करना ही दिव्या जैसे साहित्य-सृजक की ज़िम्मेदारी है, जिसे वह भलीभांति समझती हैं, निभाती हैं। चुनांचे, यह बात भी सही नहीं है कि दिव्या सिर्फ स्त्री-पक्ष पर ही अपनी दृष्टि गड़ाए रहती हैं ताकि उन्हें नारी-विमर्श की टीम में शुमार किया जा सके। दिव्या का ऐसा कोई इरादा नहीं होता। वह अपने पात्रों में सिर्फ इंसानी अक्स देखती हैं। किसी पुरुष या किसी स्त्री पर वह कोई इल्ज़ाम नहीं थोपना चाहतीं. स्त्री हो या पुरुष, किसी एक की तरफ उनका विशेष झुकाव नहीं होता. हालांकि एकाध बार उन्होंने घोषित तौर पर कहा है कि उनकी फलां कहानी या उपन्यास ‘पुरुष-प्रधान’ है; किंतु, इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि वह समाज में पुरुष के बढ़ते हुए वर्चस्व को प्रदर्शित करना चाहती हैं अथवा उसे देख, वह खुश होती हैं। इसका अर्थ यह भी नहीं लगाया जाना चाहिए कि वह ऐसा सिर्फ इसलिए कहती हैं ताकि वह नारी के प्रति पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने के आरोपों से बच सकें. असामाजिक और अमानवीय होने पर वह दोनों को झिड़कियां लगाती हैं. पुरुष समाज पर आपत्तियां और आरोप उड़ेलकर वह उसे कटघरे में खड़ा करना नहीं चाहती हैं। अस्तु, हम जैसे-जैसे उनके कथा-साहित्य की गहराई में जाते हैं, वह स्त्री-पुरुष के संबंधों को माधुर्यपूर्ण स्थायित्व प्रदान करने के लिए ख़ुद को कृतसंकल्प रखती हैं। 
दिव्या के नारी-विषयक इस आलेख में, आवश्यक संदर्भों सहित उनकी स्त्री-पात्रों की बाह्य और आंतरिक अस्मिता को सामने रखने की कोशिश की गई है. प्रथम दृष्ट्या उनकी कहानियों के अनुशीलन से यह ज़ाहिर होता है कि उनकी स्त्री-पात्र, पुरुषों के हाथों कठपुतली की भांति ता-ता थैया करते हुए नाचती हुई-सी प्रतीत होती है। किंतु, ऐसा तो बाह्य तौर पर नज़र आता है। दिव्या की तरह ही उनकी स्त्री-पात्र भी एक दृढ संकल्प के साथ नारी समाज का प्रतिनिधित्व करती है तथा नारी-सुलभ पारंपरिक मान्यताओं के अनुरूप अपने दैहिक-भौतिक रूप में कोमल और कृशगात दिखाई देती है; पर, उसका आंतरिक पक्ष अत्यंत सबल, सशक्त और समर्थ होता जाता है ताकि दुनियाभर में फैली लिंग-आधारित विभेदक मान्यताओं का खंडन-मंडन किया जा सके और एक साहचर्यपूर्ण परिवार का सौष्ठवपूर्ण पोषण किया जा सके।
दिव्या अपनी स्त्री-पात्रों के सृजन से पहले त्रिकाल दौड़ लगाती हैं; वैश्विक आधार पर, स्त्री समाज के बारे में पूरी जानकारी लेना चाहती हैं और अतीत में घुसपैठ करके भारत तथा भारतेतर दुनिया की ऐतिहासिक-पौराणिक यात्राएं भी करना चाहती हैं. उनकी स्त्री-पात्र महज़ मास-मज्ज़ा और हाड़-खून से बनी हुई कोई पुतला नहीं है; उसकी ख़ामोशी, सहनशीलता, नारी-सुलभ शीलता, विनम्रता और समझौतावादी प्रकृति का यह अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि वह मन-कर्म-वचन से सख़्त लगने वाले पुरुष के आगे घुटने टेककर सिर्फ अपने अस्तित्त्व और अस्मिता को बचाने के लिए जद्दोज़हद कर रही है. बेशक! दिव्या की कहानियों में नारी-पात्र सहनशील, विनम्र, और समझौतावादी दृष्टिकोण को धारित करती है तथा अपनी अस्मिता को बनाए रखने से पीछे नहीं हटती है. उन्होंने आर्यावर्ती दृष्टांतों के विपरीत, लोकप्रिय ग्रीक मिथकों और पुराणों में पाया है कि नारी-पात्र हर घटना, हर प्रसंग में पुरुष पर अपना आधिपत्य कायम करने के लिए तत्पर है. उदाहरणार्थ, क्लियोपेट्रा, एंटोनी पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए उसे अपने अंत:पुर में अपने सौंदर्य और वासना के बल पर क़ैद करके अपने राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करना चाहती है. इस ऐतिहासिक प्रसंग से पहले, एडम पर ईव (आदम-हौवा) के हावी होने का दृष्टांत भी उल्लेख्य है जहाँ ईव, एडम को अपनी इच्छओं का ग़ुलाम बनाती है और अपनी अस्वाभाविक मनोवृत्तियों को साकार करती है. किंतु, दिव्या इस प्रकार की स्त्री-पात्रों के प्रति अपनी सहानुभूति-सहमति व्यक्त नहीं करती हैं; वह उनके विरुद्ध खड़ी हैं क्योंकि वह स्वयं एक भारतीय नारी हैं जहाँ स्त्री-पुरुष का साहचर्य विशेष महत्त्व रखता है और इस संश्लिष्ट स्वरूप को शिव के अर्धनारीश्वर रूप में भी अनादिकाल से स्थापित किया गया है. नारी संबंधी इस पौर्वात्य विचारधारा की अभिव्यक्ति थॉमस हार्डी के स्त्री-पात्रों में भी देखी जा सकती है. हार्डी-कृत ‘फार फ्रॉम दि मैडिंग क्राउड’ में बाथशेबा के व्यक्तित्त्व में हमें कहीं-न-कहीं भारत की पौराणिक पात्र सीता नज़र आती है जिसमें स्त्री-सुलभ समर्पण, संघर्ष और आत्मोत्सर्ग के गुण सर्वोपरि हैं तथा उदात्त चरित्र वाले गैब्रियल ओक के प्रति उसका समर्पण उसके नारी-पक्ष का एक सबल घटक है जो हमें उसका प्रशंसक बना देता है. 
दिव्या की कहानी “एडम और ईव” में, एडम बाइबिल-सम्मत पौराणिक एडम का प्रतिनिधित्व नहीं करता है जबकि उनकी ईव भी पौराणिक ईव के विपरीत है. दिव्या ने स्त्री-पुरुष के उस पौराणिक मिथक को न केवल तोड़ा है बल्कि दोनों के प्रति हमारी धारणा को भी बदलने की कोशिश की है. दिव्या की ईव, हार्डी की बाथशेबा है जबकि एडम उस पौराणिक एडम के विपरीत, पौराणिक ईव की इच्छाओं का ग़ुलाम भी नहीं है. इंग्लैंड के रोमांटिक रचनाकारों की रचनाओं में भी हम नारी-पात्रों को पौर्वात्य मान्यताओं के अनुकूल पाते हैं जहाँ प्रकृति स्त्री के प्रतीक के रूप में पुरुष-प्रधान समाज के साथ साहचर्य में है. वर्डसवर्थ की कविताओं की स्त्री-पात्र ‘लिली’ भी पौराणिक ईव के विरुद्ध खड़ी है. इससे यह बात स्थापित होती है कि अंग्रेज़ी साहित्य में नारी की स्थिति किसी विशेष प्रभाव में परिवर्तित हुई. इंग्लैंड और पश्चिमी देशों में भारतीय पुराणों से संबंधित साहित्य पहुंचने के साथ-साथ वहाँ के साहित्य में नारी संबंधी विचारधाराओं में शनै:शनै: बदलाव आया जिन्हें दिव्या माथुर के अतिरिक्त, पूर्ववर्ती अंग्रेज़ी साहित्यकारों ने भी सहर्ष अपनाया। कहना न होगा कि इंग्लैंड का समाज भी पितृसत्तात्मक ज्वर से पीड़ित रहा है जिसका उपचार करने के लिए समय-समय पर वैचारिक आंदोलन हुए। ईव और क्लियोपेट्रा के दो प्रमुख उदाहरणों में स्त्री को मुखर बनाने को नारी-आंदोलन के रूप में लिया जाना चाहिए, भले ही इन दोनों पात्रों के काल-खंडों में समय का अंतराल है। उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में, उपन्यासकार जेन ऑस्टिन ने भी अपनी स्त्री-पात्रों को आदर्श-रूप में प्रस्तुत किया है. वह प्रस्तुतीकरण इंग्लैंड में आए नारीवादी आंदोलन का एक ज्वलंत दृष्टांत है। ऑस्टिन के उपन्यास ‘प्राइड एंड प्रिज्युडिस’ में एलिज़ाबेथ बेनेट नारी-संबंधी आर्यावर्ती धारणाओं का प्रतिनिधित्व करती है जहाँ नारी पुरुष-प्रधान समाज के विरुद्ध खड़ी होती है और एक अडिग संकल्प के साथ संघर्ष करती है. दिव्या की स्त्री-पात्र वर्ड्सवर्थ-कॉलरिज़ द्वारा मानवीकृत प्रकृति के स्वरूप को रूपायित करती है; वह वर्ड्सवर्थ की ‘लिली’ है, हार्डी की बाथशेबा है, ऑस्टिन की एलिज़ाबेथ बेनेट है और भारत की सीता भी है. कुल मिलाकर दिव्या की स्त्री-पात्र का प्राकट्य भारतीय नारी का प्रतिनिधित्व करने के लिए होता है।
दिव्या में नारी-संबंधी अवधारणा के अधिरोपित होने से पूर्व पश्चिमी जगत की पृष्ठभूमि पर निग़ाह डालनी होगी. स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरबिंदो घोष ने भारतीय अध्यात्म के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ पश्चिम में भारतीय नारी के सम्मानित स्वरूप को भी स्थापित किया। इनसे पूर्ववर्ती काल में, पश्चिम जगत में भारतीय दर्शन और विचारधारा ने अपनी जड़ें गहराई से जमा ली थीं. यूरोप में मैक्समूलर, नीत्शे और शोपेनहावर ने (बौद्ध और) हिंदू दर्शन के माध्यम से स्त्री के समानजनक स्वरूप को स्थापित किया जबकि अमरीका में तो वाल्ट व्हिटमैन, राल्फ वाल्डो एमर्सन, यूजीन अ’नील जैसे साहित्यकारों ने भारतीय दर्शन के प्रभाव में भारतीय नारी को वहाँ की स्त्रियों के लिए एक आदर्श के रूप में प्रतिष्ठित किया। इसी क्रम में 19वीं सदी में मैबेल कॉलिंस की भारतीय दर्शन की पुस्तिका ‘लाइट ऑन दि पाथ’ ने बच्चे-बच्चे को भारतीय विचारधारा का दीवाना बना दिया था। मैडम ब्लावात्स्की की भारतीय दर्शन को व्याख्यायित करने वाली पुस्तक ‘दि सिक्रेट डॉक्ट्रिन’ बुद्धिजीवियों से लेकर आम आदमी तक खूब पढ़ी और सराही गई। ब्लावात्स्की के दर्शन के मूल में भारतीय नारी के स्वरूप को पुराणिक उद्धरणों के जरिए, जिनमें पुरुष और स्त्री के बीच एक-दूसरे के गुणों को धारित करने पर बल दिया गया है, शिद्दत से रोपित किया गया है। पाश्चात्य जगत में इस वैचारिक प्रभाव को टी.एस. इलियट, विलियम बट्लर यीट्स जैसे साहित्यकार भी आगे लेकर आए. इस तरह दिव्या को अपनी स्त्री-पात्रों के निरूपण के लिए काफी खाद-पानी और मसाला मिला जिसे उन्होंने अपने अनुभवों से और अधिक उपयोगी बनाया है।
दिव्या ने स्त्री-पात्रों को दो स्रोतों से प्राप्त धारणाओं के जरिए निखारा है. एक तो वह स्रोत है जो उन्हें भारत में पैदायशी आधार पर मिला है जबकि दूसरा स्रोत है—पश्चिम की जमीन जो भारतीय दर्शन से पहले से ही अभिसिंचित हो चुकी थी. प्रवास में रहते हुए दिव्या ने जिन स्त्री-पात्रों को अपने कथा-साहित्य में अवतरित किया है, उन्हें उन्होंने दोनों स्रोतों के जरिए निखारा और संवारा है. अपनी कहानी ‘एडम और ईव’ में ईव उनके समूचे कथा-साहित्य की प्रतिनिधि स्त्री-पात्र है. एडम पाश्चात्य जीवन-शैली का प्रतिनिधित्व करता है और ईव पर हावी होकर अपने पुरुषजन्य अहं को संपोषित करता है. ईव तो भारतीय नारी के प्रतिरूप में संकोच, दलन, हिंसा, पीड़ा और पुरुष-अधीनता के पाश में बिंधी हुई है। ईव में प्राचीन मान्यताओं वाली पारंपरिक स्त्री की छवि दृष्टिगोचर होती है जो अत्यधिक समझौतावादी, सहनशील, विनयशील और क्षमाशील है। वह बाइबिल की ईव से बिल्कुल अलग है जो हर प्रकार से एडम को अपनी इच्छाओं और कामनाओं पर खरा उतारती है। 
बाईबिल गाथा में एडम और ईव का वही स्थान है जो भारतीय पुराण में मनु और श्रद्धा का है। दोनों ही पृथ्वी पर सृजन के लिए अवतरित हुए। अस्तु, एडम और मनु की तथा ईव और श्रद्धा की तुलना समानता के आधार पर कभी नहीं की जा सकती; दोनों के व्यक्तित्व विरोधी गुणों से आप्लावित हैं। उसी प्रकार, ईव और श्रद्धा के व्यक्तित्व में भी जमीन-आसमान का अंतर है। सामान्य तौर पर हम मनु और श्रद्धा के चरित्र को पूरी पौराणिकता के साथ हिंदी के छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद के महाकाव्य ‘कामायनी’ में वर्णित पाते हैं। दिव्या के एडम और ईव, मनु और श्रद्धा के ही प्रतिरूप हैं। इस कहानी के कथानक को बुनते समय दिव्या के मन-सरिता में मनु और श्रद्धा के चरित्र ही तैरते रहे होंगे. दिव्या के एडम और ईव दाम्पत्य जीवन के कटु यथार्थ को झेलते हुए अपने जीवन-बंधन को अपरिहार्य मानकर चलते हैं या यूं कहिए कि उन्होंने इस दांपत्य को सात जन्मों के बंधन के रूप में स्वीकार्य किया होगा, जिसकी घोषणा दिव्या ने संकोचवश नहीं की। ऐसा करने से नि:संदेह बाइबिल में निरूपित एडम और ईव के व्यक्तित्व धराशायी हो जाते। एक लोकप्रिय मॉयथोलोज़ी संकट में आ जाता।
डॉ मनोज मोक्षेन्द्र
डॉ मनोज मोक्षेन्द्र
डॉ मनोज मोक्षेन्द्र मूलतः वाराणसी से हैं. वर्तमान में, भारतीय संसद में संयुक्त निदेशक के पद पर कार्यरत हैं. कविता, कहानी, व्यंग्य, नाटक, उपन्यास आदि विधाओं में इनकी अबतक कई पुस्तकें प्रकाशित. कई पत्रिकाओं एवं वेबसाइटों पर भी रचनाएँ प्रकाशित हैं. एकाधिक पुस्तकों का संपादन. संपर्क - 9910360249; ई-मेल: [email protected]
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3 टिप्पणी

  1. दिव्या के कथा-साहित्य में अभी मैं विचरण कर रहा हूँ; या यूँ कहिए कि भटक रहा हूँ। जब तक भटका नहीं जाएगा, नए रास्ते, नया ठांव नहीं मिलेगा। उम्मीद करता हूँ कि कुछ सार्थक अवश्य हाथ आएगा।
    तेजेन्द्र शर्मा जी को हार्दिक धन्यवाद!
    आलेख में दो जगह ‘लिली’ शब्द का आवर्तन हुआ है। गलती से ‘लूसी ग्रे’ के स्थान पर लिली लिख दिया है। कभी प्रवासी साहित्यकारों पर आलोचना-समीक्षा से संबंधित कोई पुस्तक आई तो उसमें लूसी ग्रे ही लिखा जाएगा।

  2. आदरणीय मनोज जी!

    आपने लिखा है कि दिव्या के कथा साहित्य में आप विचरण कर रहे हैं और हमने प्रवेश किया है।
    इस लेख को वास्तव में हमने जल्दबाजी में पढ़ा है आज शाम को नई पत्रिका लग जाएगी और हम चाह रहे हैं कि उसके पहले जितना अधिक से अधिक पढ़कर लिख सके लिख दें क्योंकि पीछे पलट कर देखना मुश्किल होता है।
    काफी गहन अध्ययन है दिव्या जी का! पूरा लेख पढ़ने के बाद एक महत्वपूर्ण बात जो हम समझ पाए, जिसमें हमारी अपनी भी सहमति हैकि पुरुष और स्त्री दोनों ही पुरुष और प्रकृति की तरह हैं, शिव पार्वती की तरह ही हैं और दोनों को ही एक दूसरे का सम्मान करना चाहिए क्योंकि दोनों ही एक दूसरे के बिना अपूर्ण हैं।
    दोनों की ही अपनी अपनी जगह में महत्ता है। जिस तरह लाइट को जलाने के लिए वायर के दोनों तार महत्वपूर्ण है। सिर्फ एक तार से बिजली नहीं जलती प्लग में दोनों तारों का जुड़ा रहना जरूरी रहता है, इस तरह इस संसार में स्त्री और पुरुष को एक दूसरे का महत्व समझते हुए मिलकर रहना चाहिये। दोनों को एक दूसरे की अहमियत समझना चाहिये।
    इस लेख के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया। पढ़कर अच्छा लगा।

    • कुछ महीनों से कतिपय समस्याओं से विचलित हूं। लेखनी कुछ थम सी गई है। इस विरामावस्था से जल्दी ही उबरना है। बोध कराने के लिए धन्यवाद!

      प्रवासी साहित्य पर लिख रहा हूँ। दिव्या जी मेरी प्रिय लेखिका हैं। उनके साहित्य पर कुछ और लिख सका तो खुद को धन्य मानूँगा।

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