Thursday, May 21, 2026
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संपादकीय – लक्ष्मी ब्रिटेन से रूठ गई…!

दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी स्टील कंपनी आर्सेलर मित्तल (Arcelor Mittal) के मालिक लक्ष्मी मित्तल ब्रिटेन के शीर्ष अरबपतियों में शुमार हैं। यूके सरकार के टैक्स सुधारों से असंतुष्ट होने के कारण वे ब्रिटेन छोड़ रहे हैं। लक्ष्मी मित्तल का ब्रिटेन से प्रस्थान देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। स्वयं ब्रिटिश सरकार के कई मंत्री भी मानते हैं कि अरबपतियों का देश छोड़ना चिंता का विषय है। यूके सरकार टैक्स ढाँचे में बड़े बदलाव करने जा रही है, जिसमें 20% तक का एग्ज़िट टैक्स, मेंशन टैक्स और 40% तक बढ़ाया गया ‘इनहेरिटेंस टैक्स’ यानि विरासत कर शामिल हैं।

ब्रिटेन में भारतवंशियों ने अपनी उपस्थिति पूरी शिद्दत से दर्ज करवाई है। ब्रिटेन का सबसे अमीर परिवार यहाँ का राज-परिवार या कोई उद्योगपति नहीं है। ब्रिटेन का सबसे धनी परिवार भारतीय मूल का हिन्दुजा परिवार है। परिवार के मुखिया गोपीचन्द हिन्दुजा का हाल ही में निधन हो गया था, जबकि उनके सबसे बड़े भाई श्रीचन्द हिन्दुजा की मृत्यु 2023 में ही हो गई थी। इस समय प्रकाश हिन्दुजा और अशोक हिन्दुजा, हिन्दुजा परिवार की कमान संभाले हुए हैं।
‘पुरवाई’ के पाठक यह सोच सकते हैं कि आज अचानक संपादकीय के लिए ऐसा विषय क्यों चुन लिया गया है। दरअसल, हाल ही में ब्रिटेन की टैक्स नीति में कुछ ऐसे बदलाव किए गए हैं, जिनके चलते भारतीय मूल के स्टील सम्राट लक्ष्मी मित्तल ने ब्रिटेन छोड़ने का निर्णय ले लिया है। यह याद रखना आवश्यक है कि लक्ष्मी मित्तल केवल भारतीय मूल के एक अरबपति ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन के दस सबसे संपन्न व्यक्तियों में से एक हैं।
लक्ष्मी मित्तल का घर किसी महल से कम नहीं है। उनका घर लंदन में भारतीय उच्चायोग के स्थायी निवास के ठीक सामने है। यह लंदन का सबसे महँगा क्षेत्र है। जहाँ भारतीय उच्चायुक्त के निवास का पता- 9 केनसिंगटन, पैलेस गार्डंस है, तो वहीं लक्ष्मी मित्तल के घर का पता 18-19 केनसिंगटन पैलेस गार्डंस है। ऐसा शाही जीवन जीने वाले लक्ष्मी मित्तल अब ब्रिटेन छोड़ कर अपना ठिकाना स्विटज़रलैँड और दुबई में बनाने जा रहे हैं। 
15.4 अरब पाउंड की अनुमानित संपत्ति वाले मित्तल ने ब्रिटिश वित्त मंत्री रैचल रीव्स के उस बजट से पहले ही यूके छोड़ने का निर्णय ले लिया था, जिसमें धनी वर्ग पर और अधिक कर लगाने की संभावना जताई जा रही थी। यहाँ ‘नॉन-डोमिसाइल्ड’ व्यवस्था, जो दो सौ वर्षों से अधिक समय से लागू थी, विदेश में मूल घर रखने वाले निवासियों को उनकी विदेशी आय पर कर से छूट देती थी। इस विशेषाधिकार की समाप्ति से मित्तल जैसे अरबपतियों को अपनी वैश्विक आय पर भारी कर चुकाना पड़ता।
लक्ष्मी मित्तल ने अब आधिकारिक रूप से अपना टैक्स रेज़िडेंस स्विट्ज़रलैंड में स्थानांतरित कर लिया है, जबकि वे अपना अधिकांश समय दुबई में बिताएंगे। दुबई में उनके पास पहले से ही एक संपत्ति मौजूद है, और हाल ही में उन्होंने एक लक्ज़री रियल एस्टेट परियोजना में निवेश भी किया है।
इन दोनों स्थानों को चुनने का एक प्रमुख कारण यह भी है कि यहाँ विरासत कर नहीं लगाया जाता। यह कदम उनकी 15 अरब पाउंड से अधिक की संपत्ति को टैक्स-फ्री तरीके से अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करने का एक सुरक्षित अवसर प्रदान करता है।
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी स्टील कंपनी आर्सेलर मित्तल (Arcelor Mittal) के मालिक लक्ष्मी मित्तल ब्रिटेन के शीर्ष अरबपतियों में शुमार हैं। यूके सरकार के टैक्स सुधारों से असंतुष्ट होने के कारण वे ब्रिटेन छोड़ रहे हैं। लक्ष्मी मित्तल का ब्रिटेन से प्रस्थान देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। स्वयं ब्रिटिश सरकार के कई मंत्री भी मानते हैं कि अरबपतियों का देश छोड़ना चिंता का विषय है। यूके सरकार टैक्स ढाँचे में बड़े बदलाव करने जा रही है, जिसमें 20% तक का एग्ज़िट टैक्स, मेंशन टैक्स और 40% तक बढ़ाया गया ‘इनहेरिटेंस टैक्स’ यानि विरासत कर शामिल हैं।
लक्ष्मी निवास मित्तल मूल रूप से राजस्थान के रहने वाले हैं। 15 जून 1950 में राजस्थान के चुरू जिले में जन्मे लक्ष्मी निवास मित्तल अब 75 साल के हो गए हैं। साल 1960 के दशक में मित्तल का परिवार कोलकाता चला गया था, जहाँ उनके पिता एक स्टील मिल चलाते थे। मित्तल ने वहाँ के सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज में विज्ञान की पढ़ाई करते हुए मिल में काम किया। स्नातक की डिग्री पूरी करने के बाद उन्होंने मिल में ट्रेनी के रूप में काम किया।
वे वर्ष 1976 में इंडोनेशिया चले गए, जहाँ उन्होंने एक छोटी स्टील कंपनी स्थापित की, जो आगे चलकर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी स्टील मैन्युफैक्चरिंग कंपनी ‘आर्सेलर मित्तल’ के रूप में प्रसिद्ध हुई। 2004 में इस्पात इंटरनेशनल और एल.एन.एम. होल्डिंग्स के विलय तथा इंटरनेशनल स्टील ग्रुप के एक साथ अधिग्रहण के बाद ‘मित्तल स्टील’ की स्थापना हुई। इसके तुरंत बाद, 2006 में, मित्तल स्टील ने आर्सेलर के साथ विलय के लिए बोली लगाई, जिसके परिणामस्वरूप ‘आर्सेलर मित्तल’ का गठन हुआ।
जनवरी 2008 में, लक्ष्मी मित्तल को भारत के राष्ट्रपति द्वारा भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया गया। 
ब्रिटेन छोड़ कर जाने वाले उद्योगपतियों में लक्ष्मी मित्तल अकेले नहीं हैं। वर्ष 2025 में, किसी भी अन्य देश की तुलना में अधिक करोड़पति / अरबपति यू.के. छोड़कर चले गए हैं। हेनली प्राइवेट वेल्थ माइग्रेशन रिपोर्ट 2025 के अनुसार, इस साल करीब 16,500 करोड़पति ब्रिटेन छोड़ कर चले गए, जिनकी कुल संपत्ति लगभग $91.8 बिलियन है। यह पिछले दशक में यू.के. के करोड़पति आबादी में 9% की कमी के बराबर है, जिसमें आंशिक रूप से ब्रेक्सिट, राजनीतिक अस्थिरता और कर परिवर्तनों का असर शामिल है।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि “टैक्स बचाना एक बात है, लेकिन साथ ही, आपके ऊपर यह सामाजिक जिम्मेदारी भी है कि आप यह सुनिश्चित करें कि आप जिस देश में रह रहे हैं, उसमें निवेश भी कर रहे हैं।” यह बात सुनने में नैतिक रूप से सही लग सकती है, मगर व्यापारी को अपने व्यापार से सबसे अधिक प्रेम होता है। देश के लिए कुछ करने का जज़्बा जो ‘टाटा परिवार’ में देखा गया, वैसा कहीं और मिलना आसान नहीं है। 
ब्रिटेन का बजट पेश होने से पहले लंदन की सड़कों पर भारत के ‘किसान आंदोलन’ जैसा नज़ारा बन गया था। संसद के बाहर भारी पुलिस बल तैनात है, लेकिन किसानों के ट्रैक्टर वहाँ पहुँच चुके हैं। देश की अर्थव्यवस्था एक नाज़ुक मोड़ पर है। एक तरफ किसान अपनी ज़मीनों को बचाने के लिए सड़कों पर उतर आए हैं, तो दूसरी तरफ देश के सबसे बड़े उद्योगपति देश छोड़ने की प्रक्रिया में निमग्न हैं, और ये सब हो रहा है चांसलर (वित्त मंत्री) रेचल रीव्स के बजट के कारण। माना जा रहा था कि यह बजट भारतीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के स्टाइल में हो सकता है। टैक्स का बोझ इतना बढ़ने वाला है कि अमीर और गरीब दोनों परेशान हैं। लेबर पार्टी की सरकार के लिए यह सबसे बड़ी परीक्षा की घड़ी है। 
लंदन की पुलिस ने एबिंगडन स्ट्रीट पर एक ट्रैक्टर को देखा, जिस पर एक पोस्टर लगा था। पोस्टर पर लिखा था ‘फूल्स वोट लेबर’ यानि केवल मूर्ख लोग ही लेबर पार्टी को वोट देते हैं। पुलिस ने लगभग 20 ट्रैक्टरों को रोका, लेकिन प्रदर्शनकारी नहीं माने… यह नज़ारा बता रहा है कि किसानों में सरकार के ख़िलाफ़ कितना गुस्सा भरा हुआ है। पुलिस किसानों को समझा रही है कि इससे आम आदमी को बहुत परेशानी होगी, मगर किसान सुनने को तैयार नहीं हैं। 
कई बार मुझे लगता है कि भारतीय संसद में भिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं की भाषा शालीनता के स्तर से नीची मालूम होने लगती है। मगर इस बार के ब्रिटेन के बजट में विपक्षी ‘टोरी पार्टी’ की नेता केमी बादेनॉक ने चांसलर रैचल रीव्स की आलोचना करते हुए विनम्रता और शालीनता को ताक पर रख दिया। केमी ने कहा, “प्रभु हमारी सहायता करें… वह (रैचल रीव्स) रीड़ की हड्डी विहीन, लज्जाहीन और पूरी तरह से उद्देश्यहीन है।”
केमी ने आगे कहा, “आज उसका (रैचल रीव्स का) भाषण आत्म-मोह में डूबा हुआ था। आज उसे माफ़ी माँगने और कुछ विनम्रता दिखाने का मौका मिला था। मगर उसने उसे खो दिया।”, मैंने इससे पहले ब्रिटेन की संसद में ऐसी निजी स्तर पर आलोचना को गिरते नहीं देखा था। 
बजट में बीस लाख पाउंड से अधिक कीमत के घरों पर अतिरिक्त टैक्स लगाने का प्रावधान रखा गया है। ‘पुरवाई’ की संरक्षक आदरणीय ज़किया ज़ुबैरी जिस इलाके (मिल हिल) में रहती हैं, वहाँ तो घरों की कीमत आसमान को छू रही है। इस नए टैक्स की आँच शायद ज़किया जी तक भी पहुँच सकती है। 
हर देश की तरह मध्यम वर्गीय लोग ब्रिटेन में भी पिसने को अभिशप्त हैं। यह एक ऐसी निरीह जमात है, जो हर देश में टैक्स भरती है ताकि सरकार आम आदमी को लाभ देने वाली स्कीमों के लिए, इनके द्वारा दिए जा रहे टैक्स के पैसे का इस्तेमाल कर सके। इस श्रेणी के लोग दिन-रात मेहनत करते हैं (जिसमें मैं भी शामिल हूँ) और चालीस प्रतिशत की दर से टैक्स भरते हैं। बदले में उनके पल्ले पड़ते हैं और अधिक टैक्स!
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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24 टिप्पणी

  1. लक्ष्मी निवास मित्तल जिन्हें हम निवास बाबू कहते आये हैं से मेरा परिचय 1972 से है, जब मैं ca कर रहा था तब हमारी ऑडिट फर्म इनकी ऑडिटर थी इनकी कंपनी आंध्रा स्टील का मुख्यालय 2 नंबर ब्रेबॉर्न रोड में था उस समय ये ग्रेजुएशन करके नए नए अपने पिता के काम में ट्रेनी बन कर आये थे। पढ़ने में कुशाग्र थे। बहुत बड़ी कहानी है जिसे मैंने अपनी आत्मकथा में संक्ष्पित में लिखा है। खैर बात है लंदन से स्विट्ज़रलैंड जाने की बात तो यह बात है की सभी औद्योगिक घराने लांग टर्म नीति के अंतर्गत ही अपना स्थायी निवास शिफ्ट करते हैं कोई क्षणिक निर्णय लेने वालों में निवास बाबू नहीं हैं

    • सर यह जान कर बहुत अच्छा लगा कि आप लक्ष्मी निवास मित्तल जी से निजी तौर पर परिचित हैं। आप उनके निर्णय का सही आकलन कर सकते हैं। आपकी सार्थक टिप्पणी के लिये हार्दिक आभार।

  2. लक्ष्मी मित्तल सरीखे अरबपति व्यवसाई,ब्रिटेन की टैक्स व्यवस्था,किसानों का गुस्सा और आंदोलन,मिडिल क्लास पर टैक्स का बोझ ये सारे ऐसे मुद्दे हैं जो ब्रिटेन ,भारत या दुनिया के किसी भी देश में प्रमुखता से सुर्खियों में आने की नैसर्गिक क्षमता रखते हैं। इन मुद्दों पर इस बार का संपादकीय लिख कर पुरवाई पत्रिका को हम जनोन्मुखी और वैश्विक मुद्दों पर साफ साफ दो टूक लिखने वाला पत्र मान सकते हैं।
    इन्हेरिटेंस टैक्स भी एक यक्ष प्रश्न है जो तरक्की के रास्ते का भंवर है।जिन जिन देशों में इसका जिन्न है वहां वहां से लक्ष्मी और व्यवसाय भाग खड़े होते हैं और यही इस संपादकीय में भी है और सही भी है।जीवन भर की कमाई और एक झटके में सरकारी ख़ज़ाने में गई?;?!?
    ब्रिटेन की तो अपने टैक्स व्यवस्था को देखने की बहुत जरूरत है।वरना लक्ष्मी,सौभाग्य,बिजनेस और साख सभी भाग खड़े होंगे और भारत के पड़ोस विशेष के देश के नागरिकों का हज़ूम टिड्डी दल की मानिंद देश की अर्थव्यवस्था को दीमक से भी भयंकर तरीके से चाट क्या निगल जाएगा ।
    एक प्रवासी पत्रिका समूह ,इंग्लैंड को इस से बेहतर क्या समझा सकता है।

    • भाई सूर्य कान्त जी आपने संपादकीय की सोच को पूरी तरह समझा है और सार्थक टिप्पणी लिखी है। क्योंकि में स्वयं लंदन में रहता हूं तो यहां कि आर्थिक और राजनीतिक गतिविधियों पर नज़र रखता हूं। आपकी टिप्पणी हमारे लिये महत्वपूर्ण है।

  3. कराघात और करापात से पीड़ित विदेशी उद्योगपतियों द्वारा ब्रिटेन से पलायन पर शानदार संपादकीय। अभिनंदन

  4. आदरणीय तेजेंद्र शर्मा जी के इस बार के संपादकीय में ब्रिटेन के औद्योगिक जगत का समूचा इतिहास मौजूद है। सरकार की टैक्स सुधार नीतियाँ खासतौर से विदेशों से आकर ब्रिटेन में स्थाई रूप से बस चुके कारोबारियों पर असंतोषजनक टैक्स सुधार प्रणाली लागू करने की सोच को दर्शाती है।
    चूंकि लक्ष्मी मित्तल दुनिया की जानीमानी स्टील कंपनी आर्सेलर मित्तल के प्रमुख कर्ताधर्ता हैं। वे अब ब्रिटेन छोड़ रहे हैं। इसलिए भी ब्रिटेन सरकार की आलोचना हो रही है।
    संपादकीय पढने से ब्रिटेन के औद्योगिक जगत, वहाँ की टैक्स सुधार प्रणाली और प्रख्यात उद्योगपति लक्ष्मी मित्तल के विषय में पर्याप्त ज्ञानवर्धक जानकारी मिली।
    लक्ष्मी मित्तल जैसे प्रख्यात उद्योगपति का ब्रिटेन की टैक्स सुधार नीतियों के कारण ब्रिटेन छोड़ना निश्चित रूप से औद्योगिक जगत में एक बहुत बड़ी घटना होगी। ब्रिटेन की सरकार और वहां की रूलिंग पार्टी की भारी टैक्स सुधार प्रणाली और नीतियों के चलते ब्रिटेन की सरकार को आलोचना़ओं का भी सामना करना होगा।
    विश्लेषात्मक शैली में लिखे जोड़दार संपादकीय के लिए आदरणीय तेजेंद्र शर्मा को हार्दिक बधाई।

    डॉ रामशंकर भारती

    • भाई रामशंकर जी, आपने लिखा है “संपादकीय पढ़ने से ब्रिटेन के औद्योगिक जगत, वहां की टेक्स सुधार प्रणाली और प्रख्यात उद्योगपति लक्ष्मी मित्तल के विषय में पर्याप्त जानकारी मिली।” संपादकीय का एक उद्देश्य यह भी था। हार्दिक धन्यवाद।

  5. इस बार का संपादकीय ‘लक्ष्मी ब्रिटेन से रूठ गई’ शीर्षक कौतूहल पैदा करता है। लक्ष्मी ब्रिटेन से रूठ गई, मतलब अब लक्ष्मी(धन, वैभव) ज्यादा दिनों तक वहां न ठहरेगी। लक्ष्मी चंचला जो ठहरी। एक जगह ज्यादा समय वह रुकती कहां है!
    दूसरे स्टील कंपनी ‘आर्सेलर मित्तल’ के मालिक लक्ष्मी मित्तल ब्रिटेन छोड़कर जा रहे हैं। ये बड़े बिजनेस मैन हैं, जिन्हें ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था का एक स्तंभ कहा जा सकता है।
    श्लेष चमत्कारिक होता है। इसी लक्ष्मी शब्द में ही देख लीजिए। खैर छोड़िए श्लेष विलेष ये इतना महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण बात तो यह है कि लक्ष्मी मित्तल ब्रिटेन छोड़कर अन्य देशों में शिफ्ट कर चुके हैं। कारण वही सरकार की गलत टैक्स नीति।
    लक्ष्मी मित्तल भारतीय मूल के बिजनेस मैन है, इसलिए हम उन पर गर्व कर सकते हैं। उन्होंने उस ब्रिटेन में झंडे गाड़े हैं जिसके हम डेढ़ सौ, दो सौ साल उपनिवेश रहे हैं। इसे हमारा भावनात्मक लगाव कहा जा सकता हैं।
    बिजनेस मैन इन सबसे परे होता है। वहां भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं होती है। बिजनेस और भावनाओं में छत्तीस का आंकड़ा होता है। जिसमें सिर्फ प्रोफिट देखा जाता है।
    देखा जाए कि वित्त मंत्री द्वारा लगाए गए टैक्स के कारण वे पलायन कर गए हैं या कुछ और कारण से। मुझे नहीं लगता है कि ऐसा होगा। और भी कारण हो सकते हैं। जब सब कारण मिलते हैं तभी कारोबार समेटा जाता है।
    कंपनियां चलाने के लिए एंप्लॉई चाहिए होते हैं। ब्रिटेन में एंप्लॉई पाउंड में वेतन लेते है। और पाउंड डालर से भी ऊंची हस्ती है। एक तो वेतन, दूसरा टैक्स के भार ने उन्हें मजबूर कर दिया होगा। सरकारों को सोचना चाहिए कि देश भी चलता रहे और व्यवसायी भी पलायन न करे, ऐसी नीतियां बनानी चाहिए।
    ये सब उच्च वर्ग की बातें हैं। निम्न वर्ग किस तरह का जीवन जीता है, सरकार को उसे भी देखना पड़ता है।
    लेकिन वहां किसान भी इस टैक्स नीति से परेशान हैं और वे सरकार का विरोध कर रहे हैं। तब तो यह बात सही है कि वह सरकार उद्देश्य हीन हो चुकी है। उसे समझ में नहीं आ रहा है कि उस देश को चलाएं कैसे?
    आपने इस संपादकीय में टाटा समूह की दरियादिली वाली बात लिखी है। सच में हम लोगों के लिए फख्र की बात है कि टाटा में बिजनेस के साथ-साथ देशभक्ति भी थी। ऐसे लोग देशवासियों के दिलों में हमेशा जिन्दा रहते हैं।
    हम पुरवाई परिवार से जुड़े हुए है। इस टैक्स की जद में आदरणीया जकिया ज़ुबैरी जी का घर भी आ सकता है। हम सबके लिए यह फिक्रमंद होने वाली बात है।
    संपादक महोदय जी, आप कितना कुछ सोच लेते हैं। किसी भी करेंट घटना को तथ्यों के साथ संपादकीय में पिरो देना एक कला नहीं तो और क्या है। जो ज्ञानवर्धक तो होती ही है, रोचक भी होती है।
    इस संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर

  6. प्रिय भाई लखन लाल पाल जी जब एक संपादक मूलतः कहानीकार होता है तो उसके संपादकीय में रोचकता मौजूद रहना पहली शर्त होती है। कोरोना काल के बाद से ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति ख़ासी डावांडोल है। वर्तमान बजट में टैक्स अदा करने वाले किसी भी वर्ग को कुछ नहीं मिला है जबकि शरणार्थियों और सरकारी सहायता पाने वाले बिना नौकरी वाले लोगों का पूरा ख़्याल किया गया है। नौकरी पेशा तो देश छोड़ कर जा नहीं सकता। बेचारा सहने को मजबूर है। मगर खरबपति और अरबपति तो इस काम के लिये अकाउंट डायरेक्टर रखते हैं जो उन्हें तरीके बताते हैं कि उद्योगपति के हित में कैसा निर्णय रहेगा। ब्रिटेन की वर्तमान सरकार को स्थिति की गंभीरता को समझना होगा।

  7. कल शाम मैं अपनी गाड़ी में पेट्रोल भरवाने के बाद कैशियर को पैसे देते हुए कह रहा था -कितना महंगा हो गया है पेट्रोल!
    वो मुस्कुराई और बोली जब तक आपकी जेब में क्रेडिट कार्ड है; और हमारे पम्प में पेट्रोल है- चिंता मत करो : भरे जाओ!

  8. जितेन्द्र भाई: और बदले में उनके पल्ले पड़ते हैं और अधिक टैक्स!

    हाथी के पैर में सब का पैर। इन थोड़े से शव्दों ने आपने सारे सम्पादकीय का निचोड़ दे दिया है। अन्धाधुन्द नए नए टैक्स बढ़ाने की यह बीमारी केवल ब्रिटेन की बीमारी नहीं है। इस बीमारी से तो सारी दुनिया के देशों के नेता मुब्तला हैं। अन्धाधुन्द देश के ख़ज़ाने को बेदर्दी से ख़र्च करो और जब डैफ़िसिट हद से बाहर निकल जाए तो जन्ता पर और टैक्स ठोक दो। उद्योगपतियों को तो यह लोग कामधेनु गाय समझते हैं। निचोड़ लो इनको टैक्स लगा लगा कर। वो एक क्षण के लिए भूल जाते हैं कि देश लक्ष्मी मित्तल जैसे उद्योगपतियों के कारण ही चल रहा है। इन्हीं लोगों की वजह से ही देश के हज़ारों लाख़ों लोगों को काम मिला हुआ है। ग़लती सरकार करे और उसकी सज़ा लक्ष्मी मित्तल जैसे लोगों भरें; यह कहाँ का इंसाफ़ है? आख़िर को यह लोग भी तो कुछ कमाने के लिए अपनी दुकान खोले बैठे हैं। अभी तो शुरूआत है। अगर यही हाल रहा तो लक्ष्मी मित्तल ने जो पहल की है वो और भी बहुत सारे उद्योगपति करना शुरू कर देंगे। यहाँ ब्रिटेन को ही नहीं बल्कि सारी दुनिया के नेताओं को भी सोचना होगा कि सरकार के पैसे को ढँग से ख़र्च करें।

    • विजय भाई, नौकरी पेशा लोगों की समस्याएं पूरे विश्व में एक समान हैं। आपकी टिप्पणी समग्रता में सार्थक है। धन्यवाद।

  9. लक्ष्मी ब्रिटेन से रूठ गई…संपादकीय में ब्रिटेन के उद्योगपति में से एक लक्ष्मी मित्तल के बारे में बताते हुए, उनका सरकार के द्वारा लगाए टैक्स के कारण ब्रिटेन छोड़ना सरकार की नीतियों पर एक प्रश्नचिन्ह है। अगर एक उद्योगपति का यह हाल है तो सामान्य व्यक्ति कैसे इन करों का भार ढो पायेगा।
    उद्योग और उद्योगपति ही नहीं रहेंगे तो देश प्रगति कैसे करेगा? देश की प्रगति के लिए टैक्स आवश्यक हैं किन्तु इतने भी नहीं कि वे समाज पर बोझ बन जाएं।

  10. सादर नमस्कार सर…
    बहुत ही सुन्दर एवं रोचक संपादकीय है। देश छोड़ने के कई कारण होंगे…। जो हमें शायद नहीं पता। हाँ पर इससे देश की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है। गहरी जानकारी सहित गहन विचारों को रखते हैं आप।
    साधुवाद

  11. आदरणीय तेजेन्द्र जी!

    हमें सबसे अधिक आकर्षित आपके शीर्षक ने किया। कहानियाँ हों या संपादकीय आपके शीर्षक हमेशा ही महत्वपूर्ण रहे और आकर्षण का पहला केंद्र।
    शीर्षक पढ़ते हुए कल्पना में भी लक्ष्मी मित्तल नहीं थे आगे बढ़ने पर पता चला कि बात श्लेष अलंकार में हो रही है जहाँ एक ही शब्द के दो या दो से अधिक अर्थ होते हैं। यहाँ लक्ष्मी मित्तल और माँ लक्ष्मी जो धन की देवी है दोनों ही अर्थ प्रतिभाषित है और दोनों ही अर्थ केंद्र में हैं। जब करोड़पति लोग पलायन करेंगे तो लक्ष्मी भी जाएगी।
    पढ़ना रोचक लगा।
    आपने बहुत डिटेल में लक्ष्मी मित्तल की समस्त जानकारी से अवगत कराया ।
    टैक्स में सुधार ने सुधारा भले ही नहीं पर जो बिगाड़ा है वह ज्यादा महत्वपूर्ण नजर आ रहा है और ब्रिटेन के लिये दुखद व नुकसानदेह भी।
    समय कुछ ज्यादा ही निर्भीक और कठोर होता जा रहा है।
    दुनिया में क्या हो रहा है जब इस बात पर विचार किया जाता है तो सबसे पहले ध्यान अपनों का आता है कि जो अपना वहाँ है वह किस हाल में है?जाहिर की ज़किया जी के लिये चिंता तो होगी ही।
    16,500करोड़पतियों का जाना तो सही में चिंता का विषय है।
    रतन टाटा जैसा बनना सहज नहीं। राष्ट्र के प्रति प्रेम का यह जज़्बा अन्य किसी अरबपतियों में नज़र नहीं आता। वे अपने जैसे एक ही थे- भरत सम भरत।

    मध्यमवर्गीय लोग हर जगह हर काल में पिसते रहे हैं। लूटने के लिये एक ही तबका है- मध्यम वर्ग! और हर बार बढ़ते नये टैक्सों की लिस्ट।
    जब बड़े लोगों में कोई उथल-पुथल मचती है तो वह विषय गंभीर हो ही जाता है।
    इस संपादकीय के माध्यम से अर्थव्यवस्था की दृष्टि से ब्रिटेन के बिगड़ते हुए हालातों के बारे में जानकारी मिली और लक्ष्मी मित्तल की जीवनी से परिचित हुए।
    लंदन को आपके माध्यम से काफी कुछ जान गये और जान रहे।
    इस महत्वपूर्ण संपादकीय के लिये आपका शुक्रिया।
    पुरवाई का आभार।

  12. https://www.thepurvai.com/an-editorial-by-tejendra-sharma-on-laxmi-mittal-leaving-britain/

    आदरणीय तेजेन्द्र जी!

    हमें सबसे अधिक आकर्षित आपके शीर्षक ने किया। कहानियाँ हों या संपादकीय आपके शीर्षक हमेशा ही महत्वपूर्ण रहे और आकर्षण का पहला केंद्र।
    शीर्षक पढ़ते हुए कल्पना में भी लक्ष्मी मित्तल नहीं थे आगे बढ़ने पर पता चला कि बात श्लेष अलंकार में हो रही है जहाँ एक ही शब्द के दो या दो से अधिक अर्थ होते हैं। यहाँ लक्ष्मी मित्तल और माँ लक्ष्मी जो धन की देवी है दोनों ही अर्थ प्रतिभाषित है और दोनों ही अर्थ केंद्र में हैं। जब करोड़पति लोग पलायन करेंगे तो लक्ष्मी भी जाएगी।
    पढ़ना रोचक लगा।
    आपने बहुत डिटेल में लक्ष्मी मित्तल की समस्त जानकारी से अवगत कराया ।
    टैक्स में सुधार ने सुधारा भले ही नहीं पर जो बिगाड़ा है वह ज्यादा महत्वपूर्ण नजर आ रहा है और ब्रिटेन के लिये दुखद व नुकसानदेह भी।
    समय कुछ ज्यादा ही निर्भीक और कठोर होता जा रहा है।
    दुनिया में क्या हो रहा है जब इस बात पर विचार किया जाता है तो सबसे पहले ध्यान अपनों का आता है कि जो अपना वहाँ है वह किस हाल में है?जाहिर की ज़किया जी के लिये चिंता तो होगी ही।
    16,500करोड़पतियों का जाना तो सही में चिंता का विषय है।
    रतन टाटा जैसा बनना सहज नहीं। राष्ट्र के प्रति प्रेम का यह जज़्बा अन्य किसी अरबपतियों में नज़र नहीं आता। वे अपने जैसे एक ही थे- भरत सम भरत।

    मध्यमवर्गीय लोग हर जगह हर काल में पिसते रहे हैं। लूटने के लिये एक ही तबका है- मध्यम वर्ग! और हर बार बढ़ते नये टैक्सों की लिस्ट।
    जब बड़े लोगों में कोई उथल-पुथल मचती है तो वह विषय गंभीर हो ही जाता है।
    इस संपादकीय के माध्यम से अर्थव्यवस्था की दृष्टि से ब्रिटेन के बिगड़ते हुए हालातों के बारे में जानकारी मिली और लक्ष्मी मित्तल की जीवनी से परिचित हुए।
    लंदन को आपके माध्यम से काफी कुछ जान गये और जान रहे।
    इस महत्वपूर्ण संपादकीय के लिये आपका शुक्रिया।
    पुरवाई का आभार।

  13. नीलिमा जी, आपने लिखा है कि ब्रिटेन में “टैक्स में सुधार ने सुधारा बेशक ना हो, पर जो बिगाड़ा है वो अधिक महत्वपूर्ण नज़र आ रहा है और ब्रिटेन के लिए दुखद और नुकसानदेह भी।” स्थिति सच में चिंताजनक है। सार्थक टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।

  14. आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी,
    सादर वन्दे।
    आपका यह संपादकीय वर्तमान ब्रिटेन के आर्थिक और सामाजिक संकट का एक ऐसा सजीव और बेबाक चित्रण है, जो सीधे दिल पर दस्तक देता है। आपने ‘लक्ष्मी’ के रूठने के जिस रूपक का प्रयोग किया है, वह लक्ष्मी मित्तल जैसे दिग्गज उद्योगपतियों के पलायन को समझने के लिए बहुत गहरा और सटीक है। यह देखना वाकई दुखद है कि जिस देश ने सदियों तक दुनिया भर के निवेशकों को अपनी उदारता से आकर्षित किया, आज वहां की कठोर और अदूरदर्शी नीतियां अपनों को ही बेगाना बना रही हैं।
    लक्ष्मी मित्तल का स्विट्जरलैंड और दुबई की ओर रुख करना महज एक टैक्स बचाने की जुगत नहीं, बल्कि अपनी जीवन भर की पूंजी और अगली पीढ़ी के भविष्य को सुरक्षित करने की एक स्वाभाविक मानवीय कोशिश है। जब कोई देश 40 प्रतिशत ‘विरासत कर’ जैसा भारी बोझ डालता है, तो वह अनजाने में अपनी ही आर्थिक जड़ों को काटने का काम करता है। आपका यह कहना बिल्कुल सही है कि व्यापारिक बुद्धि और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन होना चाहिए, लेकिन जब सरकारें दमनकारी नीतियों पर उतर आएं, तो पूंजी का सुरक्षित ठिकानों की ओर बह जाना रोकना असंभव हो जाता है। यह केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि ब्रिटेन के उस ‘बिजनेस फ्रेंडली’ चेहरे का धुंधला होना है जिसे दुनिया बड़े सम्मान से देखती थी। हेनली प्राइवेट वेल्थ माइग्रेशन की रिपोर्ट के आंकड़े कि इस साल करीब 16,500 करोड़पति ब्रिटेन छोड़ रहे हैं, इस बात की पुष्टि करते हैं कि ब्रिटेन एक बड़े ‘वेल्थ ड्रेन’ के मुहाने पर खड़ा है।
    इस बजट ने ब्रिटेन में बसे भारतीय समुदाय, विशेषकर उन लोगों के बीच एक गहरा मानसिक द्वंद्व पैदा कर दिया है जिन्होंने दशकों तक इस देश को अपनी मेहनत और मेधा से सींचा है। भारतीय मूल के प्रवासियों के लिए घर केवल ईंट-पत्थरों की इमारत नहीं, बल्कि उनकी पीढ़ियों की विरासत का प्रतीक होता है। जब सरकार बीस लाख पाउंड से अधिक के घरों पर अतिरिक्त टैक्स की बात करती है, तो यह प्रवासियों के उस ‘ब्रिटिश सपने’ पर सीधा प्रहार है जिसके लिए उन्होंने अपना मूल देश छोड़ा था। मध्यम वर्ग के बीच भी यह चर्चा आम है कि यदि कमाई का एक बड़ा हिस्सा टैक्स में ही जाना है, और अंत में बच्चों के लिए कुछ खास बचना भी नहीं है, तो फिर इतनी मशक्कत क्यों? यह ‘रिवर्स माइग्रेशन’ की सोच उस ब्रिटेन के लिए बहुत बड़ा खतरा है, जिसने अपनी अर्थव्यवस्था को प्रवासियों के दम पर ही खड़ा किया था। लेबर पार्टी की यह नीति शायद सामाजिक न्याय के नाम पर लाई गई हो, लेकिन व्यवहार में यह उन लोगों को दंडित कर रही है जिन्होंने व्यवस्था के भीतर रहकर ईमानदारी से तरक्की की है।
    लेख में आपने लंदन की सड़कों पर किसानों के आक्रोश का जो दृश्य खींचा है, वह ब्रिटेन के भीतर सुलग रहे एक बड़े असंतोष की गवाही देता है। किसानों का इस तरह सड़कों पर उतरना और ‘फूल्स वोट लेबर’ जैसे नारों का गूंजना यह बताता है कि लेबर पार्टी की सरकार ने बजट के नाम पर जनता की नब्ज को समझने में भारी चूक की है। यह देखना काफी हैरान करने वाला है कि जो ब्रिटेन अपनी संसदीय गरिमा और शालीनता के लिए विश्व विख्यात था, आज वहां की बहसों में केमी बादेनॉक जैसी नेताओं की भाषा में “रीढ़ की हड्डी विहीन” और “लज्जाहीन” जैसे तीखे व्यक्तिगत प्रहार शामिल हो गए हैं। यह राजनीतिक गिरावट दरअसल उस आर्थिक हताशा की ही उपज है जो समाज के हर स्तर पर महसूस की जा रही है।
    स्थानीय हिंदी लेखकों और प्रवासी संगठनों के भीतर भी इस समय जो विमर्श चल रहा है, वह बहुत ही संजीदा और असुरक्षा से भरा है। भारतीय मूल के रचनाकार, जो अपनी कहानियों में ब्रिटेन को ‘दूसरा घर’ बताते थे, अब अपनी रचनाओं में विस्थापन और अविश्वास का नया स्वर पिरो रहे हैं। संगठनों की बैठकों में अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या तरक्की करना अब एक सामाजिक अपराध बनता जा रहा है? भारतीय संस्कृति में बचत और संचय का उद्देश्य हमेशा अगली पीढ़ी को सुरक्षित करना रहा है, ऐसे में नई टैक्स दरें उनकी सांस्कृतिक और पारिवारिक मान्यताओं पर एक गहरी चोट हैं। प्रवासियों के बीच अब यह डर पैठ गया है कि क्या ब्रिटेन अब भी वह ‘सुरक्षित स्वर्ग’ बचा है, जहां उनकी अगली पीढ़ी फले-फूलेगी?
    आपका यह विश्लेषण न केवल ब्रिटेन की मौजूदा उथल-पुथल को उजागर करता है, बल्कि दुनिया भर की सरकारों को यह कड़ा संदेश भी देता है कि राष्ट्र का विकास केवल करों की सख्ती से नहीं, बल्कि विश्वास और स्थिरता से संभव है। जैसा कि आपने उल्लेख किया, आदरणीय ज़किया ज़ुबैरी जी जैसे प्रतिष्ठित निवासियों के ‘मिल हिल’ जैसे इलाकों तक इस टैक्स की आंच पहुंचना यह बताता है कि अब कोई भी अछूता नहीं है। मध्यम वर्ग, जो पहले से ही महंगाई की मार झेल रहा है, अब इस नए कर ढांचे के नीचे दबकर अपनी पहचान बचाने की जंग लड़ रहा है। यदि सरकारें ‘वेल्थ क्रिएटर्स’ को दंडित करेंगी, तो ‘लक्ष्मी’ का रूठना स्वाभाविक है। जब घर की लक्ष्मी रूठती है, तो केवल तिजोरी खाली नहीं होती, बल्कि घर की रौनक और भविष्य की संभावनाएं भी साथ ले जाती है।

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