- नीलिमा करैया
मणिपुर विशेषांक मणिपुर के किसी गौरवशाली क्षणों का परिचायक नहीं है। यह एक ऐसे हादसे की दर्दनाक पीड़ा की अभिव्यक्ति है ,जो हर तरह से अमानवीय रही ।इस विशेषांक में मणिपुर के अतीत की,उसके इतिहास की कहानी है, दर्द है, पीड़ा है। अव्यवस्थाओं और असंतोष की परिणिति और मानवीय नैतिक मूल्यों का जिस तरह पतन हुआ है, वास्तव में उस इंतेहा की कलमबद्ध जुबानी है यह, या कहें प्रामाणिक दस्तावेज है मणिपुर विशेषांक।
शैलेंद्र शरण जी!जो किस्सा कोताह के कार्यकारी संपादक हैं, उन्होंने अपने संवाद में विस्तार से मणिपुर की स्थिति, समाज और जातीयता की विषमताओं को
समझाते हुए हिंसा के कारणों पर रोशनी डाली है। धर्म व जातिवाद भारतीय संस्कृति को स्लो पॉइजन की तरह धीरे-धीरे प्रभावित कर कर रहा है और इसके मूल में है- आरक्षण! फिर वह चाहे नौकरी में हो या राजनीति में इसका खत्म होना बहुत जरूरी है। धार्मिक मतभेद और जातिवाद ही मूल में लड़ाई की जड़ है।
शैलेन्द्र जी ने सही लिखा है कि फर्जी और झूठी खबरें, टेंपर्ड झूठे वीडियो, कट पेस्ट के द्वारा हित साधक सोशल मीडिया पोस्ट,मीम्स द्वारा उपहास , एनीमेटेड वीडियो और तरह-तरह के मीडिया हमारी नींव कमजोर करने का साधन बन गए हैं एक फर्जी रिपोर्ट और वीडियो के कारण मणिपुर दहक उठा व अनेक जानें चली गईं साथ ही मणिपुर देश भर में चर्चा का विषय बन गया।
शैलेन्द्र जी की बेहतरीन संपादकीय विषय वस्तु के तथ्यात्मक ब्योरे के साथ वहांँ की स्थिति को ब्योरेवार ही प्रस्तुत करती है।
ज्योति गजभिए जी ने एक चिट्ठी के रूप में अपने विचार प्रस्तुत करते हुए *”मैं मणि बोल रही हूँ”* शीर्षक से मणिपुर की व्यथा का बखान किया। यह सही है कि आदिवासियों की जमीन लूटने का कार्य सभ्य वर्ग हमेशा से ही करता आया है ,फिर चाहे वह कोई सा भी प्रांत हो। संविधान के 25 वें अनुच्छेद का हमेशा दुरुपयोग ही हुआ है।
*”मैं मणि……… मणिपुर से पूछती हूंँ ..इस संवेदनाशून्य समाज में स्त्री की अवहेलना , अपमान व कुकृत्य कब तक होते रहेंगे?”*
यह एक ज्वलंत प्रश्न है, जिसका उत्तर किसी के पास नहीं। जहाँ और जिस संस्कृति में वेदों की ऋचाएंँ नारी के सम्मान पर कहती हैं –
*यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते*
*रमन्ते तत्र देवता।*
वहीं की नारी आज कितनी बेबस व लाचार है और सामने सिर्फ गहन अंधकार के अतिरिक्त कुछ नहीं।
अनीता श्रीवास्तव जी की *आपके पुर में मणिपुर* कहानी पर मंथन करना होगा। दिमाग के सारे पुर्जे हिलने वाली कहानी है यह। एक स्त्री चरित्र ने सारी मर्यादाओं को लांँघकर पुरुषों को ही नहीं, स्त्रियों को भी उनकी औकात दिखा दी है। कहानी की नायिका के रूप में निर्वस्त्र घूमती वह स्त्री कहती है कि,
*”हाँ! तुमने ठीक सुना !यहांँ कोई पुरुष नहीं, बल्कि यहांँ कोई मनुष्य ही नहीं !! क्या स्त्री…..! क्या पुरुष…..!! तो पर्दा किसका?*
कहानी प्रश्न करती है कि जब स्त्रियांँ स्वयं पुरुषों को प्रेरित करें कि वे उन्हें गिद्ध की भांँति नोंच डालें ,तथाकथित पुरुषों का समूह उनका शीलमर्दन बीच सड़क पर करे तो स्त्री को स्वयं को छुपाने के लिए कपड़े पहनने की क्या आवश्यकता है?
कहानी स्त्री के प्रति संबोधित है कि तब तक तुम स्त्री नहीं हो सकतीं ,जब तक तुम्हें किसी अन्य की पीड़ा व घिनौनी अश्लिलताएंँ आनन्द देती हैं।
इस कहानी में एक वाक्य सूत्र वाक्य की तरह है-
*स्त्री जन्मना माता है,किंतु पुरुष जन्मजात पिता नहीं है।*
*विमर्श* के अंतर्गत प्रधान संपादक असफल अशोक जी अपना संदेह व्यक्त करते हैं कि,*” मणिपुर में भविष्य के लाभों के मद्देनजर यह कोई साजिश तो नहीं?” आश्चर्य यह है कि राष्ट्र की प्रथम महिला आदिवासी है पर गहरा सन्नाटा पसरा है। वीडियो कैसे व किसने जारी किया? कोई एक्शन किसी ने भी क्यों नहीं लिया और अप्रत्याशित आश्चर्य कि मणिपुर के मुख्यमंत्री किस मुंँह से कह गए कि,” ऐसी तो सैकड़ों घटनाएंँ हुई हैं, हजारों एफ आई आर दर्ज हैं।”*
शासन की बागडोर जिनके हाथों में है उनका, अपनी वाणी पर ऐसा अनियंत्रण ? इतना भी भान नहीं कि उनका उत्तरदायित्व क्या है और उन्हें क्या कहना है? अब नेताओं की जबान पर लगाम कौन कसेगा?
सब कुछ अंधेर नगरी चौपट राजा जैसे हाल हैं
संपादक प्रमुख की चिंता व प्रश्न जायज भी हैं कि जब हमारी राष्ट्रपति आदिवासी समुदाय से हैं फिर भी इतनी गहरी खामोशी क्यों?
विमर्श में अन्य साथी सदस्यों ने भी आक्रोश , क्षोभ ,विकृति और प्रकृति ,बढ़ते अपराधों का कारण, यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते……, सामाजिक चेतना का क्षय ,धृतराष्ट्र जिंदा है-मरा नहीं, स्त्री बदहाली में एक और कड़ी मणिपुर, व शुरुआत अपने घर से ; शीर्षकों के माध्यम से अपनी पीड़ा ,दुख व चिन्ता की वैचारिकी रची।
डॉ गीता शर्मा बित्थरिया की कहानी *महादेवी महाज़बीं*
धार्मिक वैमनस्यता के मध्य विपरीतधर्मी दो सखियों की मित्रता की बेमिसाल कहानी है। गोदना गोदने वाले की एक छोटी सी गलती के कारण दोनों का जीवन संकट में पड़ जाता है। दोनों के ही हाथों में एक दूसरे का नाम गुदा जाने के कारण दोनों का जीवन सांप्रदायिक दंगे की भेंट चढ़ जाता है। उन दोनों का दर्दनाक अंत पढ़कर दिल दहल जाता है। सांप्रदायिक वैमनस्यता की अग्नि इंसान को इंसान नहीं रहने देती। वह जंगल की आग की तरह अपने सामने आने वाली हर चीज को जला देती है ।चाहे वह मासूम सी कली ही क्यों ना हो! मिन्नतों की कितनी ही गुहार क्यों न लगा रही हो ?अपनी सफाई में अपनी सच्चाई ही क्यों ना बताना चाह रही हो!!! उस समय इंसान के ज्ञानेन्द्रियों की सारी शक्ति सिर्फ कर्मेंद्रियों पर, हिंसा रूप में समाहित हो जाती हैं।
इन दोनों सहेलियों के नाम पर बनी महादेवी महज़बीं संस्था सताई हुई महिलाओं के उद्धार के लिए कटिबद्ध होकर ऐसी महिलाओं के उत्थान के लिये, खोए हुए सम्मान को पुनः वापस दिलाने के लिए, उनमें पुनः जीवन के बीज बोती है और बड़ी मुश्किल से बचाई गई महादेवी के जीवन को संजोकर उसे सम्मान देती है।
रजनी शर्मा बस्तरिया की कहानी *”छूना किसी तितली को”* भी मणिपुर के आदिवासी युगल पर लिखी गई है। वहांँ की भाषा का माधुर्य कहानी को जीवंत बनाता है। कहानी बेहद करुण और मार्मिक है; जहांँ एक आदिवासी मासूम कंकरा, उसकी मंगेतर के सामने ही अनियंत्रित वहशी भीड़ के द्वारा निर्वस्त्र कर तार-तार कर दी जाती है और उसकी कोई सुनवाई नहीं होती।
भले ही भीड़ की जाति नहीं होती है लेकिन जाति की भीड़ तो हो सकती है। मणिपुर इसका प्रमाण है।
पत्रिका में दी गई कविताएंँ नवगीत,गजल भी सभी बहुत अच्छी हैं। काव्य की चेतना में भले ही कथ्य और शैली का अंतर हो, लेकिन जब बात दर्द की होती है, तो भावनाओं की पीड़ा सबकी लगभग एक सी ही होती है। मणिपुर का दर्द हर रचना में महसूस हो रहा है।
शिव अवतार पाल जी की कहानी *खेत का बंजर टुकड़ा* पितृसत्तात्मकता के ऐसे अहम् को दर्शाती है, जहांँ बेटी का जन्म लेना ही अपराध समझा जाता था और जन्म लेते ही उसे मार दिया जाता था। किसान अपने ही खेत के एक भाग में उस बेटी को गड़ा दिया करते थे और खेत का एक हिस्सा बंजर रह जाता था। यह कहानी जितनी अधिक मार्मिक है उतनी ही प्रेरणादाई भी है कि किस तरह एक पढ़ी-लिखी बहू की समझदारी और आत्मविश्वास ने न केवल अपनी कोख की बेटी को बचाया बल्कि सारे गांँव की सोच को बदल दिया। यही इस कहानी का केंद्रीय भाव है।
यह कहानी इस बात का प्रमाण है की शिक्षा से ही जाग्रति की नई लौ को प्रदीप्त किया जा सकता है। किंतु ज्वलंत समस्या यह भी है, कि आजकल की शिक्षा का व्यवसायिक रूप भी नैतिक शिक्षा के संबन्ध में संदेह के घेरे में है।
*अरूण यह मधुमय देश हमारा* कहानी नागालैंड के मोमोकचुंग में कार्यरत एक प्रोफेसर अरुण की है ,जो विवाह के कुछ माह बाद ही अपनी नव वधु के साथ असम में चुचुहमलांग में अपने मित्र से मिलने जा रहा होता है और गाड़ी का एक्सीडेंट हो जाता है। घायल युगल को गांँव का मुखिया अपने घर ले जाता है और उनकी सेवा करता है। यहांँ तक कि उसका बेटा अपना खून देकर अरुण की जान बचाता है। वह अरुण का विद्यार्थी भी था कॉलेज में,पर किसी कारणवश संदेह के कारण जम्मू की आर्मी उसके बेटे को उठा ले जाती है और वे कुछ नहीं कर पाते। अरुण प्रयास करता है कि जल्दी ठीक होकर वह उसकी बेगुनाही का सबूत इकट्ठा कर उसे बचाने की कोशिश करे।
कहानी मानवीय भावनाओं से उत्प्रेरित है। सीधे सरल आदिवासी! गांँव के लोग सीधे व सरल ही होते हैं ।मानव-सेवा के भाव इनमें कूट-कूट कर भरे होते हैं। यही इस कहानी का प्रतिबिंब है।
यह कहानी एक महत्वपूर्ण संदेश और देती हैं वह यह कि, “सावधानी में ही सुरक्षा है।”
चित्रगुप्त जी द्वारा लिखित रिपोर्ताज में मणिपुर की घटनाओं के आंँखों देखे हाल का वर्णन है ।वहांँ की सच्चाई है।
उनके मित्र अशोक कुमार मणिपुर में शंघाई एक्सप्रेस के पत्रकार थे और पारसोई पुलिस थाने के पास ही किराए का घर लेकर रहते थे। यह अखबार पूरे मणिपुर में समान रूप से पढ़ा जाने वाला अखबार है जो मणिपुरी व अंग्रेजी में वहांँ की राजधानी इंफाल से निकलता है। अशोक कुमार जी ने उन्हें वहांँ का आंँखों देखा हाल बताया, क्योंकि वे उस रात देर हो जाने के कारण एक कुकी परिवार में ही अतिथि थे।
रात का गहरा अंधकार, पहाड़ों से लौट कर आई गोलियों की प्रतिध्वनियों से भ्रमित यहांँ- वहांँ भागते कुकी समुदाय के लोग और बारिश! यह एक अंधा युद्ध था। देर से मिलने वाली सरकारी सहायता को भी अपराध की श्रेणी में ही गिना जाना चाहिये।
पत्रकार अशोक कुमार के अनुसार यह मणिपुर की लड़ाई कुकी और मैतेयी जनजातियों की नहीं, अपितु दोनों ही ओर के उग्रवादी संगठनों की लड़ाई है। कुछ इसे हिंदू और ईसाइयों लड़ाई भी कहते हैं पर वास्तव में यह उग्रवादी संगठनों की अपने हित की लड़ाई है। यहांँ पुलिस भी इन्हीं संगठनों के मध्य बँटी हुई है। नइसे पढ़कर हैरत होती है कि ईर्ष्या किस हद तक पहुंँच कर ठहरती है! की लाशों तक की दुर्गति करने से नहीं चूकते!
लक्ष्मीकांत कालुस्कर ‘उपेन्द्र ‘जी का व्यंग्य *शेर कभी मुंँह नहीं धोया* भी रोचक है।
*मणिपुर एक संवाद* के माध्यम से श्री रामस्वरूप दीक्षित जी का व्यंग्य काबिले गौर है। उन्होंने मणिपुर की घटनाओं को केंद्र में जरूर रखते हुए आज की शासन व्यवस्था पर गहरी चोट की है। इसमें उन्होंने नेताओं पर, व्यवस्था पर, धर्मांधता पर , अहिंसा, सरकार के आश्वासनों पर, लोकतंत्र पर, देश की जरूरत के समय नेता प्रमुख की विदेशी यात्राओं पर और अंत में इंसानियत पर गहरा कटाक्ष किया है।
मणिपुर विशेषांक की दृष्टि से यह अंक मणिपुर की धधकती हुई ज्वालाओं से उचटती हुई चिंगारियों की चटक की तरह है।

- नीलिमा करैया

बहुत ही शानदार समीक्षा लिखी है नीलिमा जी, पूरे अंक को आपने जिस तरह अपने अनोखे अंदाज में समेटा है वह लाजवाब है.
एक ज्ञानवर्धक विशेषांक उस विषय पर जिस पर पीढ़ित वर्गों से सहानुभूति या किसी सहायता की भावना रखने के बजाय राजनीतिक दलों ने सिर्फ अपनी रोटियां सेंकी। नीलिमा जी आपने सभी पहलुओं को ध्यान में रख उनकी उचित समीक्षा और विश्लेषण किया।