डॉ. यासमीन मूमल की ग़ज़ल – जग को रोशन कर दीपों का पर्व मनायेंगे
हर दिल में आशा का झिलमिल दीप जलायेंगे।
नन्हे नन्हे फुलझड़ियों से बच्चों को देखो।
सीमाओं के रखवालों को बारंबार नमन।
जिनके आंगन अंधियारों के घने बसेरे हैं।
महलों के ऊंचे क॔गूरों से मत बहस करो।
“मूमल” की भी आज गुज़ारिश है सब मिल जुल कर।
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बहुत खूब, बहुत सुंदर गजल है ।