संपादकीय - भ्रम भंग होते ही हैं 3ओवन पैटर्सन

मैं इस संपादकीय के ज़रिये अपने पाठकों को यह बताना चाहूंगा कि जिस देश की भाषा के शब्दकोश में जो शब्द होता है… वो उस देश में होता है। प्रॉस्टीट्यूट (वेश्या), थीफ़ (चोर), करप्शन (भ्रष्टाचार), डिस-ऑनेस्टी (बेईमानी), वायलेंस (हिंसा), डिवोर्स (तलाक) जैसे शब्द अंग्रेज़ी भाषा का हिस्सा हैं। यानी कि ये सब ब्रिटेन, अमरीका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया आदि में होता है। इसके लिये हैरान होने की कोई ज़रूरत नहीं। वहीं देसी घी अंग्रेज़ी में नहीं होता इसलिये इसके लिये उनके पास कोई शब्द नहीं है। ऐसे बहुत से शब्द हिंदी भाषा में हैं जो अंग्रेज़ी या किसी भी अन्य भाषा में मौजूद नहीं होंगे। वहीं ‘तलाक’ क्योंकि भारतीय परम्परा का हिस्सा नहीं है इसलिये संस्कृत, हिंदी या अन्य किसी भारतीय भाषा में इसके लिये कोई शब्द नहीं मिलेगा।

पिछले दिनों ब्रिटेन में सांसद ओवन पैटर्सन को दोषी पाया गया कि उन्होंने संसद में उस कंपनी की पैरवी की जहां से वे एक लाख पाउण्ड सालाना की राशि सलाहकार रूप में ले रहे थे। ‘रैंडॉक्स अण्ड लिन्स कंट्री फ़ूड्स’ कंपनी से जुड़े थे और संसद में उसी कंपनी की पैरवी भी किया करते थे। 
विपक्षी लेबर पार्टी के लीडर कीयर स्टामर ने “बॉरिस जॉनसन की सरकार पर “भ्रष्टाचार” का आरोप लगाया है और टोरी सांसद ओवेन पैटरसन को निलंबित किए जाने से बचाने के लिए मतदान में घोटाला करने के बाद वर्तमान सरकार छल कपट और पाखण्ड का पर्याय बन गयी है।
हमारे बहुत से पाठक यह कह सकते हैं कि अरे हम तो सोचते थे कि ऐसी घटनाएं केवल भारतीय संसद में होती होंगी। भला ब्रिटेन जैसे विकसित देश में ऐसा कैसे हो सकता है ?  बताना चाहूंगा कि पुरवाई के पिछले कुछ संपादकीयों पर हमारे पाठकों की एक प्रतिक्रिया लगभग एक सी रही – “अरे ब्रिटेन में भी ऐसा होता है!… पढ़ कर अचंभित हूं।”
इन प्रतिक्रियाओं ने मन में यह विचार पैदा किया कि हम किसी इन्सान, संस्था, शहर या देश के बारे में एक राय बना लेते हैं। न तो हम इन्सान से मिले होते हैं और न ही शहर या देश की यात्रा की होती है। बस सुनी सुनाई बातों से एक छवि बना लेते हैं। मगर जब वो छवि टूटती है तो कष्ट अवश्य होता है। 
ध्यान देने लायक बात यह है कि छवि बनाते भी हम स्वयं है और तोड़ते भी स्वयं हैं। इस बारे में फ़िल्म कलाकार शत्रुघ्न सिन्हा का एक संस्मरण याद आता है। शत्रुघ्न जब युवा थे, वे फ़िल्म कलाकार पृथ्वी राज कपूर के बहुत बड़े प्रशंसक थे। उन्हें सूचना मिली कि पृथ्वी राज जी पटना आ रहे हैं। अपने युवा साथियों के साथ शत्रुघ्न सिन्हा भी एअरपोर्ट पर पहुंच गये अपने प्रिय कलाकार की एक झलक पाने को।
पापा जी पृथ्वी राज कपूर जब एअरपोर्ट से बाहर निकले तो शत्रुघ्न उन्हें देख कर भाव विभोर हो रहे थे। इतने में पापा जी ने किसी बात पर पंजाबी में ज़ोर से एक गाली दे दी। शत्रुघ्न के लिये यह लगभग असहनीय था कि जिसे वह भगवान समझता था वे इस तरह गाली का इस्तेमाल करें। उसके मन में जो छवि पृथ्वी राज कपूर जी के बारे में बनी थी वो ध्वस्त हो गयी। अब न तो पापा जी ने शत्रुघ्न को छवि बनाने के लिये कहा था और न ही तोड़ने के लिये। उसने स्वयं ही छवि बनाई और स्वयं ही तोड़ी। पापा जी को न तो छवि बनने की ख़बर थी और न ही टूटने की।
वैसे तो यह भी कहा जाता है कि जिस व्यक्ति को आप अपनी कल्पना में एक ऊंचे आसन पर प्रतिष्ठित कर चुके हों, उसे मिलना कभी नहीं चाहिये। क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपनी छवि जितना महान नहीं हो सकता। यह बात ख़ास तौर पर फ़िल्मी सितारों, खिलाड़ियों और राजनेताओं पर लागू होती है।
मैं क्योंकि निजी रूप से बहुत से फ़िल्मी कलाकारों से परिचित रहा हूं इस बात को अच्छी तरह समझ पाता हूं। याद आता है कि जब मैं एअर इंडिया  मैंने नसीरूद्दीन शाह से एक बार एक प्रश्न भी किया था कि फ़िल्मी सितारे जब उड़ान में 35,000 फ़ुट की ऊंचाई पर होते हैं तो उनका व्यवहार विनम्र होता है मगर धरती पर पाँव पड़ते ही वे अचानक आसमान पर उड़ने लगते हैं… ऐसा क्यों…? ज़ाहिर है कि उनके पास मेरे सवाल का कोई सीधा जवाब नहीं था।
मगर हमारे साथ ऐसा दूसरे देशों को लेकर भी होता है। हम उन देशों के बारे में बिना वहां गये कुछ भ्रम पाल लेते हैं। जैसे कि मनोज कुमार की फ़िल्मों ने हमारे मन में भ्रम डाल दिये कि पश्चिमी देशों की लड़कियां अधनंगी रहना पसंद करती हैं। पश्चिमी देशों में संस्कार या परम्पराएं नहीं होतीं। या फिर कि ब्रिटेन, अमरीका या कनाडा में हर व्यक्ति अमीर ही होता है। 
मैं इस संपादकीय के ज़रिये अपने पाठकों को यह बताना चाहूंगा कि जिस देश की भाषा के शब्दकोश में जो शब्द होता है… वो उस देश में होता है। प्रॉस्टीट्यूट (वेश्या), थीफ़ (चोर), करप्शन (भ्रष्टाचार), डिस-ऑनेस्टी (बेईमानी), वायलेंस (हिंसा), डिवोर्स (तलाक) जैसे शब्द अंग्रेज़ी भाषा का हिस्सा हैं। यानी कि ये सब ब्रिटेन, अमरीका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया आदि में होता है। इसके लिये हैरान होने की कोई ज़रूरत नहीं। वहीं देसी घी अंग्रेज़ी में नहीं होता इसलिये इसके लिये उनके पास कोई शब्द नहीं है। ऐसे बहुत से शब्द हिंदी भाषा में हैं जो अंग्रेज़ी या किसी भी अन्य भाषा में मौजूद नहीं होंगे। वहीं ‘तलाक’ क्योंकि भारतीय परम्परा का हिस्सा नहीं है इसलिये संस्कृत, हिंदी या अन्य किसी भारतीय भाषा में इसके लिये कोई शब्द नहीं मिलेगा।
ठीक वैसे ही 20 शताब्दी के अधिकांश आविष्कार पश्चिमी देशों में हुए इसलिये उनके लिये भारतीय भाषाओं में कोई शब्द नहीं होते। मगर पुष्पक विमान का ज़िक्र रामायण में आता है इसलिये ‘एरोप्लेन’ के लिये हिंदी में शब्द मौजूद है। 
यह तय रहा कि जब तक हम भ्रम पालते रहेंगे… तब तक भ्रम भंग होते रहेंगे।
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

20 टिप्पणी

  1. आज की सम्पादकीय असाधारण है, जीवन दर्शन को सहज तरीके से बताया है।जो सुना वह भी सच नहीं जो देखा वह भी आधा सच है जो अनुभव किया वही यथार्थ के करीब है।
    तभी कहा जाता है कि स्वर्ग देखना हो तो स्वयं मरकर देखो।
    रौशनी से जगमग सम्पादकीय हेतु साधुवाद
    Dr prabha mishra

  2. सच है, भ्रम भंग होते ही हैं। मनोज कुमार की पूरब और पश्चिम देखकर जो धारणा हुई थी, बहुत सालों बाद बदली

  3. चित्र, छवि, कल्पना मनुष्य के लिए साँस जैसे हैं, हम चित्रों में जीते हैं. एक ध्वनि, एक नाम, एक अक्षर भी मस्तिष्क में कुछ रेखायें न खींचे असम्भव है, इसीलिए ध्वनियों को आकार दे कर भाषा बनी, उसी भाषा के सहारे आपका बेहतरीन संपादकीय पढ़ा। मोह या भ्रम की नियति भंग होना ही है. तो भंग होते रहते हैं, पीड़ा भी देते हैं, कभी सुख भी देते हैं। हमारे पूर्वजों ने तो शुद्ध ध्वनि आधारित राग, रागिनी के चित्र बना डाले, तो हम डिजिटल युग के लोग इससे बच नहीं सकते। वैसे कहते यही हैं सभी कि भ्रम न पालो… पर इन्सानी दिल है कि मानता नहीं

  4. यदि मैं ये कहूँ कि आज का संपादकीय जीवन दर्शन का एक संक्षिप्त उदाहरण है तो अतिशयोक्ति नहीं होगा। वास्तव में ये बात मानने वाली है कि जब तक हम भ्रम पालते रहेंगे तब तक भ्रम टूटते भी रहेंगे। आपके दिए गए उदाहरण सहज ही भ्रम में रहने वालों को थोड़ा विचार करने के लिए विवश भी कर सकते है लेकिन फिर भी यह संभव नहीं है कि कोई व्यक्ति किसी धारणा को न बनाए या किसी से प्रभावित होकर कोई भ्रम न पाले। यह तो जीवन की एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया भी कही जा सकती है, बहरहाल आपका संपादकीय हमेशा जी तरह प्रभावित भी करता है और सोचने के लिए प्रेरित भी।
    हार्दिक साधुवाद के साथ।

  5. आज फिर संपादकीय के माध्यम से कुछ नया सीखने को मिला। मनुष्य मन में बहुत से भ्रम पाल लेता है।

  6. सही बात है, छवियों के स्थान पर तथ्य और सत्य देखना चाहिए। सटीक संपादकीय के लिए बधाई!

  7. वाह अति सुन्दर सराहनीय सम्पादकीय ,सदैव की भाँति ज़रा हट के (मुम्बई की भाषा मे) ।
    एक आश्चर्य चकित करने वाला विचार ये है कि जब कि पाश्चात्य देशों में ऐसा होता है तो भारतीय लोग पाश्चात्य संस्कृति की ओर आकर्षित क्यों होते हैं, क्या बिना जाने बूझे केवल उनकी चमक दमक देख कर ! या उनकी इच्छा वैसा बनने की होती है।

    • कैलाश भाई आपको तो याद होगा कि मुंबई में भी हमें ऐसे बहुत से लोग मिलते थे जिन्होंने दिल्ली तक नहीं देखा था मगर लंदन और न्युयॉर्क के बारे में ऐसे बात करते थे जैसे वहां गिल्ली-डंडा खेलते रहे हों।

  8. शब्द व उसके कोश के साथ भाषिक क्षेत्र की महत्ता उज़ागर करने अच्छा प्रयास। साथ ही साथ ये सम्पादकीय पूर्वाग्रह से दो कदम दूर चलने की अच्छी नसीहत भी देता है।

  9. भ्रम तो होते ही भंग होने के लिए हैं। प्रस्तुत सम्पादकीय में यह बात बहुत पते की बताई गई है कि जिसे आपने ऊँचे आसन पर बैठा रखा है, उससे कभी मिलना नहीं चाहिए। वाह क्या बात कही है। जीवन के व्यावहारिक दर्शन की परतें खोलने वाली आपकी लेखनी वास्तव में प्रणम्य है।

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