Sunday, September 13, 2026
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निज़ाम फतेहपुरी की ग़ज़ल

शिकवा गिला मिटाने का त्योहार आ गया।
दुश्मन भी होलि खेलने  को यार आ गया।।
परदेसी  सारे  आ  गए  परदेस  से  यहाँ।
अपना भी मुझको रंगने मेरे द्वार आ गया।।
रंगे गुलाल  उड़  रहा  था  चारों  ओर  से।
नफ़रत मिटा के देखा तो बस प्यार आ गया।।
ठंडाइ भांग की मिलि हमनें जो पी लिया।
बैठा था घर में चैन  से  बाज़ार आ गया।।
मजनू पड़े हैं  पीछे  मुझे  रंगने  के  लिए।
धोखा हुआ पहन के जो सलवार आ गया।।
सब लोग मिल रहे गले  इक दूजे से यहाँ।
लगता है मुरली वाले के दरबार आ गया।।
खेलो निज़ाम रंग  भुला कर के सारे ग़म।
सबको गले लगाने  ये  दिलदार आ गया।।
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