स्मृति शेष : प्रेरणा देते रहेंगे प्रणब मुखर्जी 1
प्रणब मुखर्जी (साभार : The Indian Express)

संयोग देखिये कि प्रणब मुखर्जी ने उसी अगस्त महीने की ३१ तारीख को इस संसार से विदा ली, जिस अगस्त महीने की १६ तारीख को आज से दो वर्ष पूर्व उनके जैसे ही सभी दलों में बराबर सम्मान रखने वाले अटल बिहारी वाजपेयी का निधन हुआ था। प्रणब दा सदेह अब भले हमारे बीच न हों, मगर अपनी विशिष्टताओं के माध्यम से राजनीतिक जीवन में सक्रिय लोगों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बनकर उपस्थित रहेंगे।

भारतीय राजनीति में ऐसे राजनेता बिरले ही हैं, जिनकी स्वीकृति एवं लोकप्रियता उनके दल के बाहर भी रही हो। प्रणब मुखर्जी ऐसे ही एक राजनेता थे। पश्चिम बंगाल के वीरभूमि जिले के वासी वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एवं स्वतंत्रता सेनानी कामदा किंकर मुखर्जी के यहाँ ११ दिसंबर, १९३५ को जन्मे प्रणब मुखर्जी, सन १९६९ में जब कांग्रेस द्वारा राज्यसभा सदस्य चुने गए, तब शायद ही किसीको अंदाज़ा होगा कि साधारण-सा दिखने वाला ये लड़का इस देश की राजनीति में बड़े-बड़े पदों से होते हुए एकदिन यहाँ संवैधानिक सर्वोच्च यानी राष्ट्रपति तक बन जाएगा।
राजनीतिक जीवन की अपनी इस दीर्घ यात्रा में प्रणब दा ने अपने व्यक्तित्व व कृतित्व दोनों से ही अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई। सरकार के बड़े-बड़े पदों पर एक लम्बा वक्त गुजारने के बावजूद प्रणब मुखर्जी ने जिस प्रकार से राजनीतिक शुचिता, शालीनता और कर्तव्यनिष्ठा का निर्वाह किया, वो उन पदों पर पहुँचने वाले हर राजनेता के लिए आज एक मानक की तरह है।
प्रणब दा की एक बड़ी विशेषता उनके व्यक्तित्व में निहित दृढ़ता थी। वे सबसे ऊपर अपने विवेक को रखते थे और उसके आधार पर कोई निर्णय लेने के बाद दृढ़ता के साथ उसपर अटल रहते थे। इसके लिए उनकी कोई कितनी भी आलोचना करे उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता था।
इस संदर्भ में सबसे ताज़ा उदाहरण 2018 का है, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक कार्यक्रम में प्रणब दा को संबोधन के लिए बुलाया गया। कांग्रेस की तरफ से उनपर पूरा दबाव बनाने का प्रयास किया गया कि वे इस कार्यक्रम में न जाएं, परन्तु उन्होंने न केवल आमंत्रण स्वीकार किया अपितु कार्यक्रम में जाकर संघ के संस्थापक हेडगेवार को विजिटर डायरी में ‘भारत माँ का महान सपूत’ लिखते हुए मंच से एक बेहतरीन वक्तव्य भी दिया।
एक तरफ अपने वक्तव्य में उन्होंने संघ के स्वयंसेवकों व भाजपा के लिए कुछ नसीहतें दीं, वहीं उस कार्यक्रम में जाकर कांग्रेस को भी अप्रत्यक्ष सन्देश देने का प्रयास किया कि वो अपने पारंपरिक दुराग्रहों को छोड़ते हुए संघ की शक्ति और महत्व को स्वीकार कर वैचारिक सहिष्णुता का परिचय दे।
अपने राजनीतिक जीवन में प्रणब दा कांग्रेस के संकटमोचक माने जाते थे। पार्टी की कोई भी समस्या हो, यह भरोसा रहता था कि प्रणब मुखर्जी किसी न किसी प्रकार परिस्थिति को संभाल लेंगे। परन्तु, एक समय आया जब पुत्रमोह में सोनिया गांधी ने राहुल का रास्ता साफ़ करने के लिए अपने इस संकटमोचक को राष्ट्रपति बनवा दिया, लेकिन उसके बाद से पार्टी केवल नीचे की तरफ ही जाती नजर आ रही है। 2014 के बाद से कांग्रेस जैसे संकटों से गुजर रही है, जरूर उसने अपने इस संकटमोचक की कमी महसूस की होगी।
सैद्धांतिक पक्ष जो भी हो, मगर व्यावहारिक रूप से सत्य यही है कि कोई भी दल अपने व्यक्ति को राष्ट्रपति बनवाता है, तो मुख्य उद्देश्य यही होता है कि राष्ट्रपति उसके प्रति तनिक अधिक उदार रहेंगे। राष्ट्रपति के विशेषाधिकारों का उसे अपेक्षाकृत अधिक लाभ मिल सकेगा।
इंदिरा सरकार के आपातकाल के निर्णय को आँख मूंदकर स्वीकारने वाले फखरुद्दीन अली अहमद हों या अपने पूरे कार्यकाल के दौरान तत्कालीन कांग्रेस नीत संप्रग सरकार के प्रति अत्यंत उदार और समर्पित रहने वाली प्रतिभा पाटिल हों, ऐसे राष्ट्रपति भी देश ने देखे हैं। मगर, प्रणब मुखर्जी इस तरह के राष्ट्रपतियों में अपवाद रहे। बतौर राष्ट्रपति प्रणब दा का कार्यकाल २०१२ से २०१७ तक रहा।
इन पांच वर्षों में उन्होंने भारत में राष्ट्रपतियों की सुस्त पारंपरिक छवि से इतर अपनी सक्रियता बनाए रखी और वर्षों से लंबित कई दया याचिकाओं का निपटारा किया। उन्होंने दोषियों पर काफी कम दया दिखाई। पूरे कार्यकाल में उनके पास कुल ३७ दया याचिकाएं आईं, जिनमें से ज्यादातर में उन्होंने अदालत की सजा को बरक़रार रखा।
केवल चार दया याचिकाओं को फांसी से आजीवन कारावास में बदलकर जीवनदान दिया। विशेष यह कि इस दौरान उन्होंने अफज़ल गुरु, याकूब मेनन और अजमल कसाब जैसे तीन खूंखार आतंकियों की भी दया याचिकाओं को खारिज कर उन्हें फांसी तक पहुँचाया।
प्रणब मुखर्जी अगर इस त्वरित गति से दया याचिकाएं खारिज कर सके तो इसके लिए कारण यह माना जा सकता है कि वे सत्ताधारी दल के राजनीतिक प्रभावों से मुक्त थे। अफजल गुरु की फांसी विशुद्ध राजनीतिक कारणों से ही तो दशकों तक रुकी रही थी, मगर प्रणब मुखर्जी ने उन कारणों की परवाह न करते हुए उस दया याचिका को खारिज कर दिया।
अगर वे सत्ताधारी दल के प्रभाव में रहे होते तो शायद २०१३ में जब कांग्रेस की सरकार थी, वे अफज़ल की दया याचिका खारिज नहीं करते। सत्ताधारी दल के प्रभाव से उनके मुक्त होने के संदर्भ में २०१३ के दागी अध्यादेश का उल्लेख भी समीचीन होगा। २०१३ में दागी सांसदों-विधायकों को पदच्युत करने वाले सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को पलटने के लिए कांग्रेस सरकार अध्यादेश लाई थी जो मंज़ूरी के लिए राष्ट्रपति के पास गया। मगर, प्रणब मुखर्जी को इसपर कई शंकाएं थीं, सो उन्होंने इसे रोके रखा और कांग्रेस सरकार से जवाबतलब किया। आखिरकार राहुल गांधी के ‘बकवास विधेयक’ वाले पूरे सार्वजनिक ड्रामे के बाद तब यह अध्यादेश वापस हो गया था।
उसवक्त वरिष्ठ भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने इस दागी अध्यादेश की वापसी के लिए प्रणब मुखर्जी को सारा श्रेय दिया था। २०१४ में जब केंद्र में भाजपा की सरकार आई तो उसके प्रति भी प्रणब मुखर्जी ने कांग्रेस सरकार के समान भाव ही रखा। कह सकते हैं कि राष्ट्रपति बनने के साथ ही उन्होंने अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता को छोड़ पदानुरूप संवैधानिक प्रतिबद्धता को पूरी तरह से आत्मसात कर लिया था।
प्रणब दा की यही विशेषताएँ उन्हें सभी दलों के बीच लोकप्रिय बनाती हैं। संयोग देखिये कि प्रणब मुखर्जी ने उसी अगस्त महीने की ३१ तारीख को इस संसार से विदा ली, जिस अगस्त महीने की १६ तारीख को आज से दो वर्ष पूर्व उनके जैसे ही सभी दलों में बराबर सम्मान रखने वाले अटल बिहारी वाजपेयी का निधन हुआ था। प्रणब दा सदेह अब भले हमारे बीच न हों, मगर अपनी उक्त विशिष्टताओं के माध्यम से राजनीतिक जीवन में सक्रिय लोगों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बनकर उपस्थित रहेंगे।
पीयूष द्विवेदी
लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं. देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में सियासत और साहित्य के विषयों पर निरंतर रूप से लिखते रहते हैं. मूलतः देवरिया जिले से हैं, फिलहाल नोएडा में निवास है. संपर्क - 8750960603

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