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आशा शैली की कहानी – उसका नाम साधू था

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साधू का बुखार था कि बढ़ता ही जा रहा था। पास कोई बच्चा भी तो नहीं था और अगर होता भी तो इस बर्फ़बारी में कौन उसके लिए दवा लेने जाता। रामी भी सुबह-सवेरे की घर से निकली हुई अभी तक नहीं लौटी थीं। बस इतना ही शुकर है कि सवेरे उसे एक कप चाय तो दे गई थी। यही नहीं, लकड़ी का एक मोटा ठेला ;भारी लकड़ीद्ध डालकर आग खूब कर दी थी उसने, वरना सुबह से पड़ने वाली बर्फ़ में साधू खुद भी बर्फ़ हो गया होता।
यूँ मौसम तो कल शाम ही से खराब था। घने बादलों ने दिन ही में अन्धेरा कर दिया था, किन्तु सुबह उठकर जब वह डंगरों को घास डालने गया तो, बर्फ़ लगभग एक इंच जम चुकी थी। मोटे-मोटे धुनी रुई के फाहे जैसे हिमकण बड़ी तेजी से लगातार बरस रहे थे। चुप-चाप, निःशब्द। घर के अन्दर बैठे हुए तो इनके बरसने का पता भी नहीं चलता आदमी को।
बुखार तो उसे कल से ही था, किन्तु उसकी परवाह भी कौन करता। रोज की तरह कल भी वह जंगल से लकड़ी लेने गया था। घर तक वापस आते-आते साधू के दाँत बजने लगे थे। वह चुपचाप आग के निकट ही बिस्तर लगा कर पड़ रहा। फिर तो बुख़ार एक मिनट को भी नहीं उतरा।
साधू ने सोचा उठकर देखें कि बर्फ़ कितनी पड़ चुकी है, लेकिन लकड़ी का भारी भरकम अनघड़ द्वार खोलने की कौन कहे, उससे तो हिल भी न सका। पास ही रखी कुछ लकड़ियाँ उठा कर उन्हें आग में डालकर फूंकें मारने लगा साधू। कमरे के बीचों-बीच बने खुले वर्गाकार कुण्ड में जलती आग ने कमरा खूब गर्म कर दिया था, किन्तु फूंकें मारने से उसके सिर में दर्द होने लगा था। माँ होती तो सिर दबा देती, मालिश कर देती सिर में। काढू ;काढ़ा अथवा जुशाँदाद्ध ही बना कर पिला देती। कष्ट बढ़ जाए और सहन न हो तो माँ ही याद आती है।
अपने फटे-पुराने लिहाफ़ में दुबक कर उसे माँ के बारे में सोचना भी माँ जैसा ही सुहावना लग रहा था। जाने क्या सोच कर माँ ने उसका नाम साधू रख दिया। थोड़ा-थोड़ा याद है, छोटा सा था तो हर समय माँ के साथ ही चिपका रहता। किशोर होने तक भी माँ ही के साथ जंगल में लकड़ी लेने, डंगर चराने, घास-पत्ती लेने जाता रहा। छोटा भी था और माँ का दुलारा भी। मुश्किल से कक्षा पाँच तक पढ़ पाया था वह। उसे तो स्कूल में भी माँ ही याद आती रहती थी।
………..
साधू का बड़ा भाई रतन शहर में पढ़ रहा था। माँ ने बातों ही बातों में अपने लाडले बेटे की सगाई अपनी सहेली की बेटी रामी से कर दी। रामी साधू को पसन्द भी थी। वह भी साधू को पसन्द करती थी। एक ही गाँव के थे सो लकड़ी-घास आदि के लिए जंगल भी इक साथ ही जाने लगे।
फिर एक दिन रतन शहर से ग्याहवीं पास करके गाँव लौट आया। कुछ दिन तो सब ठीक चलता रहा, फिर रामी का जंगल के लिए उसे बुलाना भी बंद हो गया और साधू के बुलाने पर भी रामी उसके साथ जंगल नहीं जाती थी, अब वह अकेले ही जंगल जाने लगी थी। साधू को साथ के लिए नहीं बुलाती। साधू ने सोचा अब वह बड़ी हो रही है, शादी-ब्याह का मतलब समझने लगी है। साधू को हँसी आती थी रामी को कतराते देखकर, इसीलिए वह भी उससे अलग रहने लगा। एक दिन झरने के निकट रामी की खिलखिलाहट सुनकर उसे उत्सुकता हुई। पेड़ों के पीछे उसने रामी के पीछे भागते रतन को देखा। कुछ कहता इससे पहले ही वह पलट कर रतन से लिपट गई। साधू उदास हो कर घर लौट  आया।
साधू ठहरा साधू। माँ को सब बता दिया। माँ ने रतन को डाँट भी लगाई। उनकी सगाई की बात बताने पर रतन ने बड़ी बेशरमी और ढिठाई से जवाब दिया कि हम दोनों एक दूसरे को प्यार करते हैं। यह भी कहा कि बड़ा तो मैं हूँ, पहले शादी मेरी ही होगी और वह भी रामी ही के साथ होगी।
माँ बेचारी क्या करती, चुप हो गई। एक दिन घास काटते पहाड़ी पर से उसका पाँव फिसला और माँ दोबारा नहीं उठी। ओफ्फो!
साधू को लगा धरती-आकाश घूम रहे हैं। उसे फिर सर्दी लगने लगी। लेटे ही लेटे उसने हाथ बढ़ाकर आग कुरेदी और फटा लिहाफ अपने चारों ओर कस कर लपेट लिया। लिहाफ़ और कमरे की गर्मी ने उसे कुछ राहत पहुँचाई और वह फिर से अनचाहे ही अपने अतीत में गुम होता गया।
रामी तो रामी, उसका अपना भाई रतन भी शादी के बाद बेगाना हो गया। दिन प्रतिदिन दोनों का व्यवहार उसके प्रति कठोर होता गया। साधू जंगल में डंगर चराता, लकड़ी-घास लाता, खूड ;पशुशालाद्ध की सफाई आदि भी करता इस पर भी उसे न भरपेट खाने को मिलता और न पूरा कपड़ा ही मिलता बल्कि उल्टे रामी आये दिन उसे झिड़कती, गालियाँ देती और कभी-कभी तो रतन से उल्टी-सीधी चुगली कर अक्सर उसे पिटवा भी देती।
जी-जान से सेवा करने के बदले मिलता उसे अपमान लात-घूँसे, और गाली गलौच। कभी-कभी वह सोचता कि रामी, जो उसे जी-जान से चाहती थी उसके भाई से शादी करके इतनी क्रूर क्यों हो गई है? कुछ भी समझ न आने पर वह चुप ही रह जाता आखिर चारा ही क्या था उसके पास?
……….
उस दिन जब वह शाम को डंगर चरा कर घर लौटा तो पीठ पर लदा लकड़ी का गट्ठर बाहर सलीके से चुनी हुई लकड़ी की खड़ै ;टालद्ध में रखा और सीढ़ियाँ चढ़ गया। ऊपर बरामदे में रखे टोकने से पानी का लोटा भर कर हाथ पाँव धोने लगा तो रामी दूसरे लोटे में गरम पानी ले आई।
‘‘ठण्डे पानी से हाथ-मुहँ मत धोवो, सर्दी लग जायेगी।’’
‘‘…………….’’
‘‘अरे मैं तुम से कह रही हूँ साधू महाराज।’’
‘‘मुझे आदत है।’’ साधू का स्वर चौंकने पर भी बर्फ़ जैसा ठण्डा था।
‘‘मैंने तुम्हें बहुत दुख दिये हैं न?’’ रामी पिघली मोम बनी जा रही थी।
‘‘यह गर्म पानी ले लो।’’ ठण्डे पानी का लोटा लगभग छीन ही लिया उसने, ‘‘आज से हमारा झगड़ा खतम, ठीक है न?’’
क्या कहता साधू? चुपचाप हाथ मुहँ धो कर खाना खाने बैठा तो माश की ताजी दाल के साथ गरम-गरम भात ही नहीं आज तो रामी ने घी भी डाला था दाल में। खाना खा कर तृप्ति का डकार लिया था उसने। सच तो यह है कि माँ के मरने के बाद आज उसे ताजा और भरपेट गरम भोजन मिला था, वरना आधे-अधूरे पेट बासी बचा ही उसका भाग्य बन गया था।
रसोई का काम खतम करके, दिया बुझाकर रामी उसके पास आ बैठी, आज रतन घर में नहीं था। ‘‘अभी तुम जाग रहे  हो…?’’ स्वर में शहद घुला हुआ था।
‘‘तुम यहाँ क्यों आई हो?’’ साधू पोष के महीने में भी पसीने से भीग गया, रतन को मालूम पड़ गया तो…….?’’
‘‘कुछ नहीं होगा। मेरी सगाई तो तुम्हारे साथ ही हुई थी।’’ रामी अजब बेशर्मी पर उतर आई थी, ‘‘इसने मुझे बहकाया। अकल नहीं थी सो बहक गई।’’ रामी उसके बिस्तर में घुसने लगी।
‘‘अरे…..अरे! यह क्या कर रही हो……?’’
‘‘हटो उधर मुझे सर्दी लग रही है, लेटने दो।’’ साधू सरकने की जगह चिंहुक कर खड़ा हो गया। किसी अज्ञात भय व उत्तेजना वश काँपने लगा। वह सोच रहा था, ‘कैसी बेशर्म औरत है?’ रामी खिलखिला कर हँस पड़ी थी,
‘‘साधू! तू तो पूरा साधू ही है।’’
…………………..
द्वार खुलने की आवाज आई तो साधू ने सोचा रामी ही होगी। लिहाफ से मुहँ नहीं निकाला?
‘‘अरे साधू…ऽ…!’’ यह तो गाँव के मास्टर जी थे। ‘‘सुना है तुम्हें बुखार है।’’ साधू ने लिहाफ़ में से सिर निकाला तो मास्टर जी कूण्ड के दूसरी ओर बैठे आग में फूँकें मार कर उसे सुलगा रहे थे। आग जल जाने पर उन्होंने फिर पूछा, ‘‘रामी कहाँ है?’’ कुछ भी उत्तर न पाकर वे उसके निकट चले आये। माथे पर हाथ रखा तो वह तवे सा तप रहा था।
‘‘अरे! तुम्हें तो तेज बुखार है, कोई दवा ली? कुछ खाया?’’ साधू ने केवल न में सिर हिला दिया। कुछ बोला नहीं।
‘‘कमाल औरत है, जरा दया-माया नहीं। लगा रही होगी कहीं गाँव में गप्पें।’’
साधू का गला तो कब से सूख रहा था। पास रखे तामचीनी के मग को हाथ लगाया तो वह खाली था। मास्टर जी उठे और बाहर रखे टोकने ;गागरद्ध से लोटा भर पानी लाकर मग में उलट दिया। फिर सहारा दे कर साधू को उठाया और पानी पिलाया। अपनी जेब से निकाल कर एक क्रोसिन की गोली भी उसे दी और फिर सहारा देकर वापस लिटा दिया।
‘‘कब गई थी?’’
‘‘सवेरे ही……।’’ साधू ने मुश्किल से उत्तर दिया।
‘‘और अब तीन बज रहे हैं।’’ मास्टर जी का चेहरा वितृष्णा से भर उठा। थोड़ी देर बैठ कर वह चले गये। इसके अलावा और कर भी क्या सकते थे वे। साधू एक बार फिर लिहाफ़ में दुबक कर यादों की घाटियों में भटकने लगा।
…………………….
उस दिन रामी के मायके में किसी की शादी थी। बड़े प्यार से उसके निकट बैठ गई। साधू निहाल हो रहा था।
‘‘एक बात कहूँ ?’’
‘‘……………..।’’ साधू उसका मुहँ देखने लगा।
‘‘जो जेवर तुम्हारे पास हैं, आज पहनने को दे दो न।’’
‘‘अरे…….वे तो कल भी तुम्हारे थे आज भी तुम्हारे हैं, यह लो।’’ साधू ने ट्रंक की चाबी जेब से निकालकर उसके हाथ में पकड़ा दी। लगभग दो तोले सोने के कान के भारी बाले, डेढ़ तोले का चाक, ;बालों में बाँधा जाने वाला किल्प जो सुहाग का चिन्ह होता हैद्ध चाँदी का हार, शंग्गल ;तगड़ीद्ध ये सब जेवर साधू की माँ ने उसके लिए रख छोड़े थे, जो अभी तक उसके पास ही थे। रामी जेवर लेकर चली गई।
तीन दिन बाद मायके से लौटी तो साधू बड़े चाव और स्नेह भाव से आगे बढ़ा और सामान उठा लाया। रामी बिना कुछ बोले अन्दर चली गई। उसने साधू की तरफ देखा तक नहीं। उसे उखड़ा देख साधू हैरान सा सोचने लगा शायद किसी से लड़कर आई होगी, मूड बिगड़ा हुआ है। तभी रामी अन्दर से चिल्लाई,
‘‘अरे ओ बैल……अभी तक आग भी नहीं जलाई? कहाँ मरे हुए थे अब तक?’’ साधू को जैसे लकवा मार गया। वह सच्चाई का सामना करने के लिए तैयार होता कि तभी फिर उसे सुनाई दिया,
‘‘सोचा होगा, नौकरानी आ गई है, कर लेगी खुद ही।’’ जवाब न मिलने पर रामी बिफर गई थी, बहुत देर तक बड़बड़ाती रही किन्तु उसे तो कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था। धरती आकाश घूमते दिखाई दे रहे थे।
………………
ठण्डी हवा का झोंका सर्र-सर्र गिरती बर्फ़ के कुछ फाहे भी अपने साथ ले आया था। शायद मास्टर जी ने दरवाजा ठीक से बन्द नहीं किया। बर्फ़ शायद कुछ कम हो गई थी। हवा बादलों को उड़ा तो रही थी लेकिन अभी बर्फ बन्द नहीं हुई थी। उसका बुखार बढ़ रहा था। प्यास भी लगी हुई थी, गला सूख रहा था। लग रहा था, पूरे हलक में काँटे चुभ रहे थे। मग को हाथ लगाया तो वह खाली था और पानी बाहर बरामदे में था। साधू ने फिर एक बार दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन कामयाबी कहीं दूर-दूर तक नजर न आई।
सवेरे से कमर तोड़ बुखार और बिना कुछ खाए-पिए भारी दरवाजा खुलना तो दूर हिला तक नहीं। उल्टा उसके लड़खड़ाते कदम मिट्टी के तेल के गैलन से जा टकराए। गैलन उलट गया। साधू का रोम-रोम सिहर उठा। फटी-फटी आँखों से वह भल-भल कर गैलन से बहते मिट्टी के तेल को देख रहा था जो उसके मैले-फटे बिस्तर और लकड़ी के फर्श दोनों को एक साथ भिगो रहा था। घबराहट में उसे यह भी सुध न रही कि वह गैलन को सीधा तो कर दे ताकि बाकी का तेल न बह सके।
उसे ऐसा ही एक दिन याद आ गया जब मिट्टी का तेल फैल जाने के दण्ड स्वरूप उसे खाना नहीं मिला। भूखे रहने की खीज उसने रामी के पाले हुए कुत्ते पर उतारी थी। बदले में रामी ने उसे झूठी चुगली लगा कर रतन से इतना पिटवाया कि उस के हाथ की हड्डी भी उतर गई। शरीर में कई दिन दर्द रहा।
इस मार की याद आते ही डर के मारे उसकी आँखें गड्ढ़ों से बाहर उबल आईं। तेल अभी भी फ़र्श को भिगो रहा था। पूरी ताकत लगा कर उसने आग में फूँक मारी। आग जल उठी, सरकते-सरकते वह अपने भीगे बिस्तर का वह सिरा जो मिट्टी के तेल से तर बतर था आग के निकट ले गया और बिस्तर को अपने चारों ओर कसकर लपेट लिया। बिस्तर के साथ ही मिट्टी के तेल से भीगे लकड़ी के फर्श ने भी आग पकड़ ली। छत पर पड़ी बर्फ़ पिघलने लगी थी। छत लकड़ी से बने घर की आग से तप गई थी। छत से उठने वाले धुएँ ने साधू को सारी यातनाओं से ऊपर उठा दिया। वहाँ, जहाँ न रामी थी, न रतन था। बस थी तो साधू की माँ, जो उसे अपने आँचल में समेट लगी।

3 टिप्पणी

  1. शानदार कथा। पहाड़ के लोगों की कठिन जीवन पद्धति, पहाड़ी अंचल की चीजों,स्थानों के लिए निर्धारित शब्दों के माधुर्य व पल पल के संघर्ष से सजी है यह कहानी। बस कुछ सवाल हैं जो पाठक को परेशान करते हैं; मसलन रामी के अत्याचार सहता साधु कोई विद्रोह क्यों नही करता ? रतन को रामी का व्यवहार क्यो नहीं दिखता? सबसे बड़ी बात यह कि आत्मघात करना करना कोई अन्तिम विकल्प नहीं होता तो भी साधु यही क्यों चुनता है? आखिर में यह कि इस कहानी का आत्मघाती नायक क्या सन्देश दे रहा?

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