विधु विनोद चोपड़ा, एक ऐसे फिल्म निर्देशक हैं जिनकी फ़िल्में भारतीय व्यवस्थाओं की कमियों को उजागर कर, उन पर चोट कर सकने की ग़ज़ब की क्षमता रखती हैं। ‘थ्री ईडियट्स’ एक ऐसी ही फिल्म थी, जिसकी गूंज आज भी सुनाई पड़ती हैं।
अब आज के संदर्भ में जिस फिल्म की बात हो रही है… सिनेमाघर से लेकर अब यह फिल्म ओटीटी के प्लेटफार्म पर भी स्ट्रीम  हो रही है – 12 वीं फेल! विधु विनोद चोपड़ा द्वारा लिखित और निर्देशित यह फिल्म अनुराग पाठक के उपन्यास “ट्वेल्थ फेल” पर आधारित है।
इस फिल्म में विक्रांत मैसी, मेधा शंकर, संजय बिश्नोई और हरीश खन्ना मुख्य भुमिकाओं मे हैं।यह फ़िल्म 27 अक्टूबर 2023 को रिलीज़ हुई।सिनेमा घरों से निकल कर अब यह फिल्म ओटीटी प्लेटफार्म पर आने से इसकी पहुंच अब  हर उस किशोर युवा या आम जन तक हो गई है जो इसे अपने समय और अपनी सुविधा के अनुसार देखना चाहता है।
फिल्म की शुरुआत भी रोचक है। चंबल इलाके के एक गांव में एक ईमानदार पिता अपनी बेटी को हृदय सम्राट स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई जी की प्रसिद्ध कविता की पंक्तियां सुनाता और याद कराता दिखलाई पड़ता है… ‘हार नहीं मानूंगा…’ यहीं से फिल्म के विद्रोही और सच्चाई के तेवर से लबरेज़ फिल्म का अंदाज़ा हो जाता है।
यह फिल्म आज के परिदृश्य से मेल खाती है। यूं भी आत्मनिर्भर होते युवाओं से भरे पूरे, नई शिक्षा नीति से ओतप्रोत देश को ऐसे ही सिनेमा की महती जरूरत भी है जो ग्लोकल से ग्लोबल होते भारत को उसकी जन शक्ति की महत्त्वता का विश्वास दिला सके। विक्रांत मैसी ने असली हीरो मनोज कुमार शर्मा के जीवन संघर्ष को बखूबी निभाया ही नहीं वरन जिया भी है।
फिल्म गांव कस्बों में शिक्षा व्यवस्था की बदहाली और दयनीय दशा और भ्रष्टाचार का भयावह चेहरा बड़े ही नैसर्गिक ढंग से दिखलाती है। पुलिस का एक ईमानदार अफसर दुष्यंत सिंह का आना, नकल बंद करवाना और फिल्म के किशोर वय के हीरो का उन जैसा अधिकारी बनने की इच्छा पर उसे चीटिंग ना करने का मंत्र देना एक रोचक और व्यवहारिक पुट है। पुलिस की ज्यादतियों का विरोध और फिर बड़े अफसर बनने की तमन्ना लिए ग्वालियर और अमीर ठेकेदार के लड़के के साथ दिल्ली के कोचिंग गढ़ मुखर्जी नगर आना… हिंदी माध्यम से यूपीएससी सिविल सर्विसेज में बैठने की संख्या और सफल युवाओं का प्रतिशत इस परीक्षा की महत्वता को बयां करने का अंदाज़ बेहद संवेदनशीलता से बताया गया है।
फिल्म में लगातार सिविल सर्विसेज में प्रयास दर प्रयास करने वाले युवक ‘गौरी’ का किरदार  और असफल रहने पर  टी स्टाल को खोलना और ‘री-स्टार्ट’ के मंत्र को भावी और प्रयासरत युवाओं को बताना बेहद नेचुरल बन पड़ा हैं। सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करते युवा जब चाय पर हिंदी माध्यम और विशेष रूप से ग्रामीण युवाओं का दिल्ली में पढ़ाई के लिए साधनविहीन अवस्था में आना ! साधनसंपन्न युवाओं की मानसिकता और ‘गौरी ‘के माध्यम से उनकी पीड़ाओं आकांक्षाओं को बताया जाना, विधु विनोद चोपड़ा के कुशल निर्देशन की बानगी को बयां करता है।
फिल्म की कहानी बेहद कसी हुई और गतिशील है। फिल्म के नायक द्वारा  दो बार सिविल परीक्षा प्रीलिम में सफल रहना और तिस पर भी यह टिप्पणी की यस और नो से प्रीलिम तो क्लियर हो सकता है, मेन्स नहीं। कोचिंग संस्थानों की भी खबर और उनके द्वारा सफल परीक्षार्थी की सच्चाई और प्रचार प्रसार के घटिया हथकंडों को भी प्रभावी रूप से प्रदर्शित किया गया है।
फिल्म में नायिका की एंट्री भी यहीं से हुई है जो कहानी की कसावट को बढ़ाती ही है। निर्देशक ने मुंबईया फिल्मी फॉर्मूले को न लगाकर और गाने अन्य मसालों का प्रयोग ना करके फिल्म के उद्देश्य को एक गति और दिशा दी है।
फिल्म में सिविल सर्विसेज में क्या, क्यों, और कैसे? तैयारी का ब्यौरा बहुत ही सहज और आसान शब्दों और डायलॉग द्वारा और पात्रों द्वारा बताया गया है। कुछ ही सेकंड में सोच कर, रण नीति तैयार कर, गति-शक्ति से मेन्स परीक्षा में उत्तर लिखना सतत प्रयास और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ही संभव होता है।यहीं पर युवाओं को संदेश है कि वे लगातार अभ्यास से ही इस लक्ष्य को साध सकते हैं।
फिल्म में नायक का दो बार गांव लौटना, परिवार की स्थिति, आटा चक्की में 12 से 15 घंटे कार्य करना,फिल्म की रील और रियल के अंतर को पाटते से लगते हैं।
फिल्म के आखिरी भाग में यूपीएससी भवन और फिर इंटरव्यू के दृश्य संवाद तथा नायक की वाक पटुता, तार्किकता और समयानुकूल एडजस्ट होकर निडर और स्पष्ट बात को कहना,साफ और स्पष्ट अंदाज़ की बानगी दर्शकों के सामने प्रस्तुत करते हैं।
फिल्म के अंत में कोचिंग व्यवस्था का वीभत्स चेहरा पुनः दिखलाई पड़ता है। कुल मिलाकर फिल्म बेहद उद्देश्यपूर्ण और प्रेरणादायक है।

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