मनीष बादल की ग़ज़लें
हम देखते ही रह गये बस ख़्वाब आपके
बस बेवफ़ाई आपकी अच्छी नहीं लगी
हम ख़ुशबुओं से आपकी हैं तर-बतर हुए
हम आपकी दो आँखों का तारा न बन सके
हमको डुबो के जान कभी लेंगे ये ज़रूर
ये ख़्वाब है या है ये हक़ीक़त बताइए
जज़्बात से यूँ खेलना है शौक़ आपका
हम आपकी जफ़ा पे भी बस ये दुआ करें
‘बादल’ इसी उमीद पर अबतक है जी रहा
हम तो फ़िदा हुए हैं यूँ हुस्न-ओ-शबाब पर
उनके बग़ैर ज़िन्दगी ऐसी फ़ना हुई
झुकती हुई निगाह ने देखा कुछ इस तरह
हमको तो जीतनी ही थी बाज़ी वो प्यार की
हरदम ही जिनके वास्ते ख़ुद्दार हम रहे
जब जाँ पे आ गयी तो किया हमने इक सवाल
तारीफ़ सारे कर रहे ‘बादल’ की आजकल
उठा हूँ दर से तेरे जब भी, ये मलाल रहा
उसी से प्यार मुझे था उसी से पर्दा था
उसे मिला है कोई तजरबा बुरा शायद
मेरे ख़याल में वो घर बना के यूँ हैं बसे
छिपा के अश्क़ मैं आँखों में, झूठ कहता हूँ
वो चाहता है उसे दफ़्न कोई राज़ मिले
फिर एक बार सितम कर रहा है वो मुझपर
अगर जो चाह लो दिल से तो क्या नहीं हासिल
सब ने हैं पकड़े हाथ में ख़ंजर तो क्या करें
बस इसलिए ही उसकी है बे-नूर शख़्सियत
उसको क़लम की धार से था बोलना बहुत
नदियों ने मिल के कोशिशें तो लाख कीं मगर
इक वक़्त ही है सबसे बड़ा आज बादशाह
माया व मोह से चले सुख-दुःख का कारवाँ
कलियुग में पाप देख इसे बदनाम कर रहे
जन्नत जो है ज़मीन का वो अम्न खोजता
‘बादल’ है पिघले मोम-सा हर दर्द देखकर
ख़ुद से ख़ुद की कीजिए पहले शनासाई मियाँ
बस तभी इक-दूसरे से ये लिपट चलती रहीं
चार दिन की ज़िन्दगी मे क़र्ज़ साँसों का मिला
ख़ूबसूरत शै में ही, धोखे मिले अक्सर छिपे
पहले हम जज़्बात में, बहकर लुटाते जान थे
इक ज़रा-सी बात पर रिश्ते उधड़ते हैं दिखे
चैन से जीना है पगले तो नज़रिये को बदल
देखिए, सीधा बहुत है, दिल से रिश्ता अक़्ल का
तुमने क्या ‘बादल’ को बच्चा ही समझ थोड़ी-सी दी
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मनीष बादल आपकी ग़ज़ल पुरवाई पत्रिका में पढ़कर ख़ुशी हुई ।
सभी एक से बढ़कर एक लाज़वाब
शुभकामना
Dr Prabha mishra