Sunday, June 7, 2026
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उखड़ती साँसों को पहनाईं हथकड़ियां..

यदि मैंने स्वयं यह वीडियो टीवी पर नहीं देखा होता, तो मैं कभी विश्वास नहीं कर सकता था कि किसी देश की पुलिस इतनी अधिक क्रूर और निर्दयी हो सकती है। यह वीडियो 18 वर्षीय श्वेत युवा हेनरी नोवाक की हत्या से संबंधित था, जिसकी 23 वर्षीय सिख युवक विक्रम डिगवा ने चाकू से गोदकर हत्या कर दी थी। ख़ून से लथपथ हेनरी नोवाक गिड़गिड़ाकर कह रहा था, “मैं साँस नहीं ले पा रहा हूँ…”, मगर पुलिस अधिकारी उसके हाथ पीठ के पीछे ले जाकर उसे हथकड़ी लगा रहा था और उसे बता रहा था कि उसे गिरफ़्तार किया जा रहा है तथा उसके कानूनी अधिकार क्या हैं।

दरअसल, यह हादसा दिसंबर 2025 में साउथैम्प्टन क्षेत्र में घटित हुआ था। रात के समय भारतीय मूल के सिख परिवार का 22/23 वर्षीय युवक विक्रम डिगवा अपने कुछ दोस्तों के साथ सड़क किनारे मौज-मस्ती कर रहा था। उसी दौरान हेनरी नोवाक अकेले कहीं से वापस अपने घर की ओर जा रहा था। विक्रम के समूह ने नोवाक पर कुछ टिप्पणियाँ कीं, जिससे बहस शुरू हो गई। इसके बाद विक्रम डिगवा ने अपना कृपाणनुमा छुरा निकालकर हेनरी नोवाक पर जानलेवा हमला कर दिया।

हेनरी नोवाक वहीं ज़मीन पर गिर गया। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, हालात से घबराकर विक्रम या उसके भाई ने स्थानीय पुलिस को फ़ोन किया और कहा कि एक गोरे युवक ने उन पर नस्ली टिप्पणियाँ करते हुए हमला किया तथा उसकी पगड़ी गिरा दी। पुलिस ने नस्ली हमले की सूचना मिलते ही तत्काल कार्रवाई की। आरोप है कि उन्होंने परिस्थितियों को समझने के बजाय विक्रम की बात को सच मानते हुए हेनरी नोवाक को हथकड़ी पहनानी शुरू कर दी। उनके लिए नस्ली टिप्पणी, छुरा मारने की घटना से अधिक गंभीर प्रतीत हुई। हालाँकि, हेनरी नोवाक की मृत्यु के बाद उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

ध्यान रहे कि हेनरी नोवाक साउथैम्प्टन विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहा था, जबकि विक्रम डिगवा के संबंध में न तो किसी शैक्षणिक रिकॉर्ड की जानकारी उपलब्ध है और न ही किसी नौकरी या व्यवसाय की। पुलिस ने विक्रम डिगवा को गिरफ़्तार कर लिया। साथ ही उसकी माँ किरण कौर को भी हत्या में प्रयुक्त हथियार को छिपाने तथा साक्ष्य मिटाने के आरोप में हिरासत में ले लिया गया।

दिसंबर की उस घटना पर अदालत का निर्णय जून 2026 में आया, जिसके अनुसार विक्रम को उम्रकैद, यानी कि 21 वर्ष के कारावास की सज़ा सुनाई गई। मगर उसकी माँ किरण कौर को अभी सज़ा सुनाई जानी है। ऐसे में पुलिस ने वह वीडियो जारी कर दिया, जिसमें हेनरी नोवाक के जीवन के अंतिम पल स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। पुलिस का क्रूर स्वरूप साफ़ देखा जा सकता था। इससे पुलिस की मानसिकता का भी भली-भाँति अनुमान लगाया जा सकता है।
इस वीडियो ने ब्रिटेन के मीडिया में एक तूफ़ान-सा ला दिया। राजनीतिज्ञ इस हत्या और उस पर पुलिस के व्यवहार को लेकर सरकार से सवाल पूछने लगे। प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर चुप्पी साधे रहे और अंततः राजनीतिक दबाव के चलते उन्होंने संसद में इस हत्या की दबे शब्दों में निंदा की। मीडिया में वर्तमान प्रधानमंत्री का वह वक्तव्य भी वायरल हो गया, जो उन्होंने अमेरिका के एक अपराधी जॉर्ज फ़्लॉयड की पुलिस हिरासत में मृत्यु पर दिया था। उस समय सर कीर स्टार्मर विपक्ष के नेता थे।

वर्तमान प्रधानमंत्री और उनकी सहयोगी एंजेला रेनर ने उस समय लेबर पार्टी के सभी कर्मचारियों को भेजे गए एक संयुक्त संदेश में कहा था कि वे “पुलिस हिरासत में जॉर्ज फ़्लॉयड की मौत से स्तब्ध और क्रोधित हैं” तथा “यह देखकर भयभीत हैं कि शांतिपूर्ण ढंग से विरोध करने के अपने अधिकार का प्रयोग कर रहे प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने बल प्रयोग किया है।”
“समाजवादी और नस्लवाद-विरोधी होने के नाते, हम अश्वेत लोगों के प्रति पुलिस की बर्बरता के विरुद्ध खड़े होने वालों के साथ पूरी एकजुटता से खड़े हैं।” दोनों नेताओं ने अमेरिकी पुलिस के आचरण पर टिप्पणी करते हुए कहा।
उन्होंने आगे कहा, “हम राष्ट्रपति ट्रम्प की प्रतिक्रिया तथा जॉर्ज फ़्लॉयड की हत्या के मद्देनज़र उनकी कार्रवाई की निंदा करने में हमारी अपनी सरकार की विफलता से स्तब्ध हैं।”

उन दिनों ब्रिटेन में एक वाक्य बहुत अधिक वायरल हुआ था- “अश्वेत जीवन भी मायने रखता है” (Black lives also matters)।

ब्रिटेन में नस्लवादी टिप्पणी को एक गंभीर अपराध माना जाता है। पुलिस के व्यवहार से ऐसा सोचना वाजिब लगता है कि वहाँ स्थानीय श्वेत निवासियों और प्रवासी समुदायों को लेकर पुलिस और कानून की सोच अलग-अलग है। अर्थात् नस्ली भेदभाव केवल बहुसंख्यक श्वेत ही कर सकते हैं। इस मामले में गोरों के लिए अलग कानून है और प्रवासी समुदायों के लिए अलग।

‘पुरवाई’ पत्रिका को वह विधेयक भी याद आता है, जिसे भारत की संसद में कांग्रेस सरकार ने प्रस्तुत किया था और जिसे ‘सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम विधेयक, 2011’ कहा गया था। इसके अनुसार सांप्रदायिक हिंसा की स्थिति में उस क्षेत्र की बहुसंख्यक आबादी को उत्तरदायी माना जाएगा। ऐसा प्रतीत होता है कि ब्रिटेन की लेबर पार्टी और भारत का वर्तमान विपक्ष कुछ समान सोच रखते हैं।

वैसे, हेनरी नोवाक की हत्या हाल ही में उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद में हुई सूर्या चौहान की हत्या की भी याद दिलाती है, जिसे ईद के अवसर पर असद नामक युवक ने अपने मित्रों के साथ मिलकर अंजाम दिया था। कहा जाता है कि जैसे विक्रम के मामले में उसकी माँ किरण कौर पर भी आरोप लगे, उसी प्रकार इस मामले में असद के पिता पर भी संदेह व्यक्त किया जा रहा है।

ज़ाहिर है कि राजनीतिज्ञ परिस्थितियों का लाभ उठाते ही हैं। ब्रिटेन की रिफ़ॉर्म पार्टी के नेता नाइजल फ़राज ने वर्तमान सरकार पर आरोपों की झड़ी लगा दी। नाइजल फ़राज ने कहा कि पुलिस द्वारा चाकू से घायल व्यक्ति के साथ किए गए व्यवहार पर उन्हें “तीव्र आक्रोश” है, क्योंकि बॉडीकैम फ़ुटेज में मृतक किशोर को ग़लत तरीके से हथकड़ी पहनाते हुए देखा जा सकता है।

दक्षिणपंथी नेता टॉमी रॉबिन्सन ने X पर दावा किया कि हेनरी नोवाक की “नस्लवादी पुलिस नीतियों के कारण हत्या हुई, जो श्वेत लोगों को निशाना बनाती हैं।” साथ ही, टॉमी रॉबिन्सन ने एक रैली का भी आह्वान किया। अमेरिकी अरबपति एलॉन मस्क ने इस पोस्ट को साझा किया, जिससे यह संकेत मिलता है कि वैश्विक आंदोलनकारी और ऑनलाइन समूह इस प्रकार की घटनाओं को किस प्रकार बढ़ावा दे सकते हैं। एलॉन मस्क ने यह प्रस्ताव भी रखा कि एक निजी जासूस की सेवाएँ लेकर इस हत्याकांड की स्वतंत्र जाँच कराई जाए। इस पर होने वाला व्यय वहन करने की इच्छा भी उन्होंने व्यक्त की।

हर तरफ़ एक ही आवाज़ सुनाई दे रही है कि उन पुलिस अधिकारियों पर मुक़दमा चलाया जाए, जिन्होंने हेनरी नोवाक के साथ अमानवीय व्यवहार किया। उच्चाधिकारी संबंधित पुलिसकर्मियों का बचाव करते दिखाई दे रहे हैं, किंतु उनका प्रयास सफल नहीं हो पा रहा है।

मगर एक बात हैरान करने वाली है कि पूरे सिख समुदाय ने इस हत्या की निंदा की है और गुज़ारिश भी की है कि इस बेवकूफ़ी भरी हरकत के कारण पूरी सिख कौम को कटघरे में ना खड़ा किया जाए। गुरुद्वारे के ज्ञानियों से लेकर भारतीय मूल के सांसदों ने भी यही अपील की है।

एक बात हैरान करती है कि ब्रिटेन में आम नागरिक और विपक्षी दल चाहते हैं कि सभी के लिए समान नियम और कानून हों, जबकि भारत में विपक्षी दल नहीं चाहते कि सभी के लिए समान नियम-कानून लागू किए जाएँ। एक भारतीय मूल का व्यक्ति, जो ब्रिटेन में रहता है और दोनों देशों से प्रेम करता है, हैरानी से यह सब देख रहा है और सोच रहा है कि वास्तव में सही क्या है।

तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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13 टिप्पणी

  1. यह संपादकीय नस्लवाद ,नस्ली हिंसा ,नस्ली सोच और राजनीति को अवसरवादिता और स्वार्थपरता को एक समीकरण में तौलता और पड़ताल करता है।यह बात अब आईने की तरह साफ है कि अल्प संख्यक समुदाय अब क्या इंग्लैंड क्या भारत क्या अमेरिका ,, और इनके बल पर जीते राजनीतिज्ञ एक भयावह संस्करण होते जा रहे हैं।
    संपादक ने भारत का संदर्भ भी औचित्य पूर्ण अंदाज़ में प्रस्तुत किया है कि समान कानून लाना सभी और देश के हित में है।वरना सन 2011में कांग्रेस का कानून लाना कि यदि कोई हमला या उपद्रव होता है तो स्थानीय जन बहुल अाबादी को जिम्मेंवार ठहराया जायेगा ।
    ब्रिटेन और भारत की राजनीति अब एक समानता की ओर बढ़ती जा रही है और कहावत भी याद आती है ,,,हम करें सो लीला ,,तुम करो उत्पात,,,,इसे वर्तमान ब्रिटिश प्रधानमंत्री साहब की अमेरिकन नस्ली हिंसा की टिप्पणियों से साक्ष्य के तौर पर पेश किया गया है ।ताकि पाठक विवेकपूर्ण और औचित्यपूर्ण ढंग से इस संपादकीय को पढ़ें और समझें।
    एक निर्भीक और खरे खरे परंतु मर्यादित संपादकीय हेतु पुरवाई को बधाई।

    • भाई सूर्य कांत जी, इतनी त्वरित एवं सार्गर्भित टिप्पणी हमारे लिये उत्साहवर्धक है… आपने संपादकीय को सही परखा है।

  2. बेहद ग़लत और निंदनीय आचरण तो इसमें भारतीय विद्रूप स्थितियों का संदर्भ आपकी सम्पादकीय को बड़ा और गंभीर बना देता है, ऐसा लगता है पुलिस का आचरण मानवता के खिलाफ़ होता है और राजनीतिक व्यक्ति बहुत ही पक्षपाती

  3. सादर नमस्कार सर…
    बहुत संवेदनशील घटना… क्या हो गया आजकल के युवाओं को… सोचने समझने की शक्ति खो बैठे हैं…
    इसके लिए जो भी दंड विधान है लागू करने के बाद भी मानसिकता नहीं बदलती… आपका अंतिम प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है… हमारे देश में अब विपक्ष वही चाहता है… जो विनाशकारी प्रक्रिया अन्य देशों में चल रही है…।
    सर… जब हम स्वयं को नहीं सुधारते हैं….तो सिस्टम को क्यों दोष देंगे?

    साधुवाद……

  4. आज के बेहद विद्रुप समय और समाज को सामने लानेवाला बेहद चिंतनीय स्थिति को प्रस्तुत करता संपादकीय।
    संतुलित और विचारणीय

  5. Injustice any where is a threaten to justice every where किसी फ़िल्म का डायलॉग है लेकिन जब तब दिमाग़ में कौंधता है । अल्पसंख्यक समुदाय की गरिमा को बनाए रखने के लिए सरकारें प्रतिबद्ध होती हैं सामान्यत:, होना भी चाहिए क्योंकि बहुसंख्यक की भाँति अल्पसंख्यक भी देश के नागरिक होते हैं लेकिन इसका मतलब यह तो कतई नहीं है कि बहुसंख्यक समुदाय को बहुसंख्यक होने का खामियाजा भुगतना पड़ेगा। आज हर देश में माहौल ऐसा बनता जा रहा है कि मनुष्य होने से पहले जाति धर्म वर्ण प्राथमिक हो गए हैं , किसी की सहायता तब की जाएगी जब वो इस बिरादरी का होगा , कोई फ़लाँ धर्म या जाति का है तो वह गुनहगार होगा ही , हमारी यह पूर्व धारणाएँ पूर्वाग्रह टूटने का नाम नहीं ले रहे बल्कि और बढ़ रहे हैं । साफ़ शब्दों में कहा जाए तो मनुष्य आज से सौ साल पहले , जब कम शिक्षा थी ,कम साधन थे ,कम तकनीक थी ,कम संसाधन थे ,कम विकास था ,जितना बँटा हुआ था उससे कई गुना ज़्यादा आज बंटा हुआ है । सबसे भयावह यह है कि आने वाली पीढ़ी को विरासत में भी हम यही दे रहे हैं – यह बहुत खतरनाक होता जा रहा हैजैसे सब बारूद के ढेर पर बैठे हैं । जहाँ तहाँ बस वैमनस्य बढ़ाने वाली बातें या प्रपंची उपदेश । कोफ़्त होती है कि क्या यह समय का दंश है कि तिलक माथा देख कर लगाया जाएगा । फिर तो सारा साहित्य , कला , विज्ञान , प्रगति निर्मूल है । क्या हम फिर से आदिम युग की ओर बढ़ रहे हैं ?
    हाँ एक और बात -उस विधेयक का हवाला क्यों ही देना जो ख़ुद अपनी कमज़ोरी के कारण पारित नहीं हो पाया ।
    आप लगातार अपनी वैश्विक सोच से रचे गए संपादकीय के माध्यम से हम जैसे निहायत देसी बंदों को वैश्विकता से जोड़ रहे हैं , साधुवाद

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