Tuesday, June 30, 2026
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ज्ञान प्रकाश विवेक की ग़ज़लें

1.
जेब ख़ाली हो तो बाज़ार से डर लगता है
घर में रहता हूं तो इतवार से डर लगता है।

ये बनावट ये अदावत ये सियासत तेरी
तेरे अंदर के अदाकार से डर लगता है।

दोस्तो, आपको डर लगता है ग़ैरों से मगर
मुझ को मेरे ही सलाहकार से डर लगता है।

कच्ची दीवार का बैठा हूँ सहारा लेकर
ये भी सच है, इसी दीवार से डर लगता है।

बेख़तर हूं मुझे ये बात पता है लेकिन
सर पे लटकी हुई तलवार से डर लगता है।

शहर छोटा था तो मिलने के वसीले थे कई
अब तो इस शहर के आकार से डर लगता है।

ये तेरा रोज़ का नाटक मैं कहां तक देखूँ
ज़िन्दगी, अब तेरे किरदार से डर लगता है।

2.

यादों की साँकल खटकाना अच्छा लगता है
कभी-कभी किस्सा बन जाना अच्छा लगता है।

दो पल की छुट्टी मिल जाए जब मज़दूरों को
ऐसे में बीड़ी सुलगाना अच्छा लगता है।

नयी किताबें पढ़ता रहता हूं लेकिन यारो
संडे का अख़बार पुराना अच्छा लगता है।

तुम लोगों को दौड़ में आगे आने की चाहत !
मगर हमें पीछे रह जाना अच्छा लगता है।

कमरे में जब आप अकेले गुमसुम बैठे हों
ऐसे में दिलबर का आना अच्छा लगता है।

टेबल पर चाय रक्खी हो, हाथ में पुस्तक हो
यूँ भी कोई जश्न मनाना अच्छा लगता है।

अंक गणित सी चतुराई भी अच्छी है लेकिन
कभी-कभी मूरख बन जाना अच्छा लगता है।

ख़ुशियों से मुठभेड़ कभी हो जाए तो यारो
अश्कों के त्यौहार मनाना अच्छा लगता है।

जैसे अपने हाथों से आकाश पकड़ लेगा
बच्चे का हाथों को उठाना अच्छा लगता है।

3.

ये जो हाथों में है सामान ज़ियादा तेरा
छूट जाए न कहीं रेल का डिब्बा तेरा।

जोड़ के हाथ, तू करती थी नमस्ते मुझसे
मैं नहीं भूला वो मिलने का सलीका तेरा।

ज़िन्दगी, इतनी भी अनबन नहीं अच्छी तेरी
टूट जाए ना कहीं साँस का धागा तेरा।

मैं तो निर्धन-सा मछेरा हूँ मेरा कुछ भी नहीं
मेरे भगवान, ये दरिया ये किनारा तेरा।

ऐ हवा तूने जो शाबाशी, दिये को दी थी
रात भर करता रहा दीप भी चर्चा तेरा।

आज फिर याद करूँगा मैं तुझे जी भर के
आज फिर खोल के रक्खा है शिवाला तेरा।

4.

एक पुराना बूढ़ा शायर कहता है ख़ामोश रहो
कोलाहल पैदा करने से अच्छा है ख़ामोश रहो।

शोर-शराबा, जलसे, उत्सव, रैली, नारे हंगामा
महानगर में आने वालो, सदका है, ख़ामोश रहो।

मेरे घर की दीवारें तो मौन-व्रत पे रहती हैं
मेरे घर की दीवारों पर लिक्खा है ख़ामोश रहो।

दिन भर सूरज आवाज़ों के बीजगणित में ग़र्क रहा
और शाम को सूरज सबसे कहता है ख़ामोश रहो।

चिड़िया ने कल इक बच्चे को जन्म दिया था, सुनते हो
ऊंची आवाज़ों से बच्चा डरता है, ख़ामोश रहो।

बातूनी नगरी में सारे शोर मचाने वाले हैं
तुम इनके पण्डाल में आकर अच्छा है ख़ामोश रहो।

 

ज्ञान प्रकाश विवेक
1875 सेक्टर – 6
बहादुर गढ़ – 124507
ईमेल – [email protected]
मोबाइल – +91 9813491654

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