लबों के सामने ख़ाली गिलास रखते हैं
समुंदरों से कहो हम भी प्यास रखते हैं।
…. फ़राग़ रोहवी
बात जब गिलास की हो रही हो तो नज़र के सामने शीशे का गिलास ही आता है। यदि आप उच्च-मध्यवर्गीय परिवार से हैं तो आप शाम के समय क्रिस्टल से बने गिलास में अपने सुनहरे रंग के पैग के बारे में सोचने लगेंगे, जिसमें बर्फ़ के ऊपर सोड़े के बुलबुले भी हो सकते हैं।
गर्मी का मौसम हो तो हम घर में घुसते ही एक गिलास पानी के बारे में सोचते हैं। मगर हम कभी यह नहीं सोचते कि गिलास को हिंदी में क्या कहते होंगे, और जब हम एक गिलास पानी माँगते हैं तो दो भिन्न भाषाओं के शब्द इस्तेमाल करते हैं- गिलास और पानी।
‘पुरवाई’ के पाठकों के लिए मैंने खोजबीन शुरू की। प्रश्न यह था कि गिलास, और वह भी शीशे का गिलास, भारत में कब और कैसे पहुँचा। गिलास तो भारत में एल्यूमिनियम, पीतल, ताँबा और चाँदी के भी होते हैं। मगर गिलास जैसे आकार का बर्तन जब भारत में मौजूद नहीं था तो भारतीय पानी कैसे पीते होंगे? ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि हम पानी पीते ही न हों।
हम जब भी हिंदी के शब्द खोजना शुरू करते हैं, सीधे संस्कृत की ओर चल देते हैं। ऐसा माना जाता है कि संस्कृत में पानी पीने के लिए जिन पात्रों का प्रयोग किया जाता था, उन्हें जलपात्र, पानपात्र, पानभाजन, पानभाण्ड और चषक कहा जाता था। मगर वर्तमान में इन शब्दों का प्रयोग लगभग नगण्य ही कहा जाएगा, या फिर कहा जा सकता है कि ये शब्द लगभग लुप्त हो चुके हैं।
फ़ारसी और उर्दू से एक शब्द हिंदी में आया- प्याला। मगर इसे भी गिलास के समकक्ष मानना सही नहीं कहा जा सकता। एक बात तो तय है कि गिलास अब केवल हिंदी ने ही नहीं अपनाया, बल्कि इसे भारत की लगभग सभी भाषाओं ने अपने में समेट लिया है।
आम भाषा में गिलास से पहले लोटा, कुल्हड़, कटोरा और कटोरी ही पानी पीने के लिए इस्तेमाल में लाए जाते होंगे। कुछ अंचलों में लोटे का ही एक रूप गढ़वा रहा होगा। इसमें लोटे के साथ एक टोंटी जुड़ी रहती है और इसका उपयोग पूजा के लिए भी होता है। मुसलमानों में इस गढ़वे का इस्तेमाल वुज़ू करने के काम भी आता है। इसलिए इसे वुज़ू का लोटा भी कहा जाता है।
मैंने इस विषय को खँगालते हुए ग्लास और काँच के इतिहास को जानने का प्रयास किया, ताकि आप तक इस विषय की जानकारी पहुँचाई जा सके। जहाँ तक काँच का सवाल है, उसका सबसे पहला उल्लेख मेसोपोटामिया में ईसा से लगभग 3,600 वर्ष पहले मिलता है। मेसोपोटामिया में आज के इराक़, सीरिया, तुर्की और कुवैत के कुछ इलाके शामिल थे। काँच का सबसे प्रारम्भिक उल्लेख सीरिया में मिलता है।
भारत की बात की जाए तो सिंधु घाटी सभ्यता के हड़प्पा में काँच की सबसे पुरानी वस्तु मिली, जो भूरे रंग के काँच का एक मनका है। यह लगभग 1700 ईसा पूर्व का है और दक्षिण एशिया में काँच का सबसे पुराना साक्ष्य पाया जाता है। हड़प्पा आज पाकिस्तान में है। वहीं भारत के हस्तिनापुर में ताम्रपाषाण काल के दौरान काँच की बनी वस्तुएँ मिली हैं। काँच के व्यापक उपयोग का स्पष्ट प्रमाण तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व तक्षशिला में मिलता है। आज के पाकिस्तान में रावलपिंडी के निकट मिले खंडहरों में चूड़ियाँ, मनके, खिलौने और छोटे बर्तन बड़ी संख्या में पाए गए हैं।
हमें याद रखना होगा कि उस कालखंड में काँच का इस्तेमाल तो होता था, मगर काँच के गिलास के उपयोग के कोई प्रमाण नहीं मिलते। ग्लास शब्द अंग्रेज़ी में लैटिन से आया और फिर भारत पहुँचकर गिलास बन गया।
यदि आज हमें गिलास की परिभाषा लिखनी पड़े तो हम आसानी से कह सकते हैं कि- “गिलास एक ऐसा सीधा, खड़ा और छोटा पात्र है, जो आमतौर पर पारदर्शी होता है तथा जिससे कोई भी पेय पिया जा सकता है। इसका तला समतल होता है, ताकि यह मेज़ आदि पर आसानी से टिक सके। इसमें कोई हैंडल या हत्था नहीं होता। लोग पानी, जूस, दूध या अन्य पेय पीने के लिए गिलास का इस्तेमाल करते हैं। गिलास के भीतर का पेय बाहर से भी दिखाई देता है, क्योंकि गिलास प्रायः पारदर्शी होता है।“
ऐसे साक्ष्य मिलते हैं कि पानी पीने के लिए काँच के गिलास का सबसे पहले उपयोग मिस्र में पहली शताब्दी ईस्वी में हुआ। वहीं पहली शताब्दी के अंत तक रोम में आधुनिक आकार के गिलास बनने लगे। पूरे यूरोप में इस पात्र को ग्लास कहा जाने लगा। ज़ाहिर है, यह सवाल मन में उठेगा कि ऐसे गिलास का भारत में आगमन कैसे हुआ होगा।
यह माना जा सकता है कि 15वीं और 16वीं शताब्दी में जब यूरोपीय व्यापारियों का भारत में आगमन हुआ, तो उनके साथ ही ऐसा पात्र भी भारत पहुँचा। यह स्पष्ट है कि इससे पहले न तो ग्लास (गिलास) शब्द भारत में था और न ही ऐसा कोई पात्र। ऊपर बताया जा चुका है कि भारत में लोग पानी पीने के जिन पात्रों का उपयोग करते थे, उन्हें भिन्न आकारों और नामों से जाना जाता था- चषक, चुक्कड़, कुल्हड़, कसोरा, अमत्र, आपानीयकंस, आस्पात्र, कमंडल, गढ़वा, भाजन, करक, प्याला, चसक और लोटा।
यूरोप में जब एक बार ग्लास का निर्माण होने लगा तो फिर विभिन्न पेयों के लिए अलग-अलग आकार के ग्लास बनने शुरू हो गए- वाइन ग्लास, शैम्पेन ग्लास, हाईबॉल ग्लास, लिक्योर ग्लास आदि। ऐसा नहीं है कि चाय के कप में डालकर पीने से शैम्पेन का स्वाद बदल जाएगा। बात केवल इतनी-सी है कि उच्चवर्गीय तबके ने सभ्यता के विकास के साथ-साथ ग्लास के आकार को भी ग्लैमर और नफ़ासत से जोड़ दिया। यहाँ तक कि ग्लास में शैम्पेन और बीयर किस प्रकार डाली जाए, उसका भी अलग से प्रशिक्षण मिलने लगा।
हमारा प्रयास रहा है कि इस संपादकीय में काँच से कहीं अधिक हम पानी पीने वाले गिलास के आकार और इतिहास की बात करें। हमारे जीवन में बहुत-सी चीज़ें ऐसी होती हैं जिनका प्रयोग तो हम जीवन भर करते हैं, मगर उनके बारे में हमें यह जानकारी नहीं होती कि वे हमारे जीवन में आई कहाँ से। वैसे भी भारत के महानगरों में पुरातन भारतीय वस्तुएँ लगभग भुला दी गई हैं और हम विदेशी वस्तुओं से अधिक जुड़ गए हैं।
तो निष्कर्ष यह निकलता है कि गिलास के लिए हिंदी में कोई मूल शब्द नहीं है, क्योंकि गिलास का निर्माण भारत में प्रारम्भ नहीं हुआ था। लैटिन से अंग्रेज़ी में आया ग्लास भारत में आकर गिलास बन गया।
यह भी हो सकता है कि कुछ मित्र इस संपादकीय को पढ़ने के बाद अपना गिलास उठाएँ और दूसरे मित्र के गिलास से टकराकर कहें- “चीयर्स टू द एडिटोरियल!”
